Showing posts with label आर्थिक. Show all posts
Showing posts with label आर्थिक. Show all posts

2.4.14

आयुर्वेद का आर्थिक पक्ष

पिछले २०० वर्षों में भारत के स्वास्थ्य में हुये परिवर्तन को यदि एक पंक्ति में कहना हो तो इस प्रकार कहा जा सकता है। तब ५ में से ४ स्वस्थ रहते थे, अब ५ में से ४ अस्वस्थ। विकास और सुख सुविधायें शरीर को सुख देने के लिये होती हैं और यदि शरीर ही अस्वस्थ है तो सारे साधनों का क्या लाभ? दो सौ वर्षों का यह कालखण्ड अंग्रेजों के द्वारा आयुर्वेद को समूल नष्ट करने के व्यवस्थित प्रयासों से प्रारम्भ होता है, समाज को आर्थिक रूप से अशक्त बना मैकालियत को थोपने से उत्थान पाता है और अन्ततः ७-८ पीढ़ियों द्वारा घरों तक सिमटी परम्पराओं की विरासत को आधुनिकता में तिलांजलि देने से समाप्त होता है। क्या करें, किसी को भी सौ बार यह पढ़ाया जाये कि वह मूढ़ है तो वह मान बैठेगा और उसी प्रकार व्यवहार करने लगेगा। परतंत्रता का यह अभिशाप ढोना हमारे भाग्य में तो लिखा था, पर एक बात तो निश्चित है कि यह हमारी पीढ़ी में ही यह अभिशाप अपना अन्त पा जायेगा, हमारी संततियाँ उसके दुष्प्रभाव से मुक्त रहेंगी।

ज्ञान अभी भी जीवित जन में
मेरे एक मित्र बताते हैं कि उपेक्षा से ज्ञान भी दुखी होता है और लुप्त हो जाता है, स्वाभाविक और मानवीय गुण है यह। भाग्य से आयुर्वेद का प्रयोग और ज्ञान उपेक्षा से क्षीण तो हुआ है पर लुप्त नहीं हुआ है। राजकीय, प्रशासनिक और सामाजिक उपेक्षा के बाद भी यह उसकी अन्तर्निहित क्षमता ही है जो उसे जीवित रखे है। जिज्ञासा प्रेरित, अभी तक मुझे जिन क्षेत्रों में जितना भी अवसर गहरे उतरने का मिला है, एक तथ्य तो निश्चयात्मकता से कहा जा सकता है। हमारे पूर्वज अद्वितीय बौद्धिक प्रतिभा से युक्त थे। बौद्धिक उत्थान के जो उत्कृष्ट मानक वे नियत कर गये हैं, उनके समकक्ष भी पहुँच पाना हमारे लिये सम्मान का विषय होगा। अपनी विरासत से प्रतियोगिता कैसी, वह तो गर्व कर आत्मसात करने की विषयवस्तु है। ज्ञान के लिये मानव सभ्यतायें सदा ही लालायित रही हैं, कितना भी ज्ञान हो, सबको समाहित कर लेने का विशाल हृदय मानव ने पाया है। वर्तमान में सारे विश्व ने जिस स्तर पर आयुर्वेद को एक जीवनशैली और विशिष्ट उपचार पद्धति के रूप में स्वीकार किया है, यह ज्ञान अपनी पूर्णता में प्रकट होने वाला है।

स्वीकार्यता की उदात्त मानसिकता से आयुर्वेद की आर्थिक उपयोगिता को देखें तो पायेंगे कि वर्तमान में आयुर्वेद न केवल हमारे देश का स्वास्थ्य सुधार सकता है, वरन उसकी आर्थिक स्थिति को संतुलित कर सकता है। तीन स्तरों पर इसका प्रायोगिक अनुपालन किया जा सकता है। पहला है, आयुर्वेदीय सिद्धान्तों पर जीवन जीने की स्वस्थ परम्पराओं का पुनर्जीवन। ऐसा करने से ही रोगों और रोगियों की संख्या कम हो जायेगी और उनके निवारण में लगे अतिरिक्त संसाधन बचाये जा सकेंगे। बात संसाधन बचाने तक ही सीमित नहीं है, हमारी स्थिति इतनी दयनीय है कि हम सबको स्वास्थ्य सेवायें पहुँचा पाने में असमर्थ हैं। विकसित देशों की तुलना में हम आधे भी संसाधन नहीं जुटा पाते हैं, वहाँ जीडीपी का १० प्रतिशत तक व्यय होता है और हम ४ प्रतिशत भी नहीं पहुँच पाये हैं। 

