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27.5.21

बाँह की पीड़ा - उच्चारण

 

पीड़ा के क्षणों में, जब मन अपने मन की नहीं कर पाता है, तब क्या संवाद चलता है? पीड़ा के क्षणों का उच्चारण क्या होता है? स्वर आर्त होते हैं, करुणा होती है, क्रोध आता है या अस्तित्व निशान्त हो जाता है। अनमना सा लगता है, किसी एक विषय में ध्यान नहीं लगता है, रह रह कर सारा ध्यान पीड़ा के स्थान पर पहुँच जाता है, पीड़ा के कारण एक के बाद एक सामने आने लगते हैं, लगता है तब कि काश यह न करते या वह न करते, प्रायश्चित के स्वर फूटने लगते हैं।


बाँह की पीड़ा के कालखण्ड में चिन्तन बहुत हुआ। कारण स्पष्ट था। रात्रि में जब निद्रा नहीं आती थी, बाँह, कन्धे, गर्दन या पीठ में कहीं भी पीड़ा होती थी तो उठ बैठना ही पीड़ा कम करने का एकमात्र उपाय लगता था। इस स्थिति में बाँह सीधी लटकती थी और पीड़ा की तीव्रता कम हो जाती थी। एक बार निद्रा उचट जाये तो पुनः आ पाना सरल नहीं होता था, या तो सिकाई करनी पड़ती थी, या स्वयं हाथ से दाबना पड़ता था, या पीड़ानिवारक जेल लगाना पड़ता था और किसी से कुछ लाभ न होता था तो पीड़ानिवारक औषधि लेकर सोने का प्रयास करना होता था। कई बार इस प्रयास में हर बार घंटे भर के ऊपर का जागरण हो जाता था, कभी कभी रात्रि में दो बार भी। इसके अतिरिक्त ४ बजे के बाद कभी भी निद्रा टूटी तो पुनः सोने का प्रयत्न न करते हुये दिनचर्या प्रारम्भ कर दी जाती थी। रात्रि में पीड़ा को अर्पित हुये निद्रासमय की क्षतिपूर्ति दिन में करने का प्रयास रहता था पर इस पूरे प्रकरण में गाढ़ी निद्रा एक स्वप्न ही रही।


रात्रि की स्तब्धता में जब शरीर हाहाकार कर रहा हो तो मन चिन्तन में डूब ही जाता है। पहला चिन्तन तो पीड़ा  यथासंभव कम करने के उपायों पर होता था। दूसरा उन द्वितीयक कष्टों पर होता था जो कम निद्रा के कारण आयी थकान के कारण होने वाले थे। तीसरा चिन्तन वापस उन संभावित कारणों पर होता था जिनके कारण यह हृदयविदारक स्थिति में शरीर पड़ा हुआ है। हर संभावित कारण का कोई न कोई उपाय भी मन में आता था। उसकी पुनरावृत्ति न हो अतः मन हर कारण के सुधार की प्रतिज्ञा कर बैठता था। सुधारवादी विचारों का प्लावन भविष्य की इतनी सुन्दर छवि बनाने लगता है कि उसमें वर्तमान की पीड़ा कुछ क्षणों के लिये विस्मृत सी हो जाती है। न केवल कारण सुधारने की प्रतिज्ञा होती है वरन उससे भी आगे जाकर मन न जाने क्या क्या कर लेना चाहता है। पीड़ा के क्षणों में मन जितना सुधारशील हो जाता है, यदि सामान्य क्षणों में उसका शतांश भी हो जाये तो अधिकांश कष्ट हमारे पास ही न पहुँचे।


चौथा चिन्तन उन विचारों पर टिकता है जिनसे पीड़ा भुलायी जा सके। इसे चिन्तन शब्द से परिभाषित करना उचित नहीं होगा क्योंकि यह मन से ही मन को भरमाने के उपाय पूछने जैसा है। कुछ रोचक सा देखना या सोचना। यह पक्ष प्रायः असफल ही रहा, यदि सफल हुआ भी तो अत्यल्प समय के लिये। पाँचवाँ चिन्तन उस भविष्य पर होता है जब आप मान बैठते हैं आपका सर्वाधिक अहित होने वाला है। स्वजनित मानसिक पीड़ा शारीरिक पीड़ा को कुछ समय के लिये तो भुलाने में सहयोग तो करती है पर जैसे ही विचार अवसान पाता है, कृत्रिमता का आवरण हटता है, शारीरिक पीड़ा वापस लौट आती है।


