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2.11.19

अभ्यास और वैराग्य - २२

ध्यान धारणा से आगे की स्थिति है। जिस स्थान पर धारणा लगायी, उस स्थान पर प्रत्यय (ज्ञानवृत्ति) की एकतानता ध्यान है। विषय कुछ भी हो सकता है। जहाँ विभूतियों या सिद्धियों की चर्चा की गयी है, वहाँ पर स्थूल से लेकर सूक्ष्म विषय लिये गये हैं। प्रश्न उठ सकता है कि कौन सा विषय लेना है और कब लेना है? या कहें कि हम योग में कितना बढ़ पाये हैं यह कौन निर्धारित करेगा? क्या कोई अन्तःस्थल की यात्रा में हमारा मार्गदर्शन करेगा?

यद्यपि सिद्धियाँ अपने आप में योगसाधना का फल हैं, पर पतंजलि उन पर रुकने और भोग करने के बारे में आगाह करते हैं। अन्तिम उद्देश्य सारी चित्त वृत्तियों का निरोध है। जब तक वहाँ नहीं पहुँचा जाता है, कहीं पर भी रुक जाना बाधा हो सकता है। सिद्धियों का उपयोग तब दो बातों के लिये किया जाता है। पहला सामर्थ्य और अभ्यास के रूप में जो हमें आगे बढ़ने को प्रेरित करती है और सहायक भी है। दूसरा यह एक चिन्ह भी है कि हमारी साधना अब कहाँ तक पहुँची है? योग के बारे में व्यास ने दो तथ्य स्पष्ट कर दिये हैं। पहला है, योगेन योगो ज्ञातव्यो योगो योगात्प्रवर्तते। यह बहुत ही प्रभावशाली वक्तव्य है। योग के द्वारा योग को जाना जाता है, योग से ही योग बढ़ता है। दूसरा तथ्य यह कि योग के प्रति जो अप्रमत्त है वही योग में अधिक रमता है। जो भटकता नहीं है, मदमत नहीं होता है, वही देर तक योग में रहता है। आगे कहाँ जाना है, योग ही स्वयं आपको बता देगा, सहज ही ज्ञान हो जायेगा। एक बिन्दु तक पहुँचने के बाद योग ही आपका पथप्रदर्शक भी है और योग ही पथरक्षक भी।

तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्॥३.२॥ धारणा के विषय पर प्रत्यय (ज्ञानवृत्ति) और एकतानता ही ध्यान है। धारणा में प्रत्यक्ष रूप से चित्त का किसी विषय पर देश बंध किया था, ध्यान में उस विषय पर ज्ञानवृत्ति की एकतानता होती है। उस पर चिन्तन, उसी प्रकार के विचारों द्वारा, सदृश प्रवाह। वृत्ति के रूप में जहाँ धारणा में प्रत्यक्ष था, ध्यान में स्मृति प्रधान हो जाती है। विषय के गुण, धर्म आदि के बारे में वृत्तियाँ बनती रहती हैं, अन्य किसी विषय से अपरामृष्ट, अछूती। उस समय मात्र तीन रहते हैं, ध्येय, ध्याता और ध्यान। ध्याता के ध्यान में ध्येय की कल्पना की जाती है, स्मृति का सहारा लिया जाता है, उपस्थित ज्ञान को प्रयुक्त किया जाता है, उस पर ही रमा जाता है। ध्यान करने के लिये स्थानविशेष की आवश्यकता नहीं पड़ती है। 

ध्यान की प्रक्रिया का उद्देश्य क्या है? ज्ञान, एकाग्रता, एकतानता? एक विषय पर ही जो जानते हैं, ध्यान करने से वह ज्ञान बढ़े न बढ़े पर ज्ञान स्पष्ट अवश्य हो जायेगा। उसके साथ उपस्थित अन्य ज्ञान छट जाने से वह पैना अवश्य हो जायेगा। अन्य वृत्तियों को न आने देने से एकाग्रता बढ़ेगी और एकतानता होने से उसी विषय से संबंधित और वृत्तियाँ उपजेंगी। जो प्रत्यय इस प्रकार होगा, वह प्रभाषित व पूर्ण होगा। जो ज्ञान होगा उससे वह विषय प्रकाशित होगा, स्पष्ट दिखेगा। कहते हैं कि किसी भी विषय के बारे में दृश्य का निर्माण चित्त में ही होता है। हम आँखों से देखते अवश्य हैं, पर चित्र चित्त में ही बनता है। गंध, रस, स्पर्श, शब्द आदि सब के सब चित्त में ही संग्रहित और प्रकट होते हैं। नींबू देखकर स्वयं ही लार कैसे निकल आती है? रूप का विषय तो रस से सर्वथा भिन्न है तो दोनों में संबंध कैसा? यह चित्त के द्वारा ही होता है। समाधि के वर्णन में इस तथ्य को तनिक और समझेंगे। 

योग से हमारी सामर्थ्य बढ़ती है। पर यह सामर्थ्य कितनी बढ़ती है, यह कैसे ज्ञात होगा? योगी सामान्य रूप से अपनी सिद्धियों के बारे में बताता नहीं है, पर कहीं न कहीं से इस बारे ज्ञात हो ही जाता है। इस प्रकरण को हमें शब्द प्रमाण के रूप में लेना होता है, स्वयं के द्वारा सिद्ध करने तक, तब यह प्रत्यक्ष हो जाता है। सत्यार्थ प्रकाश में कहा गया है, जितना सामर्थ्य बढ़ना उचित है, उतना ही बढ़ता है। कहने का तात्पर्य है कि अनुचित नहीं बढ़ता है, मुक्ति प्राप्ति के लिये जितना आवश्यक है। पतंजलि इसे विघ्न भी मानते हैं। यहाँ पर जो रुक जाता है और उसका उपभोग या दुरुपयोग करने लगता है, वह पतित हो जाता है, तो एक सीमा के पार वैसे भी जा नहीं पाता है। जो इसे बस साधन मात्र मानते हैं और समाधि ही जिनका अन्तिम आश्रय है, वे इस पर रुकते ही नहीं हैं, उनके लिये भी इसकी सीमा लाँघने का भी प्रश्न ही नहीं है। मुक्ति के लिये जितनी सामर्थ्य आवश्यक है, उससे अधिक पाने की आवश्यकता ही नहीं।

सांख्य दर्शन में कहा गया है, ध्यानम् निर्विषयम् मनः, ध्यान मन का निर्विषय होना है। एकतानता होने पर विषय एक ही रहेगा, अन्य नहीं। एक विषय ही होगा, क्योंकि कम से कम एक तो रहेगा ही। दूसरी व्याख्या यह हो सकती है कि सांख्य के संदर्भ में ध्यान को अन्तिम स्थिति मानी है, उसमें समाधि से संग लिया है। सांख्य में ही कहा गया है, रागोः उपहत ध्यानम्, राग का उपहत होना ध्यान है। महर्षि दयानन्द कहते हैं कि कम से कम एक घंटा ध्यान में बैठे। ध्यान और उपासना में अन्तर है, उपासना ईश्वर का ध्यान है। यदि कोई आत्म का ध्यान करता है तो वह उपासना नहीं होगी यद्यपि एकाग्रता और एकतानता दोनों में ही रहेगी। मनु कहते हैं, ध्यानयोगेन सम्पश्येत गतिम् अस्यांतरात्मा - ध्यान के द्वारा अन्तरात्मा की गति को देखें। अन्तरात्मा या परमात्मा, दोनों ही हो सकता है, एक में ध्यान, दूसरे में उपासना।

एकाग्रता तो प्राणायाम से ही प्रारम्भ हो जाती है। प्राणायाम, धारणा, ध्यान, समाधि में कालखण्ड का निर्धारण किया गया है, गणितीय ढंग से, कि कम से कम कितनी देर उसे करना चाहिये। निमेष-उन्मेष (पलक झपकाने) को एक मात्रा कहते हैं, इसका कालखण्ड लगभग ८/४५ सेकण्ड का होता है। पूरक(श्वास लेना), कुम्भक(श्वास रोकना) और रेचक(श्वास छोड़ना) में १,४ और २ का अनुपात होता है। १६ मात्रा पूरक, ६४ मात्रा कुम्भक और ३२ मात्रा रेचक, कुल लगभग २० सेकण्ड। २० सेकण्ड का एक प्राणायामकाल, १२ प्राणायामकाल का एक धारणाकाल, १२ धारणाकाल का एक ध्यानकाल और १२ ध्यानकाल का एक समाधिकाल। इसे यदि मिनटों में बदलें तो ४ मिनट का धारणाकाल, ४८ मिनट का ध्यानकाल औऱ ९.६ घंटे का समाधिकाल। यह न्यूनतम है।

