कभी कभी लगता है, भगवान जो करता है, बहुत अच्छा करता है।
दो कार्यक्रमों में भाग लेना था, वर्धा में ब्लॉगरीय कार्यशाला और कानपुर में विद्यालय के सहपाठियों से २५ वर्षीय पुनर्मिलन। कानपुर का कार्यक्रम १० वर्ष पहले से नियत किये बैठे थे मित्रगण और वर्धा के लिये सिद्धार्थजी का आदेश दो माह पहले आया। अच्छी बात यह थी कि एक ही यात्रा में वर्धा और कानपुर, दोनों ही समेटे जा सकते थे, असहजता इस बात की थी कि दोनों ही स्थानों पर पूरे कार्यक्रम में भाग न लेकर आंशिक कटौती करनी पड़ रही थी।
कानपुर की ओर सपरिवार ही निकलना होता है, पर परिवार चाह कर भी साथ नहीं चल पा रहा था। बच्चों की परीक्षायें चल रही थी और अपने कार्य के लिये उनकी परीक्षायें को छुड़वाने की सोचना गृह-अपराधों की श्रेणी में आता। जब भी अकेले निकलना होता है, तब यात्रा पूरी तरह से अपने अनुसार ढाली जा सकती है, जहाँ भी समय बचाया जा सकता है, बचाया जाता है भले ही थोड़ी असुविधा ही क्यों न हो? रात और दिन का कोई भेद नहीं रहता है इन यात्राओं में क्योंकि अकेले होने पर कभी भी सोया जा सकता है और कभी भी जागा जा सकता है।
पहले एक यात्रा कार्यक्रम बना। उसमें ट्रेन के अन्दर तो कम समय लग रहा था पर ट्रेनों की प्रतीक्षा और सड़क यात्रा मिला कर कहीं अधिक समय लग रहा था। समय निचोड़ने की मानसिकता ने वैकल्पिक और समयोत्पादक कार्यक्रम बनाने के लिये उकसाया। अन्ततः ११० घंटे का कार्यक्रम बना, उसमें ४० घंटे स्थिर और शेष ७० घंटे ट्रेन में। कार्यक्रम और सिकोड़ा जा सकता था, पर हवाई जहाज़ वाले ही फैल गये, किराया बढ़ाते गये। ट्रेन में जाना अधिक सुविधाजनक लगता है, धरती से जुड़े मानुषों को। पूरे कार्यक्रम के लिये सप्ताहान्त के अतिरिक्त केवल २ दिन का अवकाश लेना पड़ रहा था। कार्यक्रम की लम्बाई चौड़ाई को देखते हुये २ दिन का अवकाश देने में प्रशासन को भी कोई कठिनाई नहीं हुयी।
वर्धा और कानपुर में मिला कर ४० घंटे पास में थे, उसमें तो पूरा समय ब्लॉगरों और मित्रों से मिलने में बीतने वाला था। ट्रेन के ७० घंटों में ४ रातें थी, उसमें ३० घंटे निकलने वाले थे। शेष बचे ४० घंटे विशुद्ध रूप से अपने थे। अब उन ४० घंटों में क्या किया जाये, इस पर पहले से विचार करना आवश्यक था। ट्रेन में संभावनायें तो बहुत होती हैं, इस पर एक पूरा लेख लिख चुका हूँ। सहयात्रियों के साथ परिचर्चायें रोचक हो सकती, पर उसके लिये सहयात्री भी रोचक होना आवश्यक हैं। कई बार भाग्य साथ नहीं देता है अतः समय बिताने के लिये अपनी व्यवस्थायें स्वयं करके चलनी होती हैं। न अब संभावनाओं की उम्र ही रह गयी है और न ही संभावनाओं के सहारे यात्रायें अनियोजित छोड़ी ही जा सकती हैं।
पुस्तकें ही सर्वोत्तम रहती हैं यात्रा में और हर बार पुस्तकों के सहारे ही यात्रायें कटती हैं। इस बार सोचा कि कुछ अलग किया जाये। कुछ फ़िल्में थी देखने के लिये, पर इस बार मैं अपना मैकबुक एयर घर छोड़कर जा रहा था। पहली बार प्रयोगिक तौर पर आईपैड मिनी लेकर जा रहा था। आईपैड मिनी में फ़िल्में तो देखी जा सकती हैं पर फ़िल्मों को आईपैड मिनी में स्थानान्तरित करना अपने आप में कठिन है। १५ जीबी के रिक्त स्थान पर अधिक फ़िल्में आ भी नहीं सकती थीं। फ़िल्में विशुद्ध मनोरंजन होती हैं और कुछ सोचने को प्रेरित नहीं करती हैं। यही कारण रहा कि फ़िल्मों का विचार त्याग दिया गया।
