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12.10.21

राम का निर्णय (वचन या आज्ञा)


गुरु वशिष्ठ, पिता दशरथ और सब माताओं को वहाँ एकत्र देख राम ने हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुये कक्ष में प्रवेश किया। पीछे सीता और अन्त में लक्ष्मण भी सबकी दृष्टि में आकर खड़े हो गये। राम को इस प्रकार नत भाव से आता देख राजा दशरथ व्याकुल हो उठे। राम की ओर दौड़े पर राम तक पहुँच पाने के पहले ही मूर्च्छित होकर गिर गये। यह देख राम शीघ्रता से पिता के पास पहुँचे हैं और सहारा दिया। लक्ष्मण ने भी हाथ बढ़ाया और सीता भी निकट आ गयीं। उपस्थित सभी लोग यह दृश्य देखकर “हा राम हा राम” बोल कर चीत्कार कर उठे। करुण वातावरण और पिता की यह स्थिति देख राम की आँखों में अश्रु उमड़ आये। लक्ष्मण और सीता के साथ राम ने पिता को दोनों हाथों से उठाया और शैय्या पर लिटाया। प्रतीक्षा के कुछ क्षणों बाद जब दशरथ को चेत आया, राम ने हाथ जोड़कर पिता से कहा।


पिताजी, मुझे दण्डकारण्य जाने की आज्ञा दीजिये। अनुज लक्ष्मण को भी अनुमति दीजिये और यह स्वीकार कीजिये कि सीता भी मेरे साथ वन जायें। मैंने चेष्टा अवश्य की पर ये दोनों यहाँ नहीं रुकना चाह रहे हैं। जैसे ब्रह्माजी ने अपने पुत्र सनकादिक मुनियों को वन जाने की आज्ञा दी थी, वैसे आप हम सबको प्रस्थान करने की आज्ञा दीजिये।


दशरथ स्तब्ध थे। एक पुत्र के जाने का शोक उनसे सम्हाला नहीं जा रहा था। प्रातः से ही लज्जा के कारण उनके मुख से एक भी शब्द नहीं निकल पा रहा था। “हा राम” के अतिरिक्त सारे शब्द अश्रु बन कर बह रहे थे। शोक संतप्त राजा कक्ष में बैठे प्रातः से बस यही मना रहे थे कि कोई चमत्कार हो जाये और राम का वन जाना रुक जाये। अब आँखों के सम्मुख सीता और लक्ष्मण भी वन जाने को प्रस्तुत खड़े हैं। सीता वन में कैसे रहेगी? क्या हो गया है राम को? निराशा की इस पराकाष्ठा में राम के प्रति उनके प्रथम शब्द निकलते हैं। यद्यपि शब्द आज्ञा से थे पर उसमें स्वर प्रार्थना सा था।


हे रघुनन्दन, मैं कैकेयी को दिये गये वर के कारण मोह में पड़ गया हूँ। मुझे कारागार में डालकर तुम स्वयं ही अयोध्या के राजा बन जाओ।


राम आज्ञा की प्रतीक्षा कर रहे थे और आशा कर रहे थे कि अपना शोकयुक्त मौन छोड़ पिता दशरथ कुछ कहें। पिता अपनी आत्मग्लानि से निकलें और अपने राम के निर्णय का सम्मान करें। यद्यपि मन में राम ने यह निश्चय कर लिया था कि यदि राजा कुछ नहीं कहते हैं तो “मौनं स्वीकृति लक्षणं” का संकेत ग्रहण करते हुये वह पिता की परिक्रमा कर वन को चले जायेंगे। पिता ने साहस किया या उनका शोक घनीभूत हो शब्द पा गया, पर यह कौन सी आज्ञा है? पिता सबके सम्मुख यह क्या कह रहे हैं? पिता यह क्या आज्ञा दे रहे हैं?


वनगमन का पूर्ण आधार पिता की आज्ञा का अनुपालना थी। यह तर्क कौशल्या और लक्ष्मण से हुये संवादों में बारम्बार व्यक्त भी हुआ था। पिता यह कौन सा आग्रह कर रहे हैं, स्वयं को कारागार में डाल देने का? आत्मग्लानिजनित दैन्यता का दूसरा स्वरूप पिता दशरथ द्वारा व्यक्त था। गत रात्रि से शोक लहर में बहते हुये पिता दशरथ अभी तक सामान्य नहीं हो पाये हैं। राम बिना कुछ अधिक बोले शीघ्रातिशीघ्र वन के लिये निकल जाना चाह रहे थे। पहले माँ कौशल्या, तत्पश्चात लक्ष्मण और सीता के द्वारा विलम्ब हो चुका था, अब स्वयं पिता दशरथ यह भ्रमपूर्ण वचन बोल रहे थे।


