Showing posts with label सात जन्म. Show all posts
Showing posts with label सात जन्म. Show all posts

24.6.21

सात जन्म - एक उत्तर

 

मन चमत्कृत करता है। विचारशील होना गति का द्योतक है, पर यदि विचारों पर ही विचार न किया तो कुछ अधूरा अतृप्त सा लगता है। एक स्वाभाविक प्रवृत्ति हो जाती है उस पर मनन करने की जिसे हम मन कहते हैं। जगत में एक अद्भुत सा निर्माण लगता है मन। जिस तरह घटनायें संचित रहती हैं, जिस तरह याद आती हैं और जिस तरह भविष्य की संभावना में बनी रहती हैं।


ज्ञान के लिये पाँच इन्द्रियों का होना, एक बार में एक से ही ज्ञान होना और यहाँ तक कि सम्मुख उपस्थित कई दृश्यों में उसी का ज्ञान होना जिस पर मन रुके। कुछ जानना और यह जानना कि हम कुछ जान रहे हैं, ज्ञान के भिन्न स्तरों का होना। विचार करते समय लगना कि हम विचार कर रहे हैं। मन के बारे में ऐसे न जाने कितने प्रत्यक्ष हैं जो हमें आश्चर्यचकित कर जाते हैं।


मन व्यस्त रहता है तो हमें अपना अस्तित्व समझ आता है, काल का बोध होता है। मन स्तब्ध होता है तो काल रुक सा जाता है। मन न रहे तो क्या समझें, क्या जाने, क्या याद करें, क्या बतायें, कैसे व्यवहार करें? देखने में तो बड़ा ही सरल लगता है पर गहरे उतरने पर मन का यह वैचित्र्य उत्कृष्ट मेधाओं को भी दिग्भ्रमित कर देता है।


न्यायशास्त्र में बड़े ही व्यवस्थित क्रम से इन्द्रिय, मन और आत्मा की भिन्नता को सिद्ध किया है। सारे के सारे तर्क, उहा, अनुमान अन्ततः प्रत्यक्ष पर ही आकर टिकते हैं। पूर्वपक्षी यथासंभव विकल्प रखता है कि यह मान लिया जाये या वह मान लिया जाये। कई अध्यायों की प्रश्नोत्तरी के बाद शेष सभी अन्यथा विकल्प अवसान पा जाते हैं और सिद्धान्ती का मत बना रहता है। एक एक तत्व की विधिवत परीक्षा और उसका यथावत निराकरण।


जहाँ आत्मा दृष्टा है और इन्द्रियाँ यन्त्रवत, वहाँ मन ही सारी व्यवस्थायें देखता है। मन की कई अवस्थायें हैं, कभी स्मृति में, कभी कल्पना में, कभी स्वप्न में, कभी ज्ञानार्जन में और कभी कर्म में ध्यानस्थ। मन गतिशील न हो, यह केवल दो ही स्थितियों में होता है, या तो सुसुप्त अवस्था में या समाधि में। एक अवस्था मन की वृत्तियों का अभाव है और दूसरी मन की वृत्तियों का निरुद्ध होना। एक अनियन्त्रित है और दूसरी नियन्त्रित।


इस दृष्टि से विश्लेषित करें तो मन अपनी अवस्थायें बदलता रहता है। मन की अवस्थाओं का उद्भव ही जन्म है और इन्हें सात विभागों में बाट देने से सारी संभावित अवस्थायें व्याख्यायित की जा सकती हैं। काल की दृष्टि से ये सात विभाग इस प्रकार हैं।