अब ध्यान अंधकार में करें कि प्रकाश में? ध्यान भंग न हो, इसलिये अंधकार का सहारा ले सकते हैं। क्या अंधकार को विषय बनाकर ध्यान किया जा सकता है? उत्तर नकारात्मक है। ध्यान में वस्तु के गुण धर्म के बारे में चिन्तन होता है। शून्य पर, अंधकार पर ध्यान करना या कुछ भी विचार नहीं करना ध्यान नहीं है, कम से कम योगदर्शन का ध्यान नहीं है। यह एक सकारात्मक प्रक्रिया है। स्थूल और सूक्ष्म विषयों के अतिरिक्त भावनात्मक विषयों में भी संयम लगता है। विभूतियों के वर्णन में देखेगे कि चार भावनायें, मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा में भी पहले तीन में ही संयम लगता है। उपेक्षा में संयम नहीं लगता है, वह तम है, अंधकार है, अभाव है। ध्यान का निष्कर्ष प्रत्यय है और जिस पर ज्ञान नहीं, जिससे ध्यान के निष्कर्ष न निकलें, वह भला कैसा ध्यान? समाधि में अर्थ पाने के लिये ध्यान में सकारात्मकता आवश्यक है।

अगले ब्लाग में समाधि।

26.10.19

अभ्यास और वैराग्य - २०

पाँचवा बहिरंग प्रत्याहार है। हरण न होने देने का भाव। प्रति आ हृ, प्रति और आ उपसर्ग हैं, प्रति अर्थात विपरीत, आ अर्थात पूरी तरह, हृ धातु का अर्थ है हरण करना। हरण किसका, इन्द्रियों का, हरण किसके द्वारा, विषयों के द्वारा। शब्द, रूप, रस, गंध, स्पर्श आदि विषय हैं इन इन्द्रियों के। कान से सुनना, शब्द। आँख से देखना, रूप। जिह्वा से चखना, रस। नाक से सूँघना, गंध। त्वचा से छूना, स्पर्श। पाँच विषय अपने प्रकारान्तर लिये हुये हैं, असीमित मात्रा में हैं, प्रचुर मात्रा में हैं, सहज उपलब्ध हैं, प्रकृति को गतिमान किये हुये हैं, विविधता बनाये हुये हैं। प्रकृति के पाँच तत्वों का सीधा संबंध इन विषयों से है। शब्द, रूप, रस, गंध और स्पर्श क्रमशः आकाश, अग्नि, जल, पृथ्वी और वायु से संबद्ध हैं।

विषय इतने प्रबल होते हैं कि हर लेते हैं। विषय, इन्द्रिय और मन के संबंध के बारे में व्यास भाष्य में लिखते हैं कि संबंध अयस्कान्तमणि(चुम्बक) और लोहे के समान है। विषय चुम्बक, इन्द्रिय लोहा। इन्द्रिय चुम्बक, मन लोहा। निकटता के आने से इनका प्रभाव पड़ता है। जब विषय पास होगा या उपस्थित होगा तो इन्द्रियाँ खिंची चली आयेंगी। आसक्ति यदि अधिक गहरी हो तो खिचाव और उत्कट हो जाता है, बलवान हो जाता है। जब इन्द्रिय किसी विषय में प्रवृत्त होती है तो मन भी स्वतः खिंचा चला जाता है, स्वतः सहयोग भी करने लगता है, पहुँचने का प्रयास करता है, साधन जुटाने लगता है। 

इस कार्यशैली को समझने के लिये एक सटीक उदाहरण रथ का है। शरीर रथ है, आत्मा रथी, बुद्धि सारथी, मन वल्गा या लगाम, इन्द्रियाँ अश्व, विषय अश्वपथ। रथ जिस ओर जाता है, जिस ओर उसकी प्रवृत्ति होती है, उसी से यह स्पष्ट हो जाता है कि रथ अश्व संचालित कर रहे हैं या रथी? विवेक नियन्त्रण में है कि मन या इन्द्रिय? रथी भोक्ता है, अपनी इच्छा करे या इन्द्रियों से सहमत हो। जन सामान्य को देख कर तो यही लगता है कि पथ निर्धारित कर रहे हैं कि रथ किस ओर जायेगा। माया का पथजाल प्रकृति को गतिमय किये हुये है। प्रवृत्ति दिशाहीन, असम्यक और अनियन्त्रित है।

प्रत्याहार का अर्थ है, इन्द्रियों का अपने विषय से असम्प्रयोग एवं इन्द्रियों का चित्त के स्वरूप के जैसे हो जाना। प्रश्न यह उठता है कि वाह्य इन्द्रियाँ तो वैसे भी मन के विषय को नहीं जानती है। मन अन्तःकरण है, मन में होने वाली गतिविधियों को जानना या समझ पाना इन्द्रियों के लिये असंभव है, मन सूक्ष्म हैं, इन्द्रियाँ स्थूल। इन्द्रियाँ न ही चित्त की वृत्तियों को समझ सकती है। इसका अर्थ तब यही होगा कि जहाँ मन लगा रहेगा, इन्द्रियाँ उसके विरूद्ध नहीं जायें, मन के कार्य में बाधा नहीं उत्पन्न करें। मन के कार्यों में सहमति हो, अपने विषयों में प्रवृत्त होने की अभिलाषा न हो। जहाँ मन रुक जाये वहाँ सारी इन्द्रिय भी रुक जायें, जहाँ मन चले वहाँ सारी इन्द्रिय प्रवृत्त हो जायें, सहयोग करें। व्यास भाष्य में रानी मक्खी का उदाहरण देते हैं। जहाँ रानी मक्खी जाती है, सारी अन्य मक्खियाँ उसका अनुसरण करती हैं, जहाँ वह बैठ जाती है, सब बैठ जाती हैं।

एक इन्द्रिय को रोकने के उपक्रम में हो सकता है कि कोई अन्य इन्द्रिय अपने विषय के प्रति आकृष्ट हो रही हो। मन एक से हटा पर दूसरे सें लग जाता है। अब उसको रोकने का उपक्रम और उतना ही प्रयास। पर प्रत्याहार में मन के रोकने पर सब रुक जाती हैं और मन के चलने पर सब चलने लगती हैं। एकै साधे सब सधे, सब साधे सब जाय। स्रोत वही है, मन। सब वहीं से संचालित होता है। एक सहज प्रश्न उठ सकता है कि यदि सब मन से ही संचालित होता है, यदि प्रत्याहार करने से ही सारी इन्द्रियाँ वश में आ जाती हैं तो यम, नियम आदि करने का क्या उपयोग? सीधे ही मन को साधें। सिद्धान्त सरल है, व्यवहार कठिन। प्रक्रिया यदि क्रमिक विकास से आये तो ही प्रभावकारी होती है। अर्जुन कहते भी हैं कि चंचलं हि मनः कृष्णः। मन इतना चंचल है कि यह बलपूर्वक हर लेता है और इसे निग्रह कर पाना वायु स्थिर कर पाने से भी अधिक दुष्कर है। कृष्ण का उत्तर था, अभ्यास और वैराग्य। प्रत्याहार एक वैराग्य सी स्थिति है, उसके पीछे अभ्यास की साधना का होना तो आवश्यक है।

