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22.10.19

अभ्यास और वैराग्य - १९

आसन में बैठने से प्रयत्नशैथिल्य होता है, शारीरिक उद्वेग कम हो जाते हैं। मन को अनन्त पर स्थिर कर दिया जाता है, इससे मानसिक उद्वेग कम हो जाते हैं। यह एक आदर्श स्थिति है जिसमें योग के आगत अंग स्थिर किये जा सकते हैं। 

पतंजलि कहते हैं कि आसन के स्थिर होने पर ही प्राणायाम किया जा सकता है। तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः॥२.४९॥ उसके(आसन) के होने पर श्वास और प्रश्वास की गति का विच्छेद प्राणायाम है। अब आसन कितनी देर कर लेने पर सिद्ध माना जा सकता है। हठयोग तो कहता है कि ३ घंटे ३६ मिनट तक आसन में स्थिर और सुखपूर्व बैठ लेने से वह सिद्ध होता है। इतनी देर नहीं भी हो पाये तो १५-२० मिनट भी आसन में बैठ लिया जाये तो प्राणायाम किया जा सकता है। अन्दर लेना श्वास है, बाहर निकालना प्रश्वास है, विच्छेद इन दोनों का अभाव है। प्राणायाम प्राणवायु का आयाम है, विस्तार है। विस्तार किस बात का हो, समय के अनुसार हो, या धीरे धीरे श्वास लेने की प्रक्रिया। योगसूत्र तो मात्र विच्छेद की चर्चा करता है। तो यहाँ पर हमें विच्छेद वाला प्राणायाम करने से ध्यान आदि में सहायता मिलती है। अन्य प्रकार के प्राणायाम से अन्य प्रकार के लाभ होते हैं, पर यहाँ पर पतंजलि का उद्देश्य उन सबको न बतलाकर एक विशेष प्रकार का अभ्यास बतलाना है।

तीन प्रकार का प्राणायाम बतलाया है। बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः॥२.५०॥ बाह्य, आभ्यन्तर और स्तम्भ के प्रकार से। देश, काल और संख्या की दृष्टि से। और दीर्घ और सूक्ष्म के भेद से। कुल देखा जाये तो १८ विभेद है। वाह्य में प्रश्वास के बाद विच्छेद कर देना, आभ्यन्तर में श्वास के बाद विच्छेद कर देना, स्तम्भ में बीच में ही विच्छेद कर देना।  कितनी दूर तक श्वास आती या जाती है, कितनी मात्रा में श्वास ली या छोड़ी जा सकती है। काल की दृष्टि से कितने समय तक छोड़ी या रोकी जा सकती है। स्तम्भ में यह प्रवाह कभी भी रोक दिया जाता है, बीच में ही। उद्घात १२ श्वास-प्रश्वास के कालखण्ड को कहते है। उतनी देर रोकना एक उद्घात कहलाता है। ३ उद्घात तक श्वास लेना, रोकना और छोड़ना सूक्ष्म प्राणायाम कहा जाता है, धीरे धीरे। दीर्घ में अधिक मात्रा में, अधिक वेग से और एक उद्घात में श्वास ली और छोड़ी जाती है। भ्रस्तिका, कपालभाती, अनुलोमविलोम आदि प्राणायाम के प्रायोगिक निष्कर्ष हैं। कैसे, किसको, कब, कितना करना है, यह अभ्यास का विषय है। 

बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः॥२.५१॥ चतुर्थ प्राणायाम प्रथम तीन का अतिक्रम है। पहले तीनों  में एक विशेष क्रम था। यह भी एक तरह का स्तम्भ है पर इसमें कोई क्रम नहीं है। स्तम्भ में एक क्रम रहता है और उस हेतु अभ्यास से सिद्धि होती जाती है। इसमें पहले तीन के अभ्यास के साथ साथ प्राण पर पूर्ण नियन्त्रण होता है, कहीं भी, कभी भी और कैसे भी।

ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्॥२.५२॥ मलीनता हटने लगेगी तो आवरण हट जाता है और सब दिखने लगता है। विवेक के ऊपर कर्म का आवरण होता है, प्राणायाम उस आवरण को हटाता है। कर्म इससे क्षीण होते हैं। हर प्राणायाम से प्रतिक्षण क्षीण होते हैं कर्म। विवेक हमारे पापकर्म के क्षीण होने से आयेगा।

प्राणायाम से बढ़कर कोई तप नहीं है। इससे मलसमूह की विशुद्धि और ज्ञानोद्दीप्ति होती है। प्राणवायु न चलने पर मृत्यु हो जाती है। उसको भी अभ्यास के माध्यम से सहन करना, मृत्यु को साक्षात देखना है, यही प्राणायाम का अभ्यास तत्व है। कैसे सबसे पहले श्वास आये, सारा ध्यान और प्रयास वहीं लग जाता है। वही सर्वाधिक आवश्यक हो जाता है। तत्काल तो यही लगता है कि किस तरह से श्वास प्रश्वास प्रक्रिया पुनः प्रारम्भ हो। शरीर एक आकस्मिकता से कार्य करने लगता है, इससे उसकी कार्यक्षमता बढ़ जाती है। एक स्तर तक यह लाभ दायक है पर यदि इसकी अति करेंगे शरीर भी इसकी आकस्मिकता भूल जायेगा, उसका अभ्यस्त हो जायेगा।

प्राणायाम का एक दूसरा पक्ष यह भी है कि मस्तिष्क में गयी अधिक आक्सीजन से मस्तिष्क के मल बाहर आते हैं और मस्तिष्क और निर्मल अनुभव करता है। प्रश्वास की स्थिति में अधिक रहने से बिना आक्सीजन के काम करते हुये जब उसे आक्सीजन की अतीव आवश्यकता होती है तो उस समय श्वास आने पर उसका अधिकतम उपयोग होता है। यदि उदाहरण लें तो उपवास करने के बाद जब भूख सर्वाधिक लगती है तो जो भी खाते हैं वह पच जाता है और शरीर में लगता भी है। आवश्यकता का बोध होने पर उत्तरदायित्व आ जाता है। मस्तिष्क को जब तक लगता रहता है कि प्राण तो स्वतः उपलब्ध है, वह उसका मूल्य नहीं समझ पाता है, उसका पूर्ण उपयोग नहीं कर पाता है। जब न्यूनता की स्थिति आती है तो संसाधनों का उपयोग सर्वोत्तम होता है।

आधुनिक चिकित्सीय विज्ञान इस पर अधिक चर्चा नहीं करता है। बीमारियों और शारीरिक प्रयोगों के कई अच्छे जानकार डाक्टर अपने उपचार के साथ साथ प्राणायाम करने की सलाह भी देते हैं। पिताजी को एक दो पुराने रोगों से बाहर लाने में प्राणायाम ने अद्भुत योगदान दिया है। प्राणायाम करने से किस प्रकार के उपयोगी रसायनों का मस्तिष्क में स्राव होता है, इस पर एक समग्र शोध होना चाहिये।  प्राणायाम प्राणदान करने में सक्षम है, प्राणायाम के चिकित्सीय लाभ अवर्णनीय हैं, बस अति नहीं करना है और एक क्रम बनाये रखना है।

धारणासु च योग्यता मनसः॥२.५३॥ प्राणायाम करने से मन एक स्थान पर टिकता है, सारी धारणाओं में मन योग्य हो जाता है। आगे की साधनापथ में तत्पर हो जाता है।

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