Showing posts with label राम. Show all posts
Showing posts with label राम. Show all posts

16.10.21

राम का निर्णय(संवेदना)

 

राम वन को चल दिये। नगरवासी उनके साथ रहने का निश्चय कर पीछे चलने लगे। राम ने आगामी रात्रि में ही सबको सोता हुआ छोड़कर चुपचाप अपनी यात्रा में बढ़ जाने का निश्चय किया। श्रृंगवेरपुर में मित्र निषादराज से भेंट करने के बाद राम प्रयागराज में मुनि भरद्वाज के आश्रम में गये और उनके सुझाने पर चित्रकूट में आकर रहने लगे।


इघर अयोध्या में अतिशय मानसिक पीड़ा और आत्मग्लानि के बोध से भरे राज दशरथ का माँ कौशल्या के महल में ही देहावसान हो गया। भरत को कैकेय से यथाशीघ्र बुलाया जाना, पिता की सकारण मृत्यु और भैया राम का वनगमन, स्वयं को दोनों का कारण मानना, अतीव लज्जा और क्रोध के भाव से अपनी माँ को धिक्कारना, भैया राम को लाने के लिये चित्रकूट के लिये सेना सहित प्रयाण करना, कथा का गतिक्रम चलता रहता है।


इस बीच राम के द्वारा लिये हुये वनगमन के निर्णय के बारे में पक्ष और प्रतिपक्ष के तर्क अवसान पा जाते हैं। सब शोकमना हो स्वीकार ही कर लेते हैं कि राम ने उचित किया। चित्रकूट प्रवास के प्रथम दिन राम पिता दशरथ को लेकर तनिक व्याकुल होते हैं और लक्ष्मण से आग्रह करते हैं कि वह वापस अयोध्या जायें और पिता का ध्यान रखें। विचार श्रृंखला के क्रम में यह बात उठती है कि किस प्रकार पिता परवश होते हैं और अपने आज्ञाकारी पुत्र के वनगमन के वर को स्वीकार कर लेते हैं। पिता की यह मनःस्थिति लक्ष्मण को उनकी सहायता हेतु वापस लौट जाने के लिये कही जाती है। यद्यपि लक्ष्मण सविनय मना कर देते हैं पर राम के हृदय की पीड़ा और अन्याय का निहित भाव राम के विलाप से व्यक्त होता है।


चित्रकूट से चलने के बाद एक अन्य प्रकरण में जब राक्षस विराध ने सीता को उठा लिया था तब सीता को भय से काँपते हुये देख राम की पीड़ा पुनः छलकी। उन्हें अकारण ही दुख देने के कैकेयी के मन्तव्य को कहते हुये तब राम कहते हैं। वन में हमारे लिये जिस दुख की प्राप्ति कैकेयी को अभीष्ट थी, वह आज दिख रहा है। संभवतः तभी वह मात्र भरत के लिये राज्य पाकर संतुष्ट नहीं हुयी। समस्त प्राणियों का प्रिय होने पर भी मुझको वन भेज दिया, लगता है माँ कैकेयी का मनोरथ आज सफल हुआ। राज्य के अपहरण और पिता की मृत्यु से मुझे उतना कष्ट नहीं हुआ जितना विदेहनन्दिनी को राक्षस के स्पर्श करने से हुआ। कैकेयी के कृत्य से राम दुखी थे, क्षुब्ध भी पर अपने वनगमन के निर्णय पर उनको कभी संशय नहीं रहा।


राम जानते थे कि धर्म का पालन सरल नहीं होता है। सरल विकल्प भी थे पर उन्होंने वन जाना सहर्ष स्वीकार कर लिया। यह अत्यन्त कठिन विकल्प था। परिवार का बिखराव, पिता का देहान्त, दो भाइयों का वन में भ्रमण, जनककुमारी को वन के कष्ट, भरत का अग्रज की भाँति ही तापस वेष में ग्राम से ही राज्य का संचालन, नगरवासियों का अपार दुख, विकल्प अत्यन्त कठिन था। मात्र कैकेयी और उसकी दासी प्रसन्न थी। वह सीमित प्रसन्नता भी पुत्र भरत का स्नेह खोकर दुख में बदल गयी। सरल विकल्प होता कि लक्ष्मण की मन्त्रणानुसार राम राज्य का अधिग्रहण कर लेते तो कैकेयी को छोड़ कर सब प्रसन्न रहते।


इतने लोगों को कष्ट देने का विकल्प राम ने क्यों चुना? यद्यपि राम स्वयं ही वन जाकर समस्या का निदान करते हुये प्रतीत हुये, पर उन्हें इस बात का भान तो था कि किस प्रकार सब अस्तव्यस्त हो जायेगा। यद्यपि राजपरिवार के स्थायित्व पर पहला कठोर प्रहार माँ कैकेयी का था पर क्या राम शेष अस्तव्यतता रोक सकते थे। क्या सत्य का मार्ग परिवार, समाज, नगर आदि के कष्टों से भी बढ़कर था?


व्यवहारिकता के परिप्रेक्ष्य में लक्ष्मण के विचार अत्यन्त तर्कसंगत लगते हैं। गुरु वशिष्ठ का सीता को युवराज्ञी बनाने के लिये धर्मसम्मत व्याख्या करना, पिता को स्वयं को कारागार में डाल देने को प्रस्तुत होना, माँ कौशल्या का वन न जाने की प्रत्याज्ञा देना, इन सबके ऊपर राम ने वनगमन को चुना। पिता को न कभी दोषमुक्त किया, न कभी अपने वनगमन का दोष ही दिया।


प्रयास और प्रभाव की दृष्टि से पुरुषार्थों में काम तात्कालिकता का द्योतक है, अर्थ का क्षेत्र तनिक बड़ा होता है, धर्म का कालखण्ड विस्तृत होता है और मोक्ष का अपरिमित। राम ने काम और अर्थ की तुलना में धर्म को चुना। दीर्घकालिक दृष्टि और सैद्धान्तिक आग्रह के मार्ग में यदि कष्ट आये तो राम ने सहे।


भरत के चित्रकूट आगमन पर वनगमन पर एक बार पुनः विस्तृत चर्चा हुयी। भरत, वशिष्ठ, जाबालि ने अपने विचारों को प्रस्तुत किया पर राम ने सबका शमन किया और पिता की आज्ञा को ही सर्वोपरि मानने का ही निश्चय किया। पिता की परवशता, अयोध्या का कल्याण, कुलपरम्परा, नास्तिकता के सिद्धान्त और धर्म के व्यवहारिक पक्ष को अस्वीकार करते हुये राम अपने निर्णय पर दृढ़ रहे। समस्त अयोध्या की प्रार्थना और करुणामयी आग्रह पर भी राम विचलित नहीं हुये। अन्ततः भरत का मान रखते हुये उन्होंने अपनी खड़ाऊँ दे दी जिन्हें भरत ने प्रतीक बनाकर तापस वेष में ही चौदह वर्ष तक शासन किया।


राम के वनगमन का प्रकरण और सम्बन्धित संवाद राम के वैशिष्ट्य और प्रखर निर्णय प्रक्रिया को व्याख्यायित करते हैं। वर्तमान में राम सर्वपूजनीय हैं पर उस समय की कल्पना कीजिये कि १८ वर्ष का एक युवा राजकुमार जो कि अपनी सामर्थ्य ताड़का वध और शिवधनुष भंग कर स्थापित कर चुका था, सहसा सब त्यागकर वन चला जाता है। उस काल के जनों में राम का सम्मान कितना बढ़ गया होगा? कालान्तर में राक्षस उन्मूलन, संगठनशक्ति और रावणवध के पश्चात उनका राजा बनना सबके लिये अत्यन्त उत्साह और हर्ष का विषय होगा। रामराज्य के उत्कर्ष और राम के व्यक्तित्व से संलग्न इतिहास ने ही वाल्मीकि को प्रेरित किया होगा कि वह राम का चरित्र आने वाली पीढ़ियों के लिये संरक्षित करें।


राम को वाल्मीकि ने एक संवेदित राजकुमार के रूप में प्रस्तुत किया है जिसने अपने निर्णयों से अपना उत्कृष्ट उत्कर्ष गढ़ा। ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया जो असामान्य था। जब केवल वनगमन के निर्णय पर ही अध्याय लिखे जा सकते हैं तो राम का सम्पूर्ण चरित्र कितना अनुकरणीय होगा, उसकी कल्पना करना कठिन है। मेरे राम मुझे शक्ति दें कि उनके वनगमन से आज भी जो दुख मेरे मन में व्याप्त है, उसका निवारण कर सकूँ। जय श्री राम।

14.10.21

राम का निर्णय (प्रयाण)

 

सुमन्त्र का मन कैकेयी की कुटिल गति देखकर बिद्ध था। प्रातः से ही कैकेयी के आचरण ने उनको व्यथित कर रखा था। दशरथ और राम के बीच का यह संवाद सुनकर राज परिवार में मर्यादा का यथासम्भव मान रखने वाले सुमन्त्र का धैर्य भी टूट गया। मूर्च्छित दशरथ राम के कन्धे पर टिके थे, कक्ष में मचा हाहाकार शान्त हो चुका था, सबको व्यग्रता से प्रतीक्षा थी कि दशरथ की चेतना वापस लौटे। राम को आज्ञा पाने और शीघ्रता से वनगमन की आकुलता थी। संताप और समय की स्तब्धता ने सुमन्त्र को अवसर दिया कि वह कैकेयी को समझायें और अपना हठ त्यागने को प्रेरित करें। तनिक क्रोध भरे कंपित स्वर में सुमन्त्र ने कहा। 


देवि, जब तुमने अपने पति राजा दशरथ का ही त्याग कर दिया है तो हे कुलघातिनी, ऐसा कोई कुकर्म शेष नहीं रहा जो तुम न कर सको। जिस प्रतापी राजा ने तुम्हें इतना मान दिया, इतना ऐश्वर्य दिया, उसको इतना संताप न दो, इतना अपमान न करो। कुल की परम्परा से च्युत हो और अधर्मपूर्वक यदि तुम कार्य करोगी तो कौन ब्राह्मण, धर्मज्ञ, नगरवासी या सेवक यहाँ रुकेगा? तब किस पर तुम राज्य करोगी? 


