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11.2.12

क्लाउड का धुंध

विकल्प की अधिकता भ्रम उत्पन्न करती है, भ्रम स्पष्ट दिशा ढाँक देता है, भ्रम सोचने पर विवश करता है, भ्रम निर्णय लेने को उकसाता है, भ्रम का धुंध छटने का अधैर्य एक अतिरिक्त भार की तरह साथ में लगा रहता है। कितना ही अच्छा होता कि विश्व एक मार्गी होता, एक विमीय, बढ़ते रहिये, कोई चौराहे नहीं, कोई विकल्प नहीं। पर क्या यह मानव मस्तिष्क को स्वीकार है, नहीं और जिस दिन यह स्वीकार होगा, उस दिन विकास का शब्द धरा से विदा ले लेगा। किसी कार्य को श्रेष्ठतर और उन्नत विधि से करने की ललक विकास का बीजरूप है। यह बीजरूप इस जगत में बहुतायत से फैला है। अतः जब तक विकास रहेगा, विकल्प रहेगा, भ्रम रहेगा, धुंध रहेगा। धुंध के पीछे का सूरज देखने की कला तो विकसित करनी होगी, धुंध छाटते रहना विकासीय मानव का नियत कर्म है।

ऐसा ही कुछ धुंध, इण्टरनेट में क्लाउड ने कर रखा है। क्लाउड का शाब्दिक अर्थ बादल है, प्रतीक पानी बरसाने का, संभवतः ध्येय भी वही है, सूचना के क्षेत्र में। यही भविष्य माना जा रहा है क्योंकि अपने उत्पाद बेचने के लिये और अपनी बेब साइटों पर आवागमन बनाये रखने के लिये क्लॉउड को विशेष उत्प्रेरक माना जा रहा है। पहले कितना अच्छा था कि एक हार्डडिस्क या पेन ड्राइव लिये हम लोग घूमते रहते थे, कभी कार्यालय के कम्प्यूटर से, कभी घर के कम्प्यूटर से, कभी मोबाइल से, कभी इण्टरनेट से, सूचनायें निकालते और भेजते रहते थे। एक कीड़ा काटा किसी को, कि काश यह सब अपने आप हो जाता, लीजिये प्रारम्भ हो गयी क्लाउड यात्रा।

इसके तीन अंग हैं, पहली वह सूचना जो आप इण्टरनेट पर संरक्षित रखना चाहते हैं, दूसरे वे यन्त्र जिन्हे आप उपयोग ला रहे हैं और तीसरे वह एप्पलीकेशन व माध्यम जो इस प्रक्रिया में सहायक बनते हैं। इन तीनों अंगों को दो कार्य निभाने होते हैं, पहला स्वतः सूचना संरक्षित करने का और दूसरा आपके यन्त्रों के बीच सूचनाओं की सततता बनाये रखने का। जो लोग यह मान कर चलते हैं कि इण्टरनेट की उपलब्धता अनवरत बनी रहेगी और उसके अनुसार इन सेवाओं का प्रारूप बनाते हैं, वे प्रारम्भ से ही उन स्थानों को इन सेवाओं से बाहर कर देते हैं जहाँ इंटरनेट अपने पाँव पसारने का प्रयास कर रहा है। इसके विस्तृत उपयोग के लिये यह आवश्यक है कि इन सेवाओं को, इंटरनेट की उपलब्धता और अनुपलब्धता, दोनों ही दशाओं में सुचारु चलने के लिये बनाया जाये।

तीन सिद्धान्त हैं जिनके आधार पर आप किसी भी क्लाउड सेवा की गुणवत्ता माप सकते हैं।

१. मोबाइल, लैपटॉप और इण्टरनेट पर एक ही प्रोग्राम हो। यह हो सकता है कि प्रोग्राम अपने पूर्णावतार में लैपटॉप पर हो, मोबाइल व इंटरनेट पर अर्धावतार में आ पाये, पर सूचनाओं के संपादन की सुविधा तीनों में होना आवश्यक है। इस प्रकार किसी भी माध्यम में कार्य करने में कोई कठिनाई नहीं होगी। यदि प्रोग्राम केवल इंटरनेट पर ही होगा तो आप इंटरनेट के लुप्त होते ही अपंग हो जायेंगे।

