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3.7.13

है अदृश्य पर सर्वव्याप्त भी

एक बहुत रोचक कहावत है, प्रबन्धन में। कहते हैं कि सबसे अच्छा प्रबन्धक वह है जो तन्त्र को इस प्रकार से व्यवस्थित करता है जिससे वह स्वयं अनावश्यक हो जाये। बड़ा सरल सा प्रश्न तब उठ खड़ा होगा कि जब अनावश्यक हो गये तब तन्त्र से बाहर क्यों नहीं आ जाते, क्यों व्यर्थ ही तन्त्र का बोझ बढ़ाना? तर्क में तनिक और दूर जायें तो प्रबन्धक का पद स्वक्षरणशील हो जायेगा, जो भी सर्वोच्च पद पर रहेगा, अनावश्यक हो जायेगा? कहावत को और संबंधित प्रश्न को समझने के लिये थोड़ा गहराई में उतरना होगा।

एक अच्छे प्रबन्धक को भौतिक दिखना आवश्यक नहीं है, पर तन्त्र की गतिशीलता में उसकी उपस्थिति परोक्ष है। वह प्रक्रियाओं को इस प्रकार व्यवस्थित करता है कि वे स्वतःस्फूर्त हो जाती हैं, घर्षणमुक्त रहती हैं, अपने आप गतिमय बनी रहती हैं।

तो देखा जाये तो उपरोक्त कहावत सामान्य स्थितियों के समतल के लिये है, न कि तन्त्रगत आरोह व अवरोह के लिये। जब भी तन्त्र को आरोह पर चलना होता है, अधिक उत्पादक होना पड़ता है, अधिक गुणवत्ता लानी होती है, तो प्रबन्धन की आवश्यकता पड़ती है। इसी प्रकार जब समस्या आती है, जब परिस्थितियाँ विरुद्ध होती हैं, तो उन्हें साधने के लिये प्रबन्धन की आवश्यकता पड़ती है। इस प्रकार देखें तो प्रबन्धक की उपस्थिति तो अनिवार्य है, पर सामान्य कार्यशैली में उसका रहना अनावश्यक है।

अब प्रश्न उठ खड़ा होता है कि कब प्रबन्धन अपने आप को आवश्यक समझे, या कब प्रक्रिया में हस्तक्षेप करे? अच्छा तो यही हो कि छोटी मोटी प्रगति और छोटी मोटी समस्याओं का अवसर प्रबन्धन के क्षेत्र के बाहर ही हो। अपने अन्तर्गत कार्य करने वालों को उनके कार्यक्षेत्र में जितना अधिक आयाम दिया जा सके, प्रबन्धन को उतना ही कम हस्तक्षेप करना होगा। प्रबन्धन को कार्यक्षेत्र के जिन मानकों और तथ्यों पर दृष्टि रखनी हो, वे दैनिक कार्य के मानकों से कहीं ऊपर और सर्वथा भिन्न हो, तभी कहीं जाकर प्रबन्धक अपनी सार्थकता और उपयोगिता सिद्ध कर सकता है। सामान्य कार्यशैली के कहीं ऊपर और कहीं नीचे ही प्रबन्धक का कार्य प्रारम्भ होता है।

ऐसा बहुधा होता है कि तन्त्र ठीक प्रकार से चल रहा हो और प्रबन्धक को लगने लगे कि उसकी उपस्थिति तन्त्र में दिख नहीं रही है। यही वह समय होता है जब प्रबन्धक अपनी उपयोगिता सिद्ध करने के लिये आतुर हो जाता है और तन्त्र में अनावश्यक हस्तक्षेप करने लगता है। अनावश्यक हस्तक्षेप न तन्त्र के लिये अच्छा होता है और न ही कार्य में लगे हुये लोगों के लिये। प्रबन्धक को अपनी व्यग्रता और ऊर्जा सम्हाल कर रखनी चाहिये, उस समय के लिये, जब वह सच में आवश्यक हो, जब तन्त्र को बहुत ऊपर ले जाना हो या नीचे जाने से बचाना हो।

तन्त्र कितना स्वस्थ और सुदृढ़ है, उसका सही आकलन आपात परिस्थितियों में होता है। समस्यायें आती हैं, गहरी आती हैं और सबके पास आती हैं। कितना शीघ्र आप संचित ऊर्जा को क्रियाशील करते हैं और कितना शीघ्र सामान्य स्थितियों में वापस लौट आते है, यह तन्त्र और प्रबन्धक की सुदृढ़ता के मानक हैं। यही वह समय होता है जब प्रबन्धक का ज्ञान, अनुभव और ऊर्जा काम में आती है।

प्रबन्धक बनना अपनी चिन्हित राहों से कहीं आगे बढ़ने का कर्म है। हमारा रुझान उसी पथ की ओर होता है जिन्हें हम पहले से जानते हैं। प्रबन्धक बन कर भी हम वही करते रहना चाहते हैं जो हम पहले करते आये हैं, संभवतः वही करने में हम मानसिक रूप से तृप्त अनुभव भी करते हैं। पर वह मानसिकता उचित नहीं, उसे विस्तार ग्रहण करना होता है, तनिक और ऊपर उठ कर अन्य पक्षों पर ध्यान केन्द्रित करना होता है। इस प्रकार हम ऊपर बढ़ते बढ़ते, तन्त्र की सीढ़ी में अपना स्थान रिक्त करते हुये बढ़ते हैं और आने वालों को वह स्थान लेने देते हैं।

जो हमें आता है और जो हमें करना चाहिये, इन दो तथ्यों में बहुत अधिक अन्तर है। हम यदि वही करते रहेंगे जो हमें आता है तो कभी भी विकास नहीं हो पायेगा। हमें तो वह करना और समझना चाहिये जो आवश्यक हो, न केवल आवश्यक हो वरन करने के योग्य भी हो।

इस विधि से तन्त्र विकसित करने के बड़े लाभ हैं, आप निर्णय प्रक्रिया को अपने कनिष्ठों को सौपना प्रारम्भ करते हैं, आप अपनी दृष्टि का विस्तार करते हैं, आप तन्त्र की गति और गुणवत्ता को बल देते हैं। आप अपने जैसे न जाने कितने और कुशल प्रबन्धक तैयार करने की प्रक्रिया में बढ़ जाते हैं।

अब हम कितना भी तन्त्र विकसित कर लें, परम प्रबन्धक जी की तरह क्षीरसागर में विश्राम करने की स्थिति फिर भी नहीं आ सकती। पर जब भी उस तरह जैसा कुछ अनुभव होता है, जब कभी भी अपने कार्यालय में बिना किसी काम के आधा दिन निकल जाता है तो दो संशय होने लगते हैं। पहला, कि कहीं भूलवश हमारे द्वारपाल ने बाहर की लाल बत्ती तो नहीं जला दी है। दूसरा, कि कहीं तन्त्र इतना विकसित तो नहीं हो गया है कि उसे हमारी आवश्यकता ही नहीं पड़ रही है, प्रबन्धन की रोचक कहावत कहीं सच तो नहीं हुयी जा रही है?