मुझे लगता है देवि कि तुम्हारा स्वभाव भी तुम्हारी माता पर गया है। तुम्हारी माता के दुराग्रह से हम परिचित हैं और यह भी जानते हैं कि किस प्रकार एक साधु द्वारा तुम्हारे पिता को दिये गये वर से ज्ञात किसी तथ्य को जानने के लिये उन्होंने हठपूर्वक आचरण किया था। तथ्य बताने पर तुम्हारे पिता की मृत्यु निश्चित थी पर मना करने पर भी तुम्हारी माँ नहीं मानी। तब साधु से विमर्श करके तुम्हारे पिता ने तुम्हारी माँ को घर से निकाल दिया था। आज तुम अपनी माँ के समान ही हठ पर अड़ी हो। यह रघुकुल की ही मर्यादा और कुलपरम्परा है कि तुम्हें अपनी माँ जैसा दण्ड नहीं मिल रहा है। अभी भी चेत जाओ और राम को वन जाने से रोक लो। अपयश मत पाओ। राम सा आज्ञाकारी पुत्र त्याग कर तुम कहीं प्रसन्न नहीं रहोगी। सुमन्त्र के तीक्ष्ण, उद्वेलित और सार्वजनिक रूप से अपमानित करने वाले वचनों से भी कैकेयी के मुख पर कोई विकार नहीं आया। अपने वर पूर्ण होने के इतने निकट आ वह और भी कठोर हो गयी थी।


दशरथ चेतते हैं, राम को अपने समीप पाकर उनका हृदय शक्ति पा जाता था। सुमन्त्र को इस प्रकार कैकेयी को समझाते हुये सुनते भी हैं। मन में एक निश्चय कर सुमन्त्र को आज्ञा देते हैं। सूत, तुम रत्नों से भरी चतुरङ्गिणी सेना राम के साथ वन भेजो। वणिजों, सेविकाओं और राम के समस्त सहायकों को प्रचुर धन सहित राम के साथ जाने की आज्ञा दो। कोष, अन्न और समस्त मनोवाञ्छित भोगों से सम्पन्न कर राम को यहाँ से भेजा जाये। शेष अयोध्या का पालन भरत करेंगे। पूर्व में सुमन्त्र के वचनों से आहत हुयी और मन में क्रोध समाये कैकेयी तमतमा कर सहसा बोल उठी कि महाराज आप ऐसा नहीं कर सकते, तब भरत के लिये शेष ही क्या रहेगा? दशरथ ने कहा कि इस प्रकार का कोई प्रतिबन्ध तो तूने अपने वरों में नहीं लगाया था। कैकेयी का क्रोध अब कुल पर लक्षित हो गया था, वह बोली कि जिस प्रकार आपके पूर्वज राजा सगर ने अपने पुत्र असमञ्ज को राज्य से निकाल दिया था उसी प्रकार आप राम को निष्काषित कर राज्य के द्वार सदा के लिये बन्द कर दीजिये। जानबूझकर की गयी इस अपमानपूर्ण तुलना पर कक्ष में सभी लोग कैकेयी को धिक्कारने लगे। तब राज्य के आदरणीय और वयोवद्ध मन्त्री सिद्धार्थ आगे बढ़कर कैकेयी से तथ्यों को स्पष्ट करते हैं।


देवि, असमञ्ज दुष्ट बुद्धि का था, मार्ग पर खेल रहे बालकों को सरयू में फेंक देने को अपना मनोरञ्जन समझता था। प्रजाजनों द्वारा राजा सगर को जब इस संदर्भ में निवेदन किया गया तो उन्होंने मन्त्रियों के साथ राजकुमार के अन्य कार्यकलापों के बारे में मन्त्रणा कर उसे राज्य से बाहर भेजने का निर्णय किया था। राज्य के हित में सगर ने अपने अहितकारी पुत्र को त्याग दिया था। देवि, राम ने कौन सा अपराध किया है? हम सब लोग राम में एक भी अवगुण नहीं देखते हैं। यदि तुम्हें किञ्चित भी कोई दोष दिखता हो कहो पर इस प्रकार अनर्गल प्रलाप मत करो। अभी भी चेत जाओ और लोकनिन्दा से बचो। यह सुनकर दशरथ कैकेयी को झिड़कते हुये बोले, “पापरुपणी, तेरी सारी चेष्टायें साधुपुरुषों के विपरीत हैं। मैं भी सारा राज्य त्याग कर राम के पीछे चला जाऊँगा, तू राज्य का सुख भोग”।


माँ कैकेयी के प्रति पिता की क्षुब्धता और सभा में व्याप्त आकुलता देख राम अत्यन्त विनीत स्वर में कहते हैं। पिताजी, मैं समस्त भोगों का त्याग कर चुका हूँ और वन में वन के द्वारा ही जीवन निर्वाह करना चाहता हूँ। मुझे सेना से क्या प्रयोजन? उत्तम हाथी का त्याग कर बाँधे जाने वाले रस्से से क्या आसक्ति? मुझे तो माँ कैकेयी वल्कल वस्त्र ला दें।


राम और लक्ष्मण दोनों ने ही पिता के सामने ही वल्कल वसन धारण कर लिये। कक्ष में सबकी आँखों में अश्रु छलक आये। चीर धारण में कुशल न होने के कारण सीता रुद्ध और लज्जा भरे स्वर में राम को सहायता के लिये पुकारती है। राम राजस्त्रियों के बीच पहुँच कर सीता को वल्कल वस्त्र बाँधना बताते हैं। वहाँ उपस्थित मातायें और सभी नारियाँ राम से तनिक खिन्न स्वर में कहती है कि हे राम सीता को इस प्रकार वन में रहने की आज्ञा नहीं दी गयी है। माताओं के इस प्रकार कहने पर भी राम ने सीता को वल्कल वस्त्र पहना दिये। यह देखकर प्रशान्त स्वभाव के गुरु वशिष्ठ के भी नेत्रों में करुणाश्रु छलक आये। वह सीता को रोककर कुपित स्वर में कैकेयी से बोले। 


“अधर्मप्रवृत्त दुर्बुद्धि कैकेयी, तू कैकेयराज के कुल का कलङ्क है। राजा से छल कर अब पुनः अपनी सीमा लाँघ रही है। सीता राम की अर्धाङ्गिनी हैं। राम के पश्चात उनका इस सिहांसन पर अधिकार है। वह अब राम को प्रस्तुत हुये सिंहासन पर बैठेंगी। देवी सीता वन नहीं जायेंगी।”


गुरु वशिष्ठ से धर्म और नीति की व्याख्या सुन और सीता का अधिकार जानकर कैकेयी का मद तनिक ठहर गया। गुरु वशिष्ठ आगे कहते हैं। “यदि देवी सीता फिर भी वन जाती हैं तो हम सब और नगरवासी भी वन चले जायेंगे। और जिस भरत से बिना मन्त्रणा किये तूने यह प्रपंच रचा है, वह भरत भी तुझे धिक्कारेगा क्योंकि अयोध्या में कोई ऐसा नहीं है जो राम से स्नेह न करता हो। देवी सीता वल्कल वसन धारण नहीं करेंगी।” सीता सब सुनकर भी संकोचवश पति के समान ही वल्कल वसन धारण किये रही। यह देख दशरथ ने कैकेयी को धिक्कारते हुये सीता पर वल्कल वसन पहनने की बाध्यता समाप्त कर अपनी अभिरुचि, गरिमा और सुख के अनुसार वस्त्र और आभूषण धारण करने की व्यवस्था और आज्ञा दी।


दशरथ ने सुमन्त्र को रथ से राम को वन तक छोड़ आने की आज्ञा दी। राम ने पिता दशरथ से माँ कौशल्या के शोकनिवारण हेतु विशेष स्नेह देने की प्रार्थना की। माँ कौशल्या ने सीता को चौदह वर्ष के लिये पर्याप्त वस्त्र और आभूषण दिये और पति के साथ वन में जीवन निर्वाह करने के सूत्र दिये। माँ सुमित्रा ने पुत्र लक्ष्मण को नीति और सेवा सम्बन्धी शिक्षा और आशीर्वाद दिया। सबको अश्रु में छोड़ और पिताजी और माताओं की परिक्रमा कर राम लक्ष्मण और सीता सहित कक्ष से बाहर निकल गये। 


राम मुखमण्डल पर अपने गुरुतर निर्णय को शान्त पर सगर्व भाव से धारण किये थे। वह क्रियान्वयन की रूपरेखा बनाते रथ पर चढ़ते हैं। सुमन्त्र रथ को हाँकते हैं, नगरवासी राम को शोकमना हो वनगमन करते देखते हैं। उनका प्रिय राजकुमार राम अपनी अयोध्या छोड़ रहा है।

12.10.21

राम का निर्णय (वचन या आज्ञा)


गुरु वशिष्ठ, पिता दशरथ और सब माताओं को वहाँ एकत्र देख राम ने हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुये कक्ष में प्रवेश किया। पीछे सीता और अन्त में लक्ष्मण भी सबकी दृष्टि में आकर खड़े हो गये। राम को इस प्रकार नत भाव से आता देख राजा दशरथ व्याकुल हो उठे। राम की ओर दौड़े पर राम तक पहुँच पाने के पहले ही मूर्च्छित होकर गिर गये। यह देख राम शीघ्रता से पिता के पास पहुँचे हैं और सहारा दिया। लक्ष्मण ने भी हाथ बढ़ाया और सीता भी निकट आ गयीं। उपस्थित सभी लोग यह दृश्य देखकर “हा राम हा राम” बोल कर चीत्कार कर उठे। करुण वातावरण और पिता की यह स्थिति देख राम की आँखों में अश्रु उमड़ आये। लक्ष्मण और सीता के साथ राम ने पिता को दोनों हाथों से उठाया और शैय्या पर लिटाया। प्रतीक्षा के कुछ क्षणों बाद जब दशरथ को चेत आया, राम ने हाथ जोड़कर पिता से कहा।


पिताजी, मुझे दण्डकारण्य जाने की आज्ञा दीजिये। अनुज लक्ष्मण को भी अनुमति दीजिये और यह स्वीकार कीजिये कि सीता भी मेरे साथ वन जायें। मैंने चेष्टा अवश्य की पर ये दोनों यहाँ नहीं रुकना चाह रहे हैं। जैसे ब्रह्माजी ने अपने पुत्र सनकादिक मुनियों को वन जाने की आज्ञा दी थी, वैसे आप हम सबको प्रस्थान करने की आज्ञा दीजिये।


दशरथ स्तब्ध थे। एक पुत्र के जाने का शोक उनसे सम्हाला नहीं जा रहा था। प्रातः से ही लज्जा के कारण उनके मुख से एक भी शब्द नहीं निकल पा रहा था। “हा राम” के अतिरिक्त सारे शब्द अश्रु बन कर बह रहे थे। शोक संतप्त राजा कक्ष में बैठे प्रातः से बस यही मना रहे थे कि कोई चमत्कार हो जाये और राम का वन जाना रुक जाये। अब आँखों के सम्मुख सीता और लक्ष्मण भी वन जाने को प्रस्तुत खड़े हैं। सीता वन में कैसे रहेगी? क्या हो गया है राम को? निराशा की इस पराकाष्ठा में राम के प्रति उनके प्रथम शब्द निकलते हैं। यद्यपि शब्द आज्ञा से थे पर उसमें स्वर प्रार्थना सा था।


हे रघुनन्दन, मैं कैकेयी को दिये गये वर के कारण मोह में पड़ गया हूँ। मुझे कारागार में डालकर तुम स्वयं ही अयोध्या के राजा बन जाओ।


राम आज्ञा की प्रतीक्षा कर रहे थे और आशा कर रहे थे कि अपना शोकयुक्त मौन छोड़ पिता दशरथ कुछ कहें। पिता अपनी आत्मग्लानि से निकलें और अपने राम के निर्णय का सम्मान करें। यद्यपि मन में राम ने यह निश्चय कर लिया था कि यदि राजा कुछ नहीं कहते हैं तो “मौनं स्वीकृति लक्षणं” का संकेत ग्रहण करते हुये वह पिता की परिक्रमा कर वन को चले जायेंगे। पिता ने साहस किया या उनका शोक घनीभूत हो शब्द पा गया, पर यह कौन सी आज्ञा है? पिता सबके सम्मुख यह क्या कह रहे हैं? पिता यह क्या आज्ञा दे रहे हैं?