२. ऑफलाइन संपादन बहुत आवश्यक है, इस प्रकार आप उस सेवा का उपयोग कभी भी कर सकते हैं। पिछले समन्वय के बाद हुये परिवर्तनों को एकत्र करने और उसे इंटरनेट के उपलब्ध होते ही क्लाउड पर भेज देने से समन्वय का एक नया बिन्दु बन जाता है। यही क्रम चलता रहता है, हर बार, जब भी ऑफलाइन संपादन होता है। हुये बदलाव को किस प्रकार कम से कम डाटा में परिवर्तित कर क्लाउड में भेजा जाता है, यह एक अत्यन्त तकनीकी विषय है।

३. एक बार क्लाउड में परिवर्तन हो जाता है, उसके बाद किस प्रकार वह सूचना अन्य यन्त्रों पर पहुँच कर संपादित होती है, इस पर क्लाउड सेवा की गुणवत्ता का स्पष्ट निर्धारण होता है। यदि आपको उस प्रोग्राम में जाकर सूचना को अद्यतन करने के लिये अपने हाथों समन्वय करना पड़े तो वह सेवा आदर्श नहीं है। प्रोग्राम खोलते ही समन्वय स्वतः होना चाहिये। यह भी हो सकता है कि किसी एक ही लेख पर आपने मोबाइल और लैपटॉप पर आपने अलग अलग ऑफलाइन संपादन किया, बाद में इंटरनेट आने पर उन दोनों संपादनों को किस प्रकार क्लाउड सेवा सुलझायेगी और सहेजेगी, यह क्लाउड सेवा की गुणवत्ता का उन्नत अंग है।

कई कम्पनियाँ क्लाउड सेवाओं में 'कई लोगों के द्वारा संपादन की सुविधा' को जोड़कर उसे और व्यापक बना रही हैं। इसमें एक फाइल पर एक समय में कई लोग कार्य कर सकते हैं। बड़े लेखकीय प्रकल्पों पर एक साथ कार्य कर रहे कई व्यक्तियों के लिये इससे उत्कृष्ट और स्पष्ट साधन नहीं हो सकता है।

आजकल मैं अपने लेखन में इस सेवा का भरपूर उपयोग कर रहा हूँ, यह पोस्ट आधी आईफोन पर, आधी मैकबुक पर, एक चौथाई ब्रॉडबैंड के समय, एक चौथाई जीपीआरएस के समय और आधी इंटरनेट की अनुपलब्धता के समय लिखी है। एक जगह किया संपादन स्वतः ही दूसरी जगह पहुँचता रहा और अन्ततः पोस्ट आप तक।

इस समय कई क्लाउड सेवायें सक्रिय हैं, जो भी चुनें उन्हें उपरोक्त सिद्धान्तों की कसौटी पर ही चुनें, आपका जीवन सरल हो जायेगा। यदि क्लाउड सेवा में इतनी सुविधायें नहीं है तो अच्छा है कि पेन ड्राइव से ही काम चलाया जाये।

13.8.11

वननोट और आउटलुक

एक बार लिख लेने के बाद सूचना को व्यवस्थित रखना और समय आने पर उसको ढूढ़ निकालना, इन दो कार्यों के लिये वननोट और आउटलुक का प्रयोग बड़ा ही उपयोगी रहा है मेरे लिये। प्रोग्रामों की भीड़ में अन्ततः इन दोनों पर आकर स्थिर होना, मेरे लिये प्रयोगों और सरलीकरण के कई वर्षों का निष्कर्ष रहा है। 1985 में बालसुलभ उत्सुकता से प्रारम्भ कर आज तक की नियमित आवश्यकता तक का मार्ग देखा है मेरे कम्प्यूटरों ने, न जाने कहाँ और कब यह साथ दार्शनिक हो गया, पता ही नहीं चला।

