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3.11.12

चलो अपनी कुटिया जगमगायें

सतर्कता सप्ताह चल रहा था, समापन के समय विशिष्ट अतिथि बुलाये जाते हैं जो अधिकारियों और कर्मचारियों की बड़ी बैठक को सम्बोधित करते हैं, सब ध्यानमग्न हो सुनते हैं। यथासंभव उस बैठक में उपस्थित रहना होता है, कि कहीं ऐसा न हो कि अनुपस्थिति का अर्थ सतर्कता की अवहेलना के रूप में ले लिया जाये। मुख्यतः दो विशिष्ट अतिथि बुलाये जाते हैं। एक जो स्वयं सरकारी सेवाओं के उच्चपदों में रहे हों और अपने सेवाकाल में अपनी निष्कलंक छवि को बचाये रखे हों, संभवतः इस बात का विश्वास देने के लिये कि यह आचरण सर्वथा असंभव सा नहीं हैं और उदाहरण साक्षात उपस्थित हैं। दूसरे जो आध्यात्मिक क्षेत्र से संबंध रखते हों, संभवतः इस बात को समझाने के लिये कि सदाचरण और अच्छा जीवन सामाजिक जीवन के साथ साथ आध्यात्मिक जीवन की भी आवश्यकता है और अपनी आवश्यकतायें कम करके भी इस जगत में रहा जा सकता है।

पिछली चार वर्षों की बैठकों में आठ विशिष्ट अतिथियों के विचार सुन चुका हूँ। हर बार बहुत अच्छा लगता है सुनकर, सबको ही अच्छा लगता होगा। कई बार बड़ी बड़ी बातें होती हैं, प्रभाव कितना पड़ता होगा लोगों पर, ज्ञात नहीं। कभी कोई बहुत छोटी सी बात कहता है जा मन में आकर लग जाती है, एक विशिष्ट प्रभाव छोड़ जाती है। बहुत कुछ निर्भर करता होगा मनःस्थिति पर और उतना ही प्रभाव पड़ता होगा वातावरण का भी। इस बार वातावरण पिछले वर्षों से कहीं अधिक ऊष्मा लिये हुये था। जितना तापमान हमारे टीवी का हो जाता होगा, उससे कहीं अधिक आँखें और मस्तिष्क का हो जाता है हर बार घटनाक्रम को देखकर। इस बार वातावरण पिछले वर्षों की तुलना में अधिक उत्सुकता भरा था, वहाँ बैठे श्रोताओं के चेहरे से वह स्पष्ट था।

पता नहीं क्यों पर जब आप यह सोचकर बैठे हों कि आपकी एकाग्रता में विघ्न न पड़े, उसी समय सारी दुनिया को सूझती है आप तक पहुँचने के लिये। विशिष्ट अतिथियों का सम्बोधन चल रहा था और मैं बार बार अपने मोबाइल के काँपने से व्यथित था। हर बार कम से कम यह देखना तो आवश्यक हो जाता था कि फोन किसका है, आवश्यक हो तो धीरे से फुसफुसा कर बतिया लें, नहीं तो बैठक में व्यस्त होने का छोटा सा संदेश भेज कर काम चला लें। इन्हीं दो क्रियाओं में पूरा ध्यान बटा हुआ था, शेष जो भी बीच बीच में शेष बच रहा था, विशिष्ट अतिथियों के सम्बोधन को सुनने के प्रयास में लगा हुआ था।

बड़ी समस्या है, जब भी किसी एक वस्तु में एकाग्रता स्थापित करता हूँ, दूसरी उसमें बाधा डाल देती है। मैे सुनना चाह रहा हूँ कि कैसे धन के प्रभाव से शापित वातावरण में भी सीमित धन और संसाधनों के साथ और अधिक प्रसन्न रह सकते हैं? सुनना चाह रहा हूँ कि कैसे सरकारी धन का सदुपयोग सुनिश्चित कर देश को विकास के अग्रतम मानकों तक ले जाया जा सकता है? कहाँ एक ओर इतना बड़ा ध्येय और कहाँ बार बार मोबाइल का काँप उठना, मोबाइल पर बतियाना भी आवश्यक है, भविष्य के महत लक्ष्यों के लिये वर्तमान को भी चुप नहीं कराया जा सकता है। मन की ईश्वर ने सुन ली, अगले २० मिनट तक कोई फोन नहीं आया, ध्यान सुनने में लगा दिया।

