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9.10.21

मुक्ति का उपहार दे दो

 

अनवरत रत, पथ चली शत, 

जीवनी रुक गयी मानो।

प्रबल कल कल, सकल उद्धत,

ऊर्जा चुक गयी मानो।


विषय अनगिन किन्तु मन का,

सिकुड़ता विस्तार सहसा।

प्राप्त सब जो प्राप्य लगता,

अकर्मक आधार सहसा।


क्या प्रयोजन, क्यों अकारण,

कौन से संकेत भ्रमवत।

क्यों नहीं स्पष्ट धारण,

काल के आदेश भ्रमवत।


समय के रुक गये जल की,

गंध रह रह सताती है ।

विकल गति छटपटाती है ।

सुप्त होकर अनमनी सी,

समय यूँ ही बिताती है ।।

 

रुके जल को धार दे दो,

प्रगति का आसार दे दो ।

निराशा से रुग्ण मन को,

मुक्ति का उपहार दे दो ।।

12.4.14

लोकपथ

अनवरत सुख की पिपासा,
प्रकृति में उन्मुक्तता है ।
शान्ति को मन ढूढ़ता है,
प्रेम को मन मचलता है ।।

है विडम्बना मनुज की पर,
विचारों के समन्वय सुर,
क्यों नही मिल पा रहे हैं ?
स्वार्थरत हो चीखते हैं,
मदित होकर मनुज सारे,
बेसुरे हो गा रहे हैं ।

जीतने की कोशिशों में,
दास होते जा रहे हैं ।
कहाँ प्रभुता पा रहे है ?
तथ्यभेदी प्रचुरता है,
जागरण के आवरण में,
अन्त्य सोते जा रहे हैं ।

आगामी आशा भरमाती,
शंका शंकित होती जाती,
लोग किस पथ जा रहे हैं,
लोकपथ क्या आ रहे हैं?