31.5.15

वर्तमान

रत विश्व सतत, मन चिन्तन पथ,
जुड़कर खोना या पंथ पृथक,
क्या निहित और क्या रहित, प्रश्न,
आश्रय, आशय, आग्रह शत शत ।।१।।

प्रातः प्रवेश, स्वागत विशेष,
करबद्ध खड़े, जो कार्य शेष,
प्रस्तुत प्रयासरत यथायोग्य,
अब निशा निकट, मन पुनः क्लेश ।।२।।

क्या पास धरें, क्या त्याग करें,
किस संचय से सब भय हर लें,
तन मन भारी, जग लदा व्यर्थ,
गन्तव्य रिक्त, अनुकूल ढलें ।।३।।

क्षण प्राप्त एक, निर्णय अनेक,
गतिमान समय, अनवरत वेग,
जिस दृष्टि दिशा, लगती विशिष्ट,
आगत अदृश्य, फल रहित टेक ।।४।।

आधार मुक्त, मतिद्वार लुप्त,
संकेतों के संसार सुप्त,
प्रश्नों के उत्तर बने प्रश्न,
निष्कर्ष रचयिता स्वयं भुक्त ।।५।।

क्या आयोजन, क्या संयोजन,
किसका नर्तन, किसका मोदन,
कथनी करनी में मुग्ध विश्व,
यदि नहीं प्राप्त, क्यों आरोदन ।।६।।

न आदि ज्ञात, न अन्त ज्ञात,
न अन्तरमन का द्वन्द्व ज्ञात,
यदि ज्ञात अभी, बस वर्तमान,
एक साँस उतरती रन्ध्र ज्ञात ।।७।।

24.5.15

आशा

आशा की अँगड़ाई, फैली दिगदिगन्त है ।
बीत गये दुख-पतझड़, जीवन में बसन्त है ।। 

पथ पर पग दो चार बढ़े, था मन उमंग में उत्साहित ।
भावनायें उन्मुक्त और मैं लक्ष्य-प्राप्ति को आशान्वित ।
रुक जाने का समय नहीं, घट भर लेने थे अनुभव के,
कर्म बसी भरपूर ऊर्जा, सुखद मनोहर पथ लक्षित ।।१।।

बीच राह, सब ओर स्याह, पुरजोर हवायें बहती थीं ।
काल करे भीषण ताण्डव, चुप रहे जीवनी सहती थी ।
आयी निष्ठुर प्रारब्ध-निशा, कुछ और कहानी कह डाली,
विघ्न-बवंडर उठते नभ में, आशायें नित ढहती थीं ।।२।।

दुख आते, मन अकुलाते, कुछ और स्वप्न ढल जाते हैं ।
अनचाही पर उस पीड़ा को, हम सहते हैं, बल पाते हैं ।
कुछ और अभी पल आयेंगे, कष्टों का बेड़ा लायेंगे,
फिर भी आशा है, जीवन है, हम भूधर से डट जाते हैं ।।३।।

17.5.15

प्रेम अपना

परिचयी आकाश में, हर रोज तारे टूटते हैं,
लोग थोड़ा साथ चलते और थकते, छूटते हैं,
किन्तु फिर भी मन यही कहता, तुम्हारे साथ जीवन,
प्रेम के चिरपाश में बँध, क्षितिज तक चलता रहेगा ।।१।।

विविधता से पूर्ण है जग, लोग फिर भी ऊब जाते,
काल के आवेग में आ, पंथ रह रह डगमगाते,
नहीं भरता दम्भ फिर भी, मन सतत यह कह रहा है,
आत्म-पोषित, प्रेम अपना, दुग्ध सा धवलित रहेगा ।।२।।

10.5.15

तुम्हारा साथ

आज मेधा साथ देती,
उमड़ता विश्वास भी है ।
चपल मन यदि शान्त बैठा,
यह तुम्हारा साथ ही है ।।१।।

