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23.10.10

वर्धित सर्वम् स वर्धा – 3

कभी कल्पना करता हूँ कि जीवन में यदि एक स्थान पर ही रहा होता तो कितना कम जान पाता समाज को, देश को, मानवता को। पुस्तकें बहुत कुछ सिखाती हैं पर प्रत्यक्ष अनुभव एक विशेष ही स्थान रखता है जीवन में। यदि वर्धा नहीं जाता तो ब्लॉगरों के व्यक्तित्व मात्र, उनके चित्रों तक ही सीमित रहते, एक ज्ञान भरी पुस्तक की तरह। गांधीजी के आश्रम को बिना देखे उस अनुशासन की कल्पना करना असंभव था जिस पर सत्याग्रह के सिद्धान्त टिके हुये थे।

गांधीजी के प्रथम सत्याग्रही का आश्रम भी वर्धा में ही है, नदी किनारे। गांधी के प्रश्नों का उत्तर भी वहीं मिलना था संभवतः। शब्दों से अधिक कर्म को महत्व देने की जीवटता जिसके अथक अनुशासन का परिणाम रही उसके आश्रम देखने का संवेदन मन में गहरा बैठा था। दधीचि-काया, अन्तरात्मा में वज्र सा आत्मविश्वास, सर्वजन के प्रति पूर्ण वात्सल्य का भाव, शारीरिक-श्रम निर्मित तन, फक्कड़ स्वभाव और नाम विनोबा भावे।

विनोबा का नाम हमारे मन में भूदान आन्दोलन की स्मृतियाँ उभार लाता हैं। जिस देश मे व्यक्तियों को अपनी भूमि से असीम लगाव हो, उस देश में भूदान-यज्ञ विनोबा के योगदान को वृहद-नाद सा उद्घोषित करता है। दस लाख एकड़ भूमि का दान भारत के इतिहास में अद्वितीय था, स्वतःस्फूर्त और मानव की सहृदयता से प्रेरित। यह एक महामानव के मन से प्रारम्भ हुआ और एक जन-आन्दोलन में बदल गया।

हम में से बहुतों को यह ज्ञात न हो कि भूदान आन्दोलन 13 वर्ष चला और इस काल में 70,000 किमी की पदयात्रा की, विनोबा ने। भारत के हर कोने में जन जन के मन में रच बस गया, वह खाँटी भारतीय स्वरूप। जन-सैलाब इस भूदान के महात्मा के दर्शन व अगवानी हेतु खड़ा रहता था और अपने क्षेत्र में अनवरत उनके संग रहता था। नये क्षेत्र में नये समूह, नयी आशा, नया उत्साह मिलता और पृथ्वी अपने महापुत्र को स्वदान का आशीर्वाद बरसाती रहती।

देश को देखने और समझने का इससे अच्छा माध्यम क्या हो सकता है भला? भारतीयता पर ज्ञान के अध्याय उघाड़ चुके विद्वानों का ज्ञान, विनोबा के सम्मुख सदा ही नगण्य रहेगा।

हमारा ज्ञान पुस्तकीय अधिक है, समस्याओं पर हमारी दृष्टि सीमित है और कल्पनाओं के खग अवसर पाते ही हमारे बौद्धिक परिवेश में उड़ने लगते हैं। प्रत्यक्ष जाकर देखने से पता लगता है कि हम कितना कम जानते हैं, वस्तुस्थिति के बारे में।

आश्रम में उनकी पदयात्रा में संग रहे श्री गौतम बजाज जी से भेंट हुयी। उनसे संस्मरण सुनते सुनते कब सायं हो गयी, पता नहीं चला। यदि ट्रेन पकड़ने की बाध्यता न होती तो रात के भोजन तक वह संस्मरण-नद बहती रहती। उनकी आत्मकथा की पुस्तक से वह कमी संभवतः पूरी न हो पाये, पर भविष्य में भारत-भ्रमण के माध्यम से ज्ञानवर्धन का योग मेरे भाग्य में बना रहे, यही ईश्वर से प्रार्थना है।