पत्थर में एक चोट करने से मूर्ति का स्वरूप नहीं आता है। सहस्रों छोटी बड़ी चोटें करनी पड़ती हैं। मन भी एक बार दृढ़ निश्चय करने से सहम कर नहीं बैठ जाता है। वह उद्दण्ड है और ऊर्जित भी, उसे सारी इन्द्रियों का समर्थन प्राप्त है, वह आपके नियन्त्रण से कब ओझल हो जायेगा, आपको पता भी नहीं चलेगा। मन में जमें हुये संस्कारों को प्रतिदिन क्षीण करना पड़ता है। मन के मैल को प्रतिदिन धोना पड़ता है। काम, क्रोध लोभ, मोह, मद और मत्सर से प्रतिदिन जूझना पड़ता है। एक एक इन्द्रिय को प्रतिदिन समझाना पड़ता है कि आपका पथ रथी के समग्र हित में नहीं है, आपका पथ अल्पकालिक भोग की अभिव्यक्ति है। रथी का हित दीर्घकालिक व्यवस्थाओं में है, संरचनाओं में है, धारण में है, धर्म में है। इन्द्रिय को रोकने का एक क्रम मन को यही संदेश देता है और विषयों के बारे में जो संस्कार बने हुये है, उसे तनिक क्षीण कर जाता है। दिनचर्या का यही सुकार्य है, यही महती उपयोग है। दिनचर्या को हम ऐसे उत्कृष्ट लघु कार्यों से भर दें कि अन्यत्र विचरण का समय ही न हो। एक ऐसा उद्देश्य सामने दिखता रहे कि इन्द्रिय विषय उसके सामने क्षुद्रता से लगें। दिनचर्या सीढ़ी सी है, एक जैसी, हर दिन। यह तो कुछ वर्ष बाद ही पता चलता है कि हम किस ऊँचाई तक पहुँच गये।

प्रत्याहार की सिद्धि से इन्द्रियों की परमवश्यता हो जाती है, इन्द्रियाँ पूरी तरह से नियन्त्रण में आ जाती हैं। प्रत्याहार से काम क्रोध लोभ मोह मद और मत्सर , ये ६ शत्रु नष्ट होते है। मान्यता यह है कि प्रत्याहार का प्रयोग ध्यानकाल में ही होता है क्योंकि व्यवहार काल में तो इन्द्रियाँ अपने विषयों के संपर्क में रहेंगी ही। पर भाष्य कहता है कि इसका प्रयोग ध्यानकाल में तो होता ही है पर व्यवहार काल में भी होता है, पूरे समय।

५ स्तर बताये गये हैं, प्रत्याहार के। प्रथम स्तर है, व्यसन न होना। व्यसन है बार बार विषय पर मन पहुँच जाना, जिसके बिना रहा न जाये। यदि वह न मिले तो अन्य क्रम बाधित हो जाये। किसी अन्य के लिये निर्धारित समय या संसाधन हो पर उसी व्यसन वाले कर्म में लग जाये। नियमित कार्य बाधित होने लगें। मोबाइल देखने में इतना लग गये खाना बनाना भूल गये। चाय नहीं मिली तो दिन भारी लगने लगा। व्यसन न होना इन्द्रियजय है, प्रथम स्तर का प्रत्याहार है। यदि मिले तो ठीक, न मिले तो ठीक, अन्य कर्मों में कोई बाधा नहीं। अहानिकारक विषयों से संयोग दूसरे स्तर का प्रत्याहार है, इन्द्रियजय है। विपरीत न हो, अति न हो, सीमा में रहे, शास्त्रसम्मत हो, यह भी इन्द्रियजय है। तीसरे स्तर का इन्द्रियजय है, विषय आदि से स्वेच्छा से सम्प्रयोग कर पाना। इच्छानुसार प्राथमिकता निर्धारित कर पाना, यदि कुछ महत्वपूर्ण हाथ में है तो अन्य विषयों को टाल पाना, जो निर्धारित किया है उसमें उद्धत हो पाना।

इन तीन स्तरों में इन्द्रियजय में राग, द्वेष, सुख, दुख के भाव भरे हो सकते हैं, पर उनमें किसी एक न एक विमा में इन्द्रियजय किया गया है। चतुर्थ स्तर में राग, द्वेष, सुख, दुख के भाव के बिना ही विषयादि का सेवन। यह कठिन स्तर है पर क्रमिक है। पंचम स्तर है, विषय संयोग शून्यता, विषयों का सेवन ही नहीं करना। यह प्रत्याहार की उच्चतम स्थिति है। जैगीषव्य ऋषि इसे चित्त की एकाग्रता आने के कारण आयी अप्रवृत्ति कहते हैं। मन में प्रछन्न लौल्य रहता है कि चलो आज देखते हैं मन नियन्त्रण में है कि नहीं? हम साधना के किस स्तर पर पहुँच गये हैं? इस स्तर में यह भी नहीं करना है। यही परमवश्यता है, यही प्रत्याहार है।

अगले ब्लाग में अंतरंग योग।

22.10.19

अभ्यास और वैराग्य - १९

आसन में बैठने से प्रयत्नशैथिल्य होता है, शारीरिक उद्वेग कम हो जाते हैं। मन को अनन्त पर स्थिर कर दिया जाता है, इससे मानसिक उद्वेग कम हो जाते हैं। यह एक आदर्श स्थिति है जिसमें योग के आगत अंग स्थिर किये जा सकते हैं। 

पतंजलि कहते हैं कि आसन के स्थिर होने पर ही प्राणायाम किया जा सकता है। तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः॥२.४९॥ उसके(आसन) के होने पर श्वास और प्रश्वास की गति का विच्छेद प्राणायाम है। अब आसन कितनी देर कर लेने पर सिद्ध माना जा सकता है। हठयोग तो कहता है कि ३ घंटे ३६ मिनट तक आसन में स्थिर और सुखपूर्व बैठ लेने से वह सिद्ध होता है। इतनी देर नहीं भी हो पाये तो १५-२० मिनट भी आसन में बैठ लिया जाये तो प्राणायाम किया जा सकता है। अन्दर लेना श्वास है, बाहर निकालना प्रश्वास है, विच्छेद इन दोनों का अभाव है। प्राणायाम प्राणवायु का आयाम है, विस्तार है। विस्तार किस बात का हो, समय के अनुसार हो, या धीरे धीरे श्वास लेने की प्रक्रिया। योगसूत्र तो मात्र विच्छेद की चर्चा करता है। तो यहाँ पर हमें विच्छेद वाला प्राणायाम करने से ध्यान आदि में सहायता मिलती है। अन्य प्रकार के प्राणायाम से अन्य प्रकार के लाभ होते हैं, पर यहाँ पर पतंजलि का उद्देश्य उन सबको न बतलाकर एक विशेष प्रकार का अभ्यास बतलाना है।

तीन प्रकार का प्राणायाम बतलाया है। बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः॥२.५०॥ बाह्य, आभ्यन्तर और स्तम्भ के प्रकार से। देश, काल और संख्या की दृष्टि से। और दीर्घ और सूक्ष्म के भेद से। कुल देखा जाये तो १८ विभेद है। वाह्य में प्रश्वास के बाद विच्छेद कर देना, आभ्यन्तर में श्वास के बाद विच्छेद कर देना, स्तम्भ में बीच में ही विच्छेद कर देना।  कितनी दूर तक श्वास आती या जाती है, कितनी मात्रा में श्वास ली या छोड़ी जा सकती है। काल की दृष्टि से कितने समय तक छोड़ी या रोकी जा सकती है। स्तम्भ में यह प्रवाह कभी भी रोक दिया जाता है, बीच में ही। उद्घात १२ श्वास-प्रश्वास के कालखण्ड को कहते है। उतनी देर रोकना एक उद्घात कहलाता है। ३ उद्घात तक श्वास लेना, रोकना और छोड़ना सूक्ष्म प्राणायाम कहा जाता है, धीरे धीरे। दीर्घ में अधिक मात्रा में, अधिक वेग से और एक उद्घात में श्वास ली और छोड़ी जाती है। भ्रस्तिका, कपालभाती, अनुलोमविलोम आदि प्राणायाम के प्रायोगिक निष्कर्ष हैं। कैसे, किसको, कब, कितना करना है, यह अभ्यास का विषय है। 

बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः॥२.५१॥ चतुर्थ प्राणायाम प्रथम तीन का अतिक्रम है। पहले तीनों  में एक विशेष क्रम था। यह भी एक तरह का स्तम्भ है पर इसमें कोई क्रम नहीं है। स्तम्भ में एक क्रम रहता है और उस हेतु अभ्यास से सिद्धि होती जाती है। इसमें पहले तीन के अभ्यास के साथ साथ प्राण पर पूर्ण नियन्त्रण होता है, कहीं भी, कभी भी और कैसे भी।

ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्॥२.५२॥ मलीनता हटने लगेगी तो आवरण हट जाता है और सब दिखने लगता है। विवेक के ऊपर कर्म का आवरण होता है, प्राणायाम उस आवरण को हटाता है। कर्म इससे क्षीण होते हैं। हर प्राणायाम से प्रतिक्षण क्षीण होते हैं कर्म। विवेक हमारे पापकर्म के क्षीण होने से आयेगा।

