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1.2.15

ढाई आखर

ढाई आखर, सबके लिये ही, अपने अलग अर्थ लिये। सबके लिये जीवन के एक पड़ाव पर, एक अनिवार्य अनुभव, एक स्पष्ट अनुभव। संभवतः उस समय तो नहीं, जिस समय हम ढाई आखर में सिमटे होते हैं, परन्तु वह कालखण्ड बीतने के पश्चात ढाई आखर में डूबते उतराते जीवन की व्यग्रता समझ आती है। हो सकता है कि ढाई आखर का कालखण्ड वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बचकाना सा लगे, हो सकता है आप वह सब सोच कर मुस्करा दें, हो सकता है कि वर्तमान पर उसका कुछ भी प्रभाव शेष न हो। पर जब कभी आप अपने आत्मीय क्षणों में बैठते और विचारते होंगे, उस कालखण्ड के भावों की पवित्रता, तीव्रता और समग्रता आपको अचम्भित करती होगी। 

बीती यादों को हृदय से चिपकाये लोग भले ही व्यवहारकुशल न माने जायें, पर भावों का मान रखना भी जीवन्तता और जीवटता के संकेत हैं। जो भाव जीवन पर छाप न छोड़ पाया, वह भाव तो निर्बल ही हार जायेगा। और जब बीते भाव हारने लगते हैं तो जीवन का वर्तमान से विश्वास उठ जाता है। जो बीत गया, उसे जाने देना, यह भाव जीवन को निश्चय ही नवीन बनाये रखता है। बीते भाव जब तक जीवन में अपनी तार्किक निष्पत्ति नहीं पाते हैं, अतृप्त रहते हैं। जब प्रकृति ने हर क्षण का मोल चुकाने की व्यवस्था कर रखी हो तो ढाई आखर का सान्ध्र समय बिना आड़ोलित किये कैसे निकल जायेगा भला?

कुछ व्यक्तित्वों में गोपनीयता का भाव बड़ा गहरा और लम्बे समय तक रहता है। पर यह भी निर्विवादित सत्य है कि गोपनीयता का भाव मन की शान्ति नहीं देता है। अच्छा ही हो कि उसे शीघ्रातिशीघ्र और सम्यक रूप से समझ कर व्यक्त कर दिया जाये। मानवेन्द्र ने इसी व्यग्रता को अपनी पुस्तक 'ढाई आखर' के रूप में व्यक्त कर दिया है।

मध्य में मानवेन्द्र
मानवेन्द्र मेरे सहकर्मी हैं, वाराणसी मंडल की संचार और सिग्नल व्यवस्था के लिये पूर्ण रूप से उत्तरदायी। तकनीकी रूप से जितने कुशल इलेक्ट्रॅानिक्स इन्जीनियर हैं, प्रशासक के रूप में उतने ही कुशल कार्य कराने वाले भी। अभिव्यक्ति की विमा भी उतनी ही विकसित मिलेगी, यह तथ्य उनकी पुस्तक पढ़ने के बाद ही पता चला। यद्यपि मानवेन्द्र इस पुस्तक को आत्मकथा नहीं मानते हैं, परन्तु जिस सहजता और गहनता से वह कथाक्रम में आगे बढ़ते हैं, ऐसा लगता है कि सब उनके भीतर छिपा हुआ था, वर्षों से बाहर आने को आतुर, शब्दों के रूप में।

कहानी साकेत की है, सीधा साधा, पढ़ने लिखने वाला साकेत, अध्ययन में श्रमरत और प्रतियोगी परीक्षाओं के कितने भी बड़े व्यवधान पार करने में सक्षम। इन्जीनियरिंग की मोटी पुस्तकों को सहज समझ सकने वाला साकेत ढाई आखर में उलझ जाता है। प्रोफेसरगण अपना सारा ज्ञान उड़ेल देने को आतुर पर साकेत का विश्व ढाई आखर में सिमटा हुआ था, या कहें कि ढाई आखर ने उसे इतना भर रखा था कि उसे कुछ और ग्रहण करने का मन ही नहीं। अपने उस भाव में सिमटा इतना कि भाव भी विधिवत व्यक्त करने में बाधित। जैसे जैसे वर्ष बीतते हैं, मन सुलझने के स्थान पर और उलझता जाता है, नित निष्कर्षों की आस में, नित भावों के संस्पर्श की प्यास में।