संगीत में बहुत समय बिताया जा सकता था पर परिवार साथ में नहीं होने के कारण मनोरंजन की अधिक इच्छा नहीं थी। इस बार कुछ सृजनात्मक करने की इच्छा थी, कुछ नया जानने की इच्छा थी, कुछ नया लिखने की इच्छा थी। अन्ततः इस पर निर्णय लिया कि टेड की शिक्षा और मन संबंधी वार्ताओं को सुना जाये। अभी तक जितनी भी टेड वार्तायें सुनी थीं, सब इंटरनेट पर थी। तभी टेड का एक एप्प मिला जिसमें आप ऑफ़ लाइन वार्तायें भी सुन सकते थे, उन्हें डाउनलोड करने के पश्चात।
जब निर्णय ले लिया तो एक सप्ताह पहले से ही उन वार्ताओं को चुन कर उन्हें आईपैड मिनी में डाउनलोड करने में लगा दिया। इण्टरनेट की गति अच्छी थी कि दो दिन में ही कुल ८ जीबी की ६० वार्तायें डाउनलोड हो गयीं। हम भी प्रसन्न थे, उन्हें ऑफ़ लाइन चला कर देख भी लिया, वे बिना किसी व्यवधान के सुव्यवस्थित चल रहीं थीं। एक बार निरीक्षण में जाते समय एक दो वार्तायें चलायीं, रोचक थीं। २० घंटे की और वार्तायें भी उसी स्तर की होंगी, यह सोचकर मन आनन्द से भर गया। ४० घंटों की रिक्त ट्रेन अवधि में २० घंटों के ज्ञानप्रवाह की अच्छी व्यवस्था, यात्रा सुखद होने के प्रति मुझे पूरी तरह से आश्वस्त कर गयी।
यात्रा प्रारम्भ करने के एक दिन पहले ही एप्पल ने अपना नया आईओएस ७ निकाल दिया। जिस दिन भी कुछ नया निकलता है, अद्यतन रहने की आतुरता मन में घिर आती है। बिना यह सोचे कि आईपैड मिनी को अद्यतन करने में किसी प्रोग्राम पर क्या प्रभाव पड़ेगा, हमने उसे प्रयोग करने हेतु डाउनलोड कर लिया। हर बार यही होता है कि ऐसा करने के पश्चात पुराने प्रोग्रामों को चलाने में कोई समस्या नहीं आती है। हम भी आश्वस्त रहे कि सब कुछ पहले जैसा ही रहेगा।
यात्रा प्रारम्भ हुयी। यात्रा से पूर्व व्यस्तता अधिक रहने के कारण थकान बहुत अधिक थी, ट्रेन में बैठते ही जाते निद्रा ने आ घेरा। दो तीन घंटे सोने के बाद जब शेष समय का सदुपयोग करने की याद आयी तो आईपैड मिनी खोलकर बैठ गये और टेड वार्ता का बटन दबा दिया। जैसे ही उसमें न चलने का संदेश आया, मन बैठ गया। दूसरी वार्ता चलायी, उसकी भी वही स्थिति। अब समझ में आ चुका था कि आईपैड मिनी को अद्यतन करने के क्रम में समन्वय का हृास हो चुका था, अब कोई भी वार्ता उसमें चलने से रही।
न केवल डाउनलोड में लगे प्रयास मिट्टी में मिल चुके थे, वरन इन वार्ताओं के लुप्त होने के साथ ही यात्रा को सार्थक और उपयोगी बनाने के स्वप्न भी धूल फाँक रहे थे। अब सामने पूरी यात्रा थी और पढ़ने के लिये अन्तिम समय में रख ली आधी पढ़ी एक छोटी पुस्तक और लिखने के लिये ढेरों पड़े आधे अधूरे अनुभव।
दुखी होकर खिड़की से बाहर देखने लगा। अपनी तकनीकी समझ पर झल्लाहट हो रही थी और लग रहा था कि इतनी छोटी सी बात पर ध्यान क्यों नहीं गया? संयोगवश खिड़की के बाहर वर्षा हो रही थी, पूरे परिवेश में हरीतिमा फैली थी और वातावरण हृदय की तरह रुक्ष नहीं था। खिड़की के बाहर का दृश्य तब तक देखता रहा, जब तक मन हल्का नहीं हो गया।
अब न कोई बाहरी ज्ञान आना है, अब न कोई नये विषयों के बारे में कुछ जानने को मिलेगा। यदि साथ रहेगा तो यात्रा का अपना अनुभव और उसे लिखने के लिये आईपैड मिनी। हो न हो यही ईश्वर की चाह थी कि इस यात्रा में कुछ मौलिक ही किया जाये।