दिख रहा स्पष्ट सब कुछ,
यदि दिशा मन की बँधी है ।
प्रेरणा अविराम बहती,
यह तुम्हारा साथ ही है ।।२।।

बढ़ रहा हूँ लक्ष्य के प्रति,
और संग आशा चली है ।
बिन सहारे चल रहा हूँ,
यह तुम्हारा साथ ही है ।।३।।

यदि सम्हलता समय का रथ,
जीवनी की लय सधी है ।
मन मुदित हो गीत गाता,
यह तुम्हारा साथ ही है ।।४।।

3.5.15

हेतु तुम्हारे

संग तुम्हारे राह पकड़ कर, 
छोड़ा सब कुछ बीते पथ पर,
मन की सारी उत्श्रंखलता, 
सुख पाने की घोर विकलता,
मुक्त उड़ाने, अपने सपने, 
भूल आया संसार विगत मैं,
स्वार्थ रूप सब स्वर्ग सिधारे, 
हेतु तुम्हारे प्रियतम प्यारे ।।१।।

बन्धन को सम्मान दिलाने, 
मन की बागडोर मैं थामे,
तज कर नयनों की चंचलता, 
नयी जीवनी प्रस्तुत करता,
निर्मित की जो निष्कर्षों से, 
अर्पित तुम पर पूर्ण रूप से,
तुम पर ही आधार हमारे, 
हेतु तुम्हारे प्रियतम प्यारे ।।२।।

नये पंथ पर लाया जीवन, 
देखो कुछ खो आया जीवन,
सहज नया एक रूप बनाकर, 
बीता सकुशल, उसे बिताकर,
स्वागत का एक थाल सजाये, 
आशाआें का दीप जलाये,
अपना सब कुछ तुम पर वारे, 
हेतु तुम्हारे प्रियतम प्यारे ।।३।।

26.4.15

आस कैसी

सोचता हूँ सहज होकर,
भावना से रहित होकर,
अपेक्षित संसार से क्या ?
हेतु किस मैं जी रहा हूँ ?

भले ही समझाऊँ कितना,
पर हृदय में प्रश्न उठता,
किन सुखों की आस में फिर,
वेदना-विष पी रहा हूँ ?

19.4.15

जीवन और मैं

समय का भण्डार जीवन,
कर्म का आगार जीवन,
व्यक्तियों की विविधता में,
बुद्धि का व्यापार जीवन ।

समय की निर्बाध तृष्णा,
काटती रहती बराबर,
शान्त होती मनस द्वारा,
कर्म का आधार पाकर ।

समय के निर्वाह का यह बोझ नित बढता गया,
मैं विकल्पों में उलझता कर्मक्रम चुनता गया,
नहीं कोई दिशा पायी, न कोई उद्देश्य लक्षित,
पथ भ्रमित एक जीवनी का जाल सा बुनता गया ।

उन प्रयत्नों का अधिक, उपयोग लेकिन कुछ नहीं था,
समय का निर्वाह केवल, सार संचित कुछ नहीं था,
इस निरर्थक सूत्र को तुम, जीवनी से व्यक्त कर दो,
व्यर्थ इस व्यापार में पर, लब्ध मुझको कुछ नहीं था ।

12.4.15

उलझी लट सुलझा दो

मन की उलझी लट सुलझा दो,
मेरे प्यारे प्रेम सरोवर ।
लुप्त दृष्टि से पथ, दिखला दो,
स्वप्नशील दर्शन झिंझोड़कर ।।१।।

ढूढ़ा था, वह लुप्त हो गया,
जागृत था, वह सुप्त हो गया ।
मार्ग विचारों को दिखला दो,
मन की उलझी लट सुलझा दो ।।२।।

कागज पर कुछ रेखायें थीं,
मूर्ति उभरने को उत्सुक थी ।
बना अधूरा चित्र बना दो,
मन की उलझी लट सुलझा दो ।।३।।

