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31.12.11

ध्यान कहाँ है पापाजी ?

ब्लॉगजगत के ताऊजी से सदा प्रभावित रहे अतः पहली बार स्वयं ताऊ बनने पर अपने भतीजे से भेंट का मन बनाया गया। उत्तर भारत की धुंधकारी ठंड अपने सौन्दर्य की शीतलहरी बिखेरने में मगन थी, दिल्ली के दो सदनों की राजनैतिक गरमाहट भी संवादों और विवादों की बर्फ पिघलाने में निष्फल रही, कई ब्लॉगरों के चाय, कम्बल, अलाव आदि के चित्र भी मानसिक ऊर्जा देने में अक्षम रहे। गृहतन्त्र की स्वस्थ परम्पराओं का अनुसरण करते हुये हमने भी उत्तर भारत की संभावित यात्रा का प्रस्ताव भोजन की मेज पर रखा, उपरिलिखित तथ्यों के प्रकाश में हमारा प्रस्ताव औंधे मुँह गिर गया, वह भी ध्वनिमत से। संस्कारी परम्पराओं का निर्वाह करते हुये, उठ खड़े हुये अवरोध के बारे में जब हमने अपने पिताजी को बताया तो उन्होने भी अपने पौत्र और पौत्री की बौद्धिक आयु हमसे अधिक घोषित कर दी, कहा कि इतनी ठंड में आने की कोई आवश्यकता नहीं है। श्रीमतीजी सदा ही बहुमत के साथ मिलकर मन्त्री बनी रहती हैं, तो हम भी निरुपाय और निष्प्रभावी हो ब्लॉग का सहारा लेकर परमहंसीय अभिनय में लग गये।

बच्चों की छुट्टियाँ श्रीमतीजी के हाथ में तुरुप का इक्का होती हैं, आपका हारना निश्चय है। लहरों की तरह उछाले जाते, उसके पहले ही हमने गोवा चलने का प्रस्ताव जड़ दिया। सब हक्के बक्के, संभवतः विवाह के १४वें वर्ष में सब पतियों के ज्ञानचक्षु खुल जाते हों। लहरों के साथ खेलने के लिये भला कौन सहमत न होगा, गोवा-गमन को हमारा निस्वार्थ उपहार मान हमें स्नेहिल दृष्टि में नहला दिया गया, यह बात अलग थी कि हमने भी वहाँ पर अपने एक बालसखा से मिलने की योजना बना ली थी, वह भी बिछड़ने के २५ वर्ष के बाद।

सागर के साथ संस्कृति को जोड़ते हुये, हम लोग हम्पी होते हुये गोवा पहुँचे। हम्पी संस्कृति के ढेरों अध्याय समेटे है और विवरण के पृथक प्रयास का अधिकारी है। गोवा में लहरों का उन्माद उछाह हमारी प्रतीक्षा में था, लहरों के साथ खेलते रहने की थकान, उसके बाद महीन रेत पर निढाल होकर घंटों लेटे रहना, नीचे से मन्द मन्द सेंकते हुये रेतकण और ऊपर से सूरज की किरणों से आपकी त्वचा पर सूख जाते नमककण, प्रकृति अपने गुनगुने स्पर्श से आपको अभिभूत कर जाती है। बच्चे कभी शरीर पर तो कभी पास में रेत के महल और डायनासौर बनाते रहे, जब कभी आँख खुलती तो बस यही लगता कि कैसे यह गरमाहट और निश्चिन्तता उत्तरभारत और विशेषकर दिल्ली पहुँचा दी जाये।

पिछली यात्राओं में चर्च आदि देखे होने के कारण हमने गोवा और उसके बीचों पर निरुद्देश्य घूमने का निश्चय किया। हमें तो लग रहा था कि हम आदर्श पर्यटक के गुण सीख चुके हैं अतः हमारे द्वारा उठाये आनन्द का अनुभव अधिकतम होगा, पर इस यात्रा में भी कुछ सीखना शेष था, वह भी अपने पुत्र पृथु से।

यद्यपि हम छुट्टी पर थे पर फिर भी कार्य का मानसिक भार कहीं न कहीं लद कर साथ में आ गया था। बच्चों को छुट्टी में पढ़ने के लिये कहना एक खुला विद्रोह आमन्त्रित करने जैसा है, पर हम लोगों के लिये छुट्टी में भी अपने कार्यस्थल से जुड़ाव स्वाभाविक सा लगता है। लगता है कि हम सब किसी न किसी जनम में एटलस रहे होंगे और पृथ्वी के अपने ऊपर टिके होने की याद हमें रह रहकर आती है। या ऐसा हो कि हम पतंगनुमा मानवों को कोई डोर आसमान पर टाँगे रहती है और उस डोर के नहीं रहने पर हमारी अवस्था एक कटी पतंग जैसी हो जाती है, समझ में नहीं आता हो कि हम गिरेंगे कहाँ पर।