दो कार्यक्रमों में भाग लेना था, वर्धा में ब्लॉगरीय कार्यशाला और कानपुर में विद्यालय के सहपाठियों से २५ वर्षीय पुनर्मिलन। कानपुर का कार्यक्रम १० वर्ष पहले से नियत किये बैठे थे मित्रगण और वर्धा के लिये सिद्धार्थजी का आदेश दो माह पहले आया। अच्छी बात यह थी कि एक ही यात्रा में वर्धा और कानपुर, दोनों ही समेटे जा सकते थे, असहजता इस बात की थी कि दोनों ही स्थानों पर पूरे कार्यक्रम में भाग न लेकर आंशिक कटौती करनी पड़ रही थी।
कानपुर की ओर सपरिवार ही निकलना होता है, पर परिवार चाह कर भी साथ नहीं चल पा रहा था। बच्चों की परीक्षायें चल रही थी और अपने कार्य के लिये उनकी परीक्षायें को छुड़वाने की सोचना गृह-अपराधों की श्रेणी में आता। जब भी अकेले निकलना होता है, तब यात्रा पूरी तरह से अपने अनुसार ढाली जा सकती है, जहाँ भी समय बचाया जा सकता है, बचाया जाता है भले ही थोड़ी असुविधा ही क्यों न हो? रात और दिन का कोई भेद नहीं रहता है इन यात्राओं में क्योंकि अकेले होने पर कभी भी सोया जा सकता है और कभी भी जागा जा सकता है।
पहले एक यात्रा कार्यक्रम बना। उसमें ट्रेन के अन्दर तो कम समय लग रहा था पर ट्रेनों की प्रतीक्षा और सड़क यात्रा मिला कर कहीं अधिक समय लग रहा था। समय निचोड़ने की मानसिकता ने वैकल्पिक और समयोत्पादक कार्यक्रम बनाने के लिये उकसाया। अन्ततः ११० घंटे का कार्यक्रम बना, उसमें ४० घंटे स्थिर और शेष ७० घंटे ट्रेन में। कार्यक्रम और सिकोड़ा जा सकता था, पर हवाई जहाज़ वाले ही फैल गये, किराया बढ़ाते गये। ट्रेन में जाना अधिक सुविधाजनक लगता है, धरती से जुड़े मानुषों को। पूरे कार्यक्रम के लिये सप्ताहान्त के अतिरिक्त केवल २ दिन का अवकाश लेना पड़ रहा था। कार्यक्रम की लम्बाई चौड़ाई को देखते हुये २ दिन का अवकाश देने में प्रशासन को भी कोई कठिनाई नहीं हुयी।
वर्धा और कानपुर में मिला कर ४० घंटे पास में थे, उसमें तो पूरा समय ब्लॉगरों और मित्रों से मिलने में बीतने वाला था। ट्रेन के ७० घंटों में ४ रातें थी, उसमें ३० घंटे निकलने वाले थे। शेष बचे ४० घंटे विशुद्ध रूप से अपने थे। अब उन ४० घंटों में क्या किया जाये, इस पर पहले से विचार करना आवश्यक था। ट्रेन में संभावनायें तो बहुत होती हैं, इस पर एक पूरा लेख लिख चुका हूँ। सहयात्रियों के साथ परिचर्चायें रोचक हो सकती, पर उसके लिये सहयात्री भी रोचक होना आवश्यक हैं। कई बार भाग्य साथ नहीं देता है अतः समय बिताने के लिये अपनी व्यवस्थायें स्वयं करके चलनी होती हैं। न अब संभावनाओं की उम्र ही रह गयी है और न ही संभावनाओं के सहारे यात्रायें अनियोजित छोड़ी ही जा सकती हैं।
पुस्तकें ही सर्वोत्तम रहती हैं यात्रा में और हर बार पुस्तकों के सहारे ही यात्रायें कटती हैं। इस बार सोचा कि कुछ अलग किया जाये। कुछ फ़िल्में थी देखने के लिये, पर इस बार मैं अपना मैकबुक एयर घर छोड़कर जा रहा था। पहली बार प्रयोगिक तौर पर आईपैड मिनी लेकर जा रहा था। आईपैड मिनी में फ़िल्में तो देखी जा सकती हैं पर फ़िल्मों को आईपैड मिनी में स्थानान्तरित करना अपने आप में कठिन है। १५ जीबी के रिक्त स्थान पर अधिक फ़िल्में आ भी नहीं सकती थीं। फ़िल्में विशुद्ध मनोरंजन होती हैं और कुछ सोचने को प्रेरित नहीं करती हैं। यही कारण रहा कि फ़िल्मों का विचार त्याग दिया गया।
