Showing posts with label वैदिक. Show all posts
Showing posts with label वैदिक. Show all posts

17.8.13

मन की सम्यक व्याख्या

पाश्चात्य दर्शन मन की सतही व्याख्या करता है। उसके अनुसार मन की दो ही अवस्थायें हैं, चेतन और अवचेतन। चेतन मन समझता है, सोचता है, याद रखता है और किसी भी भौतिक कार्य में प्रमुख भूमिका निभाता है। मन को ही अस्तित्व माना गया है और मन के सोचने को अस्तित्व सिद्ध करने का एकमेव माध्यम। एक अवचेतन मन भी होता है, जो स्वप्न के माध्यम से व्यक्त होता है। अवचेतन मन हमारी दबी हुयी इच्छाओं का प्रक्षेपण है और जब चेतना का पहरा नहीं होता है, अवचेतन मन व्यक्त हो जाता है। फ्रॉयड ने तो स्वप्नों की विस्तृत व्याख्या करके अवचेतन मन को रहस्यमयी और रोचक आधार दिया। मन की व्याख्या में ही पाश्चात्य जीवन दर्शन भी छिपा है, मन की सारी अतृप्त इच्छाओं को जी लेना।

वहीं दूसरी ओर येरुशलम में उत्पन्न तीनों धर्मों में मन की अवधारणा तो है, पर उनमें मन को पापमार्गी बताया गया है। उनके अनुसार धर्म के ऐतिहासिक पक्ष के प्रति पूर्ण श्रद्धा से ही स्वर्ग संभव है। यहाँ पर मानसिक प्रवृत्तियाँ का विश्लेषण तो है, पर मन की कार्यशैली की व्याख्या का अभाव है। संभवत: पूर्व के धर्मों और पश्चिम के धर्मों में यही प्रमुख अन्तर है। जहाँ पश्चिम के धर्मों में ऐतिहासिकता प्रमुख है, पूर्व के धर्मों में अनुभव प्रमुख है। जहाँ एक ओर समर्पण मात्र से स्वर्गपद को प्राप्य बताया गया है, वहीं दूसरी ओर अनुभव के आधार पर स्वर्ग की अनुभूति की जा सकती है। एक ओर पथ पर सामाजिकता का आधार आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर व्यक्तिगत स्तर पर साधना प्रेरित अथक प्रयास।

यही एक विशेष अन्तर रहा होगा, जिस कारण पूर्व के धर्मों में मन को इतनी प्रमुखता से विश्लेषित किया गया है। सनातन, बौद्ध, जैन, सिख, सभी मन की महत्ता समझते हैं और जितना मन के बारे में जानते हैं, वह एक सतत जिज्ञासा बनाये रखने के लिये पर्याप्त है। मन के बारे में जितनी गहराई से वैदिक ग्रंथों में वर्णन है, उतनी गहराई और सूक्ष्मता कहीं और देखने को नहीं मिलती। योग का समस्त आधार मन को समझने और उसे आत्मोन्नति में उद्धत करने के लिये है। योग का प्रायोजन व्यक्ति को दृष्टा का अनुभव प्रदान करने का है। दृष्टा की दृष्टि पाने के पहले जो मन द्वारा आरोपित बाधायें हैं, उन्हें पार करने के लिये मन की कार्यशैली और मन की भाषा समझना आवश्यक है। यह कार्य पतंजलि योग सूत्र और माण्डूक्य उपनिषद में भलीभाँति किया गया है। वर्तमान लेखकीय संदर्भ में, मन की प्राच्य धारणा का आधार यही दो मूल ग्रन्थ रहेंगे।

पतंजलि ने योग पर एक अमूल्य ग्रन्थ लिखा है, पाश्चात्य जगत उनकी ऐतिहासिकता में रुचि ले सकता है, उनसे संबद्ध तथ्य जोड़ तोड़ कर उनकी इस जगत में उपस्थिति सत्य या काल्पनिक बता सकता है। पर इस ग्रन्थ में क्या लिखा है, क्या नहीं, उसके ऊपर प्रयोग कर उसकी प्रामाणिकता को अनुभव से सत्य या असत्य सिद्ध करने की कभी उनकी मानसिकता रही ही नहीं। वहीं दूसरी ओर भारतीय जनमानस की पंतजलि के ऐतिहासिक पक्ष में उतनी रुचि नहीं जितनी कि उनके द्वारा वर्णित योग सूत्र के अनुभव पक्ष में है। पाश्चात्य ज्ञान के इस दृष्टिकोणिक अभाव के कारण मन की सम्यक व्याख्या वैदिक ग्रन्थों में ही प्रमुखता से मिलती है।

