मुश्किल है ढोना कृतघ्नता,
चुभते अब समझौते भी हैं ।
अर्पण जो तुझको करने हैं,
जाने कितने ऋण बाकी हैं ।।
रमकर तेरे उपकरणों में,
चिन्तन तेरा अनुपस्थित था ।
खोकर मैं अपनी दुनिया में,
स्वार्थ-अन्ध हो भूल गया था ।।
चित्रण तेरा कहाँ बनाता ?
मुझमें तो सामर्थ्य नहीं है,
भिक्षुक भी क्या दे सकता है ?
बूँदों का अस्तित्व कहाँ तक,
तृप्त सिन्धु को कर सकता है ।।
कौन क्षितिज को छू सकता है ?
जीवन तेरी बिन्दु-देन है,
अनुरागी तू, शाश्वत दाता ।
अनत कृपा बहती आती है,
बिन तेरे मैं कहाँ व्यक्त था ।।
खड़ा हुआ निरुपाय, विधाता ।