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17.7.22

जीवन जीने चढ़ आता है


जब छूट गया, सब टूट गया,

विधि हर प्रकार से रूठ गया,

मन पृथक, बद्ध, निश्चेष्ट दशा,

सब रुका हुआ हो, तब सहसा,

वह उठता है, बढ़ जाता है,

जीवन जीने चढ़ आता है।


जब घोर अन्ध तम आच्छादित,

सिमटे समस्त उपक्रम बाधित,

जब आगत पंथ विरक्त हुये,

आश्रय अवगुंठ, विभक्त हुये,

तब विकल प्रबल बन जाता है,

जीवन जीने चढ़ आता है।


जब लगता अर्थ विलीन हुये,

जब स्पंदन सब क्षीण हुये,

सब साधे जो, प्रत्यंग विहत,

तब नाभि धरे अमरत्व अनत,

अद्भुत समर्थ, जग जाता है।

जीवन जीने चढ़ आता है।


क्या जानो, कितना है गहरा,

कितना गतिमय, कितना ठहरा,

कब उगता, चढ़ता और अस्त,

कब शिथिल और कब अथक व्यस्त,

बस, साथ नहीं तज पाता है,

जीवन जीने चढ़ आता है।

20.3.16

चकित हूँ

घिर रहे आनन्द के कुछ मेघ नूतन,
सकल वातावरण शीतल हो रहा था
पक्षियों के कलरवों का मधुर गुञ्जन,
अत्यधिक उत्साह उत्सुक हो रहा था ।।

खिल रही थीं आस की नव-कोपलें,
वायु में स्नेह मधुरिम बह रहा था
प्रकृति में मेरी समाया अनवरत जो,
हृदय का आनन्द मुख पर खिल रहा था ।।

किन्तु

काल का झोंका कुटिल हा ! पुन आया,
ले गया सब बादलों को संग अपने
दुखों का सर्वत्र भीषण अनल छाया,
भूत संचित हृदय में बन व्यग्र सपने ।।

किन्तु सोते मनुज को यह ज्ञान भी है ?
काल का आवेग, ताण्डव नृत्य क्या है ?
बँधा है, असहाय जीवन जी रहा है,
काटने का बन्धनों को कृत्य क्या है ।।

दुख भीषण है, जगत में क्षणिक सुख है,
चकित हूँ, क्योंकि, 
मनुज तो बँधा रहना चाहता है ।।