संगीत में बहुत समय बिताया जा सकता था पर परिवार साथ में नहीं होने के कारण मनोरंजन की अधिक इच्छा नहीं थी। इस बार कुछ सृजनात्मक करने की इच्छा थी, कुछ नया जानने की इच्छा थी, कुछ नया लिखने की इच्छा थी। अन्ततः इस पर निर्णय लिया कि टेड की शिक्षा और मन संबंधी वार्ताओं को सुना जाये। अभी तक जितनी भी टेड वार्तायें सुनी थीं, सब इंटरनेट पर थी। तभी टेड का एक एप्प मिला जिसमें आप ऑफ़ लाइन वार्तायें भी सुन सकते थे, उन्हें डाउनलोड करने के पश्चात।
जब निर्णय ले लिया तो एक सप्ताह पहले से ही उन वार्ताओं को चुन कर उन्हें आईपैड मिनी में डाउनलोड करने में लगा दिया। इण्टरनेट की गति अच्छी थी कि दो दिन में ही कुल ८ जीबी की ६० वार्तायें डाउनलोड हो गयीं। हम भी प्रसन्न थे, उन्हें ऑफ़ लाइन चला कर देख भी लिया, वे बिना किसी व्यवधान के सुव्यवस्थित चल रहीं थीं। एक बार निरीक्षण में जाते समय एक दो वार्तायें चलायीं, रोचक थीं। २० घंटे की और वार्तायें भी उसी स्तर की होंगी, यह सोचकर मन आनन्द से भर गया। ४० घंटों की रिक्त ट्रेन अवधि में २० घंटों के ज्ञानप्रवाह की अच्छी व्यवस्था, यात्रा सुखद होने के प्रति मुझे पूरी तरह से आश्वस्त कर गयी।
यात्रा प्रारम्भ करने के एक दिन पहले ही एप्पल ने अपना नया आईओएस ७ निकाल दिया। जिस दिन भी कुछ नया निकलता है, अद्यतन रहने की आतुरता मन में घिर आती है। बिना यह सोचे कि आईपैड मिनी को अद्यतन करने में किसी प्रोग्राम पर क्या प्रभाव पड़ेगा, हमने उसे प्रयोग करने हेतु डाउनलोड कर लिया। हर बार यही होता है कि ऐसा करने के पश्चात पुराने प्रोग्रामों को चलाने में कोई समस्या नहीं आती है। हम भी आश्वस्त रहे कि सब कुछ पहले जैसा ही रहेगा।
यात्रा प्रारम्भ हुयी। यात्रा से पूर्व व्यस्तता अधिक रहने के कारण थकान बहुत अधिक थी, ट्रेन में बैठते ही जाते निद्रा ने आ घेरा। दो तीन घंटे सोने के बाद जब शेष समय का सदुपयोग करने की याद आयी तो आईपैड मिनी खोलकर बैठ गये और टेड वार्ता का बटन दबा दिया। जैसे ही उसमें न चलने का संदेश आया, मन बैठ गया। दूसरी वार्ता चलायी, उसकी भी वही स्थिति। अब समझ में आ चुका था कि आईपैड मिनी को अद्यतन करने के क्रम में समन्वय का हृास हो चुका था, अब कोई भी वार्ता उसमें चलने से रही।
न केवल डाउनलोड में लगे प्रयास मिट्टी में मिल चुके थे, वरन इन वार्ताओं के लुप्त होने के साथ ही यात्रा को सार्थक और उपयोगी बनाने के स्वप्न भी धूल फाँक रहे थे। अब सामने पूरी यात्रा थी और पढ़ने के लिये अन्तिम समय में रख ली आधी पढ़ी एक छोटी पुस्तक और लिखने के लिये ढेरों पड़े आधे अधूरे अनुभव।
दुखी होकर खिड़की से बाहर देखने लगा। अपनी तकनीकी समझ पर झल्लाहट हो रही थी और लग रहा था कि इतनी छोटी सी बात पर ध्यान क्यों नहीं गया? संयोगवश खिड़की के बाहर वर्षा हो रही थी, पूरे परिवेश में हरीतिमा फैली थी और वातावरण हृदय की तरह रुक्ष नहीं था। खिड़की के बाहर का दृश्य तब तक देखता रहा, जब तक मन हल्का नहीं हो गया।
अब न कोई बाहरी ज्ञान आना है, अब न कोई नये विषयों के बारे में कुछ जानने को मिलेगा। यदि साथ रहेगा तो यात्रा का अपना अनुभव और उसे लिखने के लिये आईपैड मिनी। हो न हो यही ईश्वर की चाह थी कि इस यात्रा में कुछ मौलिक ही किया जाये।