कक्ष में सबका ध्यान राजा दशरथ की मूर्च्छा पर था, राम के आज्ञा माँगने पर था। दशरथ का यह कहना सबको अचम्भित कर गया। सबका मुख अब आश्चर्य से राम की ओर था। राम पिता की इस आज्ञा का क्या उत्तर देते हैं? राम इस प्रश्न का क्या समाधान करते हैं? पिता के जिस वचन पर राम ने अपना पूर्व निर्णय आधारित किया था, उसके विपरीत संकेतों को अब राम अपने निर्णय में कैसे समाहित करेंगे? दो विपरीत आज्ञाओं में कौन सी आज्ञा किस कारण करणीय है, कक्ष में सब जानने को उत्सुक थे। कक्ष में व्याप्त शोक के सागर में संभावना का एक अंश दिखा था, सब अपना दुख क्षणभर को भुला राम की ओर देख रहे थे। सत्य के किस स्वरूप का ग्रहण करेंगे राम? किस सिद्धान्त पर राम निष्कर्ष प्रतिपादित करेंगे? पिता के वर्तमान वचनों का मान रखेगें या दशकों पूर्व दिये वरों का मोल रहेगा? सत्य रहेगा या वचन मात्र?


राम दशरथ के कथन का मर्म समझ गये थे। कथन के पूर्व चरण में यद्यपि पिता ने उसमें कैकेयी के दिये वरों के मोह का संदर्भ दिया था किन्तु उत्तर पक्ष में पिता का राम के प्रति मोह झलक रहा था। मोह कथन के दोनों भागों में था, पूर्व में कैकेयी के प्रति, उत्तर में राम के प्रति। मोह के ये दोनों आवरण पिता की दो मनःस्थिति और तज्जनित दो आज्ञाओं के मूल कारण थे। इस भ्रम से परे राम को सत्य का वरण करना था, निर्णय लेना था।


राम ने सविनय हाथ जोड़े और पिता से कहा। पिता आप सहस्रों वर्षों तक राज्य करें, मैं अब वन में रहूँगा। चौदह वर्ष व्यतीत होने पर पुनः आपके युगल चरणों में मस्तक झुकाऊँगा। आप क्षुब्ध न हों, आप आँसू न बहायें, सरितायें मिलने पर भी समुद्र अपनी मर्यादा नहीं लाँघता। मुझे न इस राज्य की, न सुख की, न पृथ्वी की, न भोगों की, न स्वर्ग की और न जीवन की ही इच्छा है। मेरे मन में यदि कोई इच्छा है तो यही कि आप सत्यवादी रहें। आपका कोई वचन मिथ्या न हो पाये। यह बात मैं आपके सामने सत्य और शुभकर्मों की शपथ खाकर कहता हूँ। राम ने स्पष्ट शब्दों में वातावरण में व्याप्त क्षणिक अनिश्चितता को विराम दे दिया था। साथ ही विनम्रतापूर्वक पिता के वचनों का मान भी रख लिया था।


राजा दशरथ राम का मुख देखे जा रहे थे। यह विचार कि चौदह वर्ष तक वह राम का मुख नहीं देख पायेंगे, उन्हें व्याकुल किये जा रहा था। कातर भाव में दशरथ पुनः बोले। राम, मेरे साथ छल हुआ है। उस विषम परिस्थिति में भी तुमने ज्येष्ठ पुत्र का कर्तव्य निभाया है। मैं यह भी जानता हूँ कि तुम्हारा निश्चय अडिग है। मेरा एक आग्रह स्वीकार कर लो कि आज रात्रि भर विश्राम करके प्रातः वन चले जाना। मैं तुम्हें जी भर कर देख लूँ। सत्य के बन्धन में और कैकेयी के कटु वचनों की बाध्यता के बीच महाप्रतापी दशरथ की दैन्यता तुच्छ सी प्रार्थना पर आकर रुक गयी थी। राम यह तथ्य जानते थे। पिता के मन की कातरता को विश्राम देना आवश्यक था, वह दशरथ को और संकुचित होते नहीं देख सकते थे। माँ कैकेयी को राम आज ही वन जाने का वचन दे चुके थे। इस परिप्रेक्ष्य में उन्हें पिता का यह आग्रह भी वचन की अवमानना लग रहा था। अत्यन्त कोमल स्वर में राम ने कहा।