हर व्यक्ति के पास मोबाइल, दूर प्रदेशों और विदेशों में जाकर पढ़ते सम्बन्धी, विद्यालय, आईआईटी और नौकरी में बढ़ती मित्रों की संख्या, धीरे धीरे संपर्कों की संख्या डायरी के बूते के बाहर की बात हो गयी। प्रारम्भिक सिमकार्डों और मोबाइलों की भी एक सीमा थी, समय 2001 के पास का था। संपर्क, उनकी जन्मतिथियाँ, वैवाहिक वर्षगाठें, बैठकें, कार्यसूची आदि की बढ़ती संख्या और आवश्यकता थी एक ऐसे प्रोग्राम की जिस पर सब डाल कर निश्चिन्त बैठा जा सके। माइक्रोसॉफ्ट के ऑफिस आउटलुक में मुझे वह सब मिल गया और आज दस वर्ष होने पर भी वह सूचना का सर्वाधिक प्रभावी अंग है मेरे लिये। न जाने कितने मोबाइल बदले, नोकिया, सोनी, ब्लैकबेरी, विन्डोज, हर एक के साथ आउटलुक का समन्वय निर्बाध रहा। अनुस्मारक लगा देने के बाद कम्प्यूटर एक सधे हुये सहयोगी की तरह साथ निभाता रहा। यही नहीं, कई खातों के ईमेल और एसएमएस स्वतः आउटलुक के माध्यम से फीड में आते रहे, आवश्यक कार्य व बैठक में परिवर्तित होते रहे।

2007 तक अपनी सारी फाइलों को अलग अलग फोल्डरों में विषयानुसार रखने का अभ्यास हो चुका था। मुख्यतः वर्ड्स, एक्सेल, पॉवर-प्वाइण्ट, पीडीएफ, एचटीएमएल। यह बात अलग है कि हर बार किसी फाइल को खोलने और बन्द करने में ही इतना समय लग जाता था कि विचारों का तारतम्य टूटता रहता था। माइक्रोसॉफ्ट के ऑफिस वननोट की अवधारणा संभवतः यही देखकर की गयी होगी। वननोट का ढाँचा देखें तो आपको इसका स्वरूप किसी पुस्तकालय से मिलता जुलता लगता है, उसकी तुलना में अन्य प्रोग्राम कागज के अलग अलग फर्रों जैसे दिखते हैं। संग्रहण के कई स्तर हैं इसमें, प्रथम-स्तर वर्कबुक कहलाता है, आप जितनी चाहें वर्कबुक बना सकते हैं, विभिन्न क्षेत्रों के लिये जैसे व्यक्तिगत, प्रशासनिक, लेखन, पठन, तकनीक, मोबाइल समन्वय आदि। हर वर्कबुक में आप कई सेक्शन्स रख सकते हैं जैसे लेखन के अन्दर ब्लॉग, कविता, कहानी, पुस्तकें, संस्मरण, डायरी, टिप्पणी इत्यादि, यही नहीं आप कई सेक्शन्स को समूह में रखकर एक सेक्शन-समूह बना सकते हैं। हर सेक्शन में आप कितने ही पृष्ठ रख सकते, एक तरह के विषयों से सम्बन्धित उपपृष्ठ भी।

हर पृष्ठ पर आप कितने ही बॉक्स बनाकर अपनी जानकारी रख सकते हैं, उन बाक्सों के कहीं पर भी रखा जा सकता है। शब्द, टेबल, चित्र, ऑडियो, कुछ भी उनमें सहेजा जा सकता है। आप स्क्रीन पर आये किसी भी भाग को चित्र के रूप में सहेज सकते हैं, किसी भी सेक्शन को पासवर्ड से लॉक कर सकते हैं। मेरी सारी सूचनायें इस समय वननोट में ही स्थित हैं।

