नृत्य और संगीत, कहते हैं कि स्वर्ग की एक भेंट है, हम पृथ्वीवासियों के लिये। स्वर्ग में हर पग नृत्य है और हर बोल संगीत। कई विधायें हैं, संस्कृतियों के प्रभाव हैं, शास्त्रीय, आधुनिक, स्थानीय लोकगीत व लोकनृत्य। हर व्यक्ति किसी न किसी तरह से नृत्य और गीत से जुड़ा हुआ है। गाना अधिक व्यापक है, घर में, स्नान करते समय, टहलते हुये, पूजा करने में, खाना बनाते बनाते, हम सब कुछ न कुछ गा लेते हैं, गुनगुना लेते हैं। नाचना थोड़ा कम हो पाता है, अब आप राह चलते नाच तो नहीं सकते हैं।
जिनके पास समय है, साथ है और धन भी है, वे डिस्को आदि में जाकर अपना नृत्य-कौशल दिखा आते हैं। हम जैसे सामान्य जीवनशैली धारकों के लिये केवल दो ही अवसर आते हैं, नाचने के। एक तो किसी निकटस्थ के विवाह में या होली में। होली वर्ष में एक बार ही आती है और सारे निकटस्थों के विवाह धीरे धीरे होते रहने से नाच पाने का अवसर कम ही मिल पाता है। जहाँ पर लोक संस्कृतियाँ अभी भी जीवित हैं और किसी न किसी नृत्य शैली से संबद्ध हैं, वहाँ पर नाचने को समुचित अवसर मिलता रहता है।
प्रेम के विशेषज्ञों की माने तो, नृत्य हमारे गुणसूत्रों में आदिमकाल से विद्यमान है, एक मानसिक उथलपुथल के रूप में। वह उथलपुथल रह रहकर अपना निरूपण ढूढ़ती है, आन्तरिक विश्रंखलता नृत्य को सर्वश्रेष्ठ माध्यम मानती है। किसी को विवाह में नाचते हुये ध्यान से देखिये, ऐसा लगता है कि ऊर्जा का अस्त व्यस्त उफान एक एक कर सभी अंगों से बाहर आने का प्रयास कर रहा हो। आप अपना वीडियो स्वयं देखिये, लगेगा कोई और व्यक्ति है। नीत्ज़े कहते हैं कि आपको यदि नृत्य में बहुत अच्छा करना है तो मन की उथलपुथल का सहारा लीजिये। हिरोमू आराकावा कहते हैं कि इस अव्यवस्थित और उथलपुथल भरे विश्व में सौन्दर्य बिखरा पड़ा है। संभवतः नृत्य उसका प्राकृतिक निरूपण है।
किसी के नृत्य करने का ढंग उसके व्यक्तित्व के बारे में बहुत कुछ कह जाता है। संगीत की बीट के अनुसार पैर थिरकने चाहिये, वह तो आवश्यक ही है और सबके होते भी हैं, पर बाकी शरीर को किस तरह से संगीत में लहराया जाता है, वह हर एक के लिये अलग अलग होता है। कुछ लोगों को प्रेमासित मध्यम नृत्य भाता है, धीरे धीरे, अपने प्रेमी के साथ, लगता है मन के श्रंगार को सुगढ़ दिशा देने का कोमल प्रयास चल रहा है, ऊर्जा से अधिक स्पर्श को प्राथमिकता देता हुआ, अपने और अपनों में खोया हुआ। कई लोगों को लयात्मक नृत्य भाता है, अंगों को भाव प्रधान संवाद करते हुये, लगता है कोई सोचा हुआ संदेश प्रसारित हो रहा हो। मुझे जब भी नाचने का अवसर मिलता है, मेरे लिये वह एक ऊर्जायुक्त घटना होती है। मुझ जैसे बहुतों के लिये नाचने के लिये जब कम समय मिलता हो, तो उसमें मन की उथलपुथल ही निकलना स्वाभाविक है।
नृत्य दैनिक जीवन का हिस्सा नहीं है, होली जैसे उत्सवों में इस तरह के आनन्ददायक क्षण मिलते हैं, उन्मादित हो नृत्य करने के लिये। रंगों के पीछे हमारी कृत्रिमता छिप जाती है, या कहें कि हमारा आदिम स्वरूप बाहर आ जाता है, उपाधियों के आवरण से परे, अपने मूल स्वरूप में सराबोर, होली के उन्माद में। मित्रों का साथ, बच्चों का उत्साह, ऊर्जा से अभिभूत वातावरण, यदि आप नाच न उठें तो आपको स्वयं से कुछ गहन प्रश्न करने पड़ेंगे। कोई होली ऐसी न बीती होगी, जब जी भर कर नाचे न हों, थककर चूर न हो गये हों, दोपहर में निढाल होकर सोये न हों, शाम के मित्रों के गाना न गाया हो।
जब तक पढ़ते थे, होली का आनन्द परीक्षाओं के पहले मन का गुबार निकालने का साधन रहता था, अब नौकरी में मार्च महीने में लक्ष्य प्राप्ति की सघनता होली में गुबार निकालने का कारण बनती है। आनन्द बटोरने की व्यग्रता होली को उसका स्वच्छंद स्वरूप दे देती है। होली को सदियों से आनन्द का आशीर्वाद मिला है, होली को हमारे आदिम भाव उभारने का आशीर्वाद मिला है, होली को आनन्द में छोटे छोटे मतभेद स्वाहा कर देने का आशीर्वाद मिला हुआ है। यदि आपने जी भर कर होली के आशीर्वाद का लाभ नहीं उठाया तो अगले वर्ष तक पुनः प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।