पिताजी, आपके सत्य के प्रतिपालन में मैंने तत्क्षण राज्य त्यागकर वनगमन के लिये प्रस्थान कर दिया था। शेष आज्ञायें लेने और सुहृदों को सूचित करने में यथासम्भव शीघ्रता करने में जो विलम्ब हुआ है, उसके लिये मुझे आप और माँ कैकेयी क्षमा करें। वनगमन के लिये प्रस्तुत होकर एक क्षण भी अयोध्या में रुकने का विचार करना मर्यादाओं का उल्लंघन है। मैंने आज ही वनगमन जाने का वचन दिया है, मुझे उसका पालन करने में आशीर्वाद और शक्ति दें और अपना शोक भीतर छिपा लें। मैं अपने निश्चय के विपरीत कुछ नहीं कर सकता। आपकी प्रतिज्ञा सत्य हो।


दशरथ ने राम को भींच कर हृदय से लगा लिया। राम ने सदा ही उनको सुख दिया है और अपना नाम सार्थक किया है। दशरथ के अश्रु अनवरत बहे जा रहे थे। हृदय को अद्भुत सी शान्ति दे रहा था राम का स्पर्श। कैकेयी की कुटिल अग्नि में दग्ध दशरथ का हृदय राम के आचरण से शीतल हो गया था। शोक में था पर स्वीकार कर शान्त हो गया था। दशरथ को समय की सुध न रही, इस शान्ति में वह कब अचेत हो गये, उन्हें किसी की सुध न रही।

26.8.21

वनगमन, पर दोष किसका?


मेरे लिये राम का वनगमन विश्व इतिहास में सर्वाधिक उद्वेलित कर देने वाली घटना है, सर्वाधिक हृदयविदारक क्षण है, सर्वाधिक अन्यायपूर्ण निर्णय है।


पता नहीं मैं कहाँ स्थित हूँ? आराध्य राम के निर्णय पर प्रश्न उठाने की धृष्टता कर रहा हूँ। क्या मैं आँख बन्द कर स्वीकार कर लूँ कि राम ने जो निर्णय लिया वह उचित था, वह भी मात्र इसलिये कि राम मेरे पूजनीय हैं, मेरे आराध्य हैं। क्या औरों की भाँति मैं उन्हें भगवान मान लूँ और यह स्वीकार कर लूँ कि उन्होंने जो भी किया वह उनकी लीला थी। यह लीलावादी तर्क बड़ा ही निर्दयी है, अपने राम के कष्ट पर दुख व्यक्त करने का भी अधिकार आपसे छीन लेता है। तब सर्वसमर्थ राम पर दुख व्यक्त करने से राम के सामर्थ्य का अपमान जो होता है। लीलावादी कह सकते हैं कि राम तो ईश्वर थे, उन्हें कौन सा कष्ट? क्या करूँ मैं? सुनता हूँ पर इस तर्क को स्वीकार नहीं कर पाता।


राम का वन जाना मुझे असाध्य कष्ट देता है, जितनी बार प्रसंग पढ़ता हूँ, उतनी बार देता है। क्योंकि मन में राम के प्रति अगाध प्रेम और श्रद्धा है। बचपन से अभी तक हृदय यह स्वीकार नहीं कर सका कि भला मेरे राम कष्ट क्यों सहें? राम के प्रति प्रेम और श्रद्धा इसलिये और भी है कि राम पिता का मान रखने के लिये वन चले गये। विचित्र सा द्वन्द्व है यह, जिस कारण कष्ट हो रहा है उसी कारण श्रद्धा भी हो रही है, प्रेम भी उमड़ रहा है। राम ने कभी भी पिता को न तो दोषी ठहराया और न कभी दोषमुक्त ही किया। उन्होंने पिता की प्रतिज्ञाजनित आज्ञा का पालन भर किया। किस कारण छोटे भाई भरत को राज्य दिया गया और किस कारण राम को बिना अपराध के वनगमन का दण्ड मिला, इस अन्याय पर राम ने कभी कोई प्रश्न ही नहीं उठाया। हाँ, वन में एक बार राम के दुखी क्षणों में यह बात उठी अवश्य थी। उस समय राम लक्ष्मण को दशरथ के हित वापस अयोध्या लौट जाने को प्रेरित कर रहे थे। दशरथ की क्षीण मनःस्थिति और उनकी संभावित परवशता, ये प्रेरक कारण थे जो राम द्वारा लक्ष्मण को समझाये गये थे।