वनगमन का पूर्ण आधार पिता की आज्ञा का अनुपालना थी। यह तर्क कौशल्या और लक्ष्मण से हुये संवादों में बारम्बार व्यक्त भी हुआ था। पिता यह कौन सा आग्रह कर रहे हैं, स्वयं को कारागार में डाल देने का? आत्मग्लानिजनित दैन्यता का दूसरा स्वरूप पिता दशरथ द्वारा व्यक्त था। गत रात्रि से शोक लहर में बहते हुये पिता दशरथ अभी तक सामान्य नहीं हो पाये हैं। राम बिना कुछ अधिक बोले शीघ्रातिशीघ्र वन के लिये निकल जाना चाह रहे थे। पहले माँ कौशल्या, तत्पश्चात लक्ष्मण और सीता के द्वारा विलम्ब हो चुका था, अब स्वयं पिता दशरथ यह भ्रमपूर्ण वचन बोल रहे थे।


कक्ष में सबका ध्यान राजा दशरथ की मूर्च्छा पर था, राम के आज्ञा माँगने पर था। दशरथ का यह कहना सबको अचम्भित कर गया। सबका मुख अब आश्चर्य से राम की ओर था। राम पिता की इस आज्ञा का क्या उत्तर देते हैं? राम इस प्रश्न का क्या समाधान करते हैं? पिता के जिस वचन पर राम ने अपना पूर्व निर्णय आधारित किया था, उसके विपरीत संकेतों को अब राम अपने निर्णय में कैसे समाहित करेंगे? दो विपरीत आज्ञाओं में कौन सी आज्ञा किस कारण करणीय है, कक्ष में सब जानने को उत्सुक थे। कक्ष में व्याप्त शोक के सागर में संभावना का एक अंश दिखा था, सब अपना दुख क्षणभर को भुला राम की ओर देख रहे थे। सत्य के किस स्वरूप का ग्रहण करेंगे राम? किस सिद्धान्त पर राम निष्कर्ष प्रतिपादित करेंगे? पिता के वर्तमान वचनों का मान रखेगें या दशकों पूर्व दिये वरों का मोल रहेगा? सत्य रहेगा या वचन मात्र?


राम दशरथ के कथन का मर्म समझ गये थे। कथन के पूर्व चरण में यद्यपि पिता ने उसमें कैकेयी के दिये वरों के मोह का संदर्भ दिया था किन्तु उत्तर पक्ष में पिता का राम के प्रति मोह झलक रहा था। मोह कथन के दोनों भागों में था, पूर्व में कैकेयी के प्रति, उत्तर में राम के प्रति। मोह के ये दोनों आवरण पिता की दो मनःस्थिति और तज्जनित दो आज्ञाओं के मूल कारण थे। इस भ्रम से परे राम को सत्य का वरण करना था, निर्णय लेना था।


राम ने सविनय हाथ जोड़े और पिता से कहा। पिता आप सहस्रों वर्षों तक राज्य करें, मैं अब वन में रहूँगा। चौदह वर्ष व्यतीत होने पर पुनः आपके युगल चरणों में मस्तक झुकाऊँगा। आप क्षुब्ध न हों, आप आँसू न बहायें, सरितायें मिलने पर भी समुद्र अपनी मर्यादा नहीं लाँघता। मुझे न इस राज्य की, न सुख की, न पृथ्वी की, न भोगों की, न स्वर्ग की और न जीवन की ही इच्छा है। मेरे मन में यदि कोई इच्छा है तो यही कि आप सत्यवादी रहें। आपका कोई वचन मिथ्या न हो पाये। यह बात मैं आपके सामने सत्य और शुभकर्मों की शपथ खाकर कहता हूँ। राम ने स्पष्ट शब्दों में वातावरण में व्याप्त क्षणिक अनिश्चितता को विराम दे दिया था। साथ ही विनम्रतापूर्वक पिता के वचनों का मान भी रख लिया था।


राजा दशरथ राम का मुख देखे जा रहे थे। यह विचार कि चौदह वर्ष तक वह राम का मुख नहीं देख पायेंगे, उन्हें व्याकुल किये जा रहा था। कातर भाव में दशरथ पुनः बोले। राम, मेरे साथ छल हुआ है। उस विषम परिस्थिति में भी तुमने ज्येष्ठ पुत्र का कर्तव्य निभाया है। मैं यह भी जानता हूँ कि तुम्हारा निश्चय अडिग है। मेरा एक आग्रह स्वीकार कर लो कि आज रात्रि भर विश्राम करके प्रातः वन चले जाना। मैं तुम्हें जी भर कर देख लूँ। सत्य के बन्धन में और कैकेयी के कटु वचनों की बाध्यता के बीच महाप्रतापी दशरथ की दैन्यता तुच्छ सी प्रार्थना पर आकर रुक गयी थी। राम यह तथ्य जानते थे। पिता के मन की कातरता को विश्राम देना आवश्यक था, वह दशरथ को और संकुचित होते नहीं देख सकते थे। माँ कैकेयी को राम आज ही वन जाने का वचन दे चुके थे। इस परिप्रेक्ष्य में उन्हें पिता का यह आग्रह भी वचन की अवमानना लग रहा था। अत्यन्त कोमल स्वर में राम ने कहा।


पिताजी, आपके सत्य के प्रतिपालन में मैंने तत्क्षण राज्य त्यागकर वनगमन के लिये प्रस्थान कर दिया था। शेष आज्ञायें लेने और सुहृदों को सूचित करने में यथासम्भव शीघ्रता करने में जो विलम्ब हुआ है, उसके लिये मुझे आप और माँ कैकेयी क्षमा करें। वनगमन के लिये प्रस्तुत होकर एक क्षण भी अयोध्या में रुकने का विचार करना मर्यादाओं का उल्लंघन है। मैंने आज ही वनगमन जाने का वचन दिया है, मुझे उसका पालन करने में आशीर्वाद और शक्ति दें और अपना शोक भीतर छिपा लें। मैं अपने निश्चय के विपरीत कुछ नहीं कर सकता। आपकी प्रतिज्ञा सत्य हो।


दशरथ ने राम को भींच कर हृदय से लगा लिया। राम ने सदा ही उनको सुख दिया है और अपना नाम सार्थक किया है। दशरथ के अश्रु अनवरत बहे जा रहे थे। हृदय को अद्भुत सी शान्ति दे रहा था राम का स्पर्श। कैकेयी की कुटिल अग्नि में दग्ध दशरथ का हृदय राम के आचरण से शीतल हो गया था। शोक में था पर स्वीकार कर शान्त हो गया था। दशरथ को समय की सुध न रही, इस शान्ति में वह कब अचेत हो गये, उन्हें किसी की सुध न रही।

7.10.21

राम का निर्णय (प्रस्तुत)

 

राम शान्त थे और संतुष्ट भी। सीता के आक्षेपपूर्ण शब्दों ने राम को आहत नहीं किया था वरन मन का यह विश्वास दृढ़ किया था कि वनगमन का निर्णय सीता का अपना होना चाहिये। निर्णय परिस्थितियों की दैन्यता पर आधारित नहीं वरन व्यक्तित्व की दृढ़ता पर केन्द्रित होना चाहिये। सीता की सामर्थ्य के बारे में राम को कभी कोई संशय नहीं रहा है। धरती से उत्पन्न कन्या को जब धरा से मातृत्व मिलता हो तो उसे आधारों की क्या कमी? शिवधनुष को कौतुकवश उठा लेने वाली शक्ति को भला कौन सा भय? आज के भीषण घटनाक्रम में, दैव की मदत्त उठापटक में, शोकाकुल वेदना में, कातरता के विलाप में और क्रोध भरे प्रश्नोत्तरों में यदि कोई राम को निष्प्रभ होने से रोक रहा था तो वह था प्रियतमा सीता का दृढ़ चरित्र। कृतज्ञ राम सीता के हृदयस्पंदों से बल पा रहे थे और चाह रहे थे कि वह क्षण, वह अनुभूति, वह विश्वास, वह आधार वहीं स्थिर रहे, कहीं विलग न हो। यह आलिङ्गन परस्पर आश्रयता का प्रतीक था। प्रकृति का पुरुष पर, पुरुष का प्रकृति पर।


गहरी श्वास भर कर, प्रिय सीता के कन्धों को दोनों हाथों से सम्हाले और उनके अश्रु पोंछते हुये राम बड़े ही सहज, स्नेहपूर्ण और सान्त्वना के स्वर में सीता से कहते हैं।


देवि, तुम्हें दुख देकर मैं स्वर्ग को भी नहीं लेना चाहूँगा क्योंकि तुम्हारे बिना मुझे स्वर्ग भी अच्छा नहीं लगेगा। मुझे किसी का भय नहीं है। मैं वन में तुम्हारी रक्षा करने में पूर्णतया सर्वसमर्थ हूँ। पर बिना तुम्हारा अभिप्राय जाने मैं तुम्हें वन जाने के लिये प्रेरित नहीं करना चाहता था। जब तुम मेरे साथ वन जाने को प्रस्तुत हो, मैं तुम्हें साथ चलने की अनुमति देता हूँ। तुम्हारा यह निर्णय धर्मानुकूल और कुल के गौरव को बढ़ाने वाला है। सुन्दरी, वनगमन की तैयारी करो। वनवास के अनुसार अपना धन रत्नादि ब्राह्मणों, भिक्षुओं और सेवकों को दान करने का प्रबन्ध करो। पति की अनुकूलता पर सीता प्रमुदित हो गयीं और उनकी आज्ञानुसार दानकर्म में प्रवृत्त हो गयीं।


लक्ष्मण सारा संवाद सुन रहे थे। हर शब्द, हर क्षण उनका मुख भिगो रहा था। सहसा भाई का विरह का भाव लक्ष्मण के लिये असहनीय हो गया। उन्होंने शीघ्रता से और जकड़कर राम के पैर पकड़ लिये और सीता सहित राम से कहा। आर्य, आप दोनों ने वन जाने का निश्चय कर लिया है तो मैं भी धनुष बाण लेकर आपके साथ वन चलूँगा। राम ने अयोध्या की व्यवस्थाओं और माता पिता के हित का विचार कर लक्ष्मण को मना कर दिया। अधीरता के स्वर में लक्ष्मण ने पुनः राम से कहा कि जब आप मुझे सदा साथ रहने की आज्ञा दे चुके हैं तो वन जाने से क्यों रोक रहे हैं। भरत अपने पिता और माताओं की समुचित सेवा करेंगे और यदि वह इससे विमुख होते हैं तो मैं यहाँ आकर उन्हें उनका कर्तव्य करने पर विवश कर दूँगा। मातायें भी समर्थ हैं उनको सहस्र गाँव मिले हुये हैं। उस पर से राजमहल की व्यवस्थायें भी सक्षम हैं। पर भैया आप माँ सीता के साथ वन में कैसे रहेंगे? आप जब विश्राम करेंगे तो आप दोनों की रक्षा कौन करेगा? पर्णकुटी और आवासीय व्यवस्थायें, भोजन का प्रबन्ध, यज्ञसामग्री का संग्रहण आदि कौन करेगा? 


