न दैन्यं न पलायनम्
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12.4.15
उलझी लट सुलझा दो
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मन की उलझी लट सुलझा दो, मेरे प्यारे प्रेम सरोवर । लुप्त दृष्टि से पथ, दिखला दो, स्वप्नशील दर्शन झिंझोड़कर ।।१।। ढूढ़ा था, वह लुप्त हो...
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