अनुपस्थित अब तक जीवन से, थी अश्रुत्पादित यथार्थता,
दोषों का अम्बार दिखेगा, ऐसा मैने सोचा ना था ।
इस शतरंजी राजनीति में,
जाने क्यों पैदल ही मरते,
मानव, धन से सस्ते पड़ते ।
सब सच था, कुछ धोखा ना था ।
मानव इतना गिर सकता है, ऐसा मैने सोचा ना था ।।१।।
अब शासन में शक्ति उपासक,
अट्टाहस कर झूम रहे हैं ,
हो मदत्त गज घूम रहे हैं ।
पर दुख से मैं रोता ना था ।
क्रोधानल में ज्वलित हुआ जो, अश्रु-सिन्धु वह छोटा ना था ।।२।।
बर्बरता का जन्तु कभी,
मानव-संस्कृति में पला नहीं है,
सदियों से यह रीति रही है ।
यह भविष्य पर देखा ना था ।
अब आतंक-भुजाआें का बल, बढ़ता था, कम होता ना था ।।३।।
मानव का व्यक्तित्व-भवन,
कब से चरित्र पर टिका हुआ,
जो संस्कृति का आधार रहा ।
क्या खण्ड खण्ड हो जाना था ।
वह महारसातल को उन्मुख, क्या उस पथ पर ही जाना था ।।४।।