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13.3.13

नेटवर्क टैक्स

कई बार ऐसा हुआ है ट्रेन यात्रा के समय रात में सोया और सुबह उठने पर पाया कि मोबाइल में १५% बैटरी कम हो गयी। कोई फ़ोन नहीं, कोई इण्टरनेट नहीं, तब कौन सा टैक्स लग गया? थोड़ा शोध किया तो पता चला कि यह नेटवर्क टैक्स है, आपका बिल नहीं खाता है, बस बैटरी खाता है।

कुछ दिनों बाद सामान्य ज्ञान के प्रश्न कुछ इस तरह से हुआ करेंगे। माना कि १००० किमी की यात्रा में २०० किमी में नेटवर्क नहीं है। पहले मार्ग में २०० किमी की यह दूरी २० किमी के १० हिस्सों में बंटी है। दूसरे मार्ग में २०० किमी की यह दूरी एक साथ है। किस मार्ग में जाने से आपकी बैटरी अधिक कम होगी और क्यों? उत्तर कठिन नहीं है, पहले मार्ग में बैटरी का क्षय दूसरे मार्ग से कहीं अधिक होगा।

क्यों का उत्तर भी समझाया जा सकता है, पर उसके लिये मोबाइल की सामान्य कार्यप्रणाली समझनी होगी। मोबाइल के अन्दर एक चिप होती है, जिसका कार्य बैटरी की ऊर्जा को रेडियो सिग्नल में बदलना होता है, रेडियो सिग्नल के माध्यम से हम नेटवर्क से संपर्क साध पाते हैं। यही चिप जिसे हम पॉवर एम्पलीफायर भी कहते हैं, मोबाइल की ६५% तक ऊर्जा खा जाती है। यदि नेटवर्क से संपर्क बना रहता है तो थोड़ी कम ऊर्जा लगती है, यदि नेटवर्क ढूँढना हो तो यही ऊर्जा और अधिक व्यय हो जाती है। यही नहीं, नेटवर्क न मिलने की दशा में पुनः खोज प्रारम्भ हो जाती है और तब तक चलती है जब तक वह मिल न जाये। कई अच्छी तकनीक वाले फ़ोन इस नेटवर्क बाधा से परिचित होते हैं और लगभग ३० मिनट बाद प्रयास करना बन्द कर देते हैं और अगले प्रयास के पहले थोड़ा विश्राम ले लेते हैं। कम समझदार मोबाइल जूझे रहते हैं और बैटरी गँवा कर गर्म होते रहते हैं।

२०० किमी में जब १० बार यह नेटवर्क बाधा आयेगी तो अधिक ऊर्जा व्यय होगी, जबकि केवल एक बार बाधा आने से यही व्यय बहुत कम होगा। ऐसा नहीं है कि नेटवर्क का न होना ही ऊर्जा व्यय करता है। जब भी नेटवर्क की उपस्थिति कम होती है या कहें कि आपको अपने मोबाइल में कम डंडियाँ दिख रही हों, समझ लीजिये कि चिप महोदय बैटरी का ख़ून चूसने में लगे हैं, नेटवर्क से अपना संबंध स्थापित करने के लिये और आपको अधिक डंडियाँ दिखाने के लिये। अधिक सघनता या टॉवर से दूरी के कारण नेटवर्क की क्षमता में आये उतार चढ़ाव आपकी मोबाइल बैटरी को बहुत अधिक प्रभावित करते हैं। संभव है कि दो कम्पनियों के नेटवर्क एक ही तरह के मोबाइल पर भिन्न प्रभाव डालें। एक नगर में भी किसी कम्पनी के टॉवरों को इस तरह से लगाया जाता है कि कम से कम टॉवरों में सारा नगर ढक जाये और बाधित नेटवर्क के स्थान भी न्यूनतम रहें। यदि उसमें कोई कमी रही है तो उसका दण्ड आपकी मोबाइल बैटरी को देना होगा, नेटवर्क टैक्स के रूप में।