राम एक क्षण विचार करते हैं और लक्ष्मण के प्रबल आग्रह को स्वीकार कर लेते हैं। ठीक है अनुज, अपनी माता और सुहृदों से इस बारे में अनुमति लेकर आ जाओ। साथ में सारे दिव्य आयुध, बाण, कवच, खड्ग और तरकस आदि गुरु वशिष्ठ के आवास से ले आओ। उसके बाद मेरे पास जो धन है, उसे वशिष्ठपुत्र सखा सुयज्ञ और अन्य ब्राह्मणों में दान करने में मेरा सहयोग करो। शीघ्रता करो, हमें आज ही वन के लिये प्रस्थान करना है।


सीता और लक्ष्मण राम द्वारा निर्देशित कार्यों को यथाशक्ति गति देने में लग जाते हैं। सखा सुयज्ञ और उनकी भार्या को राम और सीता अपने वस्त्राभूषण, पलंग, हाथी, गौ, रथ और धनादि देकर प्रसन्नचित्त विदा करते हैं। अगस्त्य, विश्वामित्र, मुनि त्रिजट और अन्य वैदिक परम्परा के ब्राह्मणों को उनके उपयोग की सामग्री, गौवें व अन्य धन देने का निर्देश लक्ष्मण को देते हैं। चित्ररथ सूत, अन्य परिचितों और व्यक्तिगत सेवकों को अपने उपयोग की सामग्री और चौदह वर्ष जीविका चलाने के लिये धन देकर यह सुनिश्चित करते हैं कि उनकी अनुपस्थिति में सेवकों को कोई असुविधा न हो। जिसकी भी आवश्यकता को जो स्मरण आया और सम्मुख जो भी दान करने योग्य वस्तु दिखायी दी या याद आयी, उसका समुचित निर्देश देकर राम ने वनगमन से पूर्व अपने भौतिक संग्रहण को न्यूनतम कर लिया, साथ ही सीता और लक्ष्मण को इसकी प्रेरणा भी दी। आयुधों का विधिपूर्वक पूजन व ससम्मान धारण कर तथा ऐश्वर्य के समस्त साधनों का दान कर राम भार्या सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ पिता को सूचित करने माँ कैकेयी के महल की ओर पैदल चले।


तब तक राम के वनगमन की सूचना सारे नगर में प्रसारित हो चुकी थी। राम को नगर की वीथियों में चलता देख नगरवासियों का हृदय विदीर्ण हो उठा। जिसने भी सुना, सब दौड़े आये। जो राज्याभिषेक देखने के लिये पहले से उपस्थित थे, वे आश्चर्यवत विलाप कर रहे थे। नगरपथ पर अपार जनसमूह और अट्टालिकाओं पर कुलवधुओं को अश्रु में आर्द्र देखकर राम का मन विकल हो उठा। जिसको सदा ही सौन्दर्य और ऐश्वर्य के रूप में रथारूढ़ नगरवासियों ने देखा था उस सीता को पैदल ही अनुगामी बना देख नगरवासियों के दुख का बन्ध टूट गया। यह करुण दृश्य देखकर सबका मन व्याकुल और अस्तित्व शोकाकुल हो गया। जनसमूह में उठे स्वर सप्रयास न सुनते हुये और भूमि पर दृष्टि टिकाये अपना पथ देखते हुये राम अधिक गति से नहीं बढ़ पा रहे थे। आदरवश नगरवासी चलने का पथ दे रहे थे पर हाथ जोड़कर और सम्मुख लेटकर रुक जाने की प्रार्थना भी कर रहे थे। दिनभर का पूर्वप्रारुप बनाये राम को इस दृश्य की किञ्चित भी कल्पना नहीं थी।


जिस पिता के सत्य का मान रखने के लिये राम वन जा रहे हैं, वह पिता निश्चय ही पिशाच से ग्रसित हो अनुचित कार्य कर रहा है। पिता तो अपने गुणहीन पुत्र को भी घर से निकालने का साहस नहीं कर सकता। जिस पिता का राम जैसा गुणवान पुत्र वन जाये उस राजा द्वारा पालित अयोध्या रहने योग्य नहीं है। चलो हम सब भी राम के साथ ही वन जायेंगे। जहाँ राम जायेंगे वही नगर हो जायेगा और जिस अयोध्या को राम छोड़ेंगे, वह दुर्भाग्य से ग्रसित हो वन हो जायेगी। माँ कैकेयी की आलोचना, पिता दशरथ की कामप्रियता, इन आक्षेपों से अवलेहित नगरवासियों का संवाद राम को अशान्त कर रहा था। फिर भी बिना कोई विकार व्यक्त किये राम माँ कैकेयी के महल में प्रवेश करते हैं।


जनकोलाहल से राम के आने की आहट पाकर सुमन्त्र राम की प्रतीक्षा में अन्तःपुर के बाहर ही खड़े थे। सुमन्त्र के जीवन में भी यह क्षण अपार शोक लेकर आया। आज प्रातः से पूरे राजपरिवार को बिखरते देख रहे थे सुमन्त्र। उस पर राम को पैदल आता देखना, धैर्य की सारी सीमायें पार कर गया। शान्तस्वर में राम ने कहा “आप पिताजी को मेरे आगमन की सूचना दे दीजिये।” 


सुमन्त्र भारी हृदय से दशरथ के समक्ष जाते हैं और शोकनिमग्न राजा को राम के आगमन का समाचार सुनाते हैं। “हे पृथ्वीनाथ, आपके पुत्र राम अपना सारा धन ब्राह्मणों व आश्रित सेवकों में दान कर और समस्त सुहृदों से मिलकर वनगमन के पूर्व आपके दर्शन के लिये द्वार पर खड़े हैं।” दशरथ को लगा कि वह उस क्षण को सह पाने की क्षमता में नहीं हैं। राम वनगमन का निश्चय कर सम्बन्धित शेष प्रबन्ध व्यवस्थित कर चुके हैं। संभवतः यह उनकी विदाई का अवसर होगा। एक क्षण सोचकर उन्होंने सुमन्त्र को राम के पहले शेष रानियों को भी बुला लाने का निर्देश दिया।


कक्ष भरा था, मध्य में राजा, एक ओर माँ कैकेयी, दूसरी ओर माँ कौशल्या और माँ सुमित्रा, उनके पीछे राजपरिवार से सम्बन्धित समाज और कुलस्त्रियाँ। कुलगुरु वशिष्ठ और सुमन्त्र राजा से कुछ दूर खड़े थे। आर्त भाव से संघनित कक्ष में राम सीता और लक्ष्मण के साथ प्रवेश करते हैं।

5.10.21

राम का निर्णय (संबल)


यद्यपि सीता वन में निवास को सहज बता रही थी, राम का मन उसे स्वीकार नहीं कर पा रहा था। राम को लग रहा था कि देवी सीता को या तो उन कठिनाइयों का आभास नहीं है या उनका वनसम्बन्धी ज्ञान मात्र मौखिक ही है। फिर भी सीता हर प्रकार से राम को आश्वस्त करने का प्रयास कर रही थी।


मैं जैसे अपने पिता के घर निवास करती थी, वैसे ही वन में निवास कर लूँगी। पतिव्रतधर्म का पालन और आपकी सेवा का अवसर वन में रहने के पर्याप्त कारण हैं, मेरे लिये। हे वीर, आप सबकी रक्षा करने वाले हैं, तब मेरी रक्षा करना आपके लिये कौन सी बड़ी बात है? मुझे वन जाने से कोई रोक नहीं सकता है। मैं आपको कोई कष्ट नहीं दूँगी और आपकी जीवनचर्या में रम जाऊँगी। मैं स्वयं ही सुन्दर वनों, सरोवरों, पर्वतों और पक्षियों को आपके साथ देखना चाहती हूँ। इस प्रकार सहस्रों वर्षों तक आपके साथ रहना मुझे स्वर्गादि से अधिक प्रिय है, पर आपसे वियोग में मेरी मृत्यु निश्चित है।


सीता के वचनों में दृढ़ता थी, नयनों में अश्रु और स्वर में साथ ले चलने की याचना। राम सीता की दृढ़ता को कम नहीं आँकना चाहते थे पर मात्र सौन्दर्य पक्ष के विवरण से वनों की भीषणता कम नहीं हो जाती है। राम को आवश्यक लगा कि वनों के कष्टों का सही चित्रण सीता के समक्ष कहा जाये।


सीते, आप अत्यन्त उत्तम कुल में उत्पन्न हुयी हो। मेरे मन को संतोष होगा यदि आप यहीं रह कर धर्म का पालन करोगी। यह आपके हित में है और आपका कर्तव्य भी है। वन दुर्गम हैं और हर प्रकार के कष्टों से भरे भी हैं, वे सदा सुख नहीं देते। सिंहों की गर्जना, गजों का मदत्त हो विचरना, हिंसक पशुओं द्वारा अकारण आक्रमण कर देना, नदियों में ग्राहों का निवास और पार करने में कठिनाई, काँटो से भरे बीहड़ मार्ग, पत्तों के बिछौनों पर शयन, जल की कमी, आँधी पानी में आश्रयहीनता, फलाहार पर ही संतोष, विषाक्त कीट पतंग और न जाने कितनी अघोषित अनिश्चिततायें। हे सीते, वन में दुख ही दुख है।


राम के वचनों से सीता के आँखों में अश्रु डबडबा आये और मन दुखी हो चला। सीता को यह तथ्य भी ज्ञात थे पर आज इन तथ्यों को इतना महत्व देना अनावश्यक था। दुखी पर निश्चयात्मक स्वर में सीता धीरे धीरे बोलती हैं।


हे वीर राम, आपने जो वन के बारे में दोष बताये हैं वे सब आपका स्नेह पाकर मेरे लिये गुणरूप हो जायेंगे। आपसे तो सभी डरते हैं तो ये सब पशु आपको देखकर ही भाग जायेंगे। वन्यजीव तो क्या, आपके सानिध्य में तो स्वयं इन्द्र भी मेरा तिरस्कार नहीं कर सकते। किन्तु आपके वियोग में मेरे प्राण जाना निश्चित हैं क्योंकि आपने ही बताया है कि पतिव्रता स्त्री पति के वियोग में जीवित नहीं रह सकती। वन जाने के लिये मैं स्वयं को बाल्यकाल से ही तैयार कर रही हूँ क्योंकि कई मूर्धन्य ऋषियों से मैंने यह सत्य सुना है। पिता के साथ हुयी चर्चा में उन्होंने उद्घाटित किया था कि मेरे भाग्य में वन जाने का योग है। इसी कारण आज से पहले मैंने आपसे कई बार वनविहार के लिये प्रार्थना भी की थी जो आपने स्वीकार भी की थी, तो आज यह बाध्यता क्यों?