नियतिवादी कह सकते हैं कि यदि राम वन नहीं जाते तो रावण को कौन मारता? उनके अनुसार सब कारण श्रृंखलाबद्ध हैं, क्रमवत हैं, दैवयोग से प्रेरित हैं, देवों ने ही मन्थरा की मति पलटी। नियतिवादियों का यह सरलीकरण मुझे स्वीकार नहीं है। सीता अपहरण से रावण वध, कारण से कार्य तक का घटनाक्रम अन्तिम दो वर्ष से भी कम समय में हो गया था। तब शेष १२ वर्ष के वनभ्रमण के कष्टों का क्या कारण कहेंगे नियतिवादी? यदि राम वन नहीं जाते तो क्या समय आने पर रावण के विरुद्ध नहीं खड़े होते। यद्यपि रावण ने अयोध्या आदि से सीधी शत्रुता नहीं ली थी पर कालान्तर में उसकी महात्वाकांक्षा बढ़ती और तब राम से टकराव स्वाभाविक होता। या यह भी संभव था कि ऋषि मुनि आकर एक सक्षम राजा से सुरक्षा का आश्रय माँगते, तब भी रावणवध तो होना ही था। उनको अपने सिद्ध शस्त्र तो विश्वामित्र ने दे ही दिये थे, कालान्तर में अगस्त्य भी उन्हें अस्त्र दे ही देते। राम वनगमन के पहले ही इस युद्ध में खींचे जा चुके थे, शेष निष्कर्ष बस काल को प्रकट करने थे। सब नियत मान लेने से या राम के वनगमन को दैवयोग कह देने से क्या हमें उस निर्णय की विवेचना करना बन्द कर देना चाहिये?


वह भले ही त्रेतायुग था पर अन्याय का यह प्रकरण कलियुग का निर्लज्ज प्राकट्य था। वाल्मीकि ने दशरथ की रानियों के बीच प्रतिस्पर्धा और मानसिक वैमनस्य को बड़े ही स्पष्टरूप से व्यक्त किया है। कौशल्या ने राम को वन न जाने के लिये यह भी कारण दिया था कि राजा कैकेयी को अधिक मान देते रहे हैं और राम के राजा बनने से उनका भी मान वापस आयेगा। राम के वन जाने की स्थिति में कैकेयी और भी मदित, क्रूर और निष्कंटक हो सकती है। राजा की सर्वाधिक प्रिय रानी की दासियों में यह अभिमान आना सहज ही तो है। दासियों की राजपरिसर में महत्ता उनकी रानी के मान पर निर्भर थी। कोई भी ऐसी घटना जिससे उनकी रानी का प्रभावक्षेत्र सिकुड़े, उस पर दासियों का सतर्क होना स्वाभाविक था। मन्थरा का व्यवहार और षड्यन्त्रशीलता परिस्थितियों और व्याप्त मानसिकता का एक स्वाभाविक कर्म था, उस प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण का सहज सा निष्कर्ष।


राम के वनगमन का पूरा दोष मन्थरा पर मढ़कर निकल जाना उस अन्यायपूर्ण घटना के साथ भी अन्याय होगा। क्या कैकेयी की भी मति पलट गयी थी, क्या दशरथ को भी न्याय के बारे में विभ्रम हो गया था? क्या दशरथ अपनी सामान्य प्रजा पर यह अन्याय कर पाते जो उन्होंने अपने पुत्र राम पर हो जाने दिया और मौन बैठे रहे। राजकीय उत्तरदायित्वों में भला व्यक्तिगत वरों का क्या मोल? कोई प्रजाजन यदि दशरथ से यह प्रश्न भर पूछ देता तो दशरथ क्या उत्तर देते? जो न्याय दशरथ के लिये अपनी प्रजा के प्रति करना असंभव था वह निर्दयी अन्यायपूर्ण निर्णय राम जैसे गुणी, सौम्य, सर्वप्रिय और आज्ञाकारी पुत्र पर किया गया।


राम के वनगमन में मन्थरा से अधिक कैकेयी का दोष था और सर्वाधिक दोष दशरथ का था। मन्थरा की जिह्वा में सरस्वती बैठ गयी थी? कैकेयी की बु्द्धि पलट गयी थी? यह मतिभ्रम नहीं वरन रानियों की परस्पर प्रतिस्पर्धा में श्रेष्ठ बनने का भाव बुद्धि में बसा बैठा था। सब एक दूसरे से भय भी खातीं थी, सशंकित थीं। कैकेयी युवा थी और दशरथ की प्रिय भी, दशरथ उन पर कामानुरक्त थे। इस पर मन्थरा को खलनायक बनाने का क्या अर्थ? यदि किसी का निर्णय इसमें प्रबलता रखता था, वह दशरथ का था। दशरथ ने राम को न जाने के लिये कहा और न ही रुकने के लिये, बस मौन बने बैठे रहे। मौनं स्वीकृति लक्षणम्।