योग के बारे में जनसाधारण की धारणा शरीर के कठिन आसन या एक रहस्यमयी आध्यात्मिक स्थिति के जैसी हो सकती है, पर जो लिखा है उसके अनुसार वस्तुस्थिति बड़ी ही वैज्ञानिक और हर स्तर पर सिद्ध करने योग्य है। योगसूत्र के बारे में भ्रामक अवधारणा से जनसामान्य ही क्या, हमारा बौद्धिक समाज भी ग्रसित है। एक बार पढ़ना प्रारम्भ किया तभी समझ में आया कि यह कितना सिद्धान्तपरक और व्यवस्थित है। यही नहीं, हर स्तर पर पाये गये अनुभव, इसमें लिखे प्रत्येक वाक्य को मस्तिष्क में सदा के लिये गढ़ देते हैं।

इस ग्रन्थ में यदि मन की भाषा का विवरण ढूँढ़ें तो किसी मानवीय भाषा विशेष का संदर्भ नहीं मिलता है। मन जिसके बारे में सोचता है, अपने मस्तिष्क में उसका आकार गढ़ लेता है। यदि किसी भौतिक वस्तु के बारे में सोचता है तो स्मृति के आधार पर उसका आकार मन में बन जाता है। यदि किसी व्यक्ति के बारे में सोचता है, तो स्मृति में पड़ी उसकी सर्वाधिक पहचानी प्रतिलिपि उसे दिखती है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो किसी भी व्यक्ति के बारे में हमारी अवधारणा उस व्यक्ति के बारे में हर ओर से प्राप्त अनगिनत संकेतों से बनती है। कोई एक विशेष गुण मन में बनने वाले उस आकार में क्या प्रभाव डालेगा, क्या सच बोलने वाले की मानसिक छवि अधिक उजली बनेगी, क्या कटु बोलने वाले की छवि में कुछ धुँधलापन रहेगा? उसका रंग, रूप, गुण, वाणी, चाल आदि टैग के रूप में उस छवि में संबद्ध हो जाते होंगे और तब कहीं जाकर मन में उसका चित्र बनता होगा।

कम्प्यूटर की भाषा हर वस्तु को ० या १ में गढ़ती है, मानव की भाषा हर वस्तु को नाम और उच्चारण देती है। इसी प्रकार किसी भी वस्तु के बारे में पाँच स्रोतों से एकत्र ज्ञान विद्युततरंगों के रूप में हमारे मस्तिष्क में संचित हो जाता है। जब मन में किसी के बारे में छवि बनती होगी तो उस व्यक्ति के बारे में संबद्ध विद्युत तरंगें कैसे एक साथ आती होगीं और उस छवि को बनाने में अपना योगदान देती होंगी? दृश्य, ध्वनि, स्वाद, स्पर्श, गंध किस प्रकार से उस छवि में आरोपित होती होंगी।

किसी वस्तु या व्यक्ति के बारे में तो फिर भी मस्तिष्क में कोई छवि आकार ले सकती है, भाव, कल्पना, तर्क आदि अभौतिक तत्व मन में कौन सी छवि बनाते होंगे। एक बात तो स्पष्ट है कि जिस रूप में भाव आदि संचित होते होंगे, उसी रूप में उनकी छवि बनती होगी या किसी व्यक्ति की छवि के साथ संबद्ध होती होगी। कौन भाव कितना गाढ़ा है और किस रूप में ग्रहण किया गया है, यह दोनों ही निर्मित छवि के प्रमुख पक्ष निर्धारित करते होंगे।

मस्तिष्क सारी इन्द्रियों का अनुभव कर सकता है, आँख बन्द हो फिर भी किसी व्यक्ति की छवि बना सकता है, कान बन्द हों फिर भी संचित अनुनाद सुन सकता है, इसी प्रकार स्पर्श कर सकता है, चख सकता है, सूँघ सकता है। आश्चर्य ही है कि इन पाँच भिन्न सी लगने वाले माध्यमों के लिये मन स्मृति में समान प्रकार की ही प्रक्रिया अपनाता है। क्या मस्तिष्क या मन के स्तर पर इन पाँचों में भेद नहीं है? कहीं ऐसा तो नहीं कि यह पाँचों अनुभव मन के स्तर पर जाकर एक हो जाते हों। संभव है, तभी यो एक से संचित होते हैं, तभी ये एक से व्यक्त हैं, चिन्तन में, स्वप्न में।

एक और प्रश्न जो मन की भाषा को रोचक बना देता है। जो अनुभव हम जागृत अवस्था में करते हैं, वही अनुभव जब चिन्तन में या स्वप्न में होता है तो उन दोनों में क्या अन्तर आ जाता है? यदि मन के स्तर पर रूप, रस ,रंग आदि घुल कर एक से हो जाते हैं तो क्या स्वप्न में भी आनन्द या दुख की अनुभूति हमें उसी तीव्रता और उसी विविधता में होती होगी जिस तीव्रता में जागृत अवस्था में होती है।

ऐसे ही न जाने कितने प्रश्न लिये आयेगी मन की सम्यक व्याख्या जो पतंजलि योगसूत्र और माण्डूक्य उपनिषद पर आधारित होगी। समझते हैं, अगली पोस्ट में।