छठा चिन्तन उन वर्तमान दृश्यों पर दृष्टिपात करके होता है जब आप सारे आयातित विचार त्याग कर अपने वर्तमान में आ जाते हैं। जो दिखता है उसी पर सोचना प्रारम्भ कर देते हैं। कमरे की छत पर भागती हुयी छिपकली, मच्छरदानी के बाहर प्रयासरत संगीतमय मच्छर, बाहर टहलते समय झींगुर के बोलने का स्पष्ट नाद या पेड़ों के पत्ते खड़खड़ाने के स्वर। दो तीन फिल्मों में देखा था कि जेल की अंधकोठरी किस प्रकार किसी कीड़े या चूहे से खेलकर अपने वर्तमान पर अधिरोपित कर नायक एक और वर्तमान ढूढ़ लेता है। अपनी स्थिति देखकर कुछ वैसी ही भावना मन में घर कर गयी, बस अंधकोठरी के स्थान पर एक पीड़ा की कोठरी थी। रात्रि में अंधकार की गहनता मापना भी ऐसे चिन्तन का एक स्वरूप हो सकता है। रात्रि के दो तीन बजे तब किसी अन्य वस्तु से भय भी नहीं लगता है, पीड़ा ऐसी निर्भयता उत्पन्न कर देती है।


सातवाँ चिन्तन आर्त भाव से युक्त होता है। आर्तनाद अपने आराध्य के प्रति होता है। प्रार्थना पीड़ा से निवारण की, प्रार्थना उस शक्ति के उपयोग की जो आपके आराध्य के पास है, प्रार्थना उस प्रकृति को संयत करने की जिसने आपके शरीर में या जीवन में उत्पात मचा रखा है। आर्तनाद करने कोई व्यक्ति उसी के पास जाता है जो सक्षम हो और सुदृद भी, शरणागत हो और भक्तवत्सल भी। न्यायप्रियता से कहीं अधिक एक विशेषकृपा की चाह रहती है इस भाव में। गीता में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा गया है, चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन। आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ। मुझे अच्छा कर्म करने वाले चार विधाओं में भजते हैं, आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी। पीड़ा कैसे भी हो, आपको आपके आराध्य के पास ले जाती है। पीड़ा आपको सामान्य जीवनक्रम से परे कुछ सोचने को विवश करती है। पीड़ा आपको वह समय देती है जब आप अपने भविष्य को भूत की भूलों से विलग कर सकें। पीड़ा का अनुभव आपके जीवन के दिशा बदलने में सक्षम होता है।


कहते हैं कि कोई घटना जीवन को पूरी तरह बदल देती है। विशेषता उस घटना में नहीं वरन उस प्रभाव में होती है जो आप पर पड़ता है, आपके शरीर पर पड़ता है, आपकी मनस्थिति पर पड़ता है। पीड़ा सहसा कोई पक्ष उजागर कर आपके चिन्तनपथ को झकझोर जाती है। गाँधी को अपमान की पीड़ा हुयी, बुद्ध को जीवन में व्याप्त कष्ट पीड़ा दे गये, दशरथ माँझी को पत्नी के देहावसान में उभरी एक विवशता पीड़ा दे गयी। कब क्या आपको हिला जाये, क्या आपके जीवन को नये पथ की ओर मोड़ जाये? पीड़ा आपके जीवन को दो भिन्न भागों में विभक्त देती है, बहुधा आपके कल्याण के लिये। पीड़ा भले ही किसी ने आप पर सहृदयता के उद्देश्य से न थोपी हो पर पीड़ा अन्ततः आपका भला कर के ही जाती है, अयस्क को कनक बना कर जाती है।


ऐसा नहीं है कि पीड़ा पहली बार हुयी और ज्ञान चक्षु खुल गये, ऐसा भी नहीं है कि पीड़ा इतने लम्बे समय के लिये पहली बार हुयी है, पर पहली बार ऐसा हुआ है कि पीड़ा के पक्षों को देखने का प्रयास किया है, पीड़ा के अन्दर झाँकने का प्रयास किया है। पीड़ा का यह अनुभव मेरे लिये पूर्णरूपेण वैयक्तिक अवश्य था पर पीड़ा का व्यक्त स्वरूप हर ओर दिखायी पड़ता है। मेरे मन और मस्तिष्क में स्थायी रूप से बिराजे तुलसीदास को भी एक बार बाँह की पीड़ा हुयी थी। उसका स्वरूप और उच्चारण अगले ब्लाग में।