न दैन्यं न पलायनम्
28.6.14
व्यर्थ ही
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शान्त , तृप्त , कर्मालु , व्यवस्थित , मन की मृगतृष्णा से दूर । ऐसा एक व्यक्तित्व जगा लूँ, अब तो मेरा ध्येय यही है ।।१।। व्...
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24.6.14
अपेक्षा
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दो खुशी के पल मिलें , तो मुक्त हो बाँहें खिलें । सत्य है इन ही पलों के, हेतु जीवन जी रहा है ।।१।। अपेक्षित तो बहुत कुछ ह...
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21.6.14
मन किससे बातें करता है
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ना जानू मैं अन्तरतम में , अवचेतन की सुप्त तहों में, अनचीन्हा, अनजाना अब तक, कौन छिपा सा रहता है ? मन किससे बातें करता है ?...
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17.6.14
फुटबाल, पिताजी, एक और पीढ़ी
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जब क्रिकेट, बैडमिन्टन और स्वीमिंग नहीं करता था, तब भी फुटबॉल खेलता था। गृहनगर के स्टेडियम में फुटबॉल नियमित रूप से होती थी। उस समय अन्य खे...
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14.6.14
बहुधा
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अथक चिन्तन में नहाया , सकल तर्कों में सुशोभित, अनवरत ऊर्जित दिशा की प्रेरणा से, बहुधा बना व्यक्तित्व मेरा । चला जब भी मैं ...
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10.6.14
पहचाना पथ
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पिछले माह जब बंगलोर से अपना सामान लाने के लिये गया तो पुराने कई पर्यवेक्षकों से बातचीत हुयी। जब उन्हें यह ज्ञात हुआ कि हम बनारस पहुँच चुके...
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7.6.14
प्रयास तुम्हारा
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उलझा दी हर डोर , हमें जो बाँध रही थी , छिन्नित संस्कृति वहीं जहाँ से साध रही थी । देखो फूहड़ता छितराकर बिखरायी है, न...
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3.6.14
दो माह के बनारसी
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बनारस आ गये हैं, पर जब तक इस तथ्य को उदरस्थ कर पाता, दो माह बीत गये। पता ही नहीं चला, यहाँ पर आना और यहाँ प्रवाहित कई धाराओं में आत्ममुग्ध...
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31.5.14
प्रश्नोत्तर
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प्रश्नचिन्ह मन - अध्यायों में , उत्तर मिलने की अभिलाषा । जीवन को हूँ ताक रहा पर, समय लगा पख उड़ा जा रहा ।।१।। ढूढ़ रहा हूँ, ...
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28.5.14
स्मृति
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कहीं शीर्ष पर स्थिर जो है , संकल्पों की प्रखर ज्योत्सना । बिना ध्येय का दीप जलाये, अंधकूप में उतर न जाये ।।१।। कहीं सम...
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24.5.14
हँस लेते सब
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सुखी पलों की आस लगाये , कुछ लोगों के संग बिताये, माह, दिवस बिन आडम्बर के, प्राय ही कष्टों से लड़ के, बिन प्रयास बढ़ जाते थ...
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21.5.14
किसके लिये
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भूख मिटाकर दो रोटी में , जीने की क्षमता रखता हूँ, अपमानों का घोर हलाहल पीने की क्षमता रखता हूँ। मन को तुच्छ प्रलोभन ...
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17.5.14
अस्तित्व लगाने बैठा हूँ
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कर लो प्रारम्भ महाभारत , निष्कर्ष बताने बैठा हूँ , तुम रोज उजाड़ो घर मेरा, मैं रोज बनाने बैठा हूँ। आवारापन मेरे मन का,...
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14.5.14
समझौते
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खाई बड़ी थी मतभेदों की , भरने की करता अभिलाषा, कितने ही थे समझौते, जो मैने अपने साथ किये । और अभी भी जीवन के जीवन ही इस...
22 comments:
10.5.14
कहाँ अकेले रहते हैं हम
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कहाँ अकेले रहते हैं हम? अपने से ही सब दिखते हैं, जितने गतिमय हम, उतने ही, जितने जड़वत हम, उतने ही, भले न बोलें शब्द एक भी, पर ...
30 comments:
7.5.14
झम झमाझम
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ढाढ़सी मौसम, बस रसद कम, जी ले लल्ला, बैठ निठल्ला, पानी बरसे, झम झमाझम।
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3.5.14
तुम्हीं पर
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प्रश्न कुछ भी पूछता हूँ , उत्तरों की विविध नदियाँ, ज्ञान का विस्तार तज कर, मात्र तुझमें सिमटती हैं । नेत्र से कुछ ढूँढ़त...
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30.4.14
बचपन
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बचपन फिर से जाग उठा है, सुख-तरंग उत्पादित करने, ऊर्जा का उन्माद उठा है । वे क्षण भी कितने निश्छल थे, चंचलता का छोर नहीं था । ...
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26.4.14
कविता झरती
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आनन्द रहित मन की तृष्णा , जब मधु का प्याला कहती है , जब यादों के मद ज्वारों की, सारी सीमायें ढहती हैं, जब मेरे सोय...
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23.4.14
मेरी कविता
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मेरी कविता है आज दुखी , शायद मेरी ही गलती है । कुछ है स्वभाव भी रूखा सा, कुछ रागें क्षुब्ध मचलती हैं ।। मैं कृतघ्न हूँ, ...
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