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10.3.12

सोझ समझ कर पीना, यह चम्बल का पानी है

जब भूगोल पढ़ना प्रारम्भ किया तब कहीं जाकर समझ में आया कि बचपन में जो भी पानी हमने पिया, वह यमुना का नहीं चम्बल का था। आगरा की यमुना में कुछ जल शेष ही नहीं रखा गया और उसी से बस ६० किमी दक्षिण में धौलपुर और मुरैना के मध्य चम्बल अपने पूरे स्वरूप में बहती है, आगे जाकर इटावा के पास दोनों मिल जाती हैं।

चम्बल अपने पानी से अधिक अपने बीहड़ों के लिये विख्यात है। बीहड़ बने कैसे, इस पर भूगोलविदों को मतभेद हो सकता है पर बीहड़ में कितने डकैतों को आश्रय मिला, उसमें कोई मतभेद नहीं है। बीहड़ों की बनावट ऐसी है कि इमामबाड़ा भी वहाँ आकर भ्रमित हो जाये। १५-२० मीटर ऊँचे अनगिनत टीले, उसमें मकड़ी के जाल की तरह बिछे रास्ते, चलते चलते कब कोई सामने प्रकट हो जाये कुछ पता नहीं। कितनी भी ऊँचाई से खड़े होकर देख ले, किस टीले के पीछे कौन छिपा है, पता ही नहीं चल सकता है। बचपन में भले ही कितनी लुकाछिपी खेली हो आपने, यहाँ आकर आप सब भूल जायेंगे, बागी दशकों से यही खेल पुलिसवालों के साथ खेल रहे हैं यहाँ पर।

कहते हैं कि यह बीहड़ तब बनने प्रारम्भ हुये जब वर्षा का पानी कई मार्गों से हो चम्बल में मिलने आया होगा। शताब्दियों का बहाव पृथ्वी की सतह में मुलायम मिट्टी को हर बार कुरेदता होगा, हर वर्ष थोड़ी थोड़ी खरोंच लगती होगी पृथ्वी को। यदि हर बार के दृश्यों को तेजी से चला कर देखा जाये तो यही लगेगा कि मदमाता पानी बहा जा रहा है, सरल पर्तों को उघाड़ता, अन्याय सा लगता है, कमजोर को अपनी जगह से हटाती शक्ति। बीहड़ों के बीच बने लहराते से रास्तों की गहराई जिस अन्याय को सहने का प्रतीक है, उसी अन्याय को सहने की शक्ति और स्थान प्रदान करता रहा है यह बीहड़।

तो क्या छिपने का उपयुक्त स्थान बागी बनाने में सहायक है? कुछ और गहरे कारण रहे होंगे कि विद्रोहीमना बीहड़ों में आश्रय लेने आये। सामाजिक व्यवस्था में बड़े बड़े छिद्र रहे होंगे जिससे समाज की ऊर्जा बीहड़ों में बहने को बाध्य हुयी होगी। भाई ने भाई को हिस्सा नहीं दिया होगा, किसी निर्बल को सताया गया होगा, प्रशासन की लोलुपता अंग्रेजों की बराबरी करने पर तुली होगी। हर बागी के साथ कोई न कोई नयी कहानी सुनने को मिल जायेगी। पीढ़ियो की वैमनस्यता का बदला आने वाली पीढ़ियों को चुकाना शेष होगा। कुछ न कुछ तो जटिलता रही होगी जो प्रशासन और समाज समय रहते समझ नहीं पाया होगा और विकास के स्थान पर यह स्थान बागियों के लिये विख्यात हो गया।

अन्याय के अध्याय तो भारत के अन्य भागों में भी लिखे गये हैं पर वहाँ पर इतने बागी नहीं हुये जितने चम्बलों के बीहड़ों ने पैदा किये। कुछ ने सह कर रहना सीख लिया, कुछ ने रह कर सहना सीख लिया, पर चम्बल के बीहड़ों ने न कभी अन्याय सहना सीखा, न कभी चैन से रहना सीखा। सहनशीलता का ज्वलनबिन्दु इतना शीघ्र भड़क जाने का कारण कुछ और पता चला।

झाँसी की पोस्टिंग के समय मुरैना और धौलपुर का क्षेत्र मंडल के अन्तर्गत ही था, लगभग उसी समय एक सहपाठी जिलाधिकारी मुरैना के पद पर था। कई बार मुरैना जाना हुआ, रेल से भी और सड़क से भी। चम्बल पुल के पास स्थित बीहड़ के अन्दर लगभग एक किमी जाने का अनुभव भी प्राप्त किया। हर दस कदम पर नया दृश्य दिख जाता था, लगा कहीं कोई बागी छिपा न बैठा हो। यद्यपि स्टेशन मास्टर ने उनकी संभावित अनुपस्थिति के बारे में आश्वस्त कर दिया था, पर जब तक वापस नहीं आ गये हृदय अव्यवस्थित सा धड़कता रहा।

कई बार जाने का अनुभव भी अपर्याप्त था, बीहड़ को समझने के लिये। सामाजिक समस्याओं की समझ भी कभी इतने गहरे निष्कर्ष गढ़ते नहीं देखी गयी। विकास के प्रति प्रशासन की उदासीनता भी विद्रोही प्रत्युत्तरों की ओर इंगित नहीं कर पायी। जब कभी स्मृति में मुरैना आया, कारण जानने का पर्याप्त चिन्तन किया, पर सफलता नहीं मिली। कुछ दिनों पहले एक परिचित पत्रकार से एक बागी(संभवतः मलखान सिंह) का स्वरचित और गाया हुआ ओजपूर्ण गीत सुना तब कहीं जाकर कारण स्पष्ट हुआ। इसी बीच पानसिंह तोमर फिल्म देखकर उस गीत को साझा करने की इच्छा भी बलवती होने लगी। साथ ही साथ यह तथ्य भी सताने लगा है कि जो पानी बीहड़ों में बागी निर्मित करता रहा है, वही पानी हम न जाने कितना पी गये हैं बचपन में, यमुना का समझ कर।

आप तो गीत सुनिये, बस। कहो, हओ...