वर्धति भारत ज्ञानम्, वर्धति कर्म प्रमाणम्, स वर्धा।

इति वर्धा कथा।

20.10.10

वर्धति सर्वम् स वर्धा - 2

ब्लॉगरों से संक्षिप्त पर स्नेहमयी भेंट के पश्चात जब चला, तब मन प्रसन्नचित्त था, वातावरण में शीतलता थी और मार्ग के दोनों ओर बिखरी हरियाली नयनों को आनन्द प्रदान कर रही थी। पता नहीं क्यों, पर जैसे जैसे सेवाग्राम स्थिति गांधी आश्रम की ओर बढ़ रहा था, मन में व्यग्रता और हृदयगति बढ़ रही थी। आज जो प्रश्न मुझसे पूछे जाने वाले थे, गांधी के प्रतीकों द्वारा, उनका उत्तर नहीं था मेरे पास। बिना कुछ भेंट लिये कैसे कोई जाता है अपने प्रिय के पास? मैं जा रहा था निरुत्तर। मुझे बहुत पहले से ज्ञात था कि यह क्षण मेरे जीवन में एक न एक दिन आयेगा अवश्य पर मैंने इस प्रश्न का उत्तर यथासम्भव नहीं ढूढ़ा। रीते हाथ जाने की व्यग्रता थी मन में और वर्षों तक गांधी से आँख न मिलाने की कायरता भी।

आश्रम सहसा ही आ गया, बिना किसी गुम्बदीय भौकाल के। जिस देश में जीवित आत्माओं के महिमा मण्डन में कुबेर के हाथों नहाने का प्रचलन हो, उस तुलना में अव्यक्त सा लगा आधुनिक भारतीय इतिहास के मर्म का निवासस्थल। मेरी व्यग्रता सहसा ढल गयी, स्थान का प्रभाव था संभवतः। राजनीति के कई शलाका पुरुषों को 1934 से 1948 के बीच ऐसी ही शान्ति मिल जाया करती होगी इस आश्रम में घुसते ही।

कुटिया में घुसते ही पर, बहुत ही करुण स्वर में गांधी जी ने मुझसे वह प्रश्न पूछ ही लिया। प्रश्न बहुत सरल था और मुझे पहले से ज्ञात भी। क्या मेरे देश के लोग सत्य और अहिंसा को अभी भी समझते हैं? राजनीति तो तब भी स्वार्थतिक्त थी और आज भी होगी, पर कहीं मेरे नाम का दुरुपयोग तो नहीं कर रहे हैं, आज के नेता?


मैं क्या कहता, आँख नम किये स्तब्ध सा खड़ा रहा अपने ही स्थान पर, किवाड़ पर मले हुये कड़वे तेल से अधिक आँखों को रुलाने वाले थे उत्तर। अपनी वृद्धावस्था से हिलने में असमर्थ उस निराश मुख के पीछे दुख का सागर हिलोरें ले रहा था। 76 वर्ष पहले वायसरॉय द्वारा लगाये गये फोन से अभी तक केवल समस्या के समाधान के लिये प्रार्थनायें ही तो आयी हैं, मेरे सत्य और अहिंसा के संदेशे को तो सदा ही म्यूट में ही रखा है सबने। मेरे अश्रु यह कह कर टपकने नहीं दिये कि यदि अश्रु टपक गये तो आँखों से इनका खारापन चला जायेगा। आज या तो अन्याय हो रहा है या अन्याय सहा जा रहा है, प्रतिकार न मेरी विधि से हो रहा है और न ही उन क्रान्तिकारियों की विधि से, जिनसे मेरा सैद्धान्तिक मतभेद रहा है। मैं कुछ सोचकर अश्रु पी गया।

सोचा, यदि सुबह ही यहाँ आ गया होता तो देश के सजग औऱ निर्भय ब्लॉगर बन्धुओं से इस प्रश्न का उत्तर पूछता। समय की कमी ने जीवन का क्रम तोड़ मरोड़ कर रख दिया है, जीने के समय मरने सी हड़बड़ी और मरने के समय शान्ति से जीने की उत्कट चाह।

गांधीजी और कस्तूरबा की सरल और अनुशासित जीवनचर्या का साक्षात दर्शन कर, अपनी पत्नी से विनोदवश पूछा कि यहाँ पर रह पाओगी, इस प्रकार का जीवन। पत्नी, जो थोड़ा आर्थिक सम्पन्न परिवार से है, का उत्तर भी आईना दिखाता हुआ सपाट था। हाँ, यदि आप गांधीजी की तरह रह सकते हो तो। गांधीजी के आदर्शों का पालन करने का दम्भ भरते हुये और ज्ञान बाटते हुये नेताओं को ऐसे उत्तर क्यों नहीं मिल पाते? क्यों नहीं इस बात पर सहमति बनती है कि किसी भी व्यक्ति के लिये गांधीजी का नाम और आदर्श का उपयोग करने की पहली शर्त उस प्रकार का जीवन व्यतीत करना है जिससे गांधीजी के विचारों को दृढ़ता व परिपक्वता मिली थी।

64 वर्ष की आयु में गांधी जी वर्धा स्थित इस आश्रम में रहने आये थे। आज मेरे देश की स्वतन्त्रता को भी 64वाँ वर्ष लगा है, उसे भी वर्धा के आश्रम जैसे सरल, अनुशासित और कर्मशील जीवन जीने को कौन प्रेरित करेगा?

