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4.8.12

बड़ा अनूठा खेला है

किसी काम को करूँ, ना करूँ, कानाफूसी चलती है,
बुद्धि कहे यदि, कर भी डालो, मन की राय बदलती है,
सुबह आँख खुलती, मन कहता, सो जाओ तुम थके बहुत,
शुभ विचार के सम्मुख नित ही तर्कों की सेना प्रस्तुत,
मन करता है रोज लड़ाई, बहका है, अलबेला है,
सचमुच भैया, जीवन जीना, बड़ा अनूठा खेला है।

मन चंचल है, नित नित साधन, नये नये ले आता है,
बुद्धि तर्क में, अनुभव में जा, अपना ज्ञान बढ़ाता है,
मन गतिमान, बुद्धि है स्थिर, अपने में मदमाये दो,
दोनों ही हैं अति आवश्यक, रहते मान बढ़ाये दो,
नहीं कोई भी हाथ बटाता, रहता आत्म अकेला है,
सचमुच भैया, जीवन जीना, बड़ा अनूठा खेला है।

दोनों की मैं सुन लेता हूँ, दोनों की मैं सहता हूँ,
तट हैं दो, मैं भी तटस्थ हो, धीरे-धीरे बहता हूँ,
बढ़ता जाता इसी आस में, दोनों के संचार सहज हों,
मिलजुल कर जीते दुविधायें, दोनों के विस्तार वृहद हों,
दो जीवट हैं और हृदय में आशाओं का मेला है,
सचमुच भैया, जीवन जीना, बड़ा अनूठा खेला है।