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12.6.13

खिड़की पर गिलहरी

घर की जिस मेज पर बैठ कर लेखन आदि कार्य करता हूँ, उसके दूसरी ओर एक खिड़की है। उसमें दो पल्ले हैं, बाहर की ओर काँच का, अन्दर की ओर जाली का, दोनों के बीच में लोहे की ग्रिल लगी है। दोनों पल्लों के बीच लगभग ४ इंच का स्थान है। जब कभी भी ऊपर की खिड़की खुली रहती है, नीचे के दोनों पल्लों के बीच आने जाने का रास्ता निकल आता है। बहुधा ऊपर की खिड़की खुली रहती है, हवा और प्रकाश दोनों ही आते रहते हैं। पिछले कुछ दिनों से बंगलोर में अत्यधिक वर्षा होने से ठंडक बढ़ गयी, तब खिड़की बन्द न कर, उस पर केवल एक पर्दा लगा दिया गया।

आज जब वह पर्दा ८-१० दिन बाद खोला तो उसमें एक गिलहरी के रहने का स्थान बन चुका था। पता नहीं इसके पहले वह कहाँ रह रही थी? संभवतः किसी पेड़ पर या किसी छत में निचले हिस्से में। वर्षा ने उस स्थान को गीला कर दिया होगा। बिल्ली आदि शत्रुओं से बचने के लिये वह क्या करे, तो उन दो पल्लों के बीच उसने अपना अस्थायी घर बना लिया। सूखी घास-फूस के कई टुकड़े लाकर उन्हें वृत्ताकार बिस्तर के रूप में सजा दिया है, एक रस्सी के रेशों को अपने छोटे छोटे दाँतों से निकाल कर एक हल्का गद्देदार आकार दे दिया है। एक बड़ा ही सुरक्षित, व्यवस्थित और विश्रामयुक्त स्थान का निर्माण कर दिया।

अब दुविधा मेरी थी। सर्वप्रथम आश्चर्य इस बात पर हो रहा था कि इतनी छोटी सी गिलहरी और इतनी व्यवस्थित बुद्धि, प्रयासरत श्रम और सार्थक निष्कर्ष। वह आधा घर बना चुकी थी और शेष के लिये दौड़ भाग कर रही थी। मैं सहसा सामने खड़ा था। एक मनुष्य की दो आँखें उसे देख रही थीं। ऐसा नहीं हैं कि मनुष्य से उसका व्यवहार सर्वथा नया है, उसके अनुभव और उसके पूर्वजों द्वारा सुनायी हुयी कहानियों में मनुष्य की छवि बहुत अच्छी तो नहीं होगी। वह स्तब्ध सी मुझे देख रही थी, हम दोनों के बीच में एक काँच का अन्तर था। दूसरी ओर से जाली से छनती हवा गिलहरी के रोयें हिला रही थी। एक अजब सा संवाद था, निर्दयी मनुष्य के हाथ और उसके घर के बीच एक चटखनी का अन्तर था। बेघर और अर्धनिर्मित घर के बीच १० दिन का श्रम था। सहृदय मनुष्य और गिलहरी के सुरक्षित भविष्य के बीच खिड़की पर खटकने वाला एक घोंसला था।

अब किस अन्तर को मनुष्य हटायेगा। देखा जाये तो वह स्थान मेरा था, प्रभात में जब प्रथम किरण आती है, जब भी सुवासित पवन बहती है, वह खिड़की ही प्रकृति से मेरा सम्पर्क स्थापित करती है। एक छोटा सा घोंसला, आपको खटक सकता है। मैं उस खिड़की पर अपना अधिकार माने बैठा था। दस दिन से वह स्थान उपयोग में न आने से गिलहरी उसे सुरक्षित मान बैठी थी और वहाँ अपना घर बनाने लगी थी।

दुविधा गहरी थी और निपटानी आवश्यक थी। आप कह सकते हैं कि मैंने दस दिन की ढील क्यों दे दी, यही कारण रहा कि गिलहरी ने अपना घर बना डाला। यदि मैं नियमित रूप से खिड़की खोलता रहता तो संभवतः यह स्थिति उत्पन्न न होती। मेरी ढील मेरा दोष है, गिलहरी का अज्ञान उसका दोष है। किसका दोष गाढ़ा है, कौन निर्णय करेगा? इस समस्या का क्या हल निकलेगा, किन सिद्धान्तों के आधार पर निकलेगा?

प्रमुख सिद्धान्त प्रकृति का आधार लिये है। मैं और गिलहरी, दोनों ही प्रकृति के अंग हैं। मेरे लिये मैं महत्वपूर्ण हूँ, गिलहरी के लिये वह स्वयं। इस विषय में गिलहरी के पूरे अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगा हुआ था और मेरे लिये प्रभात में खटकने वाली दृष्टि। गिलहरी को होनी वाली हानि मुझे होने वाली हानि से बहुत अधिक थी।

उस स्थान पर किसका न्यायपूर्ण अधिकार है या हम दोनों का सहअस्तित्व संभव है। यदि ऐसा है तो हम दोनों में किसे क्या स्वीकार करना होगा? यह हम दोनों पर छोड़ देना चाहिये या शक्तिशाली मनुष्य को दोनों के बारे में निर्णय लेना चाहिये? न्याय के किन पक्षों को किस प्रकार समझना है, यह चिन्तन की कई परतों को उद्वेलित कर जाता है।

यदि मैं चिन्तनहीन होता तो उसी समय शक्ति प्रदर्शन कर त्वरित निर्णय दे देता, घोंसला उठा कर फेंक देता, गिलहरी उसे समेट कर कहीं और नया घोंसला बना लेती। पर वह मुझसे न हुआ, मैं सोच में पड़ गया। अब निर्णय नहीं कर पा रहा हूँ कि क्या किया जाये?

विश्व की सारी समस्याओं को देखें तो हर स्थिति में गिलहरी और मनुष्य की ही कहानी दिखती है, मेरी कहानी से पूरी तरह मिलती जुलती। शक्ति के उपासक अपना न्याय और निर्णय गिलहरी पर थोप देते हैं। उनके विरोधी गिलहरी का सहारा लेकर अपना स्वार्थ साधते हैं। गिलहरी माध्यम बन जाती है, घर से बेघर हो जाती है, शेष लड़ाई चलती रहती है।

नक्सल समस्या भी कुछ अलग नहीं है। गिलहरी के तथाकथित संरक्षक कहे जाने वाले पक्ष लड़ रहे हैं और गिलहरी अपने अस्तित्व के लिये निहार रही है, सहमी सी।

अब मैं क्या करूँ? मैं तो उसे नहीं हटा पाऊँगा। प्रभात की किरण और शीतल पवन के साथ गिलहरी की गतिविधि भी देखता रहूँगा। हो सकता है कि लेखन धर्म में थोड़ा व्यवधान पड़ जाये, स्वीकार है, पर उसे हटाने का साहस मेरे अन्दर तो नहीं है। आप ही बतायें कि गिलहरी के संग सहअस्तित्व के इस नये अध्याय को और कैसे सुमधुर बनाया जा सकता है?