समय बिताने जीवन बीता,
कक्ष अनुभवों का था रीता ।
प्रश्नों के उत्तर बतला दो,
मन की उलझी लट सुलझा दो ।।४।।

मेरे प्यारे प्रेम सरोवर,
अनुयायी पर कृपा-हस्त धर ।
प्रेम, दया के दीप जला दो,
मन की उलझी लट सुलझा दो ।।५।।

5.4.15

रात्रि विरहणा, दिन भरमाये

जगता हूँ, मन खो जाता है,
तुम्हे ढूढ़ने को जाता है ।
सोऊँ, नींद नहीं आ पाती,
तेरे स्वप्नों में खो जाती ।
ध्यान कहीं भी लग न पाये,
रात्रि विरहणा, दिन भरमाये ।।१।।

जीवन स्थिर, आते हैं क्षण,
बह जाते, कुछ नहीं नियन्त्रण ।
जीवन निष्क्रिय, सुप्त चेतना,
उठती बारम्बार वेदना ।
कहीं कोई आश्रय पा जाये,
रात्रि विरहणा, दिन भरमाये ।।२।।

क्यों पीड़ा, यह ज्ञात मुझे है,
तेरा जाना याद मुझे है ।
किन्तु नहीं जब तक तुम आती,
दिखती नहीं ज्ञान की बाती ।
तेरी यादों में छिप जाये,
रात्रि विरहणा, दिन भरमाये ।।३।।

था स्वतन्त्र, फिर क्यों मेरा मन,
तुम पर अन्तहीन अवलम्बन ।
कैसे प्रबल प्रगाढ़ हुआ था,
तुमसे अंगीकार हुआ था ।
उत्तर तुम बिन कौन बताये,
रात्रि विरहणा, दिन भरमाये ।।४।।

29.3.15

दुख-पतझड़

जीवन पथ पर एक सुखद भोर, ले आई पवन मलयज, शीतल,
अनुभव की स्मृति छोड़ गयी, एक भाव सहज, मधुमय, चंचल ।
निश्चय ही मन के भावों में, सावन के झोंके आये हैं ।
अब तक सारे दुख के पतझड़, पर हमने कहाँ बितायें हैं ।।१।।

जीवन पाये निश्चिन्त शयन, लोरी गाकर सुख चला गया,
उद्विग्न विचारों की ज्वाला, स्पर्श किया और बुझा गया ।
निसन्देह आगन्तुक ने, कई राग सुरीले गाये हैं ।
अब तक सारे दुख के पतझड़, पर हमने कहाँ बितायें हैं ।।२।।

मन बसती अनुभूति सुखद है, क्लान्त हृदय को शान्ति मिली,
तम शासित व्यवहार पराजित, मन में सुख की धूप खिली ।
माना उत्सव की वेला है, कुछ स्वप्न सलोने भाये हैं ।
अब तक सारे दुख के पतझड़, पर हमने कहाँ बितायें हैं ।।३।।

कर्म सफल, मन में लहरों का, सुखद ज्वार उठ जाता है,
अति लघुजीवी हैं सुख समस्त, फिर भी जीवन बल पाता है ।
हम जीवन के गलियारों में, ऐसी ही आस लगायें हैं ।
क्या अन्तर, दुख के पतझड़, यदि हमने नहीं बितायें हैं ।।४।।

हम सुख पाते या दुख पाते, पर विजय काल की होती है,
सच मानो अपनी कर्म-तरी, उसके ही निर्णय ढोती है ।
हमने पर कठिन परिस्थिति में भी जीवन-दीप जलाये हैं ।
सह लेंगे सारे दुख-पतझड़, जो हमने नहीं बितायें हैं ।।५।।

22.3.15

आशान्वित मन

आशाओं से संचारित मन,
करने की कुछ चाह हृदय में ।
स्वप्नों से कुछ दूर अवस्थित,
अब जीवन को पाया हमने ।।१।।