  1. मन गतिशील नहीं होता है। इस समय दृष्टा अपने स्वरूप में रहता है। समाधि में उसे अपने स्वरूप में बारे में निश्चयत्मकता से ज्ञात होता है, वह स्थितिप्रज्ञ होता है। जबकि सुसुप्तावस्था में अपने स्वरूप की जानकारी का अभाव होता है, वह अवस्था अस्थिर होती है।
  2. मन विशुद्ध वर्तमान में रहता है। जिस कर्म में निरत है, जिस ज्ञान को प्राप्त कर रहा है, उसमें शत प्रतिशत लगा हुआ। भूत या भविष्य का कोई प्रभाव नहीं, स्मृति या कल्पना से परे। तब ज्ञान निर्बाध आता है, कर्म कुशलता पूर्वक सम्पन्न होता है। कर्म और ज्ञान की पराकाष्ठा तक पहुँचा देती है यह अवस्था।
  3. मन विशुद्ध भूत में रहता है। स्मृति आती है, अपना पूर्ववत प्रभाव छोड़ जाती हैं. ठीक वैसा ही, जैसा पहली बार हुआ था। उस समय प्राप्त अनुभूति किसी अन्य कारण से प्रभावित नहीं होती। जितना महत्वपूर्ण वह तब था, उतना ही आज भी है। बहुधा भूत के कई अनुभव अन्य अनुभवों से मिलकर गड्डमड्ड हो जाते हैं, विकृत हो जाते हैं। कुछ अन्य अनुभव अतिविशिष्ट हो जाते हैं। इस सब विकारों से परे भूत की यथारूप अनुभूति।
  4. मन विशुद्ध भविष्य में रहता है। कल्पना की शक्ति भविष्य का सृजन करने में सक्षम है। आगामी परिस्थिति में स्वयं को स्थित कर परिमाणों की कल्पना करना। कौन कैसे बोलेगा, क्या उत्तर देना ठीक रहेगा, सभी संभावित स्थितियों का सामर्थ्यपूर्ण चित्रण। बहुत कुछ वैसे, जैसे घटना सामने घट रही है। भय, राग, द्वेष आदि से परे।
  5. मन वर्तमान में रहता है पर भूत और भविष्य से आन्दोलित रहता है। भूत का भय या भविष्य की चिन्तायें वर्तमान को झकझोर कर रख देती हैं। किसी को देखकर सामान्य भावों के अतिरिक्त यदि वे सारे प्रकरण याद आने लगे जिसमें उसका व्यवहार अनुचित था या भविष्य में किस तरह उसको पाठ पढ़ाया जायेगा इसका षड़यन्त्र मन में बनने लगे तो मानकर चलिये कि आपका मन तो वर्तमान में है पर भूत और भविष्य से पीड़ित है, आन्दोलित है। इसमें न तो आप वर्तमान के रहते हैं, न भूत के और न ही भविष्य के, आप कालसंकर हो जाते हो, क्षिप्त विक्षिप्त से, बद्ध से, बिद्ध से।
  6. मन भविष्य में रहता है पर भूत से प्रभावित रहता है। भूत में घटी घटनायें मन को अवरूद्ध कर देती हैं। कल्पनाशीलता अपने पूरे स्वरूप में नहीं निकल पाती है। बहुधा आप अपना अवमूल्यन कर बैठते हैं। परिस्थितियों की समझ विकारयुक्त हो जाती है, निर्णय अनुचित हो जाते हैं। जीवन पर भूत का इतना प्रभाव उस बोझे को ढोने जैसा है जो आपको शीघ्र ही थका डालता है। आपकी क्षमतायें क्षीण हो जाती है। अगले क्षण को सम्हालने में जो ऊर्जा आवश्यक होती है, उसे आपका अनसुलझा भूत लील जाता है।
  7. मन भूत में रहता है पर भविष्य से प्रभावित रहता है। बचपन में हमें खिलौने भी उतने प्रिय थे जितनी कि रोचक पुस्तकें। मित्रों के साथ एक छलरहित, उदारमना व्यवहार था। जब भविष्य में हम एक विशेष छवि को जड़ देते हैं तो स्मृति के वे अनमोल अभेद प्राथमिकतायें पाने लगते हैं। भविष्य में सफलता के प्रति आपका महत्व भूत में आपके द्वार की गयी पढ़ाई को अधिक मान देने लगती है, आपका सफल और धनाड़्य मित्र आपका अधिक ध्यान पाने लगता है। स्मृतियाँ तब विशुद्ध नहीं रह पाती, विकारयुक्त हो जाती है।     


मुझे तो अस्तित्व के यही सात जन्म समझ आते हैं। प्रथम अवस्था सर्वोत्तम है और मुक्तिकारक भी। अगली तीन भी उत्तम हैं यदि ये राग द्वेष को क्षीण करें। अन्तिम तीन बन्धनकारी हैं पर साथ ही एक अवसर भी देती हैं कि हम अपने बद्ध संस्कारों को शिथिल कर सकें और अधिकतम समय प्रथम चार अवस्थाओं में बितायें।


यदि यही सात जन्म के साथ का संभावित उत्तर है जो मन की सभी अवस्थाओं सें सामञ्जस्य बैठाने को प्रेरित करता है तो एक प्रश्न पुनः उपस्थित हो जाता है। यदि अन्तिम तीन अवस्थायें बन्धनकारी हैं तो क्यों नवयुगल को उनसे बाहर निकलने की प्रेरणा नहीं दी जाती है?