दूसरा है, चिकित्सा पद्धति में आयुर्वेद का सम्यक उद्भव। आयुर्वेद में प्रयुक्त जो भी दवायें हैं, सब हमारे देश में बहुतायत से उपलब्ध हैं, सस्ती भी हैं। आयुर्वेद के विस्तार से ऐलोपैथी दवाओं के आयात में लगा धन बचाया जा सकता है। यही नहीं, आज भी ७० प्रतिशत जनसंख्या गावों में रहती है, जहाँ पर आधुनिक स्वास्थ्य सेवायें और डॉक्टर, दोनों ही अनुपस्थित हैं। सौभाग्य से वहाँ पर भी आयुर्वेद सम्मत देशी पद्धतियों की जड़ें किसी न किसी रूप में उपस्थित हैं, उन्हें व्यवस्थित रूप से पुनर्जीवित किया जा सकता है। मैसूर राज्य में अंग्रेजों के आने के पहले हर गाँव में एक वैद्य होता था जो सामान्य रोगों के निदान से लेकर शल्यचिकित्सा तक करता था।

तीसरा है, असाध्य रोगों में ऐलोपैथी का मौन और आयुर्वेद द्वारा जगायी आशा की किरण। ऐलोपैथी की लक्षण आधारित चिकित्सा और रोग को समूल नाश न कर पाने की क्षमता ने लोगों को आयुर्वेद की ओर मोड़ा है। यही एकल कारण हैं कि केरल में ही स्वास्थ्य-पर्यटन के माध्यम से देश विदेश के लोग असाध्य रोगों में लाभ पाते हैं। जहाँ एक ओर हर वर्ष देश में आयुर्वेद पर मात्र १२०० करोड़ रुपये का बजट है, वहीं दूसरी ओर केरल में पंचकर्म के माध्यम से ही देश को लगभग १०,००० करोड़ रुपये की आय होती है।

कई क्षेत्रों में ऐलोपैथी की महत्ता नकारी नहीं जा सकती है, पर जहाँ पर ऐलोपैथी है ही नहीं, वहाँ पर भी उसके गुणगान करने का क्या लाभ। पहले और तीसरे क्षेत्र ऐसे ही हैं। जीवनचर्या और रोगों की असाध्यता पर ऐलोपैथी मौन है, क्योंकि उसका कार्यक्षेत्र रोग आने के बाद ही प्रारम्भ होता है और रोग के लक्षण जाते ही समाप्त हो जाता है। आज आधे से अधिक रोगी जीवनशैली के कारण उस स्थिति पर पहुँचे हैं। रोग होने के पश्चात उपचार करने का क्या लाभ, अच्छा हो हम रोग होने ही न दें, एक ऐसी जीवनशैली अपना कर जो निरोगी रहने के सिद्धान्त विधिवत बताती है। पंचकर्म आदि उपचारों से असाध्य रोगों को दूर करने में आयुर्वेद अपनी सिद्धहस्तता दिखा रहा है। यही नहीं, दूसरे क्षेत्र में भी ऐलोपैथी दवाइयों के दुष्प्रभाव हमें आयुर्वेद जैसी प्राकृतिक और समग्र पद्धति को अपनाने को विवश कर रहे हैं। जिस तरह आजकल एण्टीबॉयोटिक दवाओं में जड़ी बूटियों के प्रयोग को बढ़ावा मिल रहा है, उससे तो लगता है कि ऐलोपैथी भी आयुर्वेद के सिद्धान्त और क्षमताओं को स्वीकार करने में संकोच नहीं कर रहा है। केवल जड़ी बूटियों के क्षेत्र में ही ६००० करोड़ के व्यापार की संभानवायें हैं और प्रतिस्पर्धा में चीन है।

आज स्थिति यह है कि जिस परिवार में किसी को कोई असाध्य या गम्भीर रोग होता है, उस परिवार का आर्थिक स्वास्थ्य भी चरमरा जाता है। मध्यम वर्ग एक रोग के कारण ही निम्न मध्यम वर्ग में आ जाता है, निम्न मध्यम वर्ग का परिवार सीधे गरीबी रेखा में आ जाता है। हृदयाघात और कैंसर जैसी बीमारियाँ व्यक्ति के साथ साथ परिवार को भी पीड़ा दे जाती हैं। कारण इन सब रोगों का इलाज बहुत मँहगा होना है। डायबिटीज़ के संग जीवन बिताना प्रकृति के बड़े दण्ड से कम नहीं और नित्य यदि इन्सुलिन आदि लेना पड़े तो आर्थिक दण्ड ऊपर से। भारत में नगरीय जनसंख्या के १० प्रतिशत और ग्रामीण जनसंख्या के ३ प्रतिशत लोगों को डायबिटीज़ है, यही कारण है कि भारत को विश्व की मधुमेह राजधानी कहा जाता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि जब आने वाले १५ वर्षों में मधुमेह के रोगियों की संख्या ७ करोड़ से बढ़कर १० करोड़ हो जायेगी, तब लोगों को आय का २०-२५ प्रतिशत भाग इस रोग के निदान में खर्च करना पड़ेगा।