प्राणायाम से बढ़कर कोई तप नहीं है। इससे मलसमूह की विशुद्धि और ज्ञानोद्दीप्ति होती है। प्राणवायु न चलने पर मृत्यु हो जाती है। उसको भी अभ्यास के माध्यम से सहन करना, मृत्यु को साक्षात देखना है, यही प्राणायाम का अभ्यास तत्व है। कैसे सबसे पहले श्वास आये, सारा ध्यान और प्रयास वहीं लग जाता है। वही सर्वाधिक आवश्यक हो जाता है। तत्काल तो यही लगता है कि किस तरह से श्वास प्रश्वास प्रक्रिया पुनः प्रारम्भ हो। शरीर एक आकस्मिकता से कार्य करने लगता है, इससे उसकी कार्यक्षमता बढ़ जाती है। एक स्तर तक यह लाभ दायक है पर यदि इसकी अति करेंगे शरीर भी इसकी आकस्मिकता भूल जायेगा, उसका अभ्यस्त हो जायेगा।

प्राणायाम का एक दूसरा पक्ष यह भी है कि मस्तिष्क में गयी अधिक आक्सीजन से मस्तिष्क के मल बाहर आते हैं और मस्तिष्क और निर्मल अनुभव करता है। प्रश्वास की स्थिति में अधिक रहने से बिना आक्सीजन के काम करते हुये जब उसे आक्सीजन की अतीव आवश्यकता होती है तो उस समय श्वास आने पर उसका अधिकतम उपयोग होता है। यदि उदाहरण लें तो उपवास करने के बाद जब भूख सर्वाधिक लगती है तो जो भी खाते हैं वह पच जाता है और शरीर में लगता भी है। आवश्यकता का बोध होने पर उत्तरदायित्व आ जाता है। मस्तिष्क को जब तक लगता रहता है कि प्राण तो स्वतः उपलब्ध है, वह उसका मूल्य नहीं समझ पाता है, उसका पूर्ण उपयोग नहीं कर पाता है। जब न्यूनता की स्थिति आती है तो संसाधनों का उपयोग सर्वोत्तम होता है।

आधुनिक चिकित्सीय विज्ञान इस पर अधिक चर्चा नहीं करता है। बीमारियों और शारीरिक प्रयोगों के कई अच्छे जानकार डाक्टर अपने उपचार के साथ साथ प्राणायाम करने की सलाह भी देते हैं। पिताजी को एक दो पुराने रोगों से बाहर लाने में प्राणायाम ने अद्भुत योगदान दिया है। प्राणायाम करने से किस प्रकार के उपयोगी रसायनों का मस्तिष्क में स्राव होता है, इस पर एक समग्र शोध होना चाहिये।  प्राणायाम प्राणदान करने में सक्षम है, प्राणायाम के चिकित्सीय लाभ अवर्णनीय हैं, बस अति नहीं करना है और एक क्रम बनाये रखना है।

धारणासु च योग्यता मनसः॥२.५३॥ प्राणायाम करने से मन एक स्थान पर टिकता है, सारी धारणाओं में मन योग्य हो जाता है। आगे की साधनापथ में तत्पर हो जाता है।

अगले ब्लाग में प्रत्याहार।


19.10.19

अभ्यास और वैराग्य - १८

अष्टांग योग में ५ अंग बहिरंग हैं, ३ अंग अंतरंग हैं। यम, नियम के साथ आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार बहिरंग में आते हैं। यम और नियम द्वारा सामाजिक और व्यक्तिगत स्थिरता के पश्चात शारीरिक स्थिरता पर साधना बढ़ जाती है। आसन द्वारा शरीर की इन्द्रियों को सहज रूप से रख पाना और अच्छा स्वास्थ्य, ये दो लाभ हैं। प्राणायाम प्राण को स्थिर करता है जिससे विचारों का प्रवाह संयत होता है। प्रत्याहार सारी इन्द्रियों को उनके विषयों से अलग कर लेने का सतत यत्न है। इन पर अभ्यास होने के बाद अंतरंग योग के धारणा, ध्यान और समाधि ही रह जाते हैं, अंतरंग योग को संयम भी कहते है। पतंजलि ने दूसरे पाद तक बहिरंग को और तीसरे पाद से अंतरंग का विषय उठाया है।

स्थिरसुखासनम्, स्थिर या निश्चल सुखपूर्वक बैठने का नाम आसन है। किसी विषय पर संयम करने के लिये अधिक समय के लिये नितान्त प्रशान्त हो बैठना पड़ता है, मन को एकाग्र हो उस विषय पर लगाने के लिये। यदि स्थिर एक आसन में नहीं बैठेंगे और शरीर की स्थिति बार बार बदलते रहेंगे तो मन एकाग्र नहीं हो पायेगा। यदि अतिप्रयत्न कर एक स्थिति पर बैठे रहते हैं और कभी कोई पीड़ा प्रारम्भ हो उठने लगे तो भी मन विचलित हो जायेगा। अनेकों आसन हैं, योगी मुख्यतः किन्हीं एक या दो आसनों में सिद्धि करते हैं। व्यास भाष्य में कई आसनों के नाम दिये भी गये हैं जो कि बताते हैं उस समय भी ये आसन समुचित रूप से प्रचलित रहे होंगे। पद्मासन, वीरासन, भद्रासन, स्वस्तिकासन, पंडासन, सोपाश्रय, पर्यक, कौञ्चनिषदन, हस्तिनिषदन, उष्ट्रनिषदन, समसंस्थान इत्यादि। उस स्थिति में शरीर की सहजता, सहनशीलता, द्वन्द्व सहने की शक्ति ही आसन के प्रमुख आधार हैं।

पतंजलि आगे कहते हैं कि प्रयत्न की शिथिलता से और अनन्त में मन लगाने से आसन सिद्ध होता है। जिस समय हमें लगे कि किसी आसन में लम्बे समय तक बैठने के लिये प्रयत्न विशेष नहीं करना पड़ रहा है और मन शरीर पर न लग कर अनन्त पर स्थिर हो रहा है तो समझना चाहिये कि वह आसन हमें सिद्ध हो रहा है। हर साधक के एक या दो आसन ही होते हैं जिसमें वह बैठकर विषयों पर संयम करता है। यदि लम्बा बैठने से शरीर के अंगों में कम्प आये या रक्त का प्रवाह रुकने से सुन्न हो तो शरीर को प्रयत्न करना पड़ रहा है, वह आसन सहज नहीं है। शरीर की चेष्टाओं को त्याग देने से, ध्यान नहीं देने से छोटी मोटी पीड़ा तो सहन की जा सकती है पर यदि मन का सारा ध्यान शरीर में ही लगा रहा तो वह आसन सिद्ध नहीं होगा, संयम तो तब दूर की बात है। 

हम जिस बिछौने पर बैठते हैं, वह भी आसन कहलाता है, वह भी सुखद होना चाहिये। बहुत पतला है और चुभे या ठंड लगे तो भी आसन सुखमय नहीं होगा। सभी प्रकार के आसनों में मेरुदण्ड सीधा रहना चाहिये। त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरम् , अर्थात वक्ष, ग्रीवा और सिर उन्नत रहना चाहिये। जिसमें किसी प्रकार की पीड़ा या कष्ट हो या शरीर के अस्थैर्य की संभावना रहे, वह अष्टांग योग वाले आसन से परिभाषित नहीं होगा।

यहाँ पर आसन को हठयोग से भिन्न देखना होगा। हठयोग शरीर को हर प्रकार की सीमाओं में प्रयुक्त कर स्वास्थ्य लाभ पाने का नाम है। कठिन मुद्राओं में शरीर को घुमाकर कई बीमारियाँ आदि सही करते हैं हठयोग के साधक पर अष्टांग योग में वर्णित आसन उस स्तर और दिशा का प्रयास नहीं है। शरीर को स्वस्थ रखना तो फिर भी आवश्यक है, उसके लिये समुचित व्यायाम ही पर्याप्त है। देखा जाये तो सूर्यनमस्कार और कुछ मूलभूत आसन ही पर्याप्त है। शरीर में तनिक ऊष्मा आ जाती है और रक्त संचार सुचारू हो जाता है। रक्त संचार ही ठीक हो जाना कई रोगों से मुक्ति दिला सकता है। कितना पर्याप्त है स्वास्थ्य के लिये और कितना योग के अंग आसन के लिये आवश्यक है, यह धीरे धीरे बढ़ाने भर से पता चल जाता है, सीमा समझ में आ जाती है कि अब इसके आगे अति हो रही है।