अब संक्षिप्त में इसके लाभ गिना देता हूँ। इसमें बार बार सेव करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है, स्वयं ही होता रहता है। मैंने अपनी कई वर्कबुकों को इण्टरनेट में विण्डोलाइव से जोड़ रखा है, कहीं पर कुछ भी बदलाव करने से स्वतः समन्वय हो जाता है। एक वर्कबुक मेरे विण्डो मोबाइल से भी सम्बद्ध है, मोबाइल पर लिखा इसमें स्वतः आ जाता है। यदि कभी किसी बैठक में किसी आलेख की आवश्यकता पड़ती है तो उसे मोबाइल की वर्कबुक में डाल देता हूँ, वह मोबाइल में स्वतः पहुँच जाती है। सूचना का तीनों अवयवों में निर्बाध विचरण।

आउटलुक में ईमेल, ब्लॉग फीड या अन्य अवयवों को सहेज कर पढ़ना चाहें तो 'सेण्ड टु वननोट' का बटन दबाते ही सूचना वननोट में संग्रहित हो जाती है। इसी प्रकार कोई भी वेब पृष्ठ स्वतः ही वननोट में सहेज लेता हूँ। यदि उसे मोबाइल में पढ़ना है तो उसे मोबाइल की वर्कबुक में भेज देता हूँ।

आप किसी भी वाक्य को कार्य में बदल सकते हैं, वह स्वतः ही आउटलुक में पहुँच जायेगा और वननोट के उस पृष्ठ से सम्बद्ध रहेगा। किसी भी वाक्य या शब्द में टैग लगाने की सुविधा होने के कारण आप जब भी सार देखेंगे तो सारे टैगयुक्त वाक्य एक पृष्ठ में आ जायेंगे। मैं उसी पृष्ठ को उस दिन की कार्यसूची के रूप में नित्य सुबह मोबाइल में सहेज लेता हूँ।


लगभग तीन वर्षों से मैं कागज और पेन लेकर नहीं चला हूँ। बैठकों में अपने मोबाइल पर ही टाइप कर लेता हूँ और यदि समय कम हो तो हाथ से भी लिख लेता हूँ। एक सूचना को कभी दुबारा डालने की आवश्यकता अभी तक नहीं पड़ी है। दो वर्ष पहले किसी विषय पर आये विचार अब तक संदर्भ सहित संग्रहित हैं। किसी भी शब्द को डालने भर से वह किन किन पृष्ठों पर है, स्वतः सामने प्रस्तुत हो जाता है।

हाथ से लिखा बहुत ही ढंग से रखता है वननोट, आने वाले समय में हाथ से लिखी हिन्दी को भी यूनीकोड में बदलेगा कम्प्यूटर तब हम अपने बचपन के दिनों में वापस चले जायेंगे और सब कुछ स्लेट पर ही उतारा करेंगे।

लाभ अभी और भी हैं, आपकी उत्सुकता जगा दी है, शेष भ्रमण आपको करना है। या कहें कि दो इक्के आपको दे दिये हैं, तीसरा आपको अपना फिट करना है, सोच समझ कर कीजियेगा।