फोन का यह नियत टैक्स तो सबको ही देना पड़ेगा। अब जो लोग फ़ेसबुक, ट्विटर आदि के लिये इण्टरनेट का भी उपयोग करते हैं, उनकी बैटरी लगभग दुगनी गति से कम होती है। कुछ और लोग जो बड़े नगरों में हैं और साधारण जीएसएम के स्थान पर २जी या ३जी का उपयोग करते हैं, उनका कार्य और भी तीव्र गति से हो जाता है। उन्हें अधिक डाटा डाउनलोड करने की सुविधा रहती है पर उनकी बैटरी और भी अधिक मात्रा में कम हो जाती है। सिद्धान्त वही है कि जितना तेज भागना हो उतनी तेजी से ऊर्जा बहानी पड़ती है।

आप यदि अतिव्यस्त हैं तो चाहेंगे कि जैसे ही कोई ईमेल हो या फेसबुक स्टेटस आया हो, वह तुरन्त ही आपके मोबाइल पर उपस्थित हो जाये। इस दशा में आप अपना २जी या ३जी नेटवर्क हर समय चालू रखते हैं और आपका संबंधित एप्लीकेशन सदा ही यह पता करने में लगा रहता है कि कोई आगत संदेश तो नहीं है। इस स्थिति में बैटरी अत्यन्त दयनीय हो जाती है, पता नहीं कब समाप्त हो जाये, कभी कभी तो एक दिन भी नहीं। प्रारम्भिक फोनों में एक नोकिया का फोन ऐसा था जो डाटा केवल एप्लीकेशन खोलने पर ही जोड़ता था और शेष समय बन्द रखता था। सारे फोनों में यह सुविधा नहीं है और बहुधा डाटा बहता ही रहता है, न जाने कितने स्रोतों से। एक नये शोध में यह भी बताया गया है कि फ्री में मिलने वाले एप्लीकेशन सर्वाधिक डाटा खाते हैं क्योंकि उसमें आपके मोबाइल से संबंधित जानकारी अपलोड होने की और विविध प्रचार डाउनलोड होने की विवशता होती है। हो सके तो वह अनुप्रयोग खरीद ले, उसमें प्रचार नहीं होगा और वह डाटा और बैटरी पर होने वाले धन के व्यय को भी बचायेगा।

एक बड़ा सीधा सा प्रश्न आ सकता है कि जब इतने पैसे खर्च कर एक स्मार्टफोन लिया है तो क्यों न उसका उपयोग अधिकतम करें। और यदि संसार से हर समय जुड़े रहना है तो इण्टरनेट को सदा ही चालू रखना होगा, थोड़ी बहुत बैटरी जाती है तो जाये। प्रश्न अच्छा है पर यह एक और बड़ा प्रश्न खड़ा करता है, क्या आप चाहते हैं कि आपका मोबाइल हर समय आपकी दिनचर्या या कार्यचर्या में व्यवधान डालता रहे, या आपके अनुसार चले? यदि आप हर समय व्यवधान नहीं चाहते हैं तो दोनों ही ध्येय साधे जा सकते हैं, पहला सदा ही सूचित बने रहने का, दूसरा लम्बी बैटरी समय का। पर उसके लिये एक नियम बनाना पड़ेगा।

अपना डाटा 'पुस' के स्थान पर 'फेच' पर कर लें, कहने का आशय है कि जब भी आप अपना एप्लीकेशन खोलेंगे तभी डाटा बहना प्रारम्भ होगा। हो सकता है यह करने के पश्चात आप दिन में कई बार देखें, पर बीच का जो समय बचेगा उस समय आपका मोबाइल व्यर्थ श्रम करने से बच जायेगा और बैटरी अधिक चलेगी। ऐसा करने भर से बैटरी में २०% तक ही वृद्धि हो जायेगी, न कुछ छूटेगा और व्यवधान भी कम होगा। यदि बैटरी और बचानी हो तो डाटा को पूरी तरह से बन्द कर दें और जब भी एप्लीकेशन देखना हो उसके पहले ही डाटा भी जोड़ें। जब एप्लीकेशन नहीं भी चल रहा होता है तब भी २जी या ३जी को स्थापित किये रहने में बहुत बैटरी खर्च होती है। साथ ही साथ ३जी नेटवर्क पर किया फोन और एसएमएस भी सामान्य की तुलना में कहीं अधिक ऊर्जा खाते हैं। डाटा भी बन्द कर देने से बैटरी का समय लगभग दुगना हो गया। ऐसा नहीं कि कोई कार्य छूट गया हो, बस थोड़ा सा व्यवस्थित भर हो गया। दो या तीन घंटे में समय पाकर एक बार डाटा चालू कर सारे स्टेटस और ईमेल देख लेते थे और फिर अपने कार्य में। थोड़ा धैर्य भर बढ़ गया, सूचना पूरी मिलती रही।