व्यायाम का एक भाग है आसन। कई प्रकार से शरीर को व्यायाम दिया जा सकता है। व्यायाम अत्यावश्यक है क्योंकि भोजन को पचाने के लिये जठराग्नि इसी से बनती है। आसन की अधिकता और अन्य व्यायाम की न्यूनता भी ठीक नहीं है। व्यायाम की अधिकता और तीव्रता भी घातक है क्योंकि वह वात उत्पन्न करती है जिससे कई रोग हो जाते है। अधिक व्यायाम में उन्मुख होने से हमारा शरीर के प्रति आसक्ति अधिक बढ़ जाती है। शरीराभास की अधिकता योग के लिये हानिकारक है। शरीर एक संतुलन चाहता है, भारी भरकम हाथ और पाँव से भी लाभ नहीं यदि शरीर हल्का और स्फूर्त अनुभव न करे। यदि शरीर एक स्थिति में अधिक समय तक न स्थिर रह पाये तो जिम आदि में जाकर लोहा आदि उठाने का क्या लाभ?

यदि एक आसन में अधिक समय बैठना संभव नहीं हो रहा है तो उचित होगा कि आसन बदल लें। उसी आसन में फिर भी बैठे रहने से और दुख सहने तो यह कहीं अधिक उचित होगा। आसन लगाने में स्थिरता और सुख में यदि किसी को प्राथमिकता देनी हो तो वह सुख को ही दें। आसन सिद्ध होने से द्वन्द्व आदि सहन करने की क्षमता साधक में आ जाती है।

अगले ब्लाग में प्राणायाम और प्रत्याहार।

15.10.19

अभ्यास और वैराग्य - १७

अष्टांग योग चित्त की स्थिर करने के उद्देश्य से हर संभव प्रकार से उसे साधने का प्रयत्न करता है। चित्त की वृत्ति अनेक हैं, अनन्त वर्षों के कर्म और उनके संस्कार संचित हैं। पंच क्लेश है, बिना उन क्लेशों के निवारण के संस्कारों का बनना बन्द नहीं होता है। इतने महत्कर्म को समग्रता और सम्पूर्णता से निर्वाह करना सरल कार्य नहीं है, हर संभव प्रकार से प्रयत्न करना होता है। प्रयास की भिन्नता अन्ततः उद्देश्य की एकाग्रता में समाहित हो जाती है। 

तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान को पतंजलि ने क्रियायोग से भी परिभाषित किया है। इन कर्तव्यों का मुख्य कार्य पंच क्लेशों को क्षीण करना है। अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश पंच क्लेश हैं, इनकी विस्तृत व्याख्या अन्य अंकों में पर यहाँ यही समझना पर्याप्त होगा कि बिना इन्हें क्षीण किये योग में बढ़ना असंभव है। 

तप है, द्वन्द्व को सहन करना। द्वन्द्व प्रकृति का मूल गुण है, जब प्रकृति नहीं होगी या प्रकृति प्रकट हो रही होगी, उस समय सब शून्य ही होगा, अपरिभाषित ही होगा, अव्यक्त ही होगा। फिर प्रकट हुआ, कुछ धनात्मक, कुछ ऋणात्मक, सुख-दुख, शीत-ऊष्ण, रात-दिन, लाभ-हानि, मान-अपमान। हमें स्रोत तक जाना है तो मध्य से जाना पड़ेगा, साम्य से होकर जाना होगा। तभी श्रीकृष्ण ने गीता में समेकृत्वा के भाव को उद्भाषित करने के लिये कहा है। समत्वं योग उच्यते। जब तक द्वन्द्व को सहन नहीं करेंगे, समत्व को प्राप्त नहीं करेंगे। दुख को सहन करना और साथ ही साथ सुख को भी सहन करना। सुख में मर्यादा न खोना और दुख में विश्वास न खोना। जो द्वन्द्व को सहन करना जानते हैं, जो द्वन्द्व को समझने लगते हैं, वे जानते हैं कि ये चक्रीय हैं, सबके जीवन में आते हैं, दिन रात की तरह, शीत ऊष्ण की तरह।

सोने में निखार लाने के लिये, उसे शुद्ध करने के लिये तपाना पड़ता है। तपाने से आन्तरिक अशुद्धियाँ पिघलकर बाहर आ जाती है। तप भी यही करता है। जब भी हम विपरीत स्थिति में जाते हैं, हम तपते हैं। तप क्षमतानुसार ही हो, धीरे धीरे, उत्तरोत्तर, क्रमशः। तप इतना भी न कर दें कि चित्त विचलित हो जाये, स्वास्थ्य बिगड़ जाये। तब तो उद्देश्य ही परास्त हो जायेगा। योगियों के लिये द्वन्द्व साधना भी है और साधना का मापन भी है। कौन कितना सह सकता है, वह उतना बड़ा योगी है। योग में रमे को द्वन्द्व सताना बन्द कर देते हैं।

स्वाध्याय का अर्थ है, मोक्षशास्त्रों का अध्ययन या प्रणव का जप। वेद, उपनिषद इत्यादि। स्व का अध्ययन करना, अपने को केन्द्रित रख कर चलना पड़ेगा। यह स्वार्थ नहीं है। अपने बारे में अध्ययन जिज्ञासा के उन ३५० प्रश्नों का उत्तर पाना है जिससे उपनिषद भरे पड़े हैं। स्वाध्याय अकेले कार्य नहीं करता है, साधक जैसे जैसे योग में आगे बढ़ता है, उसे वेदों और उपनिषदों के गूढ़ वाक्यों का अर्थ समझ आने लगता है।

ईश्वरप्रणिधान का अर्थ है, परमगुरु में अपने सारे कर्मों का अर्पण करना। कर्म महत्वपूर्ण हैं पर उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है कि उन्हें किस भाव से किया जा रहा है। ईश्वर के शब्दरूप प्रणव का जप तो स्वाध्याय में आ ही गया है। जब ईश्वर को केन्द्रबिन्दु में रखकर कार्य किये जाते हैं, व्यक्ति स्वस्थ रहेगा, अपने में स्थित, परमात्मा के साथ स्थित, परमात्मनिष्ठ। वितर्कों के जाल को क्षीण करता हुआ (यमों के विपरीत जो भाव है, वह वितर्क हैं), संसार के बीज के क्षय को देखता हुआ। ऐसा व्यक्ति नित्यमुक्त होता है। यही ईश्वरप्रणिधान है। इससे प्रत्यक् चेतनाधिगम एवं अन्तराय समूह का अभाव होता है, विघ्न नष्ट होते हैं। ईश्वर को समर्पण करने से अकर्ता का भाव आयेगा, निष्काम कर्म हो जायेगा क्योंकि फल की इच्छा ही नहीं रहेगी। इसे यम नियम के अन्त में रखा गया है, यदि यह सम्हल गया तो सब सम्हल जाता है। ईश्वर अपने संकल्प मात्र से उसको समाधि प्राप्त करा देते हैं, यह ईश्वर की कृपा पर आधारित है।

दो प्रकार के लोग होते हैं। कुछ तपपूर्वक योग करते हैं, प्रयत्नपूर्वक करते हैं, व्रत अधिक करते हैं, उनमें यम की अधिकता है। कुछ सहज भाव से करते हैं पर ईश्वर के प्रति श्रद्धा बनाये रखते हैं, शरीर को अकारण कष्ट नहीं देते हैं, प्रवृत्ति और स्वभाव के अनुसार करते हैं। दोनों ही स्वीकार्य है। योग में कोई सहाय्य हो तो उसमें तो आनन्द का भाव आना चाहिये, ईश्वर के प्रति कृतज्ञता का भाव आना चाहिये, अभिमान त्यागकर। वेद में कहा गया है, कर्म के आरम्भ में, मध्य में और अन्त में ईश्वर की प्रार्थना और ध्यान करना चाहिये। ईश्वर प्रणिधान भी प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है, पूर्ण पुरुषार्थ के साथ ही ईश्वर प्रार्थना, आगत विघ्नों को नाश करने के लिये।

