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3.9.11

पानीदार कहाँ है पानी?

पानी का साथ बचपन से प्रिय है, तैरने में विशेष रुचि है। कारण कोई विशेष नहीं, बस जहाँ जन्म हुआ और प्रारम्भिक जीवन बीता उस नगर हमीरपुर में दो नदियों का संगम है, यमुना और बेतवा। यमुना, रेतीले तट, गतिमान प्रवाह, पानी का रंग साफ। बेतवा, बालू के तट, मध्यम प्रवाह, पानी का रंग हरा।

तैरने के लिये बेतवा ही उपयुक्त थी, वहीं पर ही तैरना सीखा। गर्मियों की छुट्टियों में नित्य घंटों पानी में पड़े रहना, नदी पार जाकर ककड़ी, तरबूज आदि खाना, दोपहर को जीभर सोना और सायं घर की छत से बेतवा को बहते हुये देखना, सूर्यास्त के समय बेतवा सौन्दर्य का प्रतिमान हो जाती थी। बेतवा के साथ जुड़ी आनन्द की हिलोरें बचपन की मधुरिम स्मृतियाँ हैं। बचपन के घनिष्ठ मित्र सी लगती है बेतवा।

यमुना के रेतीले तटों पर पूर्ण शक्ति लगा सवेग दौड़ लगाना, फिर थक कर किनारे पर डरी डरी सी हल्की सी डुबकी। यमुना के गतिमान प्रवाह और उसकी शास्त्रवर्णित पवित्रता के लिये सदा ही आदर रहा मन में। संगम पर लगने वाले मेलों, धार्मिक स्नानों व अन्य अनुष्ठानों के समय मिला यमुना का मातृवत स्नेह आज भी स्मृतियों की सुरेख खींच जाता है।

मूल यमुना और उसकी पवित्रता तो दिल्लीवाले ही पी जाते हैं। अपने आकार को अपने आँसुओं से सप्रयास बनाये रखती यमुना, कान्हा के साथ बिताये दिनों को याद कर अपने अस्तित्व में और ढह जाती है, ताजमहल से भी आँख बचाकर चुपचाप निकल जाती है। यदि चंबल और बेतवा राह में न मिलती तो जलराशि के अभाव में यमुना प्रयाग में गंगा से भेंट करने की आस कब की छोड़ चुकी होती, त्रिवेणी की दूसरी नदी भी लुप्त हो गयी होती।

कुछ वर्ष पहले तक तो बेतवा का प्रवाह स्थिर था। बालू की खुदाई तटों से ही कर ली जाती थी, बाढ़ आने पर पुनः और बालू आ जाती थी, वर्षों यही क्रम चलता था, नदी का स्वरूप भी बचा रहता था और विकास को अपना अर्घ्य भी मिल जाता था। आज विकास की बाढ़ में बालू का दोहन अपने चरम पर पहुँच गया है, जहाँ पहले मजदूर ही बालू का लदान करते थे, अब बड़ी बड़ी मशीनों से नदी के तट उखाड़े जाने लगे। विकास की प्यास और बढ़ी, मशीनें नदी के भीतर घुस आयीं, जो मिला सब निकाल लिया, बेतवा सहमी सी एक पतली सी धारा बन बहती रही। वेत्रवती(बेतवा) आज असहाय सी बहती है, एक नाले जैसी, देखकर मन क्षुब्ध हो जाता है।

इस विषय पर भावनात्मक हूँ, मेरे बचपन के प्रतीकों का विनाश करने पर तुला है यह विकास। कुछ दिन पहले घर गया था, यमुना तट पर खड़ा खड़ा अपनी आँखों से उसका खारापन बढ़ाता रहा। यमुना, काश वृन्दावन की अन्य जलराशियों की तरह कान्हा ने तुम्हें भी खारा कर दिया होता, स्रोत से ही, कम से कम तुम्हारा स्वरूप तो बचा रहता। बेतवा, काश तुम्हारी बालू में भवनों को स्थायित्व देने वाला लौह-तत्व न होता, तुम्हारी भेंट ही तुम्हारे स्वरूप को ले डूबी।

हमीरपुर बुन्देलखण्ड में है, कहीं पढ़ा था बुन्देलखण्ड के विषय में,

बुन्देलों की सुनो कहानी, बुन्देलों की बानी में,
पानीदार यहाँ का पानी, आग यहाँ के पानी में।

अब न वह कहानी रही, न पानी रहा, न उस पानी में जीवन की आग रही और न ही रही वह पानीदारी।