एक बात और, मोबाइल में वाईफाई के माध्यम से इण्टरनेट देखने में नेटवर्क की तुलना में बहुत कम ऊर्जा व्यय होती है और गति अधिक मिलती है सो अलग। यदि आपके पास घर या कार्यालय में वाईफाई की सुविधा है तो उसका उपयोग अवश्य करें। वाईफाई होने पर उसी को नेटवर्क के ऊपर प्राथमिकता मिलती है। यह प्रयोग आईफोन पर किया और पहले की तुलना में लगभग दुगनी बैटरी चलने लगी। पहले एक दिन चलती थी, अब दो दिन से भी अधिक खिंच गयी। हमने नेटवर्क से यथासंभव कम संपर्क रखा हुआ है, केवल कार्यानुसार ३जी चलता है, बैटरी के रूप में हमारा नेटवर्क टैक्स भी कम हो गया है। आप भी प्रयोग कर डालिये।

5.11.11

ब्राउज़र

ब्राउज़र का प्रयोग आप सब करते हैं, यही एक सम्पर्क सूत्र है इण्टरनेट से जुड़ने का और ब्लॉग आदि पढ़ने का। कई प्रचलित ब्राउज़र हैं, क्रोम, फायरफॉक्स, सफारी, इण्टरनेट एक्सप्लोरर आदि। सबके अपने सुविधाजनक बिन्दु हैं, पुरानी जान पहचान है, विशेष क्षमतायें हैं। इसके पहले कि उनके गुणों की चर्चा करूँ, तथ्य जान लेते हैं कि किसका कितना भाग है?

लगभग २ अरब इण्टरनेट उपयोगकर्ता हैं, ९४% डेक्सटॉप(या लैपटॉप) पर, ६% टैबलेट(या मोबाइल) पर। डेक्सटॉप पर ९२% अधिकार विण्डो का व शेष मैक का है। टैबलेट पर ६२% अधिकार एप्पल का व शेष एनड्रायड आदि का है। टैबलेट में ब्राउज़र का हिसाब सीधा है, जिसका टैबलेट या मोबाइल, उसका ही ब्राउज़र, बस ओपेरा को मोबाइल धारकों के द्वारा अधिक उपयोग में लाया जाता है। डेक्सटॉप पर ब्राउज़र का हिस्सा बटा हुआ है, मुख्यतः चार के बीच, क्रोम, फायरफॉक्स, सफारी और इण्टरनेट एक्सप्लोरर के बीच।

२००४ तक ब्राउज़र पर लगभग इण्टरनेट एक्सप्लोरर का एकाधिकार था। २००४ से लेकर २००८ तक फायरफॉक्स ने वह हिस्सा आधा आधा कर दिया। २००८ में गूगल ने क्रोम उतारा और २०११ तक इन तीनों का हिस्सा लगभग एक तिहाई हो गया है। मैक ओएस में मुख्यतः सफारी और थोड़ा बहुत क्रोम भी प्रचलित है। जहाँ प्रतिस्पर्धा से सबसे अधिक लाभ उपयोगकर्ता को हुआ है, वहीं ब्राउज़र उतारने वालों के लिये यह इण्टरनेट के माध्यम से बढ़ते व्यापार पर प्रभुत्व स्थापित करने का उपक्रम है। पिछले दो वर्षों में जितना कार्य ब्राउज़र को उत्कृष्ट बनाने में हुआ है, उतना पहले कभी नहीं हुआ। सबने ही एक के बाद एक ताबड़तोड़ संस्करण निकाले हैं, अपने अपने ब्राउज़रों के।

