Showing posts with label गांधी. Show all posts
Showing posts with label गांधी. Show all posts

20.10.10

वर्धति सर्वम् स वर्धा - 2

ब्लॉगरों से संक्षिप्त पर स्नेहमयी भेंट के पश्चात जब चला, तब मन प्रसन्नचित्त था, वातावरण में शीतलता थी और मार्ग के दोनों ओर बिखरी हरियाली नयनों को आनन्द प्रदान कर रही थी। पता नहीं क्यों, पर जैसे जैसे सेवाग्राम स्थिति गांधी आश्रम की ओर बढ़ रहा था, मन में व्यग्रता और हृदयगति बढ़ रही थी। आज जो प्रश्न मुझसे पूछे जाने वाले थे, गांधी के प्रतीकों द्वारा, उनका उत्तर नहीं था मेरे पास। बिना कुछ भेंट लिये कैसे कोई जाता है अपने प्रिय के पास? मैं जा रहा था निरुत्तर। मुझे बहुत पहले से ज्ञात था कि यह क्षण मेरे जीवन में एक न एक दिन आयेगा अवश्य पर मैंने इस प्रश्न का उत्तर यथासम्भव नहीं ढूढ़ा। रीते हाथ जाने की व्यग्रता थी मन में और वर्षों तक गांधी से आँख न मिलाने की कायरता भी।

आश्रम सहसा ही आ गया, बिना किसी गुम्बदीय भौकाल के। जिस देश में जीवित आत्माओं के महिमा मण्डन में कुबेर के हाथों नहाने का प्रचलन हो, उस तुलना में अव्यक्त सा लगा आधुनिक भारतीय इतिहास के मर्म का निवासस्थल। मेरी व्यग्रता सहसा ढल गयी, स्थान का प्रभाव था संभवतः। राजनीति के कई शलाका पुरुषों को 1934 से 1948 के बीच ऐसी ही शान्ति मिल जाया करती होगी इस आश्रम में घुसते ही।

कुटिया में घुसते ही पर, बहुत ही करुण स्वर में गांधी जी ने मुझसे वह प्रश्न पूछ ही लिया। प्रश्न बहुत सरल था और मुझे पहले से ज्ञात भी। क्या मेरे देश के लोग सत्य और अहिंसा को अभी भी समझते हैं? राजनीति तो तब भी स्वार्थतिक्त थी और आज भी होगी, पर कहीं मेरे नाम का दुरुपयोग तो नहीं कर रहे हैं, आज के नेता?


मैं क्या कहता, आँख नम किये स्तब्ध सा खड़ा रहा अपने ही स्थान पर, किवाड़ पर मले हुये कड़वे तेल से अधिक आँखों को रुलाने वाले थे उत्तर। अपनी वृद्धावस्था से हिलने में असमर्थ उस निराश मुख के पीछे दुख का सागर हिलोरें ले रहा था। 76 वर्ष पहले वायसरॉय द्वारा लगाये गये फोन से अभी तक केवल समस्या के समाधान के लिये प्रार्थनायें ही तो आयी हैं, मेरे सत्य और अहिंसा के संदेशे को तो सदा ही म्यूट में ही रखा है सबने। मेरे अश्रु यह कह कर टपकने नहीं दिये कि यदि अश्रु टपक गये तो आँखों से इनका खारापन चला जायेगा। आज या तो अन्याय हो रहा है या अन्याय सहा जा रहा है, प्रतिकार न मेरी विधि से हो रहा है और न ही उन क्रान्तिकारियों की विधि से, जिनसे मेरा सैद्धान्तिक मतभेद रहा है। मैं कुछ सोचकर अश्रु पी गया।

सोचा, यदि सुबह ही यहाँ आ गया होता तो देश के सजग औऱ निर्भय ब्लॉगर बन्धुओं से इस प्रश्न का उत्तर पूछता। समय की कमी ने जीवन का क्रम तोड़ मरोड़ कर रख दिया है, जीने के समय मरने सी हड़बड़ी और मरने के समय शान्ति से जीने की उत्कट चाह।

गांधीजी और कस्तूरबा की सरल और अनुशासित जीवनचर्या का साक्षात दर्शन कर, अपनी पत्नी से विनोदवश पूछा कि यहाँ पर रह पाओगी, इस प्रकार का जीवन। पत्नी, जो थोड़ा आर्थिक सम्पन्न परिवार से है, का उत्तर भी आईना दिखाता हुआ सपाट था। हाँ, यदि आप गांधीजी की तरह रह सकते हो तो। गांधीजी के आदर्शों का पालन करने का दम्भ भरते हुये और ज्ञान बाटते हुये नेताओं को ऐसे उत्तर क्यों नहीं मिल पाते? क्यों नहीं इस बात पर सहमति बनती है कि किसी भी व्यक्ति के लिये गांधीजी का नाम और आदर्श का उपयोग करने की पहली शर्त उस प्रकार का जीवन व्यतीत करना है जिससे गांधीजी के विचारों को दृढ़ता व परिपक्वता मिली थी।

64 वर्ष की आयु में गांधी जी वर्धा स्थित इस आश्रम में रहने आये थे। आज मेरे देश की स्वतन्त्रता को भी 64वाँ वर्ष लगा है, उसे भी वर्धा के आश्रम जैसे सरल, अनुशासित और कर्मशील जीवन जीने को कौन प्रेरित करेगा?

वर्धति गांधी कर्मम्, वर्धति गांधी मर्मम्, स वर्धा।