छोड़िये, कारण और निवारण से परे वर्तमान में ही जीते हैं, जितने भी जन्म साथ मिले? बस वर्तमान सध जाये तो सब सध जाये। 

22.6.21

सात जन्म - एक प्रश्न

 

शीर्षक पढ़ते ही स्वाभाविक विचार आता है कि संभवतः चर्चा विवाह सम्बन्धों के कालखण्ड की होगी, एक के बाद एक, जीवनोत्तर। बहुधा इसी संदर्भ में सात जन्मों को अभिव्यक्त भी किया जाता है। तब विनोदवश प्रश्न यह भी उठता है कि सात जन्म ही क्यों? जब प्रेम इतना अधिक है तो सदा के लिये क्यों नहीं? जिनके लिये यह सम्बन्ध कठिन होने लगता है, उस क्षुब्धमना के लिये प्रश्न उठ सकता है कि जब एक नहीं सम्हाला जा रहा तो सात जन्म कैसे निभाये जायेंगे? जिज्ञासुमना को यह जानने की चाह हो सकती है कि अभी उनका कौन सा जन्म चल रहा है? प्रयोगधर्मियों के लिये हर बार नये प्रयोग करने के स्थान पर सात बार एक ही प्रयोग की बाध्यता क्यों? क्यों न ऐसा हो कि जब तक सामञ्जस्य की श्रेष्ठतम सीमा नहीं मिलती, प्रयोग चलते रहें और उसके बाद वही सम्बन्ध जन्मजन्मान्तर बने रहें।


यद्यपि यह देखा गया है कि लोग एक चित परिचित समूह में ही जन्म लेते हैं, जन्म जन्मान्तरों तक। ब्रायन वीज़ अपनी पुस्तकों में इस तथ्य को प्रयोगों द्वारा स्थापित करते हैं। “रिग्रेसन” पद्धति पर आधारित उनके प्रयोग व्यक्तियों को उनके पूर्वजन्मों में ले जाते हैं, जहाँ पर वे अपने वर्तमान सम्बन्धियों को पहचानते हैं पर किसी अन्य सम्बन्धी के रूप में। कभी कोई मित्र भाई के रूप में आता है, पिता पुत्र के रूप में आता है, शत्रु बान्धव बन कर आता है, परिचित पति बनकर आ धमकता है, सब गड्डमड्ड। कई बार पुराने सम्बन्ध उनके वर्तमान व्यवहार को भी समझने में सहायक होते हैं और केवल यह रहस्य जानकर ही उससे सम्बन्धित सारे अवसाद तिरोहित हो जाते हैं। आधुनिक वैज्ञानिक समाज भले ही अपनी परिधि से बाहर होने पर स्वीकार न करे पर पुनर्जन्म पर विश्वास रखने वालों के लिये और उसे दर्शन का स्थायी आधार मानने वाले हम भारतीयों के लिये यह सहज सा निष्कर्ष है।


पतंजलि के योगसूत्र में अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश, ये पाँच क्लेश कहे गये हैं। जब तक ये शेष रहते हैं, जन्म मिलता रहता है। साथ में रहने वालों के प्रति राग और द्वेष तो स्वाभाविक ही हैं। उन भावों की जब तक पूर्ण निष्पत्ति नहीं हो जाती, भोगक्रम चलता रहेगा। जिनके प्रति निष्पत्ति होनी है, उनके साथ जन्मक्रम चलता रहेगा। यद्यपि परम ध्येय इस चक्र से मुक्ति है, पर कर्मफल का सिद्धान्त समझना जीवन का एक अत्यन्त व्यवहारिक अंग है। देहान्तर के बाद भी चित्त में कर्मजनित संस्कार बने रहते हैं और वही कारण बनते हैं अगले जन्म का। स्मृतियों के रूप में जब यह संस्कार किसी तकनीक से कुरेदे जाते हैं तो वह पुनः संज्ञान में आ जाते हैं। पिछले जन्म की बातों को “रिग्रेसन” की पद्धति से याद कर पाना भी तभी संभव हो सकता है जब वे स्मृतियाँ चित्तपटल पर शेष हैं। योगसूत्र ही बताता है कि स्मृतियों के वे संस्कार कई परतों में ढके रहते हैं और सामान्यतः स्वतः बाहर नहीं आते हैं। अपरिग्रह विधि से जब वे सारी परतें धीरे धीरे हटती हैं तो सारे जन्मों के कृतान्त और वृत्तान्त स्पष्ट दीखते हैं।