कौन सा ब्राउज़र उपयोग में लाना है, इसके लिये कोई स्थिर मानक नहीं हैं। जिसको जो सुविधाजनक लगता है, उस पर ही कार्य करता है, धीरे धीरे अभ्यस्त हो जाता है और अन्ततः उसी में रम जाता है। या कहें कि सबका स्तर एक सा ही है अतः किसी को भी उपयोग में ले आयें, अन्तर नहीं पड़ता है। फिर भी तीन मानक कहे जा सकते हैं, गति, सरलता व सुविधा, पर उन पक्षों के साथ कुछ हानि भी जुड़ी हैं। यदि गति अधिक होगी तो वह अधिक बैटरी खायेगा, सुविधा अधिक होगी तो अघिक रैम लगेगी और खुलने में देर भी लगेगी, सरल अधिक होगा तो हर सुविधा स्वयं ही जुटानी पड़ेगी।

जिस दिन से क्रोम प्रारम्भ हुआ है, उसी दिन से उस पर टिके हैं, कारण उसका सरल लेआउट, खोज और पता टाइप करने के लिये एक ही विण्डो, बुकमार्क का किसी अन्य मशीन में स्वयं ही पहुँच जाना, उपयोगी एक्सटेंशन और साथ ही साथ उसका अधिकतम तेज होना है। क्रोम के कैनरी संस्करण का भी उपयोग किया जिसमें आने वाले संस्करणों के बारे में प्रयोग भी चलते रहते हैं। मात्र दो अवसरों पर क्रोम से दुखी हो जाता था, पहला अधिक टैब होने पर उसका क्रैश कर जाना और दूसरा किसी भी वेब साइट को सीधे वननोट में भेजने की सुविधा न होना। बीच बीच में इण्टरनेट एक्सप्लोरर का नये संस्करण व फॉयरफाक्स पर कार्य किया पर दोनों ही उपयोग में बड़े भारी लगे। कुछ दिन घूम फिर कर अन्ततः क्रोम पर आना पड़ा।

जहाँ विण्डो में क्रोम का कोई विकल्प नहीं, मैक में परिस्थितियाँ भिन्न हैं। सफारी का प्रदर्शन जहाँ विण्डो में चौथे स्थान पर रहता है, मैक में उसे अपने घर में होने का एक बड़ा लाभ रहता है। मैक ओएस के अनुसार सफारी की संरचना की गयी है। क्रोम और सफारी दोनों में ही काम किया, बैटरी की उपलब्धता लगभग एक घंटे अधिक रहती है सफारी में। थोड़ा अध्ययन करने पर पता लगा कि कारण मुख्यतः ३ हैं। पहला तो क्रोम में प्रत्येक टैब एक अलग प्रोसेस की तरह चलता, यदि आपके १० टैब खुले हैं तो ११ प्रोसेस, एक अतिरिक्त क्रोम के लिये स्वयं, और हर प्रोसेस ऊर्जा खाता है। सफारी में कितने ही टैब खुले हों, केवल २ प्रोसेस ही चलते हैं, यद्यपि दूसरे प्रोसेस में रैम अधिक लगती है पर बैटरी बची रहती है। दूसरा कारण मैक ओएस के सुदृढ़ पक्ष के कारण है, मैक में यदि कोई प्रोसेस उपयोग में नहीं आता है तो वह तुरन्त सुप्तावस्था में चला जाता है। सफारी के उपयोग में न आ रहे टैब अवसर पाते ही सो जाते हैं, पर क्रोम की संरचना सुप्तावस्था में जाने के लिये नहीं बनी होने के कारण वह जगता रहता है और ऊर्जा पीता रहता है।