प्रार्थना, तर्क, अश्रु, धर्म, ओज आदि आग्रहों से राम को अप्रभावित देखकर सीता और भी दुखी हो चलीं। राम उनको बार बार समझा रहे थे पर सीता का मन बिछोह के भाव से व्याकुल हो चला था। उससे भी अधिक उनको राम की चिन्ता थी। वन के एकान्त में और क्षात्रकर्म से वंचित राम नैराश्य के किस समुन्दर समा जायेंगे। राम मूलतः सात्विक प्रकृति के थे। एकान्त, ऋषियों का संग, आगत की अनिश्चितता, भोजन का व्यतिक्रम, आवासीय व्यवस्थाओं का श्रम, राम का मन हर प्रकार उलझ जायेगा। इस स्थिति में चौदह वर्ष रहने के बाद राम क्या से क्या हो जायेंगे? राम को निश्चय ही व्यवस्थाओं का आधारतन्त्र आवश्यक होगा। पत्नी से अधिक व्यवस्थित आधार भला पति को कौन दे सकता है। प्रिय राम की संभावित स्थिति की कल्पना कर सीता का विरही मन और भी व्याकुल हो चला। मेरे राम को वन में कौन सम्हालेगा? जो कठिनाई मुझे लक्ष्य कर बतलायी जा रही हैं, वे सब राम पर भी तो प्रयुक्त होती हैं। माना मेरे राम उनका निर्वहन कर सकेंगे पर अन्ततः उसी में उलझ कर रह जायेंगे।


राम मेरे जिस योगक्षेम के लिये वन नहीं ले जाना चाह रहे हैं, उनके योगक्षेम का ध्यान वन में कौन रखेगा? न वानप्रस्थ सा जीवन बिताने में सक्षम हैं प्रिय राम और न ही ऋषियों सा। तब राम को वन में किसका साथ मिलेगा? एक युवा हाथ में धनुषबाण लिये वन वन भटकेगा, यह दृश्य तो विचित्र सा ही होगा? सीता की व्याकुलता द्विगुणित हो जाती है। अपनी तनिक भी चिन्ता न करते हुये और सबकी सुविधा के हित तर्क प्रस्तुत करते हुये राम जो सहनशीलता का उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं, वह अब सीता को अनुचित लगने लगा। राम का संबल सीता है, राम का संबल लक्ष्मण हैं। क्या लक्ष्मण भी साथ नहीं जा रहे हैं, सीता को सहसा याद आया। जिस निराशा और शोक में लक्ष्मण खड़े हैं, लगता है कि इस सम्बन्ध में बात अभी तक हुयी नहीं है।


सीता पर्याप्त प्रार्थना कर चुकी थी, राम मान नहीं रहे थे। राम व्यहारिकता के परिप्रेक्ष्य में अपना हित नहीं सोच रहे थे केवल धर्म पर अपना कर्म निश्चित कर रहे थे। वनगमन की अकारण शीघ्रता में अपनी निर्णय प्रक्रिया को सरलतम करने के प्रयास में राम के निर्णय दोषपूर्ण थे। सीता यह नहीं होने देगी। वह राम की अर्धांगिनी है, उनका भी राम पर समानता का अधिकार है। सीता ने निश्चय किया कि उन्हें भी अपना मन कठोर करना होगा और जिस सत्य को राम सुनना नहीं चाहते हैं, उसे भी व्यक्त करना होगा। सीता पर इस समय तर्क नहीं करना चाहती थी वरन पत्नी के रूप में अपने अधिकार को सरोष व्यक्त करना चाहती थी। सीता व्यंगपूर्ण पर कठोर स्वर में बोलीं। सीता राम पर वनगमन की व्याकुलता में अपना धर्म न निभाने का आक्षेप लगाने जा रही थी।


हे नाथ, पता नहीं विवाह करते समय मेरे पिता को यह ज्ञात था कि नहीं कि जिस पुरुषविग्रह से वह मेरा विवाह कर रहे हैं, वह हृदय से स्त्री है। सीता का यह वाक्य पूरे कक्ष को स्तब्ध कर गया। जो साहस, जो स्पष्टवादिता न कैकेयी में थी और न ही कौशल्या में, वह सीता के मुख से सुनकर लक्ष्मण अचम्भित थे। उनका क्रोध सबको निगलने में सक्षम था पर जहाँ बात राम पर आती थी वहाँ वह निःशब्द हो जाते थे। यह वाक्य मात्र पत्नी के अधिकारक्षेत्र से ही निकल सकता था। राम अब तक सीता को हितपूर्वक अधिकारमना हो उपदेश दे रहे थे। इस वाक्य ने वह बन्धन सहसा तोड़ दिये। राम को केवल इस वाक्य से ही सीता का निश्चय समझ आ गया था। राम भी मन में एक निश्चय कर चुके थे पर वह सीता को सुनना चाहते थे। राम सीता को अपने पति पर पूर्ण अधिकार व्यक्त करने का समय देना चाहते थे। वह चाहते थे कि यदि सीता चलें तो वह उनका अपना निर्णय हो, न कि पति द्वारा आदेशित या आरोपित निर्णय। सीता के आक्षेप ने राम की किंकर्तव्यविमूढ़ता की मनःस्थिति सहसा भंग कर दी थी।


आपके इस तरह छोड़कर जाने में सब यही कहेंगे कि सूर्यवंशी राम में पराक्रम का अभाव है। यह सुनना मेरे लिये अपार दुःख का कारण होगा। ऐसा क्या विषाद या भय है आपको कि केवल आप पर ही आश्रय रखने वाली सीता का परित्याग करना चाहते हैं। जिस प्रकार सावित्री सत्यवान की अनुगामिनी थी मैं भी आपके पीछे वैसे ही चलूँगी। मैं आप पर निर्भर हूँ और आप द्वारा अर्जित आहार पर ही जीवन निर्वाह करूँगी। जिस भरत के कारण आपको वन जाना पड़ रहा है, उसकी राजाज्ञों के पालन का कर्तव्य आप निभाइये, मुझे विवश मत कीजिये। आप तपस्या कीजिये, वन में रहिये या स्वर्ग में, सभी जगह मैं आपके साथ रहना चाहती हूँ। आपके साथ वन की कठिन जीवनशैली मुझे स्वीकार है पर आपके बिना मुझे स्वर्ग भी स्वीकार नहीं हैं। आपका विरह मैं दो घड़ी के लिये सहन नहीं कर सकती, चौदह वर्ष को सहन करने का प्रश्न ही नहीं है। यदि आप फिर भी नहीं माने तो मैं विष पीकर प्राण त्याग दूँगी।


सीता का शोक मुखर हो बह रहा था, अश्रु अब तक बँधे थे। जब सीता के शब्द रुके, अश्रुओं ने संवाद प्रारम्भ कर दिया। अपनी पूरी शक्ति से पति से लिपटकर, करुणाजनित विलाप करती हुयी सीता शिथिल हो गयी थी। अपने आश्रय पर आधार ले स्वयं को व्यक्त कर चुकी सीता ने निर्णय पति पर छोड़ दिया था। राम के कंधे पर गिर रहे सीता अश्रुओं ने पूरे वातावरण को आर्द्र कर दिया था। अश्रु संवाद की अधिकारपूर्ण पराकाष्ठा हैं। जिस पर गिरते हैं, उसको ही द्रवित कर जाते हैं। राम का हृदय जिस अकस्मात शोक ने वज्रवत कर दिया था, सीता के अश्रुओं ने उसे पुनर्जीवित हो संवेदनापूर्ण कर दिया था।


राम सीता को दोनों हाथों से सम्हालते हैं और हृदय से लगा लेते हैं। राम अपना निर्णय परिवर्धित कर चुके थे।

30.9.21

राम का निर्णय (सीता)


लक्ष्मण आगे कुछ नहीं कहते हैं, तर्क का उद्देश्य निर्णय के सभी विकल्पों के पक्षों को सामने लाना था। सब जानकर और सब सुनकर राम ने अपना निर्णय नहीं बदला था। लक्ष्मण निर्णय का मान करते हैं। लक्ष्मण का क्रोध तो शान्त हो गया था पर शोक स्वाभाविक था। मन क्षुब्ध था पर राम का निर्णय अब उनका भी था।


राम माँ कौशल्या के पास जाकर उन्हें पुनः सान्त्वना देते हैं और वन जाने की अनुमति माँगते हैं। अपने राम के लिये माँ अपने शोक से सयत्न बाहर आती है और भारी मन से वनगमन की अनुमति देती है। जो सामग्री अभिषेक के लिये रखी थी, उसी को उपयोग में लाकर विधिपूर्वक स्वस्तिवाचन कर्म करती है।


माँ का स्वर तनिक रुद्ध है पर मन्त्रों का गाम्भीर्य वातावरण को स्थिर करने लगता है। अन्तरिक्ष, पृथिवी, जल, औषधि, वनस्पति, दिशा, काल, देव, ब्रह्मा, सबको आह्वान करता शान्ति पाठ कौशल्या के मन को निश्चिन्त नहीं कर पा रहा था। पुत्र के कल्याण की जो कामना वनगमन से रोक रही थी अब वही कामना सभी देवों से प्रार्थना कर रही थी कि राम जहाँ जायें, सब देव उनकी रक्षा करें। वन से, वृक्ष से, वन्य जीवों से, नदियों से, सबसे अपने राम की रक्षा के मन्त्र उच्चार रही थी माता। सबसे आह्वान कर चुकने के बाद माता पुत्र को निहारने लगती है। आँसू झर झर बह रहे हैं। स्वस्तिकर्म का समापन पुत्र की परिक्रमा कर समाप्त करती है माँ। पुत्र के चारों ओर अपनी शक्ति का घेरा स्थापित करती है माँ। अन्ततः हृदय से लगा लेती है अपने राम को। एक क्षण रुकते हैं राम, माँ की आज्ञा पाने की अनुकूलता है और माँ की पीड़ा का शोक भी, दोनों का अनुभव होता है राम को। राम झुककर प्रणाम करते हैं, बार बार माँ के चरणों का स्पर्श करते हैं और लक्ष्मण के साथ महल के बाहर निकल जाते हैं।


मार्ग के प्रतीक्षा कर रहे जनसमुदाय की मनःस्थिति भ्रमित थी। राम वन जा रहे हैं, यह कुछ को ज्ञात था, कईयों को यह तथ्य ज्ञान नहीं था, कुछ को ज्ञात हो रहा था, यह दुखद समाचार नगरवासियों में फैल रहा था। राम के मुख की शान्ति यथावत थी, वह चाह कर भी प्रसन्नमना हो अभिवादन स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। एक तो वनगमन की शीघ्रता, पिता दशरथ और माँ कौशल्या के शोकसंतप्त चेहरे की छवि, लक्ष्मण का क्रोध और सीता की संभावित स्थिति और अनिश्चितता, इन सबके तात्कालिक प्रभाव से राम अपनी सर्वप्रियता के अभिवादन का यथायोग्य उत्तर नहीं दे पा रहे थे। साथ ही माँ कैकेयी के महल से निकलते ही उन्होंने युवराज पद मानसिक रूप से त्याग दिया था अतः जनसमुदाय के उस रूप में किये गये उल्लास पर सप्रयास ध्यान नहीं दे रहे थे। यथासंभव स्वयं को संयतकर प्रजा के बीच से निकलते हुये राम सीता के महल पहुँचते हैं।


सीता को राम के वनगमन प्रकरण का समाचार ज्ञात नहीं था। वह सकल सामयिक कर्तव्यों का पालनकर, सारे देवताओं की अर्चना कर प्रसन्नचित्त मन से अपने प्रिय राम की प्रतीक्षा कर रही थीं। अन्तःपुर में पहले से उपस्थित जनसमुदाय की दृष्टि से स्वयं को छिपाते हुये राम महल में प्रवेश करते हैं, उस समय लज्जा से उनका मुख झुका हुआ था। राम की यह छवि सीता के हृदय में कम्प उत्पन्न कर देती है। वह सहसा खड़ी हो जाती हैं और चिन्ता से इस प्रकार व्याकुल अपने पति को निहारने लगती हैं।


