यह तो सुना था कि भवनों के नाम महापुरुषों के नाम पर रखे जाते हैं। सही भी है, निर्जीव भवनों को इसी बहाने कोई नाम मिल जाता है, महापुरुषों का नाम मिल जाता है, उनका जीवन बस इसी बात से धन्य हो जाता है। पहचान के लिये नाम आवश्यक भी होता है, बिना नाम अनाथ जैसा लगता होगा, निर्जीव भवनों को।
दो उद्देश्य रहते होंगे, नाम रखने के। पहला, यह जताने के लिये कि किसने उसका निर्माण कराया, सम्पन्नता को अनाम रखना सच में कितना कठिन कार्य रहा है, सदियों से। दूसरा, भवन के सहारे ही सही पर स्वयं को अमरत्व प्रदान कराने के लिये भी नामकरण होता होगा, सही भी है क्योंकि भवन मानवों से कहीं अधिक जीते हैं। जब कभी औरों को प्रसन्न करना अधिक आवश्यक होता है तो भवन आदि का नामकरण एक विशेष उद्देश्य सिद्ध करने लगता है। भवन के साथ साथ नगर के मार्ग, चौराहे, उपवन, पुल आदि किसी न किसी का नाम ग्रहण करने को उतावले रहते हैं, सत्तासीनों की सुविधानुसार। बेनामों और बेजानों के नामकरण के बाद उस महापुरुष के गुण उसके निर्जीव वातावरण को जीवन्त कर देते होंगे। तब सड़कों में चलने वालों में और भवनों में रहने वालों में चरित्र उत्थान और व्यक्तित्व निर्माण की पूर्ण संभावनायें बनी रहती होंगी।
संक्षिप्त में कहा जाये तो अभी तक भवनों को औरों से प्रभावित होते ही देखा है, औरों को नाम ग्रहण करते ही सुना है। ऐसा नहीं है कि भवनों में कोई विशेष गुण नहीं होता है, कुछ गिने चुने भवनों में ही वह गुण होता है जो विशेषण के रूप में प्रयुक्त किया जा सके। ताजमहल का सौन्दर्य, पीसा की मीनार का तिरछापन आदि विशेष गुण हो सकते हैं और उनका हम उपयोग भी कर सकते हैं।
सब कह रहे हैं कि अर्थव्यवस्था मन्दिया रही है। लग भी रहा है, डालर फूल रहा है, रुपया सिकुड़ रहा है। अर्थव्यवस्था की जटिलतायें हमको समझ में नहीं आती हैं, जैसा लोग समझाते हैं, हम समझ जाते हैं। सुना था कि बहुत समय पहले जब लखनऊ में अकाल पड़ा था, किसी को कोई काम नहीं था, तब सभ्रांत समाज को रात के समय कार्य करने का अवसर देकर वहाँ के नवाब ने न केवल उनका जीवन बचाया वरन इमामबाड़ा जैसा बड़ा भवन निर्मित करवा दिया।
जिनको ज्ञात न हो, उन्हें बताते चलें कि इमामबाड़ा अपने भूलभुलैया के लिये बहुत प्रसिद्ध है। गलियारों का जाल और ४८९ एक जैसे दरवाजों का होना ही भूलभुलैये का प्रमुख कारण है। न भूलने की ठान ली थी तो उस भवन के निर्माण को समझना आवश्यक हो गया था। भूलभुलैया को उसके निर्माण से पृथक रख कर देखना ही उसमें भटक जाने का प्रमुख कारण है। जो लोग गये होंगे वहाँ, उन्हें यह याद होगा कि भूलभुलैया प्रथम खण्ड में जाकर प्रारम्भ होता है, तीन परतों में ऊपर नीचे गलियारों, सीढ़ियों और दरवाजों की भटकन और सबसे ऊपर एक सपाट छत।
इमामबाड़े का वास्तु और स्थापत्य कौशल तब समझ में आया जब ऊपर से नीचे के विशालकाय हॉल में झाँका। न कोई खम्भा, न कोई बीम, न कोई सरिया, और ऊपर स्थित वृहदतम अर्धबेलनाकार छत, मेहराब शैली का निर्माण। गजब की कलाकारी है, सरल भाषा में समझा जाये तो एक विशाल भवन के ऊपर तीन मंजिला छप्पर। अब छप्पर पूरा ठोस तो बनाया नहीं जा सकता था, उसका भार इतना अधिक हो जाता कि वह स्वयं सहारा देने में विफल हो जाता। संभवतः इसीलिये उसे खोखला बनाया गया होगा, खोखले में गलियारों की दीवारों का प्रयोग नीचे की अर्धबेलनाकार छत और ऊपर की सपाट छत के बीच सततता बनाये रखने के लिये, सीढ़ियों का प्रयोग मेहराब के रूप में, और द्वारों का प्रयोग पूरे आकार को आपस में जोड़ने के लिये किया गया होगा।