स्थिर है मन संकल्पों में,
लगा विकल्पों का भ्रम छटने ।
वर्षों से श्रमहीन रही जो,
संचित शक्ति उमड़ती मन में ।।२।।

बुद्धि व्यवस्थित और लगा है,
चिन्तन का विस्तार सिमटने ।
विविध विचारों की लड़ियाँ भी,
आज संकलित होती क्रम में ।।३।।

आज कल्पना प्रखर, मुखर है,
रोषित हृदय लगा है रमने ।
आज व्यन्जना पूर्ण रूप से,
कह जाती जो आता मन में ।।४।।

जीवन-दर्शन ज्ञात हो गया,
बहना छूट गया मद-नद में ।
आओ प्रभु स्थान ग्रहण हो,
आमन्त्रित मन के आँगन में ।।५।।

15.3.15

आये तुम

स्वप्न देखने का जीवन में, साहस तो कर बैठे थे ।
आये तुम, पीछे पीछे, देखो स्वप्न और आ जायेंगे ।।१।।

कठिन परिस्थियों में भी, एक किरण दिखी थी आशा की ।
आये तुम, अब हम कष्टों को भी आँख दिखाते जायेंगे ।।२।।

भीड़ भरे आहातों के एक कोने में चुपचाप खड़े ।
आये तुम, मन की बात आज दीवारों से चिल्लायेंगे ।।३।।

सुन्दरतम की बाट जोहते, अब तक जगते रहते थे हम ।
आये तुम, लाये गोद सुखद, हम चुपके से सो जायेंगे ।।४।।

8.3.15

तुम ही

जहाँ देखूँ, दीखता आकार तेरा,
स्वप्न चुप है, कल्पनायें अनमनी हैं ।।१।।

पा रहा हूँ प्रेम, साराबोर होकर,
आज पुलकित रोम, मन में सनसनी है ।।२।।

खिंचा है मन और तुझ पर ही टिका है,
पूछता आकर्ष, मुझमें क्या कमी है ।।३।।

हृदय-तह तक भरा है बस प्रेम तेरा,
जीवनी अनुराग-दलदल में सनी है ।।४।।

अभी तक सुख दे रहा स्पर्श तेरा,
करूँ कुछ भी, तुम्ही में आत्मा रमी है ।।५।।

खोजता हर वाक्य में सौन्दर्य तेरा,
उमड़ती जो याद, अब कविता बनी है ।।६।।

1.3.15

जीवन-सार

नहीं पुष्प में पला, नहीं झरनों की झर झर ज्ञात मुझे,
नहीं कभी भी भाग्य रहा जो सुख सुविधायें आकर दे ।
इच्छायें थी सीमित, सिमटी, मन-दीवारों में पली बढ़ीं,
आशायें शत, आये बसन्त, अस्तित्व-अग्नि शीतल कर दे ।।१।।

शीतल, मन्द बयार हृदय में ठिठुरन लेकर आती है,
तारों की टिमटिम, धुन्धों में जा, चुपके से छिप जाती है ।
रिमझिम वर्षा की बूँदों ने, प्लावित बाँधों को तोड़ दिया,
लहरों की कलकल ना भाती, रह रहकर शोर मचाती है ।।२।।

फिर भी जीवन में कुछ तो है, हम थकने से रह जाते हैं,
भावनायें बहती, हृद धड़के, स्वप्न दिशा दे जाते हैं,
नहीं विजय यदि प्राप्त, हृदय में नीरवता सी छाये क्यों,
संग्रामों में हारे क्षण भी, हौले से थपकाते हैं ।।३ ।।