10.8.11

संग्रहण और प्रवाह

मानव मस्तिष्क की एक क्षमता होती है, स्मृति के क्षेत्र में। बहुत अधिक सूचना भर लेने के बाद यह पूरी संभावना रहती है कि आगत सूचनायें ठहर नहीं रह पायेंगी और बाहर छलक जायेंगी। यह न हो, इसके लिये बहुत आवश्यक है कि उन्हें लिख लिया जाये। तीक्ष्ण बुद्धि के स्वामी भी स्मृति लोप से ग्रसित रहते हैं, जोर डालते हैं कि क्या भूल रहे हैं? अतः जिस समय जो भी विचार आये, लिख लिया जाये। यह आप निश्चय मान लीजिये यदि वह विचार दुबारा आता है तो आप पर उपकार करता है। अब विचार कहीं पर भी आ सकता है तो तैयारी सदा रहनी चाहिये उसे लिख लेने की। या तो एक छोटी सी डायरी हो एक पेन के साथ या आप अपने मोबाइल में ही लिख सकें वह विचार। मुझे भी अपनी स्मृति पर उतना भरोसा नहीं है, मुझे जो भी विचार उपहार में मिलता है मैं समेट लेता हूँ।

इसी प्रकार अध्ययन करते समय कई रचनायें व विषय समयाभाव के कारण उसी समय नहीं पढ़े जा सकते हैं, यह आवश्यक है कि उन्हें किसी ऐसी जगह संग्रहित कर लिया जाये जहाँ पर आप समय मिलने पर विस्तार से पुनः पढ़ सकें। किसी विषय पर शोध करने पर बहुत सी सूचनायें प्रथमतः पृथक स्वरूप में होती है पर उनका समुचित विश्लेषण करने के लिये उन्हें एक स्थान पर रखना आवश्यक होता है। कभी इण्टरनेट में, कभी पुस्तक में, कभी दीवार पर, कभी सूचना बोर्ड पर, कभी चित्र के माध्यम से, कभी वाणी रूप में, कभी मैसेज में, कभी ईमेल में, कभी ब्लॉग में, हर प्रकार से आपको सम्बन्धित तथ्य मिलते रहते हैं, आपको सहेजना होता है, रखना होता है, एक स्थान पर, भविष्य के लिये।

साहित्य के अतिरिक्त भी, अपने अपने व्यावसायिक क्षेत्रों में सम्बद्ध ज्ञान-संवर्धन और नियमावली अपना महत्व रखते हैं और आपकी निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। औरों पर निर्भरता कम रहे और निर्णय निष्पक्ष लिये जायें, उसके लिये भी आवश्यक है कि हम अपना ज्ञान संग्रहित और संवर्धित करते चलें। सामाजिक और व्यावसायिक बाध्यतायें आपको ढेरों संपर्क, तिथियाँ, बैठकें, कार्य, निर्देश आदि याद रखने पर विवश करेंगी, उन्हें कैसे सहेजना है, कैसे उपयोग में लाना है और कैसे उन्हें अगले स्तर पर पहुँचा प्रवाह बनाये रखना है, यह स्वयं में एक बड़ा और अत्यन्त ही आवश्यक कार्य है।

डिजिटल रूप में विविध प्रकार की सूचना का संग्रहण मुख्यतः आपके कम्प्यूटर में होता है, आपका ज्ञान आपके साथ और चल सकता है यदि आपके पास लैपटॉप हो। सूचनाओं के एकत्रीकरण के लिये एक उपयोगी मोबाइल और सूचनाओं के बैकअप के लिये इण्टरनेट का प्रयोग आपके संग्रहण को पूर्ण बनाता है। लैपटॉप, मोबाइल और इण्टरनेट, ये तीन अवयव एक दूसरे के पूरक भी हैं और आवश्यक समग्रता भी रखते हैं। आपका संग्रहण-प्रवाह इन तीनों पर आधारित बने रहने से कभी अवरुद्ध नहीं होगा।