यद्यपि कैकेयी से दशरथ ने यथासंभव अनुनय विनय और याचना की, पर वह राजा का स्वरूप नहीं दिखा पाये और न ही पिता बन अपने पुत्र की रक्षा कर पाये। क्या वचन न मानने का सामाजिक अपयश राम को अन्यायपूर्ण वन भेजने से अधिक होता? यहाँ तो सर्वथा विपरीत ही हुआ। राम ने पिता की प्रतिज्ञा की रक्षा की, उनके अपयश में बाधा बन कर खड़े हो गये। बिना युवराज बने, रघुकुल और राजा के गुरुतर दायित्वों के निर्वहन का मान रखते हुये स्वयं ही वनगमन का निर्णय ले लिया।


यद्यपि घटनाक्रम अन्यायपूर्ण था, राम ने सबका ध्यान रखते हुये, माँ, पिता और कुल का सम्मान रखते हुये स्वयं ही वनगमन चुना।


राम के निर्णय के आधार क्या थे, विस्तृत विवेचना अगले ब्लाग में।

24.8.21

निर्णय के क्षण


दशरथ को जब पुनः चेतना आती है, कैकेयी राम को दो वरों के बारे में बता रही थी। हा! कितनी निर्दयी हो गयी है कैकेयी।


दशरथ स्वयं ही शान्त रहने का निर्णय ले चुके थे। अब जो भी होना है वह कैकेयी अथवा राम के निर्णय पर होना है। कैकेयी निर्लज्जता से अपना स्वार्थ व्यक्त किये जा रही है। अपने पुत्र से तो सबको प्रेम होता है इसलिये भरत को राज्य की बात तो समझी जा सकती थी पर राम को १४ वर्ष का वनवास दशरथ से न समझा जा रहा था और न ही सहा जा रहा था। 


क्या कैकेयी को राम से भय है? यदि राम यहाँ रहे तो कालान्तर में राम राज्य पर अधिकार का प्रयास करेंगे, क्या यह चिन्तन है कैकेयी का? कैकेयी की राजनीति मति दशरथ की समझ से परे थी। यदि भरत के लिये ही राज्य माँग लेती तो वह सदा के लिये हो जाता। राम यदि चौदह वर्ष बाद लौटे और राज्य पर अपना अधिकार जताया तब क्या स्थिति होगी? यह चौदह वर्ष क्या इसलिये माँगे हैं कि इतने वर्षों में भरत राज्य और सेना पर अपना नियन्त्रण स्थापित कर लेंगे। राम क्या जीवनपर्यन्त शक्तिहीन ही रहेंगे? कैकेयी की इस अतार्किक बुद्धि से हताश थे दशरथ।


क्या कैकेयी को नगरवासियों से भय है? राम सबके प्रिय हैं। राम बचपन से ही उदारमना रहे हैं, पहले अपने भ्राताओं के प्रति, महल के परिचारकों और परिचारिकाओं के प्रति और बड़े होने पर सारे नगरवासियों के प्रति। कल ही प्रबुद्ध नगरवासी बता रहे थे कि राम मिलने पर सबकी कुशलक्षेम पूछते हैं। यही नहीं उनके परिजनों और परिचितों के बारे में ज्ञान रखते हैं। जब से नगरवासियों को पता चला है कि राम युवराज बनने वाले हैं और राजकीय कार्यों में उनका दायित्व गुरुतर होगा, तब से नगर में उत्सव का वातावरण बना हुआ है। सब अपने सर्वश्रेष्ठ वस्त्र पहन कर राम के दर्शन को लालायित हैं। जब उनको पता चलेगा कि राम को वन भेजने का षड्यन्त्र चल रहा है, क्या प्रजा विद्रोह कर देगी?