22.2.15

आज प्रियतम जीवनी में आ रहा है

अकेला उन्मुक्त उड़ना चाहता था,
मेघ सा विस्तृत उमड़ना चाहता था,
स्वतः प्रेरित, दूसरों के अनुभवों को,
स्वयं के अनुरूप गढ़ना चाहता था ।
किन्तु मन किस ओर बढ़ता जा रहा है,
आज प्रियतम जीवनी में आ रहा है । १।

नहीं निर्भरता कभी मैं चाहता था,
मुक्त था मैं, मुक्त रहना चाहता था,
शूल सा चुभता हृदय में तीव्रता से,
यदि कहीं कोई कभी भी बाँधता था।
किन्तु अब तो बँधे रहना भा रहा है,
आज प्रियतम जीवनी में आ रहा है । २।

आत्म-केन्द्रित, स्वयं को पहचानता था,
स्वयं में सीमित जगत मैं मानता था,
आत्म के अस्तित्व को सहजे समेटे,
भीड़ से मैं दूर कोसों भागता था ।
हृदय को पर्याय मिलता जा रहा है,
आज प्रियतम जीवनी में आ रहा है । ३।

व्याप्त नीरवता, किन्तु मैं जागता था,
हृदय में एक धधकता अंगार सा था,
सतत अपने लक्ष्य पर कर दिशा मन की,
मैं अकेला समय के संग भागता था ।
किन्तु अब क्या स्वप्न में बहका रहा है,
आज प्रियतम जीवनी में आ रहा है । ४।

स्वार्थ-कोलाहल निहित हर वाक्य में था,
नहीं कुछ भी व्यक्त करता क्रम हृदय का,
अचम्भी स्तब्धता मन छा गयी जब,
शब्द स्थिर, रिक्त मन अनुभाव से था ।
प्रेम अब अभिव्यक्ति बनकर गा रहा है,
आज प्रियतम जीवनी में आ रहा है । ५।

किन्तु मन में ज्योति टिमटिम जल रही थी,
शान्त श्रद्धा जीवनी में बढ़ रही थी,
चिर प्रतीक्षित भावना से तृप्त करती,
लिपटती, बन बेल हृद में चढ़ रही थी ।
नेत्र में आनन्द सा उतरा रहा है,
आज प्रियतम जीवनी में आ रहा है । ६।

थका मन अब छाँह का सुख पा रहा है,
भावना में डूबना फिर भा रहा है,
मुझे कल की वेदना से मुक्त कर दो,
आज प्रियतम जीवनी में आ रहा है । ७।

15.2.15

मन और जीवन

मैं जीवन बाँधता हूँ और मन से रोज लड़ता हूँ,
लुढ़कता ध्येय से मैं दूर, लेकिन फिर भी चढ़ता हूँ ।
बहुत कारक, विरोधों की हवा अनवरत बहती है,
बचाये स्वयं को, बन आत्मा की आग जलता हूँ ।।

विविधता में जगत की, किन्तु मन हर बार बहलाता,
भुलाता, स्वप्न दिखलाता, छिपाता रूप जीवन का ।
सुलाता नींद में, फिर भी स्वयं का भान होता है,
बढ़ाता हूँ कदम मैं, प्रात को पाने की उत्सुकता ।।

कभी मन साथ होता है,
कभी आघात होता है,
कभी आह्लाद आ जाता,
कभी संताप होता है ।
विकट इस द्वन्द्व में रहना,
सरलता चरमराती है,
हृदय में, किन्तु फिर भी आस,
रह रह टिमटिमाती है ।। 

8.2.15

शिल्पी बन आयी

मेरे मन-भावों की मिट्टी,
राह पड़ी, जाती थी कुचली ।
तेज हवायें, उड़ती, फिरती,
रहे उपेक्षित, दिन भर तपती ।
ऊँचे भवनों बीच एकाकी,
शान्त, प्रतीक्षित रात बिताती ।।१।।

जीवन बढ़ता और एक दिन,
दिया सहारा, प्रत्याशा बिन ।
हृद की छाया, जीवन सम्बल,
देकर ममता का आश्रय-जल ।
ढाली मिट्टी, मूर्ति बनायी,
जीवन में शिल्पी बन आयी ।।२।। 