मधुमेह ही नहीं, जीवनशैली से जुड़े लगभग सभी रोगों में देश इसी दयनीय आर्थिक स्थिति में पहुँचने वाला है। २०१० में देश में ५ करोड़ हृदयरोगी और ३० लाख कैंसर के मरीज थे। जहाँ हृदयरोग और कैंसर के इलाज के लिये लाखों का खर्च लगता हो, वहाँ के नागरिक अपनी सारी कमाई इन्हीं रोगों को समर्पित करते रहेंगे। २०१२ की डब्लूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार लगभग २३ प्रतिशत भारतीय हाइपरटेंशन से ग्रसित हैं। कम गम्भीर रोगों में यह संख्या कहीं और अधिक है, लगभग १२ करोड़ श्वासरोग से, १० करोड़ जोड़दर्द से, १८ करोड़ पेटरोग से और २० करोड़ से अधिक लोग आँखों के रोगों से ग्रसित हैं। इसमें ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के आँकड़े अनुपस्थित हैं। गाँवों में डॉक्टरों के न जाने से ७० प्रतिशत जनसंख्या का भाग उपेक्षित है, न रोगों की संख्या ज्ञात है, न उनका निदान उपलब्ध है। अन्य रोग और नियमित रूप से होने वाले ज्वर आदि की संख्या लेंगे तो देश के स्वास्थ्य का दयनीय चित्र उभरेगा।

रोगियों की संख्या हमें चिन्तित करती है, पर उससे भी अधिक घबराहट डॉक्टरों की संख्या देखकर होती है। देश में कुल ६ लाख डॉक्टर हैं, हर २००० व्यक्तियों पर एक, जबकि अन्तर्राष्ट्रीय मानक के आधार पर डॉक्टरों की संख्या १२ लाख होनी चाहिये। प्रतिवर्ष ३०,००० नये डॉक्टरों से भी यह अनुपात अगले २० वर्षों में भर पायेगा। वह भी तब, जब कोई डॉक्टर विदेश न जाये, रिटायर न हो और साथ ही कोई नया रोगी न बढ़े। यदि वर्तमान में डॉक्टरों की कमी पूरी करनी है तो मेडिकल कॉलेज खोलने और चलाने में १० लाख करोड़ रूपये का अतिरिक्त खर्च आयेगा। जिस देश में स्वास्थ्य का वार्षिक बजट ही ३७००० करोड़ हो, वहाँ पर सबको स्वास्थ्य दे पाने की अवधारणा बेईमानी लगती है।

इन चिन्तनीय परिस्थितियों में आयुर्वेद की यह बात सहारा देती है कि बस आहार और अपनी प्रकृति समझ लेने से ८५ प्रतिशत रोगों का निदान संभव है। समुचित और स्वस्थ जीवनचर्या के माध्यम से रोगों को न आने देना आयुर्वेद का सशक्त आधारस्तम्भ है। आयुर्वेद के इन्हीं सिद्धान्तों के आधार पर सबको अपनी चिकित्सा स्वयं करनी होगी। रोगी अपना चिकित्सक स्वयं ही है। जो पीड़ा झेलता है, यदि उसे तनिक ज्ञान हो तो वह उसका निवारण स्वयं ही कर सकता है। आयुर्वेद, प्रणायाम और आसन के साथ स्वास्थ्य में समग्रता और रोगों से लड़ने की सक्षमता आ जाती है। आयुर्वेद में क्षमता है कि वह देश का स्वास्थ्य ढाँचा संभाल सकता है, देश का आर्थिक स्वास्थ्य स्थिर कर सकता है और आयुर्वेद की क्षमताओं का विश्व में प्रचार व प्रसार कर देश के लिये आर्थिक सम्पन्नता भी ला सकता है। बस आवश्यकता है आयुर्वेद की टूटी हुयी कड़ियों को व्यापक और समग्र रूप से जीवन में पुनः जोड़ने की।

आयुर्वेद पर अन्तिम कड़ी में मेरे मन का प्रिय विषय, गाय और आयुर्वेद।

चित्र साभार - yanashala.com