पतंजलि कहते हैं कि हिंसा आदि भाव मन में आये तो प्रतिपक्ष की भावना देखनी चाहिये। किसी अपकारी के प्रति नकारात्मक भाव आये, हनन करना, असत्य बात करना, इसकी वस्तु लेना, दारा के साथ व्यभिचार करना आदि का भाव आता है, पाँचों यमो के विपरीत कर्म का भाव। इसकी प्रतिपक्ष की भावना है कि इतने श्रम से तो योग की राह में चल पा रहा हूँ, तब यह कैसे कुत्तों जैसा कार्य कर रहा हूँ। मनुस्मृति में कहा है, जब मनुष्य अपने अधर्म की निन्दा करने लगे, हानि देखने लगे तो वह अपने आप छूट जाता है। उस आचरण से होने वाली हानि को देखना प्रतिपक्षभाव है। हिंसा, अनृत, स्तेय आदि वितर्क कृत, कारित और अनुमोदित, क्रोध, लोभ तथा मोहपूर्वक आचरित तथा मृदु, मध्य और अधिमात्र होते हैं। वे अनन्त दुख और अनन्त अज्ञान के कारण हैं। यही प्रतिपक्षभावन है।


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10.9.19

अभ्यास और वैराग्य - ७

अभ्यास और वैराग्य से योग की किस स्थिति तक पहुँचा जा सकता है? यदि उस स्थिति तक न पहुँच पाये तो क्या पुनः प्रारम्भ से प्रयास करना होगा? यद्यपि प्रक्रिया के प्रारम्भ होने से हमें भौतिक लाभ प्राप्त होने लगते हैं, पर आध्यात्मिक लक्ष्य क्या हैं?

योग का लक्ष्य चित्त की वृत्तियों का निरोध है। अभ्यास और वैराग्य से हम पहले पाँच अंग साधते हैं, इन्हें वाह्य अंग या बहिरंग कहा जाता है, यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार। धारणा, ध्यान और समाधि को सम्मिलित रूप से संयम की संज्ञा दी है, ये आन्तरिक अंग हैं, अंतरंग। बिना बहिरंग साधे अंतरंग संभव भी नहीं है। संयम का लक्ष्य ऋतम्भरा प्रज्ञा होती है या कहें तो वह बुद्धि जो सत्य पर टिकी रहती है। संयम का विषय क्रमशः स्थूल से सूक्ष्म होता जाता है। किस विषय पर संयम करने से क्या सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, इसका पूरा विवरण विभूति पाद में है, उस पर चर्चा फिर कभी।

यहाँ तक की प्रक्रिया को सम्प्रज्ञातयोग कहते हैं, जिससे प्रज्ञा प्राप्त हो। अब चित्त की नयी वृत्तियों का बनना समाप्त हो जाता है पर पुरानी वृत्तियों और तज्जनित कर्मों के कारण संस्कार शेष रहते हैं। कालान्तर में वे संस्कार भी क्षीण हो जाते हैं, उस समय की अवस्था को असम्प्रज्ञातयोग, निर्बीज समाधि या कैवल्य अवस्था कहते हैं। योगसूत्र का विषय यहीं समाप्त हो जाता है, गीता उसके बाद की भी गतियों का वर्णन करती है।

स्थितिप्रज्ञ, विदेह और प्रकृतिलय, ये तीन शब्द हमें योगसूत्र और गीता से प्राप्त होते हैं। स्थितिप्रज्ञ या जिसकी बुद्धि स्थिर हो, विदेह या  देह के अभिमान से रहित और प्रकृतिलय या चित्त को प्रकृति में लीन करने वाले। इन तीनों की समाधि अवस्था को पुरुष, शरीर और प्रकृति की दृष्टि से देखा जा सकता है। चित्त पुरुष और प्रकृति के बीच का संपर्कसूत्र है। उसकी उपादेयता पुरुष को भोग से अपवर्ग तक ले जाने की है। स्थितिप्रज्ञता पर पहुँचते ही चित्त अपने कारण में विलीन हो जाता है, प्रकृति में विलीन हो जाता है, प्रकृतिलय हो जाता है। देह की इन्द्रियाँ तब चित्त के माध्यम से अपने विषयों में लिप्त नहीं हो पाती है, व्यक्ति विदेह हो जाता है।

माँ सीता को वैदेही भी कहते हैं, यह नाम उन्हें अपने पिता राजा जनक से मिला। जनक राजा थे पर विदेह थे। राजकार्य करते हुये भी निर्लिप्त थे। योग के निष्कर्षों की दृष्टि से कर्म, भक्ति और ज्ञान में कोई भेद नहीं है। अपनी क्षमताओं और रुचियों के अनुसार साधन चुनने की स्वच्छन्दता योग को और भी सौन्दर्यमयी बना देती है। योग गृहस्थ या सामाजिक जीवन में व्यवधान नहीं वरन एक वरदान है। योग को समग्रता से न जानने वालों का संशय तो समझ आता है पर जिनके समक्ष योग के इतने सुन्दर उदाहरण इतनी सहजता से उपस्थित हों, उन्हें योग स्वीकारने में संशय हो, यह सामान्य बु्द्धि से परे है।

अभ्यास की परिभाषा, गुण और उसकी अष्टांगयोग में आवश्कता बताने के साथ ही पतंजलि अभ्यास हेतु पाँच साधनों का भी वर्णन करते हैं। श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञा। इनसे अभ्यास शीघ्रप्राप्त और अत्यन्त दृढ़ होता है। शब्द स्पष्ट हैं, फिर भी सरलता के लिये अर्थ बताते चलते हैं।

श्रद्धा - भक्तिपूर्वक विश्वास। जो कर रहे हैं उस पर पूरा विश्वास। संशय चित्त की अवस्था है, प्रभावित हुये तो पगभ्रमित होने की संभावना है, विलम्ब की संभावना है।
वीर्य - मन, इन्द्रिय और शरीर का सामर्थ्य और दृढ़ता। उत्साह बना रहना चाहिये। निष्कर्ष आने में समय लग सकता है, कई कारण होते हैं, पर उत्साह, ऊर्जा और उद्योग अत्यन्त आवश्यक है।
स्मृति - ध्येय की स्मृति, योग की क्रियाओं की स्मृति, अंगों की स्मृति, बार बार। किसी भी कार्य को करने में किसी यम या नियम की अवहेलना तो नहीं हो रही है।
समाधि - चित्त का एकाग्र होना। पूरी ऊर्जा और ध्यान एक ही कार्य में प्रस्तुत हो जाता है। इससे अभ्यास और दृढ़ होता जाता है।
प्रज्ञा - स्वयं के स्वरूप का समुचित ज्ञान, साधन और साध्य का ज्ञान, उपादेय और हेय का ज्ञान।

यावत् जीवेतम सुखम् जीवेत के अनुयायी भले ही छद्म धरे और बुद्धि के बल पर जगत को ढग लें, पर ऐसे लोगों की मानसिकता उद्भाषित होने पर बड़ी छीछालेदर होती है। आप किसी को कितना मूर्ख बना सकते हैं? उद्योग और उत्साह का अभ्यास ग्राह्य हो, कुटिलता और चालाकी त्याज्य हो। योग के पथ पर कितना भी चल सके, कोई हानि नहीं है। यह श्रीकृष्ण की घोषणा हैं, त्रायते महतो भयात् (२.४०), न मे भक्तः प्रणश्यति(९.३१)।

अगले ब्लाग में अष्टांग योग की चर्चा।

24.8.19

अभ्यास और वैराग्य - २

अभ्यास और वैराग्य सुनते ही लगता है कि संभवतः कोई हमें किसी अन्य जगत में रहने को बाध्य कर रहा है। या अन्यथा ही इतना श्रम और सब कुछ छोड़ देने के लिये उत्प्रेरित कर रहा है। इसका लाभ क्या है और जिस प्रकार हम अभी रह रहे हैं, उसमें क्या हानि है? ये प्रश्न सहज ही आते हैं।

ये प्रश्न स्वाभाविक भी हैं, मन के द्वारा उकसाये हैं, सबके मन में आते हैं। मन भला कैसे चाहेगा कि उसकी मनमानी न चले। सामान्य सा नियम भी है कि यदि कार्य में लाभ अधिक है और हानि कम तो वह करणीय है। क्यों इतना श्रम करना अभ्यास में, क्यों सब छोड़ देना वैराग्य से, क्या लाभ है स्वयं को या समाज को? सहज हैं ये प्रश्न, सबको आने भी चाहिये, शैथिल्य काल में मुझे भी आते हैं, अब तक।

