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28.8.21

आशा के शत दीप जले

 

न जाने किस राह चला जग, कातरता व्यापी चहुँ ओर,

अब मानवता रहे संशकित, अब पशुता का चलता जोर ।


शील, धैर्य, सज्जनता, श्रम, सब आदर्शों की गाली हैं,

जिनके पेड़ों पर रुपया है, बस वही आज वनमाली हैं ।


मानवता सिमटी क्षुब्धमना, नित दानवता उत्पातों से,

जन थकता छिपता दीन हीन, नित निशाचरी आघातों से ।


जो हैं समाज के शीर्षबिन्दु, जो मानवता के त्राता हैं,

बिन पिये चढ़े गर्वित मद में, बन बैठे वंद्य विधाता हैं ।


आश्रित तुम पर दुखियारे जो, उनके घर में देखो जाकर,

जो बिता रहे पूरा जीवन, तन ढकने का कपड़ा पाकर ।


तुम उसी राजसी सूट-बूट में, मद-मतवाले फिरते हो,

मानवता का दायित्व लिये, कुत्सित कर्मों में गिरते हो ।


भोली जनता को बहलाते, बस अपना स्वार्थ निभाते हो,

कब आकर इनकी सुध लेते, कब आकर इन्हें बचाते हो?


ये तेरे है, तुम इनके हो, इनमें तुममें कोई भेद नहीं,

बस राह मिलेगी अन्तहीन, हो गया किन्तु विच्छेद कहीं ।


सब यही चाहते देश बढ़े, उन्नति के विकसित पंथ चले,

यदि निशा पसारे तम अपार, तब आशा के शत दीप जले।