न दैन्यं न पलायनम्
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मन
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21.8.22
सज्जन-मन
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सब सहसा एकान्त लग रहा, ठहरा रुद्ध नितान्त लग रहा, बने हुये आकार ढह रहे, सिमटा सब कुछ शान्त लग रहा। मन का चिन्तन नहीं व्यग्रवत, शुष्क ...
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18.9.21
विकल्प तोड़ता है
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अन्दर से उठता हुआ धूम्र, घुटता मन, बढ़ती शेष आस, नवशमित भ्रमितवत अर्धचित्त, अन्तरमन की उन्मुक्त प्यास । इंगित करती जीवन रेखा, क्रमरहित, रु...
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21.8.21
व्यक्त कर उद्गार मन के
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व्यक्त कर उद्गार मन के, क्यों खड़ा है मूक बन के । व्यथा के आगार हों जब, सुखों के आलाप क्यों तब, नहीं जीवन की मधुरता को विकट विषधर बना ले । ...
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14.8.21
मन मेरा फिर डोल रहा है
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शान्ति धरो स्थान, व्यक्त जीवन में तेरा मोल रहा है । देखो अभी कहीं मत जाना, मन मेरा फिर डोल रहा है ।। शान्ति, सुधा का रस बरसाती, जीवन क...
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6.7.21
सात चक्र - स्थिति
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सात चक्रों की अवधारणा संभवतः भारतीय सिद्धान्त पक्ष का सर्वाधिक चर्चित तत्व है। शरीर में स्थित ऊर्जा के ये चक्र न केवल शरीर को अध्यात्म से ...
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1.7.21
सात जन्म - क्रम
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ऊर्जा, साम्य, विकास और एकता की विमाओं में भूत, भविष्य और वर्तमान को कैसे साधा जाये, यह जीवन का मूल प्रश्न हो जाता है। साथ ही ढेर सारे और भी ...
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29.6.21
सात जन्म - मन
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मन है तो गति करेगा, स्वाभाविक है। कहाँ तक गति करेगा? जहाँ तक उसकी सामर्थ्य है। कब किस काल में रहेगा, क्या पता? क्यों नहीं हमें सारी स्मृति...
8 comments:
24.6.21
सात जन्म - एक उत्तर
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मन चमत्कृत करता है। विचारशील होना गति का द्योतक है, पर यदि विचारों पर ही विचार न किया तो कुछ अधूरा अतृप्त सा लगता है। एक स्वाभाविक प्रवृत्...
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22.6.21
सात जन्म - एक प्रश्न
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शीर्षक पढ़ते ही स्वाभाविक विचार आता है कि संभवतः चर्चा विवाह सम्बन्धों के कालखण्ड की होगी, एक के बाद एक, जीवनोत्तर। बहुधा इसी संदर्भ में स...
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21.12.16
मित्र हो मन
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कब बनोगे मित्र, कह दो, शत्रुवत हो आज मन, काम का अनुराग तजकर, क्रोध को कर त्याग मन, दूर कब तक कर सकोगे, लोभ-अर्जित पाप मन, और कब दोगे...
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10.4.16
मन-राक्षस
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दुनिया, कुछ अधखुली मस्तिष्क-पटल पर, करती है हर काम अपनी धुन पर । कुछ भी हो, मैं भी हूँ दुनिया, और प्राप्त हैं सारे अधिकार, मान...
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21.2.16
मन मेरा तू
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कभी सुखों की आस दिखायी , कभी प्रलोभन से बहलाया । मन मेरा तू शत्रु निरन्तर , मुझको अब तक छलता आया ।। प्रभुता का...
13 comments:
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