क्या कैकेयी को भरत की क्षमताओं पर विश्वास नहीं है? भरत अपने ज्येष्ठ के समक्ष क्या शासन में समर्थ नहीं रह पायेंगे या राम के रहते वह सिंहासन पर बैठने से मना कर देंगे? भरत क्या राम के भय से निष्कंटक नहीं रह पायेंगे? भरत का राम के प्रति आदर और स्नेह कहाँ कहीं किसी से छिपा है। राम का भी तो प्रेम भरत के प्रति अप्रतिम है। कैकेयी को संभवतः इसी का भय मुख्य हो कि राम के अयोध्या में रहते भरत सहज नहीं रह पायेंगे।


जब तक दशरथ इन विकल्पों में उतरा रहे थे, कैकेयी अपना वक्तव्य दे चुकी थी, दोनों वर बड़े ही रुक्ष स्वर में व्यक्त कर चुकी थी। कैकेयी की आँखों में अब एक स्पष्ट सा प्रश्नवाचक चिन्ह था। राम का मुख शान्त और भावहीन था। जिन शब्दों ने पिता को असहनीय पीड़ा पहुँचायी है, उन शब्दों को वह अपने कानों से सुनना चाहते थे। पिता की पीड़ा समझ सकें, माँ का मन्तव्य समझ सकें, इसके लिये आवश्यक था वह सब शान्त भाव से सुनें।


सब सुनने के पश्चात राम समय लेते हैं। इसलिये नहीं कि वह दुखी है, इसलिये नहीं कि वह क्षुब्ध हैं। बिना किसी पर दृष्टि पहुँचाये वह कक्ष में उपस्थित सभी जनों के मुख की कल्पना कर सकते हैं। पिता शोकमग्न और आर्त मुख लिये, माँ प्रश्नवाचक और आन्दोलित मुख लिये, लक्ष्मण आग्नेय और उद्वेलित मुख लिये, सुमन्त हतप्रभ और वितृष्णा भाव लिये। सबके मन में अपने भाव गाढ़े हैं पर साथ में एक उत्सुकता और स्तब्धता है कि राम क्या कहेंगे? राम पर सबकी दृष्टि टिकी है। सबको साधने का क्रम कठिन है पर राम का उत्तर सबको संतुष्ट करने वाला होना चाहिये।


सब सुनने के पश्चात राम समय लेते हैं। वह अपने निर्णयों के विकल्पों पर विचार करते हैं। प्रत्येक विकल्प के क्या दूरगामी परिणाम होंगे उनके पक्षों पर सोचते हैं। अनवगत प्रिय भरत जो इस चक्र में पिसेगा, कोई भी निर्णय हो पिता दशरथ मन से रुग्ण हो जायेंगे, माँ कौशल्या का क्या होगा, लक्ष्मण क्या करेगा? सीता, उसकी तो कोई सोच भी नहीं रहा है? गुरु, प्रजा, कुल, नीति और स्वयं राम की एक छवि। धर्म का प्रायोगिक क्षण था यह। संस्कार, विद्या, सम्बन्ध, सबके निष्कर्षों की परीक्षा लेनी थी इस निर्णय को।  


सब सुनने के पश्चात राम समय लेते हैं। युवराज बनने के पहले ही उन पर निर्णय का महादायित्व आ गया था। यह निर्णय कोई लघु निर्णय नहीं था। पूरे राजपरिवार में संभावित उथलपुथल का अनुमान राम को हो गया था। एक महाअंधड़ उठ चुका था, रघुकुल की क्षति निश्चित दिख रही थी। राम को अपने निर्णय से यह सुनिश्चित करना है कि किस तरह यह क्षति न्यूनतम हो।


सब सुनने के पश्चात राम समय लेते हैं। राजा और पिता शान्त हैं, कुछ कहते नहीं। माँ कैकेयी की वाणी रुक्ष अवश्य थी पर वह आदेश नहीं दे रही थी। वह सशंकित सी राम के माध्यम से पिता दशरथ से अपने वरों की माँग कर रही थी। राम को यहीं निर्णय लेना था। गुरु या माँ कौशल्या से मंत्रणा का न अवसर था और न ही समय। 


सब सुनने के पश्चात राम समय लेते हैं। उस क्षण का पूरा भार राम के युवा हृदय में संघनित था। सबके व्यवहार ने अनायास ही राम को कितना वयस्क कर दिया था। राम के निर्णय की प्रतीक्षा कक्ष में उपस्थित सब कर रहे थे, राम के निर्णय पर प्रश्न सभी सम्बन्धी करने वाले हैं, राम के निर्णय की परीक्षा कल प्रजा करेगी, राम के निर्णय की समीक्षा आने वाली पीढियाँ करेंगी।


राम क्या निर्णय लेंगे? 