1.2.15

ढाई आखर

ढाई आखर, सबके लिये ही, अपने अलग अर्थ लिये। सबके लिये जीवन के एक पड़ाव पर, एक अनिवार्य अनुभव, एक स्पष्ट अनुभव। संभवतः उस समय तो नहीं, जिस समय हम ढाई आखर में सिमटे होते हैं, परन्तु वह कालखण्ड बीतने के पश्चात ढाई आखर में डूबते उतराते जीवन की व्यग्रता समझ आती है। हो सकता है कि ढाई आखर का कालखण्ड वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बचकाना सा लगे, हो सकता है आप वह सब सोच कर मुस्करा दें, हो सकता है कि वर्तमान पर उसका कुछ भी प्रभाव शेष न हो। पर जब कभी आप अपने आत्मीय क्षणों में बैठते और विचारते होंगे, उस कालखण्ड के भावों की पवित्रता, तीव्रता और समग्रता आपको अचम्भित करती होगी। 

बीती यादों को हृदय से चिपकाये लोग भले ही व्यवहारकुशल न माने जायें, पर भावों का मान रखना भी जीवन्तता और जीवटता के संकेत हैं। जो भाव जीवन पर छाप न छोड़ पाया, वह भाव तो निर्बल ही हार जायेगा। और जब बीते भाव हारने लगते हैं तो जीवन का वर्तमान से विश्वास उठ जाता है। जो बीत गया, उसे जाने देना, यह भाव जीवन को निश्चय ही नवीन बनाये रखता है। बीते भाव जब तक जीवन में अपनी तार्किक निष्पत्ति नहीं पाते हैं, अतृप्त रहते हैं। जब प्रकृति ने हर क्षण का मोल चुकाने की व्यवस्था कर रखी हो तो ढाई आखर का सान्ध्र समय बिना आड़ोलित किये कैसे निकल जायेगा भला?

कुछ व्यक्तित्वों में गोपनीयता का भाव बड़ा गहरा और लम्बे समय तक रहता है। पर यह भी निर्विवादित सत्य है कि गोपनीयता का भाव मन की शान्ति नहीं देता है। अच्छा ही हो कि उसे शीघ्रातिशीघ्र और सम्यक रूप से समझ कर व्यक्त कर दिया जाये। मानवेन्द्र ने इसी व्यग्रता को अपनी पुस्तक 'ढाई आखर' के रूप में व्यक्त कर दिया है।

मध्य में मानवेन्द्र
मानवेन्द्र मेरे सहकर्मी हैं, वाराणसी मंडल की संचार और सिग्नल व्यवस्था के लिये पूर्ण रूप से उत्तरदायी। तकनीकी रूप से जितने कुशल इलेक्ट्रॅानिक्स इन्जीनियर हैं, प्रशासक के रूप में उतने ही कुशल कार्य कराने वाले भी। अभिव्यक्ति की विमा भी उतनी ही विकसित मिलेगी, यह तथ्य उनकी पुस्तक पढ़ने के बाद ही पता चला। यद्यपि मानवेन्द्र इस पुस्तक को आत्मकथा नहीं मानते हैं, परन्तु जिस सहजता और गहनता से वह कथाक्रम में आगे बढ़ते हैं, ऐसा लगता है कि सब उनके भीतर छिपा हुआ था, वर्षों से बाहर आने को आतुर, शब्दों के रूप में।