स्थान छूट जाता है पर ध्यान नहीं छूटता है, ढाई आखर का आधार नहीं छूटता है। अधर पड़े जीवन में व्यग्रतापूर्ण आस सतत बनी ही रहती है। व्यवहार में सहज पर मन में असहज, कुछ ऐसा ही संपर्क बना रहता है। मस्तिष्क के क्षेत्र में सब लब्ध पर हृदयक्षेत्र में स्तब्ध, साकेत को समय तौलता रहता है, हर दिन, जब भी अपने आप में उतरता है।

एकान्त का निर्वात कभी छिपता नहीं है, औरों को दिख ही जाता है। उसे छिपाने के प्रयास में साकेत उसे और विस्तारित करता रहा, कभी हास्य से, कभी कठोरता से। साकेत बाधित रहे, पर और तो बाधित नहीं हैं। आईईएस के प्रशिक्षण के समय ऐसा ही एक घटनाक्रम खुलता है। लुप्तप्राय औऱ लब्धप्राय के बीच का द्वन्द्व। तन्तु खिंचते हैं, उलझते हैं, टूटते हैं। पता नहीं साकेत क्या निर्णय लेगा और किस आधार पर लेगा?

सब साकेत जैसे हो न पायें, सोच न पायें, पर उस प्रक्रिया से सब होकर जाते हैं। एक साकेत ने अपनी कहानी सुना दी, आप पढ़िये और अपने साकेत को भी पढ़ाइये। हो सके तो उसे स्वयं को व्यक्त करने के लिये प्रेरित भी कीजिये।

(पुस्तक इस लिंक पर उपलब्ध है)

23.2.11

बहता समीर

अपने घर से निकलकर मित्र के घर पहुँचने तक की कार यात्रा में जीवन का दर्शन समेट कर रख दिया, सहयात्रियों को देखते, उनके बारे में बतियाते, उनके मन में झाँकते। अनुभवों की अभिव्यक्ति इतनी सशक्त कि हर घटना एक नया दृष्टिकोण लिये निकली। कोई गुरुता नहीं शब्दों में, वाक्यों में, पृष्ठों में, सब कुछ बड़े ही सरल ढंग से, ग्रहणीय, संदर्भों की जटिल पृष्ठभूमि से परे। स्वनामजन्य प्रवाह, तार्किक प्रबलता, मानवीय दुर्बलताओं का विनोदपूर्ण पर आक्षेपविहीन अवलोकन, समाजिक सुन्दर पक्षों का काव्यमय समावेश, निष्कर्ष 'देख लूँ तो चलूँ'

एक साहित्यिक कृपा की समीरलाल जी ने कि मुझे अपनी पुस्तक की हस्ताक्षरित प्रति भेजने के योग्य समझा। उसी समय हर्षातिरेक में दो तीन पृष्ठ पढ़ गया, पर लगा कि पुस्तक का सम्मान उसे एक प्रवाह में पढ़ने में है, न कि खण्ड खण्ड। अगली लम्बी ट्रेन यात्रा का दिन निर्धारित कर लिया गया। यात्रा का सामान सजाते समय यह पुस्तक सबसे ऊपर रखी गयी, भेंट का समय आ गया, 16-02-11, कर्नाटक एक्सप्रेस, ए केबिन, बच्चे और उनकी माँ दोपहर का भोजन कर सामने वाली बर्थों में निद्रा में डोलते हुये, दौंड और भुसावल के बीच का सुन्दर परिदृश्य, खिड़की से छनकर हल्की सी धूप अन्दर आती हुयी, पढ़ने का निर्मल एकान्त, उस पर 77 पृष्ठों का अपरिमित आनन्द, एक प्रवाह में पढ़ लगा, लगभग उतने ही समय में जिसमें समीरलाल जी की कार मित्र के घर पहुँच गयी।