जब कालखण्ड की परिकल्पना इतनी विस्तृत हो, जब कालचक्र से बाहर निकल आने वाली मुक्ति को श्रेयस्कर माना जाता हो, तब सात जन्म को इतना महत्व क्यों? क्या सम्बन्धों की मधुरता सात जन्म तक ही सीमित रहे? क्या सात जन्म तक इतनी मधुरता से साथ रहने के बाद राग नहीं रहेंगे? यदि किसी और से राग नहीं है तो वह कैसे अगली बार सम्बन्ध में आ बसेगा? यदि कोई राग में इतना ही अवलेहित है तो हमारे यहाँ पर तो चौरासी लाख का विधान है, उसे तो हर एक में भोगना पड़ेगा। प्रेमराग रहे भी और वह भी केवल सात जन्म, यह तथ्य सिद्धान्तसम्मत नहीं जान पड़ता है। यदि मुक्ति ही परम साध्य है तो क्यों न इसी जन्म में मुक्ति मिल जाये? यदि ऐसा है तो सांसारिक प्रेम का निरूपण मुक्ति से कैसे व्याख्यायित हो? यदि शास्त्रों पर विहंगम दृष्टि डालें तो एक सफल वैवाहिक सम्बन्ध को मुक्ति में सहायक माना गया है। पति और पत्नी एक दूसरे के पूरक और प्रेरक बने हुये मुक्ति को ओर संयुक्त रूप से बढ़ते हैं।


इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो “सात जन्म” का आशीर्वादात्मक उच्चार समझ नहीं आता है। यदि व्यवहारिकता के भाव में जायें तो “सात जन्म का साथ” वाक्य का प्रयोग उस पूर्णता के लिये किया जाता है जो सम्बन्धों से अपेक्षित है। यह शुभकामना का वह स्वरूप है जो सम्बन्धों में प्रगाढ़ता की आशा करता है। तब यह समझ नहीं आता है कि पूर्णता का निरुपण “सात” सी संख्या से क्यों? कहीं ऐसा तो नहीं कि इसके पीछे कोई और तर्क, भाव या अर्थ छिपे हों जो कालान्तर में शब्द से विलग हो गये हों? यह शास्त्र सम्मत है, वैज्ञानिक है, परिपाटी है या किसी अन्य भाव का अवशेष?


इस बारे में पहले तो उन लोगों से पूछा जो विवाह और सम्बन्धों में सिद्धहस्तता रखते हैं। क्योंकि इस प्रश्न के उत्तर उनके लिये भी उतने महत्वपूर्ण होने चाहिये जितने मुझे लग रहे हैं। एक अच्छा जन्म निकालना तो ठीक है पर शेष छह में भी वही मिलेंगे, इस बात की पुष्टि कर लेनी चाहिये। किसी भी शास्त्र में इसका कोई प्रमाण नहीं मिला है। यद्यपि सात संख्या से सम्बन्धित कई रोचक तथ्य पता चले पर उनमें से कोई भी तार्किक रूप से सम्बद्ध नहीं था। निकटतम संदर्भ सात फेरे और हर फेरे से जुड़े एक वचन का मिलता है पर उससे सात जन्मों की सहयात्रा न तो सिद्ध होती है और न ही अपेक्षित। अग्नि को साक्षी मानकर सात वचन लेना, सात जन्म तक साथ रहने से सम्बद्ध नहीं किया जा सकता है।


एक संभावित कारण समझ में आता है, उसकी चर्चा अगले ब्लाग में।