वर्धति गांधी कर्मम्, वर्धति गांधी मर्मम्, स वर्धा।

16.10.10

वर्धति सर्वम् स वर्धा - 1

गांधीजी, विनोबा भावे और हिन्दी, इन तीनों का प्रेम मेरे आलस्य पर विजय पा चुका था, जब मैंने स्वयं को वर्धा हिन्दी विश्वविद्यालय के सभागार में खड़ा पाया। परिचय की प्रक्रिया में सारे ब्लॉगरों को उनके चित्र के सहारे पहचान लेने का विश्वास उस समय ढहने लगा जब त्रिविमीय आकृतियाँ स्मृति को धुँधलाने व उलझाने लगीं। चित्र में सजे मुखमण्डल सजीव रूप में और भी आकर्षक, सहज व भावपूर्ण लगे। चित्रों का सीमित संप्रेषण तब तक स्मृति पटल से नहीं हटा, जब तक बार बार देख कर यह निश्चय नहीं कर लिया कि, हाँ, यही अमुक ब्लॉगर हैं। पीछे चुपचाप बैठ कर मुलक मुलक के कई बार, बाल-सुलभ फिर भी उन्हें देखता ही रहा।

विचित्र सा लग रहा था। बौद्धिक परिचय था पहले से, पोस्टों के माध्यम से, साक्षात उपस्थिति में उनकी कई पोस्टों के शीर्षक उछल उछल कर आँखों के सामने आ रहे थे। बौद्धिक से शारीरिक ढलान में लुढ़कने के बाद जब संयत हुआ तब लगा कि इन महानुभावों के बीच स्वयं को पाना किसी महाभाग्य से कम नहीं है।
 
तल्लीनता में विघ्न तब आया जब सिद्धार्थ जी ने मेरे द्वारा कुछ विचार व्यक्त करने की सार्वजनिक घोषणा कर दी, वह भी बिना बताये। घर्र घर्र हो रही गाड़ी यदि सहसा पाँचवें गियर में डाल दी जाये तो जो प्रयास उसे सम्हालने में लगेंगे, वही प्रयास मुझे हृदयगति को सामान्य करने में लग रहे थे। विषय पर तब तक ध्यान ही नहीं दिया था, बड़े पोस्टर पर आचार-संहिता लिखा देख, विचार भी भाग खड़े हुये क्योंकि विचार तो सदा ही आवारगी-पसन्द रहे हैं। मैं तो ब्लॉगर दर्शन करने आया था, आचार-संहिता से दूर दूर का सम्बन्ध नहीं रहा, कभी भी।

यद्यपि सभाओं को सम्बोधित करने का अनुभव रहा है पर यशदीपों के सामने खड़ा, जुगनू सा टिमटिमाता, कौन सा ज्ञान उड़ेल दूँ, नहीं समझ में आ रहा था। जब घटनाओं का प्रवाह गतिशील हो, नदी का ही उदाहरण सूझता है, वही बहा कर जब मंच से उतरा तभी वास्तविकता में पुनः लौट पाया।

सभी ब्लॉगरों से बात करने का अवसर मिला जो संक्षिप्त ही रहा। अनीता कुमार जी के अतिरिक्त किसी से पहले का परिचय नहीं था अतः मुख्यतः कुशलक्षेम व ब्लॉग की प्रविष्टियों के सम्बन्ध में ही चर्चा हुयी। चर्चा भोजन के समय भी चलती रही जिससे भोजन और भी सुस्वादु हो गया था। तत्पश्चात शेष दो प्रेम-दायित्वों का निर्वाह करने निकल पड़ा।