राम सीता के सम्मुख पहुँचने पर अपना मानसिक वेग रोक नहीं पाते हैं और उनका शोक सकल अंगों से प्रकट हो जाता है। सीता पति की दशा समझ जाती है। राम के मुखमण्डल पर सतत दमकती कान्ति को अनुपस्थित पा सीता अनर्थ की आशंका से अश्रु-प्लावित हो जाती है। शुभ लक्षणों की अनुपस्थिति को इंगित करते हुये अपने प्रिय राम से इसका कारण पूछती है। मन के भावों और वेगों को बिना छिपाये राम व्यग्र हो सीता को बताते हैं। सीते, आज पिताजी मुझे वन भेज रहे हैं। राम सीता को प्रातः से घट रहे प्रकरण की पृष्ठभूमि बताते हैं। पिता की प्रतिज्ञा के पालन हेतु वनगमन के औचित्य पर चर्चा न करते हुये सीता को इस कालखण्ड हेतु आवश्यक मंत्रणा देना प्रारम्भ करते हैं।


जहाँ राम सारे कथन यह मानकर कर रहे थे कि वह स्वयं ही वन जा रहे हैं, वहीं सीता शोक और आश्चर्य से राम को देखे जा रही थी। किस विषय की शीघ्रता है कि बिना कुछ बात किये इस कालखण्ड में सीता के क्या कर्तव्य उचित होंगे, क्या नहीं, राम कहे ही जा रहे हैं। सीते धैर्य धारण करना, सीते भरत को राजा का मान देना, भरत के समक्ष मेरी प्रशंसा मत करना, माँ कौशल्या और पिताजी की सेवा करना, किसी को कोई मानसिक कष्ट मत देना, धर्म का आचरण करना।


सीता हतप्रभ थी और पति की व्याकुलता पर आर्द्र भी। पति की दशा पर मन में शोक था और उनके स्वयं ही सब निर्णय लिये जाने पर क्रोध भी। पति ने वनगमन का निर्णय पिता की प्रतिज्ञा के पालन हेतु ले लिया। वह उनका अधिकार क्षेत्र था और परिस्थितियाँ देखते हुये इतना समय भी नहीं था कि निर्णय प्रक्रिया में पत्नी को सम्मिलित किया जाता। पर राम अब स्वयं ही जाने का प्रलाप किये जा रहे हैं, यह अधिकार उन्हें किसने दिया? माना, पति के रूप में पत्नी का योगक्षेम उनके हाथों में है और उस संदर्भ में उपदेश उचित भी हैं। पर अकेले ही वन जाने का निर्णय सीता को स्वीकार नहीं है। सीता राम के प्रवाह को रोकती नहीं है अपितु उस समय को अपने संवाद व्यवस्थित करने में लगाती है। राम अपनी बात समाप्त करते हैं तब सीता तात्कालिक शोक भुला कर स्पष्ट कुपित स्वरों में राम से कहती है। 


हे नरश्रेष्ठ, आप मुझे अत्यन्त लघु या ओछा समझ कर किस प्रकार बात कर रहे हैं? आपकी यह बातें सुनकर मुझे हँसी आ रही है। आप जो कह रहे हैं, वह धर्म के जानने वालों के योग्य नहीं है और न ही आप जैसे राजकुमार के योग्य है। आर्यपुत्र, सभी सम्बन्धी, माता, पिता, भाई, पुत्र आदि जीवन में अपने अपने भाग्य के अनुसार जीवन निर्वाह करते हैं। केवल पत्नी ही अपने पति के भाग्य का अनुसरण करती है। केवल इसी कारणमात्र से मुझे आपके साथ वन जाने की अनुमति प्राप्त हो जाती है। यदि आप वन में प्रस्थान करने का निर्णय कर चुके हैं तो मैं कुश और काँटों को कुचलती आपके आगे आगे चलूँगी। यदि आपको मेरे इस निर्णय से ईर्ष्या हो कि कैसे एक स्त्री वन जाने का साहस कर रही है या आपको रोष हो कि कैसे मेरी पत्नी मेरी आज्ञा का पालन नहीं कर रही है तो इन दोनों ही भावों को अपने मन से दूर कर दीजिये और जिस प्रकार पीने से बचा शेष जल भी यात्रा में साथ रखा जाता है, मुझे भी अपने साथ ले चलिये। मैंने कोई भी ऐसा पाप या अपराध नहीं किया है कि आप मुझे यहाँ त्याग दें।


मेरे लिये जीवन की सभी सुख सुविधायें तभी तक कुछ मूल्य रखती है जब आप उनमें सम्मिलित हों। किस सम्बन्धी से मुझे किस प्रकार का व्यवहार करना है, इस विषय ने मेरे माता पिता ने मुझे हर प्रकार से शिक्षा दी है, इस विषय में इस समय मुझे आपके उपदेश की आवश्यकता नहीं है। मैं आपके साथ वन अवश्य चलूँगी।


राम का शोक सहसा वाष्पित हो चला था। मन के द्रवित भाव पत्नी सीता के स्पष्ट और सपाट कथन सुनकर स्थिर हो गये थे। माँ कैकेयी के कुटिल वचन, दशरथ का मौन, माँ कौशल्या की दैन्यता और लक्ष्मण का क्रोध, उन सबके भावों से दग्ध होने के बाद सीता के ये वचन उद्विग्नता को सहसा विश्राम दे देते हैं। पत्नी की प्रेमपूरित रूप की परिकल्पना की परिधि में यह गुणश्रेष्ठता संभवतः छिपी रह जाती। सीता ने एक बार भी किसी पर प्रश्न नहीं उठाया, एक बार भी रुकने के लिये नहीं कहा और एक बार भी इस बारे में आशंका व्यक्त नहीं की। साथ ही जब सीता को अपने न जाने की बात पता लगी तो जिस तीक्ष्णता और तीव्रता से उसका विरोध किया, वह देखकर राम के मन में सीता के लिये गर्व की अनुभूति हो आयी।


गर्वानुभूति के वह क्षण वनजीवन की कठिनाइयों से पुनः विचलित हो उठे। सीता अपना मन्तव्य स्पष्ट कर चुकी थी।

28.9.21

राम का निर्णय (पुरुषार्थ)


लक्ष्मण भावों के द्वन्द्व में थे। राज्याभिषेक में विघ्न उपस्थित होने से उन्हें दुःख था पर भैया राम की धर्म के प्रति दृढ़ता देख कर उन्हें आत्मिक प्रसन्नता भी थी। राम के स्नेह और आश्वासनपूरित संस्पर्श से उनका मन शान्त हुआ था पर इस प्रकरण में दैव की सर्वकारणता की व्याख्या से उन्हें क्रोध भी आ रहा था।


दैव से लक्ष्मण को सदा ही विशेष आपत्ति रही है। दैव को स्वीकार करने और उसे ही ओढ़कर बैठे रहने वाले मनुष्य उन्हें आलसी और अकर्मठ लगते थे। जहाँ एक ओर भैया राम ने पिताकी अन्यायपूर्णता को दैव के आवरण में लपेट दिया था, वहीं दूसरी ओर अपने निर्णय को धर्म के निरूपण में व्याख्यायित किया था। दोनों के मापदण्ड समान क्यों नहीं?


उस समय राम के लिये लक्ष्मण के मनःस्थिति को यथारूप समझना कठिन नहीं था। मध्य भाल तक चढ़ी हुयी भौहें, लम्बी साँसें भरना, हाथी की सूँड की भाँति दायें हाथ को हिलाना, ग्रीवा को सब ओर डुलाना और भैया के प्रति तिर्यक नेत्र कर देखना। राम जानते थे कि दैव का जो जो शब्द उन्होंने बोला है, यह सब उसी की प्रतिक्रिया है, उसी के अनियन्त्रित स्फुरण हैं। अपनी सामर्थ्य पर अत्यधिक विश्वास करने वाले दैव को नहीं मानते हैं और न ही किञ्चित मान देते हैं। राम जानते थे कि लक्ष्मण दैववाद का प्रबलता से खण्डन करेंगे। आशानुरूप तनिक रोषपूर्ण स्वर में लक्ष्मण बोलना प्रारम्भ करते हैं।


भैया आपको लगता है कि यदि आप पिता की आज्ञा का उल्लंघन कर वन नहीं जायेंगे तो धर्म के विरोध का प्रसङ्ग होगा। इस प्रसङ्ग से संभवतः प्रजा के मन में यह धारणा बैठ जाये कि जो धर्मानुरूप पिता की आज्ञा का पालन नहीं करता है वह राजा बनने पर धर्मानुसार राज्य का पालन कैसे करेगा? आपको यह भी लगता है कि यदि आप पिता की आज्ञा का उल्लंघन करेंगे तो अन्य भी आपका अनुकरण कर ऐसा ही करना प्रारम्भ कर देंगे और कालान्तर में धर्म की यह अवहेलना व्यवस्था के विनाश का कारण बनेगी। इसी कारण आपके मन में वन जाने के प्रति एक शीघ्रता और उतावलापन दिख रहा है। ये दोनों शंकायें सर्वथा अनुचित और भ्रममूूलक है। इसका तात्कालिक साक्ष्य और प्रमाण आपके दैव वाले कथन से पुष्ट हो रहा है। आप जैसा क्षत्रियवीरशिरोमणि यदि दैव जैसी असमर्थ और तुच्छ वस्तु को प्रबल बताने लगे तो वह भ्रम की पराकाष्ठा ही कही जायेगी।


भैया, यह तथ्य मेरी समझ से परे है कि असमर्थ पुरुषों द्वारा अपनाये जाने योग्य और पौरुष के समक्ष निष्प्रभ खड़े “दैव” की आप साधारण मनुष्य के समान स्तुति और प्रशंसा क्यों कर रहे हैं? भैया, मुझे समझ नहीं आता कि आपको उन दोनों पापियों पर संदेह क्यों नहीं होता है? संसार में कितने ही ऐसे पापासक्त मनुष्य हैं जो दूसरों को ठगने के लिये धर्म का सहारा लेते हैं। क्या यह व्यवहारिक तथ्य आप से छिपा है? वे दोनों शठ धर्म के आवरण में ही आप जैसे सच्चरित्र पुरुष का परित्याग करना चाहते हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो भरत के राज्याभिषेक का निर्णय बहुत पहले ही दोनों ने ले लिया होता। षड्यन्त्रवश यह निर्णय आपको राजपाट से दूर रखने के लिये उन दोनों ने सामूहिक रूप से लिया है।


भैया, आप मुझे क्षमा करें पर अग्रज के रहते अनुज का राज्याभिषेक घोर लोकविरुद्ध कार्य है और मुझे सहन नहीं है। साथ ही पिता के जिस वचन के कारण आप मोह और दुविधा में पड़े हैं, उस धर्म का मैं पक्षपाती नहीं हूँ और उसका घोर विरोध करता हूँ। आप कैकेयी के वश में रहने वाले पिता के अधर्मपूर्ण और निन्दित वचन का पालन कैसे करेंगे? ऐसे कपट और पाखण्डपूर्ण धर्म के प्रति आपकी जो प्रवृत्ति और आसक्ति है, वह मेरे और प्रजा की दृष्टि में हेय है, त्याज्य है। आप कैसे कामानुरक्त और पुत्र का अहित करने वाले के वचनों को महत्व दे सकते हैं? 


