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10.4.16

मन-राक्षस

दुनिया,
कुछ अधखुली मस्तिष्क-पटल पर,
करती है हर काम अपनी धुन पर ।
कुछ भी हो,
मैं भी हूँ दुनिया,
और प्राप्त हैं सारे अधिकार,
मानवीय, दैवीय, राक्षसीय आदि ।
आखिर हों भी क्यों न,
मैं भी उस धरती का पुत्र,
जिसने जन्म दिया कुछ राक्षसों को,
उनके लिये अवतरित किया,
भगवान को ।
लड़ाई हुयी और विजय मिली,
सत्य को ।

शायद कभी कभी ऐसा ही युद्ध होता है,
मेरे मन की पर्तों में ।
शायद बाहरी राक्षस,
विजय पाना चाहते हों,
मन के देवता पर,
क्योंकि मन तो निर्मल है ।
और यदि होती है हार,
तो विजय पाकर राक्षस,
मन को करता दूषित, बेकार,
और इस तरह,
निर्माण होता है, एक नये राक्षस का ।
वह भी अपनी धुन में सवार,
आक्रमण हेतु खोजता है शिकार ।

3.4.16

संस्कृति

गूँजतीं हैं प्रतिध्वनियाँ,
वेद की शाश्वत ऋचायें,
अनवरत बहती रहेंगी,
वृहद संस्कृति की विधायें ।।

आज कुछ राक्षस घिनौने,
भ्रमों के आधार लेकर,
युगों के निर्मित भवन को,
ध्वस्त करना चाहते हैं ।।

यदि विचारा, यह धरातल तोड़ दोगे,
सत्य मानो कल्पना छलती तुम्हें है ।
ध्वंस का विश्वास मरकर ही रहा है,
वह जिया यदि, मात्र स्वप्नों के भवन में ।।

व्यर्थ की हठधर्मिता को,
कहीं जीवन में उतारा,
लिये हमने मातृ रक्षा के वचन हैं,
रही संचित वीरता की पूर्व गरिमा ।

रक्त का आवेश अन्दर से उठेगा,
और फूटेगा हृदय से अनल जीवट,
प्रबल विष में उफनते आघात होंगे,
जो करेंगे भस्म अनुचित गर्व तेरा ।

काल के विस्तृत पटल पर,
हैं विजय के शब्द अंकित ।