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12.5.12

आधारभूत गर्त

जुआ खेलने वाले जानते हैं कि दाँव इतना लगाना चाहिये कि एक बार हारने पर अधिक कष्ट न हो, और दाँव इतनी बार ही लगाना चाहिये कि अन्त में जीने के लिये कुछ बचा रहे। वैसे तो लोग कहते हैं कि जुआ खेलना ही नहीं चाहिये, सहमत हूँ और खेलता भी नहीं हूँ, पर जीवन में इससे बचना संभव नहीं होता है। वृहद परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो ऐसे निर्णय जिनका निष्कर्ष नहीं ज्ञात होता है, एक प्रकार से जुये की श्रेणी में ही आते हैं। ताश आदि के खेलों में अनिश्चितता अधिक होती है, इसीलिये जुआ अधिक बदनाम है, इसे खेलना टाला भी जा सकता है। जीवन के निर्णयों में अनिश्चितता कम होती है, ये आवश्यक होते हैं, लम्बित तो किये जा सकते हैं पर पूरी तरह से टाले नहीं जा सकते हैं।

शेयर खरीदने वाले जानते हैं कि उन कम्पनी के शेयरों पर पैसा लगाना अच्छा है जिनका नाम है, जिनके भविष्य में कुछ निश्चितता है, जिनका प्रबन्धतन्त्र सुदृढ़ हाथों में है। यह विकास का अंग अवश्य है पर उसमें उपस्थित अनिश्चितता इसे भी जुये की श्रेणी में ले आती है। मैं शेयर भी नहीं खरीदता हूँ यद्यपि कई लोग उकसाते रहते हैं, उनके अनुसार हम अपनी बुद्धि और ज्ञान का सही उपयोग नहीं कर रहे हैं क्योंकि बुद्धि और बल का उपयोग धनार्जन में नहीं किया गया तो जीवन व्यर्थ हो गया। यथासंभव इन सबसे बचने के प्रयास के कारण कई बार भीरु और मूढ़ होने के सम्बोधन भी झेल चुका हूँ।

कई लोग हैं मेरे जैसे ही, जो इस अनावश्यक और अनिश्चित के दुहरे पाश से यथासंभव बचे रहना चाहते हैं। बचा भी रहा जा सकता है यदि तन्त्र ठीक चलें, अपने नियत प्रारूप में, व्यवस्थित। बहुत से ऐसे तन्त्र हैं जो अच्छे से चल भी रहे हैं और उन क्षेत्रों में हमारा जीवन स्थिर भी है, यदि स्पष्ट न दिखते हों तो पड़ोसी देशों को निहारा जा सकता है। कई क्षेत्र पर ऐसे हैं जिन्होंने एक पीढ़ी में ही इतना पतन देख लिया है, जो हमारे विश्वास को हिलाने के लिये पर्याप्त है, निश्चित से अनिश्चित तक की पूरी यात्रा। अनिश्चित और अनावश्यक अन्तर्बद्ध हैं, बहुत अन्दर तक, एक दूसरे को सहारा देते रहते हैं और निर्माण करते रहते हैं, एक आधारभूत गर्त।

बहुत क्षेत्र हैं जिसमें बहुत कुछ कहा जा सकता है, पर विषय की एक निश्चयात्मक समझ के लिये बिजली और पानी की स्थिति ले लेते हैं, सबसे जुड़ा और सबका भोगा विषय, हर बार घर की यात्रा में ताजा हो जाता विषय, अपने बचपन से तुलना किया जा सकने वाला विषय, एक पीढ़ी के अन्तर पर खड़ा विषय।

बचपन की स्थिति स्पष्ट याद है। दिन में तीन बार पानी आता था, कुल मिलाकर ६ घंटे, कहते थे उसी समय पंपहाउस का पंप चलता था। साथ ही साथ बिजली भी रहती थी, लगभग १८ घंटे, बिजली कटने के घंटे नियत, कहते थे कि बचे हुये ६ घंटे उद्योगों और खेतों को बिजली दी जाती थी। सुविधा तब जितनी भी थी, निश्चितता थी। यदा कदा यदि किसी कारण से बिजली और पानी नहीं आता था, तो उसका कारण ज्ञात रहता था, साथ ही साथ कब तक स्थिति सामान्य हो जायेगी, यह भी ज्ञात रहता था। पानी नहीं आने पर नदी में नहाने जाते थे और बिजली नहीं आने पर हाथ से पंखा झल लेते थे।

स्थितियाँ बिगड़ी, अनिश्चितता बढ़ी। सबसे पहले वोल्टेज कम होना प्रारम्भ हुआ, अब सब क्या करें? जो सक्षम थे उन्होंने अपने घर में स्टेबलाइज़र लगाना प्रारम्भ किया, जो कभी अनावश्यक समझा जाता था, आवश्यक हो गया। धीरे धीरे बिजली अधिक समय के लिये गायब रहने लगी, उस अन्तराल को भरने के लिये लोगों ने इन्वर्टर ले लिये, धीरे धीरे वह हर घरों में जम गया। जब इन्वर्टर को भी पूरी चार्जिंग का समय नहीं मिला, तो छोटे जेनसेट हर घरों में आ गये। घनाड्य तो बड़े जेनेरेटर लगा कर एसी में रहने का आनन्द उठाते रहे।

पानी जहाँ बिजली पैदा करता है वहीं बिजली से पंप भी किया जाता है। बिजली की अनिश्चितता ने पानी को भी पानी पानी कर दिया। जब लोगों का विश्वास सार्वजनिक सेवाओं से हट गया तो घरों में बोरिंग हुयी, पंप लगे और बड़ी बड़ी टंकियाँ बनायी गयीं।

जहाँ एक ओर तन्त्र अनिश्चित हो रहा था, अनावश्यक यन्त्र आवश्यक हो रहे थे, हमारी सुविधाभोगी जीवनशैली और साधन जुटाने में लगी थी। फ्रिज, वाशिंग मशीन, कूलर, ओवेन, एसी आदि हमारे जीवन में छोटे छोटे स्वप्नों के रूप में जम रहे थे। विश्वास ही नहीं होता है कि तीस वर्ष पहले तक बिना इन यन्त्रों के भी घर का बिजली पानी चल रहा था। सीमित बिजली पानी बड़े नगर सोख ले रहे हैं, इस आधारभूत गर्त में छोटे नगरों का जीवन कठिन हुआ जा रहा है, सारा समय इन्हीं आधारभूत समस्याओं से लड़ने में निकल जाता है।

हम सबने सुविधाओं के नाम पर विकास के जुये में इतना बड़ा दाँव लगा दिया कि हार का कष्ट असहनीय हुआ जा रहा है, इतनी बार दाँव लगाया है कि जीने के लिये कुछ बचा भी नहीं। पुरानी स्थिति में भी नहीं लौटा जा सकता है क्योंकि सुविधाओं ने उस लायक नहीं छोड़ा है कि पुरानी जीवनशैली को पुनः अपनाया जा सके। इस आधारभूत गर्त में एक हारे हुये मूर्ख जुआरी का जीवन जी रहे हैं हम सब।