तीसरा कारण ग्राफिक्स व फ्लैश से सम्बन्धित है। एप्पल फ्लैश को छोड़ एचटीएमएल५ आधारित वीडियो लाने का प्रबल पक्षधर है, एप्पल का कहना है कि फ्लैश बहुत अधिक ऊर्जा खाता है और इस कारण से अन्य प्रक्रियाओं को अस्थिर कर देता है। एडोब व एप्पल का इस तथ्य को लेकर बौद्धिक युद्ध छिड़ा हुआ है। एचटीएमएल५ फ्लैश की तुलना में बहुत कम ऊर्जा खाता है। क्रोम में फ्लैश पहले से ही विद्यमान है और मैक में फ्लैश सपोर्ट न होने पर भी निर्बाध चलता है। सफारी में फ्लैश नहीं है, पर एक एक्सटेंशन के माध्यम से सारी फ्लैश वीडियो एचटीएमएल५ में परिवर्तित होकर आ जाते हैं, वह भी तब जब आदेश होते हैं। क्रोम प्रारम्भ करते ही उसकी जीपीयू(ग्राफिक्स प्रोसेसर यूनिट) स्वतः चल जाती हो, फ्लैश चले तो बहुत अधिक और न भी चले तब भी कुछ न कुछ ऊर्जा खाती रहती है।

मैक में अब हम वापस सफारी में आ गये हैं, क्रोम जितना ही तेज है, सरल भी है, पठनीय संदेश को बिना कोलाहल दिखाता है, कहीं अधिक स्थायी है और अथाह ऊर्जा बचाता है। क्यों न हो, देश की ऊर्जा जो बचानी है।

@ विवेक रस्तोगी जी - विण्डो में IE9 सबसे कम ऊर्जा खाता है पर सबसे तेज अभी भी क्रोम है। सफारी का प्रदर्शन मैक में ही सर्वोत्तम है।

26.10.11

बैटरी

बैटरी का अधिक व्यय एक प्रमुख कारण रहा मैक में विण्डो न लोड करने का, बात २५% अपव्यय की हो तो संभवतः आप भी वही निर्णय लेंगे। यह निर्णय न केवल मैक सीखने के लिये विवश कर गया वरन बैटरी की कार्यप्रणाली सम्बन्धी उत्सुकता को भी बढ़ा गया। ऐसा भी क्या कारण है कि दो भिन्न संरचनाओं में बैटरी का व्यय इतना अधिक हो जाता है?

एक मित्र ने बहुत पहले एक सलाह दी थी कि बैटरी की पूरी कार्यक्षमता के दोहन के लिये बैटरी-चक्र १००% पर रखिये। कहने का आशय यह कि पूरी चार्ज बैटरी को पूरी डिस्चार्ज होने के पहले चार्ज न करें। इससे बैटरी न केवल एक चक्र में अधिक चलती है वरन उसका जीवनकाल भी बढ़ जाता है। संभवतः इसका कारण हर बैटरी की डिजाइन में नियत चार्जिंग-चक्रों का होना हो। अभी तक यथासंभव इस सलाह को माना है और परिणाम भी आशानुरूप रहे हैं। इसी सलाह पर पिछले ३० दिनों से अपनी मैकबुक एयर को भी कसे हुये हूँ और इसी कारण ५ घंटे की घोषित क्षमता की तुलना में ७ घंटे की बैटरी की उपलब्धता बनी हुयी है।

मेरी मैकबुक एयर में ३५ वॉट-ऑवर की बैटरी लगी है, चलती है ६ घंटे, अर्थात लगभग ६ वॉट प्रतिघंटा का व्यय। पुराने लैपटॉप तोशीबा में ९०  वॉट-ऑवर की बैटरी थी, चलती थी ५ घंटे, अर्थात १८ वॉट प्रतिघंटा का व्यय। डेक्सटॉप में यही व्यय ९० वॉट प्रतिघंटा व मोबाइल में १ वॉट प्रतिघंटा के आसपास रहता है। यदि ईमेल देखने व कमेन्ट मॉडरेट करने में आप अपने डेक्सटॉप के स्थान पर मोबाइल का प्रयोग करते हैं तो आप न केवल अपना समय बचा रहे हैं वरन बिजली की महाबचत भी कर रहे हैं। अपने ब्लैकबेरी पर यथासंभव कार्य कर मैं अपने हिस्से को कार्बन क्रेडिट हथिया लेता हूँ। लेखन, पठन व ब्लॉग संबंधी कार्य मोबाइल पर असहज हैं अतः उसके लिये लैपटॉप ही उपयोग में लाता हूँ, डेक्सटॉप का उपयोग पिछले ५ वर्षों से नहीं किया है। जहाँ एक ओर बड़ी स्क्रीन, चमकदार स्क्रीन, वीडियो और ऑडियो कार्यक्रम, वीडियो-गेम आदि ऊर्जा-शोषक हैं वहीं दूसरी ओर लेखन, ब्लॉग, पठन आदि ऊर्जा-संरक्षक हैं। यूपीएस तो डेक्सटॉप में प्रयुक्त ऊर्जा के बराबर की ऊर्जा व्यर्थ कर देता है, बैटरी उसकी तुलना में कहीं अधिक ऊर्जा-संरक्षण करती है।