हिन्दी के प्रति समर्पित योद्धाओं से मिलकर, साहित्य के प्रति मेरी आस्था का बल बढ़ा है। हिन्दीवर्धन में यह सम्मेलन एक सशक्त हस्ताक्षर सिद्ध होगा। सभी की अनुभूति उनकी लेखनी को और प्रबल बनायेगी और साहित्यसंवर्धन भी होगा। आयोजकों, विशेषकर कुलपति महोदय व सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी के प्रयासों को अतिशय साधुवाद, इस उत्कृष्ट आयोजन के लिये जिसकी विषयान्तर उपलब्धियाँ कहीं अधिक रहीं।

हिन्दी सम्मानम् वर्धति स वर्धा।

किसी व्यक्तित्व को कुछ पंक्तियों में व्यक्त करना कठिन है पर अपने अवलोकन को न कहना उनके प्रति अपराध माना जा सकता है अतः सबके नाम सहित लिख देता हूँ। न्यायालय की भाँति पूर्ण निर्णय सुरक्षित रख रहा हूँ, व्यक्तिगत भेंट के बाद ही निर्णय बताया जायेगा। अतः आप सभी बंगलोर आमन्त्रित हैं।



अनीता कुमार
देवीरूपा, संयत, गरिमा,
ब्लॉग जगत की एक मधुरिमा
अजित गुप्ता
अब तक तो गाम्भीर्य दिखा है,
एक प्रफुल्लित हृदय छिपा है
कविता वाचक्नवी
हिन्दी-महक, बयार लिये,
परदेशी बन प्यार लिये
रचना त्रिपाठी
आवृत गांधी खादी,
एकल ही संवादी
गायत्री शर्मा
मेधा-अर्जित आस,
रूपमयी-विश्वास
अनूप शुक्ल
मौज लेने में अपरिमित आस्था,
उसी रौ में सुना डाली दास्ता
विवेक सिंह
हाथ कैमरा, झोंके फ्लैश,
विद्वानों से क्योंकर क्लैश
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
दिवस दो काँधों सकल ब्लॉगिंग टिकी,
जी गये पल, पर जरा भी उफ नहीं की
डॉ महेश सिन्हा
देखकर स्मित सी मुस्कान,
उड़न छू परिचय का व्यवधान
हर्षवर्धन त्रिपाठी
उद्यमिता की बात कही,
सब सुधरेंगे, देर सही
संजीत त्रिपाठी
एक कुँवारा इस शहर में,
मिला उसे दोपहर में
यशवन्त सिंह
जो विचार मन में आयेगा,
यहीं अभी वाणी पायेगा
अविनाश वाचस्पति
कलमाडी की कृति अद्भुत,
पर ब्लॉगिंग में मजा बहुत
जय कुमार झा
स्वच्छ व्यवस्था करे विधाता,
हम घूमेंगे लिये पताका
रवीन्द्र प्रभात
मन बसी परिकल्पना,
शब्द दिखते अल्पना
संजय बेगाणी
छोटा तन, गुजरात बसा,
हिन्दी का विश्वास बसा
सुरेश चिपलूनकर
तिक्त शब्द, भीषण संहार,
हृदय किन्तु विस्तृत आकार
विनोद शुक्ल
निज आह्लादित, शान्त, सुहृद-नर,
है अनामिका विजयित पथ पर
जाकिर अली रजनीश
जहाँ ब्लॉग और हिन्दी वर्धित,
दिख जाते रजनीश समर्पित
अशोक कुमार मिश्र
हम पहले थे मिले नहीं,
भाव किये संवाद कहीं
प्रियन्कर पालीवाल
परिचय में संवाद सिमटकर,
थे वर्धा में एक प्रियन्कर
शैलेष भारतवासी
परिचय दृष्टि रहा बनकर,
है भविष्य-आशा तनकर
वन बिहारी बाबू
हम सम्मेलन में उन्मत थे,
आप व्यवस्था में उद्धृत थे
आलोक धन्वा
हुआ हमारा मेल नहीं,
सुना आप संग रेल रही
विभूति नारायन राय
गूँज रहा बस एक संदेशा,
ब्लॉगिंग में ही लक्ष्मण-रेखा
रवि रतलामी
गोली मारो, जियो कलन्दर,
मायावी हो घूम घूम कर
पवन दुग्गल
बच के रहना बाबा जी,
उत्श्रंखल मन बाधा जी
श्रद्धा पाण्डेय
लख ब्लॉगिंग की मदमत धार,
संग रहीं बनकर पतवार
प्रवीण पाण्डेय
जिन्दगी अलमस्त हो,
चुपचाप बहना चाहती है