कहानी साकेत की है, सीधा साधा, पढ़ने लिखने वाला साकेत, अध्ययन में श्रमरत और प्रतियोगी परीक्षाओं के कितने भी बड़े व्यवधान पार करने में सक्षम। इन्जीनियरिंग की मोटी पुस्तकों को सहज समझ सकने वाला साकेत ढाई आखर में उलझ जाता है। प्रोफेसरगण अपना सारा ज्ञान उड़ेल देने को आतुर पर साकेत का विश्व ढाई आखर में सिमटा हुआ था, या कहें कि ढाई आखर ने उसे इतना भर रखा था कि उसे कुछ और ग्रहण करने का मन ही नहीं। अपने उस भाव में सिमटा इतना कि भाव भी विधिवत व्यक्त करने में बाधित। जैसे जैसे वर्ष बीतते हैं, मन सुलझने के स्थान पर और उलझता जाता है, नित निष्कर्षों की आस में, नित भावों के संस्पर्श की प्यास में।

स्थान छूट जाता है पर ध्यान नहीं छूटता है, ढाई आखर का आधार नहीं छूटता है। अधर पड़े जीवन में व्यग्रतापूर्ण आस सतत बनी ही रहती है। व्यवहार में सहज पर मन में असहज, कुछ ऐसा ही संपर्क बना रहता है। मस्तिष्क के क्षेत्र में सब लब्ध पर हृदयक्षेत्र में स्तब्ध, साकेत को समय तौलता रहता है, हर दिन, जब भी अपने आप में उतरता है।

एकान्त का निर्वात कभी छिपता नहीं है, औरों को दिख ही जाता है। उसे छिपाने के प्रयास में साकेत उसे और विस्तारित करता रहा, कभी हास्य से, कभी कठोरता से। साकेत बाधित रहे, पर और तो बाधित नहीं हैं। आईईएस के प्रशिक्षण के समय ऐसा ही एक घटनाक्रम खुलता है। लुप्तप्राय औऱ लब्धप्राय के बीच का द्वन्द्व। तन्तु खिंचते हैं, उलझते हैं, टूटते हैं। पता नहीं साकेत क्या निर्णय लेगा और किस आधार पर लेगा?

सब साकेत जैसे हो न पायें, सोच न पायें, पर उस प्रक्रिया से सब होकर जाते हैं। एक साकेत ने अपनी कहानी सुना दी, आप पढ़िये और अपने साकेत को भी पढ़ाइये। हो सके तो उसे स्वयं को व्यक्त करने के लिये प्रेरित भी कीजिये।

(पुस्तक इस लिंक पर उपलब्ध है)

25.1.15

स्वपीड़न

कोई कष्ट देता, सहजता से सहते,
पीड़ा तो होती, पर आँसू न बहते ।

कर्कश स्वरों में भी, सुनते थे सरगम,
मन की उमंगों में चलते रहे हम ।

कभी, किन्तु जीवन को प्रतिकूल पाया,
स्वयं पर प्रथम प्रश्न मैंने लगाया,
द्वन्द्वों के कइयों पाले बना कर,
तर्कों, विवादों में जीवन सजा कर,
लड़ता रहा और थकता रहा मैं,
स्वयं से अधिक दूर बढ़ता रहा मैं ।

बना शत्रु अपना, करूँ क्या निवारण,
स्वयं को रुलाता रहा मैं अकारण ।

19.1.15

एक बचपन माँगता हूँ

अब समय की राह में,
अस्तित्व अपना जानता हूँ ।
यदि कहीं, कुछ भा रहा है,
एक बचपन माँगता हूँ ।

कहाँ से लाऊँ सहजता,
हर तरफ तो आवरण है ।
आत्म का आचार जग में,
बुद्धि का ही अनुकरण है ।
क्यों नहीं प्रस्फुट हृदय है,
कृत्रिम कविता बाँचता हूँ ।
एक बचपन माँगता हूँ ।।

खो गया हूँ, मैं अकेला,
स्वयं के निर्मित भवन में ।
अनुभवों की वृहद नद में,
आचरण के जटिल वन में,
क्यों सफलता के घड़ों से,
जीवनी मैं नापता हूँ ।
एक बचपन माँगता हूँ ।। २।।