न दैन्यं न पलायनम्

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28.8.21

आशा के शत दीप जले

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  न जाने किस राह चला जग, कातरता व्यापी चहुँ ओर, अब मानवता रहे संशकित, अब पशुता का चलता जोर । शील, धैर्य, सज्जनता, श्रम, सब आदर्शों की गाली ह...
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