यदि आप माता पिता के इस विचार को दैव की प्रेरणा का फल मानते हैं तो आपको उसकी उपेक्षा कर देनी चाहिये। कायर ही दैव की उपासना करता है। सारा विश्व जिनके पराक्रम से प्रेरित होता है और इस कारण समुचित आदर देता है, वे दैव को तनिक भी महत्व नहीं देते हैं। दैव को जीतने में समर्थ पुरुष कार्य में बाधा आने पर शिथिल नहीं बैठ जाता है। 


आज सब देखेंगे कि दैव और पुरुषार्थ में कौन बलवान है। जिन्होंने दैव से आपके राज्याभिषेक को नष्ट होते देखा है, वे आज मेरे पुरुषार्थ द्वारा उसी दैव का विनाश देखेंगे। वीर अपना दैव स्वयं ही लिखते हैं। मदत्त गजराज की तरह सब पर अपना आतंक स्थापित करने वाले दैव को मैं वापस जाने पर विवश कर दूँगा और जो भी मेरे मार्ग में आयेगा उसे मेरा असह्य ताप सहना होगा।


भैया, आपको वन तो जाना है, पर अभी नहीं। सहस्रों वर्षों के शासन के बाद और वृद्ध होने पर। वन तो पिता को जाना था। वन जाने की बात तो दूर, वह तो वानप्रस्थ में भी एकाग्र नहीं हैं। मेरी दो भुजायें केवल शोभा के लिये या चन्दन का लेप लगाने के लिये नहीं हैं। आपके अभिषेक की जो सामग्री आयी है, आप उससे अपना राज्याभिषेक होने दीजिये, शेष को सम्हालने का दायित्व आप मुझ पर छोड़ दीजिये।


लक्ष्मण का क्रोध शब्दों में अनवरत बह रहा था। राम के हित सबका संहार कर देने का भाव प्रचण्ड हो बह रहा था। सामने किसी अन्य के ठहर पाने की स्थिति नहीं थी। माँ कौशल्या हतप्रभ हो लक्ष्मण को देखे जा रही थी। राम धीरे से पुनः एक हाथ लक्ष्मण के कन्धे पर रखते हैं। लक्ष्मण का क्रोध पिघलने लगता है, शब्दाग्नि के साथ ऊष्ण अश्रु झरने लगते हैं। राम लक्ष्मण की खींचकर वक्ष से लगा लेते हैं। राम क्या उत्तर देंगे? सारा संवाद तो लक्ष्मण के अश्रु ही कहे जा रहे थे। राम जानते थे कि लक्ष्मण का क्रोध इस प्रकार बह जाना आवश्यक है।


राम का संस्पर्श पा लक्ष्मण स्थिर हो जाते हैं। शब्द रुक जाते हैं। बायीं बाँह से लक्ष्मण को भींच कर राम अपने दायें हाथ से लक्ष्मण के अश्रु पोंछते हैं। तर्क के काल का पूर्णतः अवसान हो चला था। अब निर्णय को स्वीकार करने का समय था। राम अत्यन्त शान्त स्वर में कहते हैं।


हे सौम्य, हे प्रिय, मुझे तुम माता-पिता के आज्ञा पालन में दृढ़तापूर्वक स्थित समझो। यही सत्पुरुषों का मार्ग है। राम के इसी निर्णय वाक्य में लक्ष्मण के सारे संवाद विश्राम पा जाते हैं।

23.9.21

राम का निर्णय(दैवयोग)


धर्मकेन्द्रित निर्णय प्रक्रिया राम के व्यक्तित्व का सशक्त हस्ताक्षर रही है। इस तथ्य को माँ कौशल्या भी जानती थी और लक्ष्मण भी। राम को धर्म की सीमित व्याख्या में उलझाना असम्भव था। राम तो धर्म के उदात्त परिप्रेक्ष्य और मौलिक सिद्धान्तों से अपने निर्णयों को बल प्रदान करते थे।


जैसे ही राम ने अपना अभिप्राय स्पष्ट किया, लक्ष्मण को यह समझ आ गया कि राम क्षात्रधर्म की सीमित व्याख्या को स्वीकार नहीं करेंगे। राज्य हस्तगत कर सुदृढ़ धर्म के द्वारा अपने कर्तव्यों का निर्वहन राम के विकल्पों में नहीं था। राम धर्म की “धारण करने वाली” परिभाषा पर अपना निर्णय आधारित कर रहे थे। किसी भी विषय में नियम, उपनियम, कर्तव्य, परम्परा आदि मूल सिद्धान्त से बड़े नहीं हो सकते। जहाँ दो कर्तव्यों में संशय हो, विकल्प हो वहाँ मूल सिद्धान्त का अनुप्रयोग ही निष्कर्ष देता है।


राम ने सत्य को धर्म के मूल सिद्धान्त के रूप में चुना था। सहजीवन का आधार ही सत्य है। बिना सत्य के वह आधार ही नहीं बनता है जिस पर जन एक दूसरे पर विश्वास कर सकें। तब नियमों, राजाज्ञाओं, आश्वासनों, घोषणाओं आदि का क्या मोल, जब उनके पालन का दृढ़ विश्वास ही न हो। जब व्यक्ति के वचनों का ही मोल न हो तब उस व्यक्ति का क्या मोल? अवसरवादिता यदि सर चढ़कर बोलेगी तो कौन निर्बल की रक्षा करेगा, कौन दुखी को आश्रय देगा, कौन समाज की उथल पुथल को स्थायित्व देगा?


लक्ष्मण अग्रज के भावों को जानते थे और यह भी जानते थे राम के निर्णय कभी भावनात्मक नहीं होते हैं। राम का पिता दशरथ से स्नेह है, उनके प्रति आदर है, पर यह निर्णय राम ने धर्म के मूल “सत्य” के सिद्धान्त पर लिया है।


कर्मफल में प्रदत्त परिस्थिति में धर्म, अर्थ और काम तीनों का ही समावेश होता है। जिस परिस्थिति में कैकेयी का चिन्तन तमप्रेरित था और लक्ष्मण रजस मनोवृत्ति से सोच रहे थे उसी परिस्थिति में राम सात्विकता से विचार कर रहे थे। एक ही परिस्थिति में धर्म, अर्थ और काम की प्रवृत्तियाँ क्रमशः राम, लक्ष्मण और कैकेयी में दृष्टव्य थीं। निर्णय प्रक्रिया के विकल्पों के बारे में राम ने अपना मत स्पष्ट कर दिया था। यदि निर्णय के विकल्पों में धर्म का लेशमात्र भी उपस्थिति नहीं है तो वह राम के लिये त्याज्य है। निर्णयों के चयनित विकल्प वही हो सकते हैं जिसमें धर्म, अर्थ और काम, तीनों ही हों। उन शेष विकल्पों में राम अर्थकेन्द्रित और कामकेन्द्रित विकल्पों से अधिक महत्व धर्मकेन्द्रित विकल्पों को देते हैं। उस पर भी धर्म के विभिन्न स्तरों पर उनका आश्रय धर्म के मौलिक सिद्धान्तों पर रहता है। यहाँ सत्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण था।


लक्ष्मण राम का मन्तव्य जानते थे और यह भी जानते थे कि समाज की संरचना धर्म के इन्हीं सिद्धान्तों पर दृढ़ टिकी रह सकती है। राम ने धर्म, अर्थ और काम की इस समावेशी व्याख्या में भार्या का उदाहरण दिया था। भार्या धर्म, अर्थ, और काम, तीनों ही रूप में रहती है। अतिथि सत्कार, पोषण, पाचन आदि व्यवस्थाओं में वह अर्धांगिनी बन धर्म के पालन में सहायक होती है। माँ के रूप में परिवार के पालन और संचलन में वह अर्थ के पालन में कर्तव्य निभाती है। प्रेयसी रूप में वह पति के साथ परस्पर काम भी साधती है। अन्य दोनों का समावेश होने पर भी यह एक धर्मकेन्द्रित व्यवस्था है। अन्य मानवीय समाजों की कामकेन्द्रित और अर्थकेन्द्रित व्यवस्थाओं में कहाँ ऐसी समावेशी प्रवृत्ति देखी जाती है जो सबको जोड़कर चल सके, सबको धारण कर वढ़ सके, धर्म रूप में प्रस्तुत हो सके।


यद्यपि लक्ष्मण राम का अभिप्राय समझ गये थे पर उनका मूल प्रश्न अभी तक अनुत्तरित था। लक्ष्मण की आँखों में अभी तक प्रश्न थे। माँ कौशल्या निराशा में डूब विलाप कर रही थी पर लक्ष्मण अपना उत्तर पाने की प्रतीक्षा में स्थिर खड़े थे। उनके भाव राम के निर्णय को तो स्वीकार कर चुके थे पर दशरथ और कैकेयी के निर्णय को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे।


राम समझ जाते हैं कि लक्ष्मण संतुष्ट नहीं हैं। न चाह कर उन्हें उस विषय पर आना ही होगा। पर उसके पहले लक्ष्मण को सान्त्वना देनी होगी। राम के प्रति हो रहे अन्याय से लक्ष्मण एक विशेष अमर्ष से भरे हुये थे। क्रोध से उनके नेत्र और नाक फैल रहे थे। धर्म की व्याख्या करने पर भी और अपना अभिप्राय समझाने पर भी उन्हें यह निर्णय स्वीकार नहीं हो रहा था। राम आगे बढ़ते हैं, दोनों हाथों से लक्ष्मण के कन्धे पकड़ कर सस्नेह कहते हैं। अनुज, धैर्य धरो, मन के शोक और क्रोध को दूर करो, चित्त से अपमान के भावना को निकाल दो। कोई भी ऐसा कार्य मत करो जिससे मेरे वनगमन में बाधा उत्पन्न हो।


अनुज, मैं नहीं चाहता कि माँ कैकेयी के मन में कोई भी ऐसी शंका न रह जाये जिससे उनको शोक हो। पिताजी भी सदा सत्यवादी रहे हैं और परलोक के प्रति भयग्रस्त रहे हैं। मैं नहीं चाहता कि मेरे अयोध्या में अधिक समय रहने से उनकी सत्यप्रतिष्ठा में कोई आँच आये।


लक्ष्मण, तुम्हारा कथन सत्य है। मुझे याद नहीं पड़ता कि मैंने कभी किसी माँ के प्रति या पिताजी के प्रति कोई छोटा सा भी अपराध किया हो। मुझे यह भी याद नहीं है कि आज तक पिताजी ने कभी भी मुझे प्रसन्न होकर न देखा हो। मेरी माँ कैकेयी का मेरे प्रति स्नेह सदा ही भरत से भी अधिक रहा है। उन्होंने तो हर बार बढ़कर अपने राम को मान दिया है, अपने राम के वचनों को मान दिया है।


आज सब भिन्न है लक्ष्मण। जो माँ कैकेयी सदा ही ऐश्वर्य में रही, उत्तम स्वभाव और श्रेष्ठ गुणों से युक्त उदारमना रही, आज वही एक साधारण स्त्री की भाँति अपने अधिकारों के लिये पिता को शोकसंतप्त कर रही है, कटुवचन बोलकर पिता का हृदय विदीर्ण कर रही है। जिसके ममत्व में मेरा मन आनन्दित होता था वही माँ मुझसे आज कुटिलता और कठोरता से बात कर रही है। पिताजी जो कभी मुझे देखकर बिना प्रसन्न हुये रह नहीं पाते थे और मेरे तनिक से दुख में विह्वल हो जाते थे, वह मुझसे बात तक नहीं कर रहे हैं। यही तो दैव है लक्ष्मण।