यात्रायें कुछ न कुछ नया लेकर आती हैं, हर बार। कार यात्रा, ट्रेन यात्रा, जीवन यात्रा, सबमें एक अन्तर्निहित समानता है, एक को दूसरे से जोड़कर देखा जा सकता है। यही सशक्त पक्ष है पुस्तक का भी, यात्रा में कुछ न कुछ दिखता रहता है, उससे सम्बन्धित जीवन के तथ्य स्वतः उभर कर सामने आ जाते हैं। यह शैली अपनाकर दर्शन के तत्वों को भी सरलता उड़ेला जा सकता है। पर दो खतरे हैं इसमें। पहला, असम्बद्ध विषयों को जोड़ने का प्रयास बहुधा कृत्रिम सा लगने लगता है। दूसरा, हर विषय को जोड़ते रहने से पुस्तक का स्वरूप डायरीनुमा होने लगता है। इन दोनों खतरों को कुशलता से बचाते हुये दर्शन और जीवन का जो उत्कृष्ट मिश्रण समीरलालजी ने प्रस्तुत किया है, वह मात्र सुगढ़ चिन्तन और स्पष्ट चिन्तन-दिशा से ही सम्भव है।

कभी एक शब्द विशेष की उपस्थिति संवाद को संक्षिप्तता से कह जाती है, कभी वाक्यों का समूह जीवन का रहस्य उद्घाटित करता है, कभी कविता दर्शन की गहनता को समेट देती है, हर शब्द, हर वाक्य, हर पृष्ठ, व्यस्त सा प्रतीत होता है, कुछ न कुछ कह देने के लिये। उनके व्यस्त जीवन का प्रक्षेप है लेखन में भी, सब कुछ समेट लेने की शीघ्रता। विक्रम सेठ के 'सूटेबल ब्वॉय' या अरुन्धती रॉय की 'द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग' लिखने जितना समय और धैर्य होता तो 77 पृष्ठों का लेखन 770 पृष्ठों में भी न समा पाता। चलिये, इस बार पाठक सूप से संतुष्ट हो गये हैं, पर भविष्य के लिये पढ़ने की भूख भी बढ़ गयी और स्वादिष्ट भोजन की आस भी।

विषयवस्तु पर जाने से उसकी प्रशंसा में कई अध्याय लिखने पड़ जायेंगे। उसका भार सुधीजनों पर छोड़ बस इतना ही कहना चाहूँगा कि सबके जीवन से जुड़ी नित्य की घटनायें एक माध्यम होती हैं कुछ गहरा कहने के लिये। माध्यम का सुन्दर उपयोग, अवलोकन की कुछ और सीमायें निर्धारित कर देने के लिये, इस कृति की विशेषता है। पुस्तक पढ़ने के पश्चात अब वे घटनायें वैसी नहीं दिखेंगी, जैसी अब तक दिखती आयी हैं, उस पर समीरलालजी के हस्ताक्षर दिखायी पड़ जायेंगे आपको।

मैं नहीं जानता कि मेरा अवलोकन कितना गहरा रहा, पर और गहरे जाने से उन उद्देश्यों को उभार न पाता जिसके लिये यह पुस्तक लिखी गयी होगी। पुस्तक लिखने का उद्देश्य और अभीष्ट पाठकगण, दोनों ही मानकों पर पुस्तक खरी उतर आने के कारण मैं स्वयं संतुष्ट था। नदी में गहरा उतरने से पूरी तरह डूब जाने का खतरा तो रहता ही है।

यदि आपने पुस्तक नहीं पढ़ी है तो तुरन्त पढ़ डालें, इतना सरल-हृदय-संप्रेषण विरला ही होता है।