जिन दिनों हम गोवा में थे एयरटेल की सेवायें पश्चिम भारत में ध्वस्त थीं। नेटवर्क की अनुपस्थिति हमें हमारे नियन्त्रण कक्ष से बहुत दूर रखे थी। अपने आईफोन पर ही हम अपने मंडल के स्वास्थ्य की जानकारी लेते रहते हैं और समय पड़ने पर समुचित निर्देश दे देते हैं। यदि और समय मिलता है तो उसी से ही ब्लॉग पर टिप्पणियाँ करने का कार्य भी करते रहते हैं। न कार्य, न ब्लॉग, बार बार हमारा ध्यान मोबाइल पर, हमारी स्थिति कटी पतंग सी, मन के भाव चेहरे पर पूर्णरूप से व्यक्त थे।

पृथु को वे भाव सहज समझ में आ गये। वह बोल उठे “नेटवर्क तो आ नहीं आ रहा है तो आपका ध्यान कहाँ है पापाजी।“ वह एक वाक्य ही पर्याप्त था, मोबाइल जेब में गया और पूरा ध्यान छुट्टी पर, बच्चों पर, गोवा पर और सबके सम्मिलित आनन्द पर।

14.7.10

खिलौनों की वेदना - Toy Story 3

खिलौने बतिया रहे हैं कि अब उन्हें उतना प्यार नहीं मिलता है जितना पहले मिलता था। बच्चा महोदय अब बड़े हो गये हैं और उनकी प्राथमिकतायें बदल गयी हैं। चलो भाग चलते हैं। कहाँ? किसी ऐसे स्थान पर जहाँ पर ढेर सारे बच्चे हों । कहाँ? डे केयर सेन्टर। विरोध के स्वर दबा दिये जाते हैं और सब किसी तरह वहाँ पहुँच जाते हैं। बुरे बर्ताव से मोह भंग होता है और सब वापस आ जाते हैं। बच्चा महोदय भी भावुक हो एक नन्ही प्यारी बिटिया को सारे खिलौने दे जाते हैं। सुखान्त।

बच्चे मल्टीप्लेक्स के बाहर निकले तो प्रसन्न थे। उन्हें अपने खिलौनों की वेदना फिल्म देखकर ही समझ में आयी। लोहा गरम था तो हमने भी पुराने खिलौनों को किसी गरीब बच्चे को दिलवाने की बात मनवा ली। 3-D में फिल्म का आनन्द दूना हो गया था और रही सही कसर पॉपकार्न आदि स्नैक्स ने पूरी कर दी थी। स्टीव जाब्स निर्मित पिक्सार की तकनीक ने कार्टून चरित्रों को भावजनित जीवन्तता दे दी थी।

खिलौने तो मानवीय ढंग से बतियाये और मनोरंजन कर के चले गये पर अपनी खिलौनीय वेदना का मानवीय पक्ष हमारे हृदय में उड़ेल गये। छोटी छोटी बातों में हिल जाने की और बड़ी घटनाओं में अजगरवत पड़े रहने की हमारी विधा से लोग त्रस्त हों, उसके पहले हम सब ब्लॉग में उड़ेल कर सामान्य हो लेते हैं।

खिलौने क्यों, हम सबकी यही स्थिति है। भाव वही हैं, सन्दर्भ बदल जाते हैं। जिन्हें हम अपना समझने लगते हैं, वही हमारा मूल्य नहीं जानते। जिन पर प्यार की आशायें पल्लवित थीं, उनकी प्राथमिकतायें बदल गयी हैं।

और गहरे उतरें इस वेदना में। दिन में कितनी बार आप को लगता है कि जो आपकी योग्यता है और जो आप कर सकने में सक्षम हैं, उसका एक चौथाई भी आप नहीं कर पा रहे हैं। इतने कम में ही संतुष्ट हो जाना पड़ रहा है, हर बार, लगातार, कारण ज्ञात नहीं पर।

मैं खिलौना बन जाता हूँ और देखता हूँ कि शेष सब सिकुड़ कर बच्चा महोदय बन गये हैं। कभी सब के सब चाहते थे आपको, आपकी उपयोगिता थी। सब छोड़ देने को जी चाहता है, दूसरा विश्व अच्छा दिखने लगता है, डे केयर सेन्टर की भाँति। नयापन, अपने स्वभाव से अलग, बस नया सब कुछ। जीवन सब कुछ बदल लेने का हठ पकड़ लेता है, जो भी मिले।

क्या, मैं विद्रोही या तुम सब प्रेमहीन?

