न दैन्यं न पलायनम्
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27.8.14
कुछ हो वहाँ?
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एक क्रम है, एक भ्रम है, क्या पता, हम हैं कहां? तरल सी पायी सरलता, नियति बहते हम यहाँ। प्रकृति कहती, मानते हैं, परिधि अपनी जानते ...
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30.6.12
पर न जाने बात क्या है
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लखनऊ का असह्य ताप, प्रशिक्षण की गम्भीरता, सायं तरणताल में निस्पंद उतराना, कार्य से कहीं दूर आधुनिक मनीषी की तरह बहते दिन। जहाँ मन में एक अ...
65 comments:
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