19.8.21

निर्णय की कालरात्रि


कैकेयी प्रतीक्षा में थी कि कब राम अपने पिता की प्रतिज्ञा का पालन करने का वचन दें। जब राम ने तनिक रुक्ष व स्पष्ट स्वर में कहा तब कहीं जाकर कैकेयी को संतोष हुआ कि उसका षड्यन्त्र सफल हो जायेगा। 


मन्थरा द्वारा समझायी हर बात का कैकेयी ने अक्षरशः अनुपालन किया था। पहले कोपभवन में जाना, राजा के पूछने पर उन्हें वर की याद दिलाना, राजा को इस बात के लिये चढ़ाना कि रघुवंशियों के लिये उनकी प्रतिज्ञा ही सर्वोपरि है और तब कहीं दो वर माँगना। मन्थरा को यह भी ज्ञात था कि राजा क्रोध कर सकते हैं या मना कर सकते हैं, उसके लिये कैकेयी को विष पी लेने या अग्नि में कूद जाने की धमकी देने की सीख दी। यदि राजा दयनीय होकर अनुनय विनय करते हैं तब भी टस से मस न होने की अत्यन्त स्पष्ट चेतावनी भी दी थी मन्थरा ने।


कैकेयी को विश्वास था कि एक बार वर देने के पश्चात राजा स्वतः ही अपना निर्णय राम को सुना देंगे। राजा के शोकनिमग्न हो अचेत हो जाने से उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? हर बार उठते और “हा राम” कह कर पुनः अचेत हो जाते। उसे तो अब यह भी समझ नहीं आ रहा था कि राजा ने वर दिये हैं कि नहीं? या केवल विलम्ब करना चाह रहे हैं राजा?


राजा ने कितना धिक्कारा था, बुरा भला कहा था पर मना नहीं किया था। रघुवंशियों की इसी मति पर ही कैकेयी का पूरा छलतन्त्र टिका था। स्पष्ट मना कर देना प्रतिज्ञा का उल्लंघन था। यदि राजा ऐसा करते तो उसे भी रघुकुल के बारे में आक्षेप लगाने का अवसर मिल जाता।


राजा अधर में थे, न मना कर रहे थे और न ही हाँ कर रहे थे। जैसे ही राजा ने अनुनय विनय करना प्रारम्भ किया कैकेयी समझ गयी थी कि राजा अब मना नहीं कर सकते हैं। उस ओर से निश्चिन्त हो बैठी कैकेयी को पर यह समझ में नहीं आ रहा था कि राजा को कैसे प्रेरित करे कि वह अपना निर्णय राम को सुनायें। सारे अस्त्र उपयोग में लाने के बाद उसके पास बस एक ही अस्त्र बचा था जिसका वह रात में कई बार उपयोग कर चुकी थी, और वह थी उसकी कठोर वाणी। कठोर वाणी में उलाहना देने से राजा हर बार पीड़ा में उतर जाते और हा राम कह कर अचेत हो जाते। कैकेयी को लग रहा था कि यदि यह अस्त्र अधिक बार प्रयोग किया तो संभव हो राजा इस पीड़ा को सहन न कर पायें और स्वर्ग सिधार जायें। तब तो कोई वर भी नहीं मिलेगा। वैसे भी राजा पहला वर तो मान ही चुके थे। अब राजा का सारा दुख और प्रयत्न दूसरे वर पर था। इसी कारण उसने चुपचाप रात्रि बिताने का निर्णय लिया।


इधर दशरथ की पीड़ा मर्मान्तक थी। उनके मन में सतत ही उहापोह चल रही थी कि कैकेयी को किस प्रकार समझाया जाये, दूसरे वर के लिये आग्रह न करने के लिये किस तरह मनाया जाये। शोकमग्न हो दशरथ शिथिल अवश्य थे पर मन गतिमान था, ईश्वर से प्रेरणा देने की प्रार्थना कर रहे थे कि किसी तरह प्रातः होने तक कैकेयी को मुझपर कुछ दया आ जाये, उसका हठ कुछ कम हो जाये। जब भरत को राजा बनाने का उसका मन्तव्य सिद्ध हो चुका है तो राम को अकारण कष्ट क्यों दे रही है कैकेयी? यह सब क्यों हो रहा है, दशरथ अभी कुछ नहीं समझना चाह रहे थे। इस समय तो वह समस्त देवों का आह्वान कर रहे थे कि कैकेयी के भीतर तनिक ममत्व जग जाये, या तो राम के लिये या अपने पति के लिये।


