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13.7.11

प्यार छिपाये फिरता हूँ

छिपी किसी के मन में कितनी गहराई, मैं क्या जानूँ?
आतुर कितनी बहने को, हृद-पुरवाई, मैं क्या जानूँ?

कैसे जानूँ, लहर प्रेम की वेग नहीं खोने वाली,
कैसे जानूँ, प्रात जगी जो आस नहीं सोने वाली।

धूप, छाँव में बह जाता दिन, आ जाती है रात बड़ी,
बढ़ता रहता, खुशी न जाने किन मोड़ों पर मिले खड़ी।

एक अनिश्चित बादल सा आकार बनाये फिरता हूँ,
सकल विश्व पर बरसा दूँ, वह प्यार छिपाये फिरता हूँ।

14.5.11

हर दिल जो प्यार करेगा

अब आप बोल उठेंगे कि गाना गायेगा। कैसा विचित्र संयोग है कि पहला कवि तो वियोगी था, कविता लिख गया, अब उस कविता को गाने के लिये वही आगे आयेगा, जो प्यार करेगा। प्रकृति में यह नियम कूट कूट के घुला है कि हर प्रभाव अपने स्रोत के विरोध की दिशा में होता है।

प्रकृति की गति तो अकल्पनीय है पर संगम के राजकपूर के बारे में एक अपनापन सा लगता है, लहराता हुआ उसका एकांगी प्यार, उस प्यार का निश्छल उछाह, उसका उन्मुक्त प्रकटन, अधिकारजनित, नकार दिये जाने के संशय व भय से कोसों दूर, रुदन-युगल के ऊपर बादल सा बरसता और अपनी बात कहता, हर दिल जो प्यार करेगा, वह गाना गायेगा।

राजकपूर की अधिकारपूर्ण प्रेमाभिव्यक्ति इसी गीत के माध्यम से होती है। निश्चय ही हर दिल जो प्यार में डूबता है वह गाना गुगुनाने लगता है। अब दो और प्रश्न उठते हैं। पहलाक्या हर प्यार करने वाला निश्चय ही गाना गाता है? दूसराक्या हर गाना गाने वाला प्यार करता है? मुझे तो दोनों ही प्रश्नों के उत्तर नकारात्मक लगते हैं। बहुत लोग तो ऐसे प्यार करते हैं कि उसको भी नहीं पता चलता है, जिससे वे प्यार कर बैठते हैं, बड़ा चुपचाप सा प्यार होता है वह, गाना तो कभी नहीं गाया जाता है। दूसरी ओर बहुत लोग ऐसे भी होते हैं जो अपनी गाते रहते हैं, अपने मन की बताते रहते हैं, पर प्यार के उपहार से कोसों दूर रहते हैं। मुझे तो इन दोनों प्रश्नों के उत्तर सकारात्मक नहीं मिले जिस पर आधारित गणितीय प्रमेय के आधार पर प्रेम और गाने को एकरूप समझा जा सकता हो।

पारिवारिक परिवेश में सत्य कितना भी स्पष्ट हो पर श्रीमतीजी की सहमति पाने तक त्रिशंकु सा लटका रहता है। श्रीमती जी को राजकपूर के गाने पर चौतरफा विश्वास है और उन्हें यहाँ तक लगता है कि बिना गाना गाये मन में प्यार उत्पन्न ही नहीं हो सकता है। पर यही कारण नहीं है कि मेरी गीत गाने में बहुत रुचि है, बचपन से धुन है गुनगुनाने की। जब रौ में होता हूँ तो कहीं भी गुनगुनाने लगता हूँ। जब तक पता लगता कि कहाँ पर खड़ा होकर गा रहा हूँ तब तक दो तीन पंक्तियाँ सुर में ढलकर निकल भागती हैं। बचपन की लयात्मक लहरियाँ अभी भी जीवित हैंअभी भी घर में सहसा ही गा उठता हूँवृन्दावन का कृष्ण कन्हैयासबकी आँखों का तारा।

पिछले कई दिनों से घर में सुरों के उद्गार नहीं उठ रहे थेकारण मेरी व्यस्तता का थाबंगलोर में ही वाणिज्य के स्थान पर परिचालन का नया दायित्व सम्हालने के कारण भारी भरकम ट्रेनों और इंजनों से आत्मीयता बढ़ गयी थी। घर में टेलीफोन पर पूर्णनिमग्ना हो घंटे भर बतियाने के बाद कण्ठ गाने योग्य बचता ही नहीं है। गाना कम हो गयाघर के वातावरण में स्वर गूँजने कम हो गये,  श्रीमतीजी को लगने लगा कि प्यार कम हो गया। आप कितना भी समझा लें कि न गाने से प्यार कम नहीं होता हैकण्ठ भले ही न कुछ कहे पर मन गुनगुनाता रहता है। श्रीमतीजी तो मानती ही नहीं, अब राजकपूर ने जो इतना जोर जोर से गा दिया है, बिल्कुल स्पष्ट,  हर दिल जो प्यार करेगावो गाना गायेगा।

हमारे तर्क धरे के धरे रह गयेगाना तो गाना ही पड़ेगा। स्वयं नहीं गायेंगे तो गवाया जायेगा। इसी बीच हमारा जन्म दिवस आया। हम तो जीवन को ही उपहार मानते हैं अतः उपहार माँगते नहीं। सहसा सामने एक बड़ा सा उपहार देखकर आश्चर्य हुआ। उत्सुकतावश खोला तो एक करोओके उपकरण निकला। टीवी स्क्रीन से जोड़ामनपसन्द गाना चुना और गाने लगाआनन्द आ गयाएक के बाद गाने गाये।

श्रीमतीजी के चेहरे पर मुस्कान थी। पति गा रहे हैं, अब राजकपूरजी के अनुसार प्यार भी जागेगा।

हर दिल जो प्यार करेगावह गाना गायेगा,
गाना रूखे सूखे दिल में प्यार जगायेगा।