अध्यात्म की बात छोड़ दें तो भी अभ्यास और वैराग्य नीत जीवन भौतिकता में श्रेयस्कर है, सर्वश्रेष्ठ है।

पंतजलि और श्रीकृष्ण ने योग की उत्कृष्टता को बताया है। अपने समय में श्रीकृष्ण निश्चय ही योग के महाप्रणेता रहे होंगे, तभी उनको योगेश्वर कहा जाता है। पतंजलि ने यदि सूत्ररूप में योग को प्रस्तुत किया तो गीता में योग की विशद प्रायोगिक व्याख्या है। कैसे करना है, करने में क्या क्या बाधायें आती हैं, उनको कैसे पार करना है, योग का व्यवहारिक जगत से क्या संबंध है। अर्जुन और श्रीकृष्ण के संवाद में हमारे प्रश्नों के उत्तर मिलते जाते हैं। 

संस्कृत, योगसूत्र और गीता के मूलपाठ समझने के प्रयास में एक बड़ा ही रोचक संबंध संज्ञान में आया है। पाणिनीकृत अष्टाध्यायी का महाभाष्य पतंजलि ने लिखा है। महाभाष्य सूत्रों की विस्तृत व्याख्या होती है। पतंजलिकृत योग सूत्र का महाभाष्य व्यास ने लिखा। जैसा कि विदित है कि महाभारत में वर्णित भगवतगीता के रचयिता व्यास हैं। मैं इतिहासकारों के कल्पनाक्षेत्र में नहीं गया हूँ पर संस्कृत, सूत्रशैली और योग के प्रणेतागण तीनों विषयों को बड़े ही सुगढ़ प्रकार से जोड़े हुये हैं।

योग प्रायोगिक है, एक एक शब्द सिद्ध किया जा सकता है, बस बताये पंथ पर चलना पड़ेगा। पतंजलि और श्रीकृष्ण दोनों ही इसकी घोषणा करते हैं। जैसे जैसे कोई योग में बढ़ता है, उसके लक्षण और सिद्धियाँ पहले से ही बतायी गयीं हैं। उन्ही लक्षणों और सिद्धियों को पढ़ लें तो समझ आ जायेगा कि योग भौतिक क्षेत्र में भी लाभकर है।

दोनों पुस्तकें कई बार पढ़कर प्रभावित इतना हूँ कि बिना प्रायोगिक अनुभव भी उस पर लिखने की धृष्टता कर रहा हूँ। दृष्टाओं ने समाधि में जाकर सब जाना है, एक एक सूत्र उनके प्रत्यक्ष का शाब्दिक प्रकटीकरण है। अन्तर है कि दृष्टाओं ने समाधि में जाकर ज्ञान पाया, हम समाधि में जाने का उपाय ढूढ़ रहे हैं। 

कहीं न कहीं प्रारम्भ तो करना ही होगा। जैसे गुरुत्व नियम है और ऊपर जाने के लिये प्रयास करना होता है उसी प्रकार मन की गति भी अधोगामी होती है। आलस्य, प्रमाद, स्वार्थ स्वतः ही आ पसरते हैं। इस स्वाभाविक जड़ता और गुरुता से बाहर आने के लिये प्रयास करना पड़ता है। स्वस्थ और पुष्ट दिनचर्या तभी आती है जब प्रयासपूर्वक जुटा जाता है। कार्य सरल नहीं है, बिना तपे निखरना और बिना लगे इस जड़ता से निकलना संभव भी नहीं है। 

योग श्रमसाध्य तो अवश्य है पर रुक्ष नहीं है। योग में बहुत कुछ है। विभूति पाद योगसूत्र का तीसरा पाद है और उसमें योगमार्ग में आगत सिद्धियों का ही विवरण है। यद्यपि पतंजलि आगाह करते हैं कि उन पर रुका न जाये, वे बाधक हो सकती हैं, पर योग के पथ पर चलने वालों के लिये ये दिशाचिन्ह भी हैं। अगले ब्लाग में योगसूत्र और गीता में वर्णित इन लाभों की चर्चा, साथ ही योग के बारे में फैले कई भ्रमों का निवारण।

17.8.19

अभ्यास और वैराग्य - १

पतंजलि पहले ४ सूत्रों में ही योग को परिभाषित कर देते है, शेष व्याख्या है। चित्त, वृत्ति, निरोध, दृष्टा, स्वरूप, सारूप्य, इन शब्दों को समझ लेने से ही पूरा योग दर्शित या स्पष्ट हो जाता है।

शाब्दिक अर्थ है। चित्त की वृत्तियों का निरोध योग है। योग में दृष्टा अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है। अन्य समय में वह वृत्तियों के सारूप्य रहता है।

चलिये और सरल करते हैं। चित्त मन है। मन की भटकन वृत्ति है। मन की भटकन का रुकना योग है। दृष्टा मन से भिन्न है। उसका मन से भिन्न अपना एक स्वरूप है। योग की स्थिति में वह अपने स्वरूप में रहता है, नहीं तो वह मन की भटकन जैसा अनुभव करता है।

मन की भटकन को रोकने के लिये उसे समझना भी आवश्यक है। मन के अनुकूल कुछ हुआ तो हम सुखी हो जाते हैं, कुछ प्रतिकूल हुआ तो हम दुखी हो जाते हैं। कितने असहाय हो जाते हैं। मन में आ रहे विचारों का प्रवाह नियन्त्रित करना कठिन है अतः जैसा मन कहता है, हम हो जाते हैं। जो कहता है, हम कर जाते हैं। जैसा मनवाता है, हम मान जाते हैं। है न विडम्बना, हमारा सेवक हमें नियन्त्रित करता है। हम विचारों के आकार में हवा हवा हो जाते हैं। है न दयनीय स्थिति।

ऐसा नहीं है कि हमारा ही मन इतना उत्पाती है या हम ही इतने असमर्थ हैं। सबकी यही समस्या है। अर्जुन जैसा वीर भी कहता है कि हे कृष्ण, यह मन इतना चंचल है कि बलपूर्वक मुझे हर लेता है और इसे नियन्त्रित करना वायु को बाँधने से भी अधिक कठिन है। तो उपाय क्या है?

अभ्यास और वैराग्य। कृष्ण भगवद्गीता (२.३४) में और पतंजलि (१.१२) में यही उपाय बताते हैं।

कहावत है कि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। कटु सत्य पर यह है कि सदैव मन ही जीतता है तो वह हमारी हार ही हुयी। कहाँ से कहाँ लाकर पटक देता है। कभी अत्यधिक उन्माद में ढकेलता है तो कभी विषादग्रस्त कर जाता है। क्या दुर्गति नहीं करता है? मन की इस मनमानी में कभी कभार जो स्थिर सा दिखता है, वही हमारा स्वरूप है। सही मुहावरा तो होना चाहिये मन के जीते हार है, मन से जीते जीत।

पतंजलि मन की ५ वृत्तियाँ बताते हैं। प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृति। प्रमाण (प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम) के द्वारा प्राप्त सही ज्ञान, विपर्यय या मिथ्या ज्ञान, विकल्प या कल्पना, स्मृति या पुराने प्रत्यक्ष का पुनः उभरना, निद्रा या ज्ञान का अभाव। मन इन्ही ५ वृत्तियों के बीच अनियन्त्रित भटकता है और साथ में हमें भी बलवत बहा ले जाता है। यह साथ कालान्तर में इतना गाढ़ा हो जाता है कि हम स्वयं को ही मन समझने लगते हैं।

मन की सारूप्यता में बद्ध दृष्टा को अभ्यास और वैराग्य के माध्यम से ही मुक्त किया जा सकता है।

अभ्यास क्या है, किसका अभ्यास, किन सोपानों पर बढ़ते रहने का अभ्यास? वैराग्य ही क्यों? भौतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य में इन प्रश्नों के उत्तर हमारी भटकन की समस्या सुलझाने के लिये आवश्यक हैं। इस विषय को समझने का प्रयास करेंगे अगले ब्लाॆग में।

20.11.13

अपरिग्रह - अध्यात्म विधा

अपरिग्रह का व्यवहारिक पक्ष सबको ज्ञात है। आवश्यकतानुसार उपयोग न केवल संसाधन की उपलब्धता बनाने में सहायक रहता है, वरन स्वयं को भी अनावश्यक संग्रह और आसक्ति से दूर रखता है। इसके अतिरिक्त अपरिग्रह का क्या कोई और पक्ष है?