सूचना के संग्रहण के तीन अवयव किसी एक डोर से बँधे हों जिससे इन तीनों के समन्वय में आपको कोई प्रयास न करना पड़े। कहीं भी और किसी भी माध्यम से एकत्र सूचना इन तीन अवयवों में स्वमेव पहुँच जानी चाहिये। कहीं आपको इण्टरनेट नहीं मिलेगा, कहीं आपका लैपटॉप आपके पास नहीं रहेगा, कई बार आप मोबाइल बदल लेते हैं या खो देते हैं। यह सब होने पर भी आपका सूचना-तंत्र निर्बाध बढ़ना चाहिये। किसी भी सूचना का आपकी परिधि में बस एक बार आगमन हो, उसे उपयोग में लाने के लिये बार बार बदलना न पड़े। जब मैं लोगों को मोबाइल बदलते समय सारे संपर्क हाथ से भरते हुये या सिमकार्ड से बार बार कॉपी करते हुये देखता हूँ तो मुझे ऊर्जा व्यर्थ होते देख दुःख भी होता है और क्षोभ भी।

सूचनाओं का संग्रहण और समग्र समन्वय, तीनों अवयवों में उनका स्वरूप, एकत्रीकरण और विश्लेषण में लचीलापन, समय पड़ने पर उनकी खोज। इन विषयों का महत्व जाने बिना यदि आप मोबाइल का चयन, लैपटॉप पर संग्रहक प्रोग्राम का चयन और इण्टरनेट पर इन सूचनाओं के स्वरूप का चयन करते हैं, तो संभव है कि आपका संग्रहण आपकी ऊर्जा और समय व्यर्थ करेगा।

असहज मत हों, इन सिद्धान्तों को मन में बिठा लेने के पश्चात जो भी आपके संग्रहण का प्रारूप होगा, वह आपको ही लाभ पहुँचायेगा। इस प्रकार संरक्षित ऊर्जा और समय साहित्य संवर्धन में लगेगा।

इस बार आप अपने संग्रहण के प्रारूप पर मनन कर लें, अगली बार बाजी पास नहीं करूँगा, अपने पत्ते दिखा दूँगा।

6.8.11

साहित्य और संग्रहण

संग्रहण मनुष्य का प्राचीनतम व्यसन है। जब कभी भी कोई अतिरिक्त वस्त्र, भोजन, शस्त्र इत्यादि अस्तित्व में आया होगा, उसका संग्रहण किस प्रकार किया जाये, यह प्रश्न अवश्य उठा होगा। हर वस्तु के संग्रह करने की अलग विधि, अलग स्थान, अलग सुरक्षा, अलग समय सीमा। मूलभूत संग्रहण को पूरा करने के पश्चात आवश्यकताओं का क्रम और बढ़ा, ज्ञान, विज्ञान, कला, साहित्य, सौन्दर्यबोध आदि विषय पनपे, उनसे सम्बन्धित संग्रहण भी आकार लेने लगा। मशीनें आयीं, कारखाने आये, व्यवसाय आया, संग्रहण का विज्ञान धीरे धीरे विकसित होने लगा। आज संग्रहण पर विशेषज्ञता, किसी भी व्यवसाय का अभिन्न अंग बन चुकी है।

हर व्यक्ति संग्रह करता है, आवश्यक भी है, कोई अत्याधिक करता है, कोई न्यूनतम रखता है। पशुओं में भी संग्रहण का गुण दिखता है, जीवन में अनिश्चितता का भय इस संग्रह का प्रमुख कारण है। हम अपने घरों की सीमाओं में न जाने कितनी प्रकार की वस्तुओं को रखते हैं, हर एक का नियत स्थान और नियत आकार। मूलभूत आवश्यकताओं के ही लिये यदि घरों का निर्माण होता तो सारा विश्व अपने दसवें भाग में सिमट गया होता।

नये विश्व में नित नयी नयी वस्तुयें जन्म ले रही हैं, सबका अपना अलग संग्रहण प्रारूप। आलेखों, श्रव्य और दृश्य सामग्रियों को डिजिटल स्वरूप दिया जा रहा है, भौतिक विश्व धीरे धीरे आभासी में बदलता जा रहा है अब चित्रों में भौतिक रंग नहीं वरन 1 और 0 से निर्मित आभासी रंगों का मिश्रण पड़ा होता है। भौतिक पुस्तकें और डायरी अब इतिहास के विषय होने को अग्रसर हैं, उनका स्थान ले रहे हैं उनके डिजिटल अवतार। पुस्तकालय या तो आपके कम्प्यूटर पर सिमट रहे हैं या इण्टरनेट के किसी सर्वर पर धूनी रमाये बैठे हैं।