बदलाव भाता नहीं है पर। नये लोग भी मर्म नहीं समझते हैं। उनकी आशायें आपको निचोड़ने लगती हैं, जीवन रस से।

आप भागते हो, प्रश्न पूछते हो अपने मालिक से, असली मालिक, ईश्वर से। कोई उत्तर नहीं।

अन्ततः स्वयं को समझाने की समझ अवतरित हो जाती है, ज्ञानीजन जिसे बुद्धि कहते हैं।

हम सोफे के हत्थों पर टाँग धरकर लेटे हुये सोच रहे हैं, खिलौनीय वेदना। सब चाहते हैं हम बतियायें फिल्म के बारे में। लेटे हुये नींद घेर लेती है। अवचेतन में लहरें अभी भी प्रश्न के हिलोर लेती हैं ।

क्यों हृदय में आस जीवित? 
प्रेम का विश्वास जीवित?
हर समय ये नेत्र रह रह ढूढ़ते जिनको।
इस जगत को वेदना उपहार देकर,
काल को सब निर्दयी अधिकार देकर,
क्षीर सागर में कहीं विश्रामरत हैं वो।
क्षीर सागर में अभी विश्रामरत हैं वो।

30.6.10

30 जून 2010

आज का दिन मेरे लिये विशेष है । आज माँ सेवा-निवृत्त हो रही हैं । माँ के प्रति लाड़-प्यार के अतिरिक्त कोई और भाव मन में कभी उभरा ही नहीं पर आज मन स्थिर है, नयन आर्द्र हैं । लिख रहा हूँ, माँ पढ़ेगी तो डाँटेगी । भावुक हूँ, न लिखूँगा तो कदाचित मन को न कह पाने का बोझ लिये रहूँगा ।
कहते हैं जिस लड़के की सूरत माँ पर जाती है वह बहुत भाग्यशाली होता है। मेरी तो सूरत ही नहीं वरन पूरा का पूरा भाग्य ही माँ पर गया है। यदि माँ पंख फैला सहारा नहीं देती, कदाचित भाग्य भी सुविधाजनक स्थान ढूढ़ने कहीं और चला गया होता। मैंने जन्म के समय माँ को कितना कष्ट दिया, वह तो याद नहीं, पर स्मृति पटल स्पष्ट होने से अब तक जीवन में जो भी कठिन मोड़ दिखायी पड़े, माँ को साथ खड़ा पाया।

नये घर में, खेती से सम्पन्न घर की छोटी बहू को घर का सारा अर्थतन्त्र बड़ों के हाथ में छिना हुआ दिखा और पति का उस कारण से उपद्रव न मचाने का निश्चय भी। बिना भाग्य को कोसे व व्यर्थ समय गवाँये पहले अपनी पढ़ाई पूरी की और तत्पश्चात प्राइमरी विद्यालय में एक अध्यापिका के रूप में नौकरी प्रारम्भ की। एक नारी के द्वारा नौकरी करना कदाचित उस परिवेश के लिये एक अमर्यादित निर्णय था जिसका तत्कालीन सभी प्रबुद्धों ने प्रबल विरोध किया। परिवेशीय घुटन के बाहर परिवार का भविष्य है, इस तर्क पर ससुर के समर्थन को अपना सम्बल मान आधुनिका कहे जाने के सारे वाक्दंश सहे। मुझे गर्भ में सम्भवतः यही शिक्षा प्राप्त हुयी है, जुझारूपन की। माँ ने हृदय की अग्नि की आँच सदा अन्दर ही रखी और कभी व्यक्त भी हुयी तो परिश्रम व त्याग के रूप में, गृह-धारिणी के रूप में।

आज मैं, छोटा भाई व सबसे छोटी बहन, तीनों समुचित और उत्तम शिक्षा पाकर, अपने पैरों पर खड़े हैं, पर उसके पीछे माँ का अथक परिश्रम था जो स्मृतियों में अभी भी अप्रतिम धरोहर के रूप में संजोयें हैं हम सभी। माँ तो उसके बाद भी लगी रही कई और बच्चों का भविष्य बनाने में, कहती रही कि बच्चे अच्छे लगते हैं, मन लगा रहता है।

आज माँ सेवा-निवृत्त हो रही है।

बचपन नहीं भूलता है, माँ का पैदल 3 किमी विद्यालय जाना। कई बार हमने चिढ़ाया कि रिक्शा नहीं करती, पैसे बचाती है। हँस कर झूठ बोलती, नहीं, पैदल चलने से स्वास्थ्य ठीक रहता है। भगवान करे उस झूठ का सारा दण्ड मुझे मिलता रहे, शाश्वत, मेरे लिये बोला गया वह झूठ।

आज उस तपस्या का अन्तिम दिन है, आज माँ सेवा-निवृत्त हो रही है, 37 वर्षों की अथक व निःस्वार्थ यात्रा के पश्चात।

सरल-हृदया की आन्तरिक सहनीयता आज मेरी आँखों से टपक रही है, रुकना नहीं चाहती है।

पुरुष प्रधान इस जगत में मेरे हृदय को यदि किसी का पुरुषार्थ अभिभूत करता है तो वह मेरी माँ का।