मूलभूत सिद्धान्तों का एक गुण होता है, आप जहाँ पर भी उन्हें प्रयुक्त करें, निष्कर्षों में भेद नहीं रहता है। अपरिग्रह भी ऐसे ही सिद्धान्तों में से एक है। आप जहाँ पर भी इसे प्रयुक्त करेंगे, जितने समय के लिये प्रयुक्त करेंगे, उसी अनुपात में आपको संतुष्टि और आनन्द मिलेगा। अपरिग्रह का सौन्दर्य यह भी है कि मूलरूप से यह एक आध्यात्मिक सिद्धान्त है और उसका भौतिक जगत में प्रक्षेपण इतना उपयोगी है कि हम उसी में संतुष्ट हो लेते हैं, उसे उसके मौलिक स्वरूप में देखने का प्रयत्न नहीं करते हैं।

जैन धर्म के पाँच मूल सिद्धान्तों में एक, अपरिग्रह का सिद्धान्त जैन सन्तों की जीवनशैली में रचा बसा है। उनके जीवन का अवलोकन ही इस सिद्धान्त की महत्कथा कह जाता है। अपने जीवन में जितना संभव हो सका, अपरिग्रह के अनुपालन की संतुष्टि पा रहा हूँ। गहरे उतरने के व्यवहारिक पक्षों की बाधायें सम्मुख हैं। सैद्धान्तिक रूप से अपरिग्रह के बारे में और जानने की इच्छा उन सूत्रों तक ले गयी जहाँ पर इन्हें मूलतः परिभाषित किया गया है।

आश्चर्यचकित रह गया जब पतंजलि योग सूत्र के साधनपाद में यम नियम के बारे में पढ़ते समय अपरिग्रह का महत्व सूत्रबद्ध दिखा। सहसा लगा कि अपरिग्रह का सिद्धान्त एक गूढ़ अध्यात्म विधा है। सूत्र २.३९ इस प्रकार है। अपरिग्रह स्थैर्ये जन्मकथन्ता सम्बोधः - अपरिग्रह की स्थिरता में जन्म के कैसेपन का साक्षात होता है। अर्थात अपरिग्रह के अभ्यास से आप अपने भूत, वर्तमान और भविष्य के जन्मों को देख सकते हैं, संभावित अस्तित्वों को समझ सकते हैं।

वैसे तो यह सच है कि सिद्धान्त समझने और विकसित होने में समय भी लगता है और समझ भी, पर अपरिग्रह का यह अर्थ न कभी समझा था और न ही कभी सुना था। आवश्यकतानुसार ही उपयोग करने का मन्त्र कैसे ऐसी अलौकिक दृष्टि दे देगा कि आप अपने भूत और भविष्य में झाँक पायेंगे। यदि पंतजलि योगसूत्र पढ़ने का प्रारम्भिक समय होता तो संभवतः इस सूत्र को रहस्यवाद मान कर आगे बढ़ गया होता, पर जिस गूढ़ता से पतंजलि ने सूत्र गढ़ने की कला प्रदर्शित की है, इस रहस्य पर विचार न करना अपनी मूढ़ता का ही परिचायक होता। पतंजलि ने निश्चय ही कोई न कोई गूढ़ सिद्धांत इस सूत्र के माध्यम से व्यक्त किया है।

इस सूत्र पर केन्द्रित कई व्याख्यानों को सुना, कई अध्यायों को पढ़ा, तब कहीं जाकर इस सिद्धान्त की परिधि पर पहुँच पाया। जितना सुना, जितना पढ़ा, उतना ही रोचक होता गया अपरिग्रह का सिद्धान्त।

क्या परिग्रह है, उसे निर्धारित करने के लिये परिधि को समझना होगा। परिधि को समझने के लिये केन्द्र को जानना होगा। केन्द्र के चारो ओर जो भी हो, उसे परिधि से परिभाषित किया जा सकता है। जब तक मैं केन्द्र में शरीर को मानकर विषय को समझ रहा था, अपरिग्रह के व्यावहारिक पक्ष तक ही सीमित था, कपड़े और अन्य वस्तुओं तक ही। पतंजलि के इस सूत्र की व्याख्या सुनी तो समझ गया कि मुझे इस विषय के तल में जाने के लिये अपना केन्द्र पुनर्परिभाषित करना होगा, यदि ऐसा न करता तो सूत्र की पूरी व्याख्या नहीं जान पाता।

भारतीय दर्शन के संदर्भों में, वासांसि जीर्णानि यथा विहाय के संदर्भों में, शरीर भी परिधि ही है। परिवर्तनशील शरीर को केन्द्र कभी नहीं माना गया, जिस तरह हम कपड़े बदलते हैं, उसी प्रकार आत्मा भी शरीर बदलती है। केन्द्र में सदा ही आत्मा रही है, न मन, न बुद्धि, न शरीर।

अपरिग्रह के सिद्धान्त की गहराई केन्द्र निर्धारित करते ही दृष्टिगत होने लगती है। आत्म के अतिरिक्त शेष को अपना न मानने का भाव ही अपरिग्रह का आध्यात्मिक पक्ष है। स्वयं को शरीर या मन मानने के क्रम में हम स्वयं को परिधि में परिधि में स्थापित कर लेते हैं और जब कालचक्र चलता है तो हम परिधि पर आने वाले बलाक्षेप से जूझने में लगे रहते हैं, संभवतः इसी संघर्ष को मर्मज्ञ कालचक्र के गतिमय प्रवाह से परिभाषित करते हैं। प्रकृति के कालचक्र से बचना है तो केन्द्र की ओर बढ़ते रहना ही श्रेयस्कर है क्योंकि केन्द्र में ही बल का प्रक्षेप शून्य होता है।

शरीर नहीं त्यागना होता है, मन भी नहीं त्यागना होता है, यदि अपरिग्रह के हेतु कुछ त्यागना होता है तो वह है स्वयं के शरीर या मन होने के भाव का। शरीर, मन, स्मृतियाँ, भय, सब के सब मिलकर एक ऐसा विश्व निर्मित कर देते हैं कि हम उसमें उलझे रहते हैं, उसके पार कुछ भी नहीं देख पाते हैं, कुछ भी नहीं समझ पाते हैं। जब यह सब भाव छटता है, जन्म और उसके कारण, भूत-भविष्य और उसके विस्तार, सब के सब स्वतः ही समझ आने लगते हैं। निश्चय ही पतंजलि के लिये अपरिग्रह की यही अवधारणा रही होगी।

अपरिग्रह का प्रारम्भ उस बिन्दु से होता है जब हम सोचते हैं कि कोई वस्तु या व्यक्ति हमें सुख दे सकता है। किन्तु जब अन्यथा निष्कर्ष देखने को मिलता है तो धीरे धीरे हम अपनी खोखली आश्रयता को तिलांजलि देने लगते हैं। आनन्द की सततता जब फिर भी सुनिश्चित नहीं होती है, तो हम सिद्धान्त की सीमायें बनाने लगते हैं और उससे परे दूसरे सिद्धान्त सोचने लगते हैं, वर्तमान सिद्धान्त पर संशय करने लगते हैं। पतंजलि का यह सूत्र अपरिग्रह के सिद्धान्त को उसके उत्कर्ष पर न केवल स्थापित करता है, वरन उसे अध्यात्म का मूलमन्त्र भी बना देता है।

अपरिग्रह का सिद्धान्त पतंजलि से अच्छा न कोई समझ सकता है, न कोई समझा सकता है। वर्णित सूत्र स्वयं में ही अपरिग्रह के जीवन्त उदाहरण हैं। ज्ञान के विस्तार को इस तरह से प्रस्तुत करना कि कोई भी शब्द अनावश्यक न हो और कोई भी अर्थ छूटा न हो। योगसूत्र की रचना अपरिग्रह के सिद्धान्त का ही मूर्त स्वरूप है, आकार में भी, विषय में भी। अपरिग्रह की यह अध्यात्म विधा, इस सिद्धान्त को मानव अस्तित्व के मौलिकतम सिद्धान्तों में स्थापित करती है।