मेरे अनुसार माँ कैकेयी का यह विपरीत व्यवहार और मुझे वन भेजकर पीड़ा देने का विचार दैव का ही विधान है। जिसके विषय में कभी कुछ सोचा न गया हो, वही दैव का विधान है। प्राणियों और देवताओं में कोई भी ऐसा नहीं है जो दैव के विधान को मिटा सके। अतः उसी की प्रेरणा से मेरे राज्याभिषेक और माँ कैकेयी की बुद्धि में यह विपरीत व्यवहार हुआ है।


दैव का पता तो कर्मफल प्राप्त होने पर ही चलता है, उससे अन्यत्र उसका पता ही नहीं चलता है। उस दैव से कौन युद्ध कर सकता है? जिसका कोई कारण समझ में न आये, समझो दैव के कारण है। उग्र तपस्वी ऋषि भी दैव के कारण अपने तीव्र नियमों को छोड़ देते हैं, काम क्रोध से विवश हो मर्यादा से भ्रष्ट हो जाते हैं। अतः प्रिय लक्ष्मण, इस तर्क पर मन स्थिर करो और दुखी न हो।


मेरे लिये शोक न करो। मेरे लिये राज्य और वनवास, दोनों ही समान है। अपितु विशेष विचार करने पर वनवास अधिक अभ्युदयकारी प्रतीत होता है। लक्ष्मण मेरे राज्याभिषेक में जो विघ्न आया है, उसमें न माँ कैकेयी कारण हैं और न ही पिताजी कारण हैं। तुम तो दैव और उसके अद्भुत प्रभाव को जानते ही हो, बस वही कारण है। यह कहकर राम शान्त हो गये।


लक्ष्मण अभी भी क्रोध में थे पर राम के संस्पर्श से सहज हो गये थे। राम का सहजता से माँ कैकेयी और पिता दशरथ को दोषमुक्त करने का भाव लक्ष्मण को और भी उद्वेलित कर रहा था। सबका अन्याय अपने ऊपर लेने के राम के यह भाव और उनकी अपार सहनशीलता लक्ष्मण को व्यथित कर देती थी। लक्ष्मण यह तथ्य जानते थे कि राम अद्भुत वीर है फिर भी उनका क्षत्रियोचित व्यवहार न करना लक्ष्मण को विचित्र लगता था।


लक्ष्मण का बात अभी समाप्त नहीं हुयी थी।

21.9.21

राम का निर्णय(धर्म अर्थ काम)


लक्ष्मण के तर्कों और राज्य अधिग्रहण करने के उत्साहपूर्ण वचनों से माँ कौशल्या के शोक में कुछ कमी आयी थी। राम को कुछ न बोलते देख माँ की आशा बढ़ी कि संभवतः राम इन तर्कों का संज्ञान लेंगे। उस संवाद की दिशा को अपनी सहमति सी प्रदान करती हुयी माँ कौशल्या बोली।


पुत्र राम, लक्ष्मण के वचनों में जो भी करणीय हो, आप करें। यह कह कर माँ कौशल्या ने लक्ष्मण की संवाददिशा को अपनी समर्थन दे दिया था। माँ का मन पुत्र से तर्क में जीतना नहीं चाहता था पर पुत्र अयोध्या में रह जाये, इसके लिये कोई भी प्रयास छोड़ना भी नहीं चाहता था। माँ का मन भावनाओं के सहस्रों ज्वारों में अपने तटों के पाने की अदम्य इच्छाशक्ति लिये टिका था, जूझ रहा था। माँ कौशल्या व्यक्तिगत स्तर पर लक्ष्मण के प्रश्नों से तो सहमत थी। धर्म, कुल और पिता के तथाकथित कर्तव्य, इन तीनों को असिद्ध कर लक्ष्मण ने कौशल्या का मन तनिक स्फुरित अवश्य कर दिया था पर राज्य के बलात अधिग्रहण और हिंसा के उपायों के प्रति माँ की अनुकूलता नहीं थी। लक्ष्मण संवाद के प्रथम भाग को ग्रहण कर अब राम कोई निर्णय लें या अपना निर्णय संशोधित करें, जो भी करें पर वन न जायें।


“जो भी करणीय हो, आप करें” बोलकर माँ के नेत्र अश्रुपूरित हो गये। जहाँ माँ कौशल्या के शब्द राम को विकल्प दे रहे थे, माँ कौशल्या के अश्रु उन विकल्पों को संकुचित कर रहे थे, एक स्पष्ट सा संदेश दे रहे थे कि राम वन न जायें।


भैया राम पर निर्णय छोड़ने वाले, बड़ी माँ कौशल्या के वचनों ने लक्ष्मण के क्रोध से ज्वलित हृदय को तनिक सान्त्वना दी थी। मन के उद्गार तो व्यवस्थित होकर निकलना प्रारम्भ हुये थे पर संवाद समाप्त होते होते पूर्णतया अव्यवस्थित और आग्नेय हो चुके थे। लक्ष्मण के क्रोध की परिधि बहुधा लक्ष्मण को ही लाँघ जाती थी पर आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि वह राम को आहत कर पायी हो। राम की उदारता और दीर्घमना सहजता लक्ष्मण के क्रोध को हर बार सोख लेती थी। लक्ष्मण के क्रोध को शान्त करना और समझाना राम के लिये नया नहीं था। लक्ष्मण का क्रोध व्यक्तिगत न होकर अपने प्रिय अग्रज राम के प्रति हुये अन्याय पर लक्षित था। व्यक्तिगत लाभ या कष्ट के लिये लक्ष्मण ने कभी क्रोध किया ही नहीं। कष्ट सहने में लक्ष्मण को कोई बाधा नहीं थी पर अन्याय और अधर्म के प्रति वह ज्वलन्त उल्कापिण्ड के भाँति व्यक्त होते थे।


राम के मन में स्पष्ट था कि कहाँ से उत्तर प्रारम्भ करना है। सबसे पहले लक्ष्मण को यह संकेत देना है कि वह अन्ततः माँ कौशल्या का दुख बढ़ाने का कार्य कर रहे हैं। माँ एक बार राम के उत्तर से शोकमना ही सही पर संतुष्ट हो बैठ गयी थी। उस पर एक आशा जगाना जो कि निर्णयों के प्रवाह में और काल के करालता में जी नहीं पायेगी। एक ऐसी आशा जगाना जो फलित न होकर माँ को अधिक दुख दे जायेगी, अधिक शोकसंतप्त कर जायेगी। राम लक्ष्मण को बताना चाह रहे थे कि आशायें वही जगाना चाहिये जिनमें तनिक संभावना हो। पुनर्जागृत अतृप्त आशायें दुख को और भी बढ़ा जाती हैं। दूसरा कार्य था, लक्ष्मण के क्रोध को शान्त करना। तीसरा कार्य था माँ को पुनः पूर्व अवस्था में वापस लाना जिसमें वह राम के वनगमन को मानसिक रूप से स्वीकार कर चुकी थी। चौथा और सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य था धर्म की समुचित व्याख्या कर उठ रहे तर्कों को समुचित विश्राम देना था।


एक कार्य और था जिस पर राम अनिश्चित थे और उत्तर नहीं देना चाह रहे थे। वह था पिता पर लक्ष्मण के द्वारा लगाये आक्षेपों पर कोई चर्चा। पिता जैसे भी थे, राम के पिता थे। यद्यपि उन्होंने कोई स्पष्ट आज्ञा नहीं दी थी पर पिता की प्रतिज्ञा राम के लिये आज्ञापत्रक थी। राम के लिये कारणों में जाने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। उनकी विवशता भी वहन करने में राम को लेशमात्र का संकोच नहीं था। वह आज पिता के कर्तव्यों की न तो विवेचना करेंगे और उनके द्वारा लिये निर्णय का चारित्रिक विश्लेषण। आज यदि कोई पक्ष स्पष्ट करना आवश्यक है, तो वह है एक पुत्र के कर्तव्यों की विवेचना।


राम पहले लक्ष्मण को लक्ष्य कर कहते हैं। लक्ष्मण, मेरे प्रति जो तुम्हारा उत्तम स्नेह है, मैं वह जानता हूँ। साथ ही तुम्हारे अदम्य पराक्रम, धैर्य और दुर्धर्ष तेज का भी मुझे ज्ञान है। मेरी माँ के हृदय में जो अतुल दुख हो रहा है, वह सत्य और शम के बारे में मेरे अभिप्राय को न समझने के कारण से है। यद्यपि राम माँ कौशल्या के दुख के कारणों पर संवाद अवलम्बित कर रहे थे पर परोक्ष से उनका उद्देश्य लक्ष्मण के तर्कों को धर्म के आधार पर सुव्यवस्थित करने का था। साथ ही आशा की एक किरण जो लक्ष्मण ने दिखायी थी उसको यथाशीघ्र रुद्ध करने के लिये धर्म की पुनर्व्याख्या राम के लिये आवश्यक थी।


लक्ष्मण, संसार में धर्म ही श्रेष्ठ है। उसमें सबको धारण करने की शक्ति है। सत्य उस धारणा की प्रतिष्ठा है। यदि सत्य नहीं रहेगा तो अविश्वास बढ़ेगा। अविश्वास सहजीवन के मूल को नष्ट कर देगा। इस कारण से मुझे पिता के वचनों का सत्य स्वीकार करना है। पिता के वचनों को सत्य करना मेरे लिये धर्म का सर्वोत्कृष्ट कृत्य है। पिता की निर्णय प्रक्रिया और प्रस्तुत चारित्रिक दुर्बलताओं को तनिक भी स्पर्श न करते हुये राम धर्म आधारित अपने कर्तव्यों पर संवाद केन्द्रित कर रहे थे।


अतः लक्ष्मण, केवल क्षात्र धर्म पर आश्रित मति छोड़ो और वृहद धर्म के पालन में मेरा अनुसरण करो। मेरा अभिप्राय समझने के स्थान पर तुम माँ के साथ मुझे भी पीड़ा दे रहे हो। पराक्रमी अनुज, मुझे इस दुःख में मत डालो।


फल रूप में हमारे सम्मुख जो भी कर्म उपस्थित होते हैं, उसमें धर्म, अर्थ और काम तीनों का ही समावेश रहता है। उसमें धर्म के फल को प्रमुख मानकर शेष दो को भी साथ लेना चाहिये। जिस कर्म में धर्म, अर्थ और काम तीनों का समावेश न हो, उसे नहीं करना चाहिये। जिससे धर्म की सिद्धि हो, उसी का आरम्भ करना चाहिये। धर्मरहित हो केवल अर्थपरायण करने वाला सबके द्वेष का पात्र और केवल काम में अत्यन्त आसक्त होने वाला सबकी निन्दा का पात्र बनता है। पिता माननीय हैं। उन्होंने क्रोध से, हर्ष से या काम से भी प्रेरित होकर भी यदि किसी कार्य को करने की आज्ञा दें तो हमें धर्म समझ कर उसका पालन करना चाहिये।


राम अपना अभिप्राय स्पष्ट कर चुके थे। आशा क्षीण हो रही थी, माँ कौशल्या का विलाप बढ़ रहा था पर लक्ष्मण सहमत नहीं दिख रहे थे। उनके पूरे प्रश्नों का उत्तर राम ने नहीं दिया था। पिता व उनकी निर्णय प्रक्रिया पर उठे प्रश्नों पर राम मौन थे।