हम तो जी भर कर नाचे, सबके साथ। यदि आप इस वर्ष संकोच में रहे हों तो अगली बार हमारे घर में आकर होली खेलें, जी भर कर नाचेंगे, और चीख कर कहेंगे, होली है।
जिनके पास समय है, साथ है और धन भी है, वे डिस्को आदि में जाकर अपना नृत्य-कौशल दिखा आते हैं। हम जैसे सामान्य जीवनशैली धारकों के लिये केवल दो ही अवसर आते हैं, नाचने के। एक तो किसी निकटस्थ के विवाह में या होली में। होली वर्ष में एक बार ही आती है और सारे निकटस्थों के विवाह धीरे धीरे होते रहने से नाच पाने का अवसर कम ही मिल पाता है। जहाँ पर लोक संस्कृतियाँ अभी भी जीवित हैं और किसी न किसी नृत्य शैली से संबद्ध हैं, वहाँ पर नाचने को समुचित अवसर मिलता रहता है।
प्रेम के विशेषज्ञों की माने तो, नृत्य हमारे गुणसूत्रों में आदिमकाल से विद्यमान है, एक मानसिक उथलपुथल के रूप में। वह उथलपुथल रह रहकर अपना निरूपण ढूढ़ती है, आन्तरिक विश्रंखलता नृत्य को सर्वश्रेष्ठ माध्यम मानती है। किसी को विवाह में नाचते हुये ध्यान से देखिये, ऐसा लगता है कि ऊर्जा का अस्त व्यस्त उफान एक एक कर सभी अंगों से बाहर आने का प्रयास कर रहा हो। आप अपना वीडियो स्वयं देखिये, लगेगा कोई और व्यक्ति है। नीत्ज़े कहते हैं कि आपको यदि नृत्य में बहुत अच्छा करना है तो मन की उथलपुथल का सहारा लीजिये। हिरोमू आराकावा कहते हैं कि इस अव्यवस्थित और उथलपुथल भरे विश्व में सौन्दर्य बिखरा पड़ा है। संभवतः नृत्य उसका प्राकृतिक निरूपण है।
किसी के नृत्य करने का ढंग उसके व्यक्तित्व के बारे में बहुत कुछ कह जाता है। संगीत की बीट के अनुसार पैर थिरकने चाहिये, वह तो आवश्यक ही है और सबके होते भी हैं, पर बाकी शरीर को किस तरह से संगीत में लहराया जाता है, वह हर एक के लिये अलग अलग होता है। कुछ लोगों को प्रेमासित मध्यम नृत्य भाता है, धीरे धीरे, अपने प्रेमी के साथ, लगता है मन के श्रंगार को सुगढ़ दिशा देने का कोमल प्रयास चल रहा है, ऊर्जा से अधिक स्पर्श को प्राथमिकता देता हुआ, अपने और अपनों में खोया हुआ। कई लोगों को लयात्मक नृत्य भाता है, अंगों को भाव प्रधान संवाद करते हुये, लगता है कोई सोचा हुआ संदेश प्रसारित हो रहा हो। मुझे जब भी नाचने का अवसर मिलता है, मेरे लिये वह एक ऊर्जायुक्त घटना होती है। मुझ जैसे बहुतों के लिये नाचने के लिये जब कम समय मिलता हो, तो उसमें मन की उथलपुथल ही निकलना स्वाभाविक है।
नृत्य दैनिक जीवन का हिस्सा नहीं है, होली जैसे उत्सवों में इस तरह के आनन्ददायक क्षण मिलते हैं, उन्मादित हो नृत्य करने के लिये। रंगों के पीछे हमारी कृत्रिमता छिप जाती है, या कहें कि हमारा आदिम स्वरूप बाहर आ जाता है, उपाधियों के आवरण से परे, अपने मूल स्वरूप में सराबोर, होली के उन्माद में। मित्रों का साथ, बच्चों का उत्साह, ऊर्जा से अभिभूत वातावरण, यदि आप नाच न उठें तो आपको स्वयं से कुछ गहन प्रश्न करने पड़ेंगे। कोई होली ऐसी न बीती होगी, जब जी भर कर नाचे न हों, थककर चूर न हो गये हों, दोपहर में निढाल होकर सोये न हों, शाम के मित्रों के गाना न गाया हो।
जब तक पढ़ते थे, होली का आनन्द परीक्षाओं के पहले मन का गुबार निकालने का साधन रहता था, अब नौकरी में मार्च महीने में लक्ष्य प्राप्ति की सघनता होली में गुबार निकालने का कारण बनती है। आनन्द बटोरने की व्यग्रता होली को उसका स्वच्छंद स्वरूप दे देती है। होली को सदियों से आनन्द का आशीर्वाद मिला है, होली को हमारे आदिम भाव उभारने का आशीर्वाद मिला है, होली को आनन्द में छोटे छोटे मतभेद स्वाहा कर देने का आशीर्वाद मिला हुआ है। यदि आपने जी भर कर होली के आशीर्वाद का लाभ नहीं उठाया तो अगले वर्ष तक पुनः प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।
हम तो जी भर कर नाचे, सबके साथ। यदि आप इस वर्ष संकोच में रहे हों तो अगली बार हमारे घर में आकर होली खेलें, जी भर कर नाचेंगे, और चीख कर कहेंगे, होली है।