आप लेख लिखते हैं, कहानियाँ रचते हैं, कवितायें करते हैं, गीत गुनते हैं, चित्र गढ़ते हैं। संवाद के माध्यम डिजिटल होने के कारण, उन सृजनाओं का डिजिटल स्वरूप आवश्यक हो जाता है। बहुधा कम्प्यूटर के ही किसी भाग में आपके सृजित-शब्द पड़े रहते हैं, फाइलों के रूप में। हम नव-उत्साहियों के पास ऐसी सैकड़ों फाइलें होंगी और जो वर्षों से सृजन-कर्म में रत हैं, उनके लिये यह संख्या निश्चय ही हजारों में होगी। न जाने कितनी फाइलें ऐसी होंगी जिसमें कोई एक विचार बाट जोहता होगा कि कब वह रचना की सम्पूर्णता पायेगा। सृजित और सृजनशील, पठित और पठनशील, न जाने कितनी रचनायें, कई विधायें, कई विषय, कई प्रकल्प, कई संदर्भ, यह सब मिलकर साहित्य संग्रहण के कार्य को गुरुतर अवश्य बना देते होंगे।

साहित्यकार ही नहीं, शोधकर्ता, विद्यार्थी, वैज्ञानिक, बुद्धिजीवी और इस श्रेणी में स्थित सबको ही ज्ञान के संग्रहण की आवश्यकता पड़ती है। संग्रहण के सिद्धान्त भौतिक जगत में जिस तरह से प्रयुक्त होते हैं, लगभग वैसे ही डिजिटल क्षेत्र में भी उपयोग में आते हैं। कम स्थान में समुचित रखरखाव, समय पड़ने पर उनकी खोज, खोज में लगा समय न्यूनतम, शब्दों और विषयों के आधार पर खोज, अनावश्यक का निष्कासन, आवश्यक की गतिशीलता।

कम्प्यूटर में कोई फाइल कहाँ है यह पता लगाना सरल है यदि आपने बड़े ही वैज्ञानिक ढंग से उनका संग्रहण किया है। आपको उस फाइल का नाम थोड़ा भी ज्ञात है तब भी कम्प्यूटर आपको खोज कर दे देगा आपकी रचना। किन्तु यदि आपको बस इतना याद पड़े कि उस रचना में कोई शब्द विशेष उपयोग किया है, तो असंभव सा हो जायेगा खोज करना। कम्प्यूटर तब एक नगर जैसा हो जाता है और आपकी खोज में एक रचना किसी घर जैसी हो जाती है।

देखिये न, गूगल महाराज खोज के व्यवसाय से ही कितने प्रभावशाली हो गये हैं, इण्टरनेटीय ज्ञान में गोता लगाने में इनकी महारत आपको इण्टरनेट में तो सहायता दे सकती है पर आपके अपने कम्प्यूटर में वे कितना सहायक हो पायेंगे, इस विषय में संशय है। वैसे भी यदि ज्ञान इण्टरनेट पर न हो या ठीक से क्रमबद्ध न हो तो उस विषय में गूगल भी गुगला जाते हैं। एक विषय पर लाखों निष्कर्ष दे आपका धैर्य परखते हैं और पार्श्व में मुस्कराते हैं।

आपके कम्प्यूटर पर साहित्यिक संग्रह आपका है, उपयोग आपको करना है, व्यवस्थित आपको करना है। आप करते हैं या नहीं? यदि करते हैं तो कैसे? अपनी विधि से आपको भी अवगत करायेंगे, पर आपकी विधि जानने के बाद।