न दैन्यं न पलायनम्
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आत्म
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29.1.14
प्रयासरत
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कहीं पर कोलाहल से दूर , टूटकर मैं थकान से चूर, सिमट कर अपने में भरपूर, बैठकर जीवन पर कुछ सोच रहा मैं, भूतकाल को खोद रहा था...
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3.10.12
मैं समय की भँवर में हूँ
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परिस्थितियों में बँधा मैं , राह मेरी बनी कारा , श्रव्य केवल प्रतिध्वनियाँ, यदि किसी को भी पुकारा, देखना है, और कब तक, स्व...
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12.9.12
ध्यान से देखो, थोड़ा और ध्यान से
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दर्पण देखता गया, पंथ खुलता गया। चेहरे पर दिखता, त्वचा का ढीला पड़ता कसाव, जो यह बताने लगा है कि समय भागा जा रहा है। शरीर की घड़ी गोल गोल ...
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4.8.12
बड़ा अनूठा खेला है
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किसी काम को करूँ , ना करूँ , कानाफूसी चलती है , बुद्धि कहे यदि , कर भी डालो , मन की राय बदलती है , सुबह...
64 comments:
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