रामायण समाप्त हो गयी, रावण रूपी समस्या समाप्त हो गयी, राम प्रसन्नचित्त अयोध्या लौट आये, उनके स्वागत में दिये जलाये गये, देवताओं ने पुष्पवर्षा की। हम सब भी निश्चिन्त हो गये कि अब कोई युद्ध नहीं होगा, बुराई का समूल नाश हो गया है, रावण का उदाहरण दुष्टों के हृदयों में स्थायी डर बन कर धड़केगा। आनन्द और आश्वस्तता के वातावरण में इस बात पर किसी का ध्यान नहीं गया कि हम सबको कुम्भकर्ण का श्राप लग गया है।
जहाँ एक ओर रामायण के सारे चरित्रों ने अपने चरित्र को अपनी बातों व अपने कर्मों से प्रकाशित किया और उन सबको इस बात के लिये पर्याप्त अवसर भी मिला, दुर्भाग्यवश यह अवसर कुम्भकर्ण को नहीं मिल पाया। बलात नींद से उठाये जाने के बाद थोड़ी सी शान्तिवार्ता और तत्पश्चात युद्ध में अवसान। ऐतिहासिक साक्ष्य तो नहीं है कि कुम्भकर्ण ने आने वाली पाढ़ियों को कोई श्राप दिया हो, पर थोड़ा अवलोकन करने से यह तथ्य स्वयं उद्घाटित हो जाता है।
रामराज्य की आस थी, शाश्वत, पर विश्व क्या पुनः वैसा हो पाया? नहीं, एक शान्तिप्रिय का श्राप हम सबको लग गया, कुम्भकर्ण मरा नहीं वरन हम सबके अन्दर आकर सो गया। अब उसका क्रोध न अपने भाई रावण से है, न अपने हन्ता राम से है, न उसका विरोध सच से है, न झूठ से है, उसका तो विरोध तो उनसे है जो लोग नींद में विघ्न डालते हैं और उनसे तो और भी है जो युद्ध के लिये उकसाते हैं।
संभवतः सोते सब रहते हैं पर इस तथ्य को सगर्व स्वीकार कर लेना अध्यात्मिकता की पहली किरण है। जागने का अभिनय करना जागने से कहीं अधिक कष्टकर है।
एक शान्तिप्रिय के बलिदान के श्राप की परिणति ऐसी स्याह शान्ति के रूप में होगी कि न प्रसन्न होते बनेगा और न ही दुख को व्यक्त करते बनेगा। अजब सी शान्ति है, विस्फोट के पहले सी। यह श्राप कैसे उतरेगा, कोई राह नहीं दीखती। हम सबके अन्दर सो रहे उदासीन कुम्भकर्ण को मारने के लिये अब तो आ जाओ राम, यह शान्ति काटती है।