रामकृष्णमिशन के स्वामीजी थे, वयोवृद्ध थे और चर्चा का आध्यात्मिक पक्ष रख रहे थे। नाम ढंग से याद नहीं आ रहा है, आप समझ सकते हैं कि आधुनिक जीवनशैली ने मानसिक रूप से हम सबको कितना क्षीण बना दिया है, पाँच मिनट पहले जिनका परिचय दिया गया, वह भी याद नहीं रहा। मोबाइल में हजारों से अधिक नाम संचित पर जिन्हें वर्तमान में सुन रहा, उनका नाम ही ध्यान से उतर गया। मन पर अधिक दवाब नहीं डाला और सम्बोधन सुनने में लग गया।(नाम स्वामी हर्षानंदजी है, आभार देवेन्द्रदत्तजी)

रवीन्द्रनाथ टैगोर की किसी कविता का संदर्भ था। भावार्थ कुछ इस प्रकार था।

सूरज अस्त हो रहा है, क्षुब्ध है, दिन भर स्वयं दहक कर सारे विश्व को प्रकाश देने का महत कार्य किया था। अस्त होने में बस कुछ ही समय शेष है, सोच रहा है कि उसके जाने के बाद क्या होगा? क्या होगा उन स्थानों का, जो अभी तक स्पष्ट दिखायी देते हैं। किसी को संशय नहीं उनके बारे में, क्योंकि वे साक्षात दिखायी पड़ते हैं। सूरज नहीं रहेगा तो उनके अस्तित्व के बारे में संशय हो जायेगा। अँधेरे में उन्हें असहजता लगती है, जो पारदर्शिता के, जो स्पष्टता के आराधक हैं। सबको सब दिखायी पड़े, सबको सबका सुख दिखे, सबको सबका दुख दिखे, सबको सबके कर्म दिखें, सबको सबके दुष्कर्म दिखें। आज वही सूरज अस्त हो रहा है, आज प्रकाश का स्रोत अस्त हो रहा है। विश्व को नहीं ज्ञात कि क्या होने वाला है, पर जिसने प्रकाश फैलाया है, वह बस इस चिन्ता में घुला जा रहा है कि उसके जाने के बाद विश्व का क्या होगा?

उस उत्तराधिकारी को ढूढ़ रही थी सूरज की आँखें जो उसके अस्त होने के बाद भी वैसा ही प्रकाश फैला सके। सूरज को जब निराशा सी लगने लगी, डूबने में बस कुछ क्षण ही बचे तब एक छोटे से दिये ने बोलना प्रारम्भ किया।

मुझे ज्ञात है कि मैं बहुत छोटा हूँ, मुझमें इतनी सामर्थ्य भी नहीं कि आपके सम्मुख खड़ा होकर कुछ कह पाऊँ, आपके महत कार्य को समझ तक पाऊँ। पर हे सूरज,मैं आपको बस इतना विश्वास दिला सकता हूँ, कि आज रात के लिये और इस छोटी कुटिया के भीतर मैं अँधेरा नहीं होने दूँगा। कल मेरा अस्तित्व रहे न रहे, कल मेरी लौ जीवित रहे न रहे, कल मुझे ऊर्जा मिले न मिले, बस इतना विश्वास दिलाता हूँ कि कम से कम इस जगह पर मैं रात भर मोर्चा सम्हाले रहूँगा।

बात बहुत छोटी की दिये ने, अपने आकार के अनुपात में, पर उसका विस्तार वृहद था, उसका उत्तर सूरज का सन्तोष था, इस बात का सन्तोष कि जब वह कल वापस आयेगा तो उसे कम से कम इस कुटिया में अपना कोई जाना पहचाना सा दिखेगा। कोई दिखेगा जो उसके आदर्शों को जीवित रखेगा, स्वयं जलकर भी, स्वयं दहक कर भी।

तभी किसी विशेष कार्य के कारण नियन्त्रण कक्ष जाना पड़ गया, और अधिक सम्बोधन न सुन पाया, पर स्वामीजी के वे शब्द मन में अनुनादित होते रहे, कि हे सूरज, आप दिन सम्हालो, आप विश्व सम्हालो। रात हम हाथ से निकलने नहीं देंगे, हम इस कुटिया को जगमगायेंगे और प्रतीक्षा करेंगे उस सुबह की जब सूरज पुनः क्षितिज पर जगमगाने लगेगा।