मोबाइल, लैपटॉप व डेक्सटॉप का अन्तर तो समझ में आता है पर उसी कार्यप्रारूप के लिये विण्डो लैपटॉप पर मैकबुक एयर की तुलना में बैटरी का तीन गुना व्यय क्यों? जब दो दिनों में यह दूसरा प्रश्न मुँह बाये खड़ा हो गया तो उत्सुकता शान्त करने के लिये बैटरी की ऊर्जा के प्रवाह का अध्ययन आवश्यक हो गया। विण्डो लैपटॉप पर धौकनी जैसे गर्म हवा फेकते पंखों की व्यग्रता और मैकबुक एयर की शीतल काया के भेद का रहस्य इसी अध्ययन में छिपा था।

तेज गति के प्रॉसेसर अधिक ऊर्जा चूसते हैं वहीं कम गति के प्रॉसेसर आपका धैर्य। कार्यानुसार दोनों का संतुलन कर सामान्य कार्य के लिये आई-३ से ऊपर जाने की आवश्यकता नहीं है, भविष्य के लिये भी आई-५ युक्त मेरा मैकबुक एयर पर्याप्त है। एसएसडी हार्डड्राइव में परंपरागत घूमने वाली हार्डड्राइव की तुलना में नगण्य ऊर्जा लगती है। किसी भी फाइल ढूढ़ने में परंपरागत हार्डड्राइव को जहाँ अपनी चकरी रह रहकर घुमानी पड़ती है वहीं एसएसडी हार्डड्राइव में यह कार्य डिजिटल विधि से हो जाता है, यह मैकबुक एयर की तकनीक का उनन्त पक्ष है।

आपके लैपटॉप पर नेपथ्य में सैकड़ों प्रक्रियायें स्वतः चलती रहती हैं, संभवतः इस आशा में कि आप उनका उपयोग करेंगे। आपकी जानकारी में हों न हों, आपके उपयोग में आयें न आयें, पर ये प्रक्रियायें ऊर्जा बहाती रहती हैं। यदि ओएस इन पर ध्यान नहीं दे पाता है तो व्यर्थ ही आपकी बैटरी कम हो जायेगी। मैक ओएस में ऐसी प्रक्रियाओं को तुरन्त ही शान्त कर देने का अद्भुत समावेश है। ऐसे में बची उर्जा उन प्रक्रियाओं को पुनः प्रारम्भ करने में लगी ऊर्जा से बहुत अधिक है क्योंकि एसएसडी हार्डड्राइव में प्रक्रिया प्रारम्भ करने में नगण्य ऊर्जा लगती है।

मैक में विण्डो चलाने में व्यय अतिरिक्त ऊर्जा का कारण हार्डवेयर और ओएस के बीच के संबंधों में छिपा है। ये संबंध ड्राइवरों के द्वारा स्थापित होते हैं। हार्डवेयर और ओएस के बीच सामञ्जस्य बना रहने से ड्राइवरों को कम भागदौड़ करनी पड़ती है। मैक मशीन में विण्डो ठूसने से इन ड्राइवरों का कार्य व धमाचौकड़ी कई गुना बढ़ जाती है जो अन्ततः २५% अधिक ऊर्जा व्यय का कारण भी बनती है। 

कमरे में अंधकार है, स्क्रीन पर न्यूनतम चमक, बैकलिट कीबोर्ड का उपयोग, घर में शेष परिवार निद्रामय हैं, मैकबुक में शेष प्रक्रियायें भी सो रही हैं, बस जगे हैं, मैं, मेरी मैकबुक, बहते विचार, अधूरा आलेख, आपकी प्रतीक्षा और बैटरी।