दशरथ कैकेयी को समझ तो कभी नहीं सके थे। एक अद्भुत आकर्षण था उसमें, बस खिंचते चले गये और वहाँ निश्चेष्ट हो पड़े रहे, जीवन भर। एक अद्भुत ऊर्जा, जीवन जीने की एक अद्भुत शैली। अपरिमित सौन्दर्य और उस पर अपरिमित शूरता, एक बार बँधे तो जीवन भर बद्ध ही पड़े रहे। युद्धकौशल का ज्ञान तो बहुतों को होता है पर भला कौन नारी घनघोर युद्धक्षेत्र में अपने पति के साथ जाती है। कौतूहलवश नहीं वरन एक सहयोगी बन कर। स्पष्ट याद है वह क्षण जब लगा कि बाणों से बिद्ध पीड़ा अब प्राण हर लेगी तब कैकेयी ने कुशल सारथी बन कर उनके प्राण बचाये थे। प्राणरक्षा के इस उपकार के प्रति कृतज्ञ राजा के लिये दो वर भला कौन सी बड़ी बात थी। तब भी कैकेयी की विनम्रता से उनका हृदय गदगद हो उठा था। “बस आपके प्राण बच गये महाराज, यही मेरा वर है” कैकेयी के इस उत्तर पर जब उन्होंने अधिक आग्रह किया तो समय आने पर माँग लेने के लिये कह कर बात टाल दी थी।


पीड़ा के घोर क्षणों में दशरथ विचार में डूबे थे, उन्हें सच में समझ नहीं आ रहा था कि उनसे भूल कहाँ हुयी। युवा, सुगढ़, सुवाक, सुन्दरी और वीर कैकेयी से अधिक स्नेह तो परिस्थितियों की एक स्वाभाविक सी ही परिणिति थी। कौशल्या और सुमित्रा को यह अखरता अवश्य था पर उनके संस्कारों ने अपने पति की इस एकप्रियता को स्वीकार ही कर लिया था। उन्होनें भी सदा राजकीय और सामाजिक कार्यों में दोनों रानियों को समुचित सम्मान दिया। क्या करें पर व्यक्तिगत क्षणों में उन्हें कैकेयी का सानिध्य ही भाता था।


दशरथ अपने जीवन में कैकेयी के व्यवहार के विश्लेषण में लगे थे कि संभवतः कोई सूत्र मिल जाये जिससे यह अनर्थ होने से बच जाये। अपने पति और राजा पर इतना अधिकार पाकर कैकेयी का व्यवहार और भी उदार हो चला था। एक पुत्र की इच्छा थी और वह भी यज्ञ द्वारा पूरी हो गयी थी। एक नहीं, वरन चार पुत्रों पर कैकेयी का स्नेह देखते ही बनता था, विशेषकर राम उसे अत्यन्त प्रिय थे। वहीं राम थे जो अपनी माँ से अधिक आदर माँ कैकेयी को देते थे। सब कुछ तो ठीक चल रहा था, फिर मुझसे भूल कहाँ हुयी, दशरथ पुनः अचेत हो गये।


मैंने बिना कैकेयी से परामर्श लिये राम को सिंहासन देने का निर्णय ले लिया, कहीं उससे तो कैकेयी आहत नहीं हुयी है? यदि ऐसा होता तो सारा क्रोध मुझ पर होता पर कैकेयी के वरों में लक्ष्य तो राम हैं। इतना आदर और प्रेम पाने के बाद भी कैकेयी राम के प्रति इतनी निर्दयी क्यों बनी हुयी है, यह दशरथ की बुद्धि से परे था। क्या किसी ने कैकेयी को भरा है? वैसे तो कैकेयी स्वतन्त्र विचारधारा रखती है और उसे प्रभावित कर पाना सबके बस की बात नहीं है। शोक और सोच से दशरथ का हृदय फटा जा रहा था।


सुमन्त्र आते हैं, कैकेयी उन्हें राजा की ओर लक्ष्य कर कुछ आदेशित करती हैं, सुमन्त्र वहीं खड़े रहते हैं। हा, पुनः कठोर वचन! हा, कैकेयी को क्या हो गया हैं ईश्वर? राम को बुलाने के लिये इतनी व्यग्रता, इतना क्रोध। दशरथ सुमन्त्र को अनमने हो संस्तुति देते हैं। सहसा राजा कैकेयी के बारे में सोचना बन्द कर देते हैं और इस असमंजस में पड़ जाते हैं कि राम का सामना कैसे कर पायेंगे वह? क्या कहेंगे राम से? किस अपराध के लिये वन भेजेंगे उन्हें? दशरथ निर्णय ले चुके थे, वह शान्त ही रहेंगे। संभवतः राम की विनम्रता या वीरता इस अपार भीषण निर्णय को बदल सके।


राम आते हैं, सारा वार्तालाप सुन कर और राम की निश्छल पितृभक्ति देखकर दशरथ का दुख और भी गाढ़ा हो जाता है, वह पुनः अचेत हो जाते हैं।