आस जगी थी, लगा लगन में,
उड़ता पंछी नील-गगन में,
ताल समय की, थापों पर जो,
झूम रहा मन अपना ही था ।।१।।
उत्सुकता के फूल खिले थे,
दृश्य राह के अलबेले थे,
आशाओं से संचारित और
आनन्दित मन अपना ही था ।।२।।
अनुभूतित थी भारहीनता,
वेग व्यवस्थित था जीवन का,
शान्ति-झील की सुखद नाव पर
आत्मरमा मन अपना ही था ।।३।।
मेरा तेरा भेद नहीं था,
विमल रूप था अन्तरतम का,
प्यार लुटाता, सकल जगत को,
मुग्ध-मुदित मन अपना ही था ।।४।।
सदा सभी के साथ चला यह,
हाथों में ले हाथ चला यह,
भीड़ भरे बाजारों में पर,
बिछड़ गया, मन अपना ही था ।।५।।