न दैन्यं न पलायनम्
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12.2.11
विभावरी शेष, आलोक प्रवेश
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नित स्वयं से एक रार ठनती है, नित मैं हारता हूँ, दिन की मेरी पहली हार, मन की पहली जीत। जब उठता हूँ, सूर्यदेव अपनी विजय पर मुस्करा रहे हो...
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