न दैन्यं न पलायनम्

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9.10.21

मुक्ति का उपहार दे दो

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  अनवरत रत, पथ चली शत,   जीवनी रुक गयी मानो। प्रबल कल कल, सकल उद्धत, ऊर्जा चुक गयी मानो। विषय अनगिन किन्तु मन का, सिकुड़ता विस्तार सहसा। प्र...
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12.4.14

लोकपथ

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अनवरत   सुख   की   पिपासा , प्रकृति में उन्मुक्तता है । शान्ति को मन ढूढ़ता है, प्रेम को मन मचलता है ।। है विडम्बना मनुज की पर, ...
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