इमामबाड़े जैसे भवनों का मर्म कहीं और छिपा है और हम उसके भूलभुलैये में खो जाते हैं। मर्म अन्दर छिपा होता है और हम आवरण में उलझ जाते हैं। जो दीवारें भार सहन करती हैं, उनसे अधिक महत्व भटकाने वाली दीवारों को मिलता है। मेहराबदार स्थापत्य का अद्भुत उदाहरण, रात में अपनी जीविका के लिये कार्य करने वालों की कहानी बन जाता है। यह आपाधापी या व्यर्थ में बहाये हुये श्रम का उदाहरण नहीं, वरन उन्नत योजनानुसार क्रियान्वित भवननिर्माण का उदाहरण है। इसके निर्माण की वैज्ञानिक प्रक्रिया और संबन्धित तथ्य निश्चय ही इतिहास के किसी भूलभुलैया में पड़े अपने बचावदल की राह देख रहे होंगे।
जो बड़े भवनों का सच है, वही सच बड़े महापुरुषों का भी है। उनकी उपाधियों, जीवनी, कार्यों आदि के आवरण के अन्दर छिपे भाव कभी उद्घाटित और स्थापित किये जाने के प्रयास ही नहीं किये जाते। बाहरी भूलभुलैया हमें इतना उलझा देता है कि हम यह भी याद नहीं रख पाते हैं कि मर्म में क्या है, नीचे का बड़ा हॉल जहाँ सबके लिये पर्याप्त स्थान है, समुचित और सुरक्षित स्थान।
शताब्दियाँ बीत गयी हैं, हम महापुरुषों का नाम भवनों को देते आये हैं। आज हम अपनी क्षुद्र समझ से अपने महापुरुषों के व्यक्तित्वों को इमामबाड़ा का स्वरूप देने में लगे हैं, मर्म कम, भूलभुलैया अधिक। गलियारों में भटकते भटकते कभी तो नीचे झाँकना होगा, और समझना होगा कि हम सब एक बड़े आकार के चारों ओर खड़े हैं, एक ही भवन में और एक साथ।
दो उद्देश्य रहते होंगे, नाम रखने के। पहला, यह जताने के लिये कि किसने उसका निर्माण कराया, सम्पन्नता को अनाम रखना सच में कितना कठिन कार्य रहा है, सदियों से। दूसरा, भवन के सहारे ही सही पर स्वयं को अमरत्व प्रदान कराने के लिये भी नामकरण होता होगा, सही भी है क्योंकि भवन मानवों से कहीं अधिक जीते हैं। जब कभी औरों को प्रसन्न करना अधिक आवश्यक होता है तो भवन आदि का नामकरण एक विशेष उद्देश्य सिद्ध करने लगता है। भवन के साथ साथ नगर के मार्ग, चौराहे, उपवन, पुल आदि किसी न किसी का नाम ग्रहण करने को उतावले रहते हैं, सत्तासीनों की सुविधानुसार। बेनामों और बेजानों के नामकरण के बाद उस महापुरुष के गुण उसके निर्जीव वातावरण को जीवन्त कर देते होंगे। तब सड़कों में चलने वालों में और भवनों में रहने वालों में चरित्र उत्थान और व्यक्तित्व निर्माण की पूर्ण संभावनायें बनी रहती होंगी।
संक्षिप्त में कहा जाये तो अभी तक भवनों को औरों से प्रभावित होते ही देखा है, औरों को नाम ग्रहण करते ही सुना है। ऐसा नहीं है कि भवनों में कोई विशेष गुण नहीं होता है, कुछ गिने चुने भवनों में ही वह गुण होता है जो विशेषण के रूप में प्रयुक्त किया जा सके। ताजमहल का सौन्दर्य, पीसा की मीनार का तिरछापन आदि विशेष गुण हो सकते हैं और उनका हम उपयोग भी कर सकते हैं।
सब कह रहे हैं कि अर्थव्यवस्था मन्दिया रही है। लग भी रहा है, डालर फूल रहा है, रुपया सिकुड़ रहा है। अर्थव्यवस्था की जटिलतायें हमको समझ में नहीं आती हैं, जैसा लोग समझाते हैं, हम समझ जाते हैं। सुना था कि बहुत समय पहले जब लखनऊ में अकाल पड़ा था, किसी को कोई काम नहीं था, तब सभ्रांत समाज को रात के समय कार्य करने का अवसर देकर वहाँ के नवाब ने न केवल उनका जीवन बचाया वरन इमामबाड़ा जैसा बड़ा भवन निर्मित करवा दिया।
जो बड़े भवनों का सच है, वही सच बड़े महापुरुषों का भी है। उनकी उपाधियों, जीवनी, कार्यों आदि के आवरण के अन्दर छिपे भाव कभी उद्घाटित और स्थापित किये जाने के प्रयास ही नहीं किये जाते। बाहरी भूलभुलैया हमें इतना उलझा देता है कि हम यह भी याद नहीं रख पाते हैं कि मर्म में क्या है, नीचे का बड़ा हॉल जहाँ सबके लिये पर्याप्त स्थान है, समुचित और सुरक्षित स्थान।
शताब्दियाँ बीत गयी हैं, हम महापुरुषों का नाम भवनों को देते आये हैं। आज हम अपनी क्षुद्र समझ से अपने महापुरुषों के व्यक्तित्वों को इमामबाड़ा का स्वरूप देने में लगे हैं, मर्म कम, भूलभुलैया अधिक। गलियारों में भटकते भटकते कभी तो नीचे झाँकना होगा, और समझना होगा कि हम सब एक बड़े आकार के चारों ओर खड़े हैं, एक ही भवन में और एक साथ।