न दैन्यं न पलायनम्

31.5.14

प्रश्नोत्तर

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प्रश्नचिन्ह   मन - अध्यायों   में , उत्तर मिलने की अभिलाषा । जीवन को हूँ ताक रहा पर, समय लगा पख उड़ा जा रहा ।।१।। ढूढ़ रहा हूँ, ...
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28.5.14

स्मृति

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कहीं   शीर्ष   पर   स्थिर   जो   है , संकल्पों की प्रखर ज्योत्सना । बिना ध्येय का दीप जलाये, अंधकूप में उतर न जाये ।।१।। कहीं सम...
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24.5.14

हँस लेते सब

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सुखी   पलों   की   आस   लगाये , कुछ लोगों के संग बिताये, माह, दिवस बिन आडम्बर के, प्राय ही कष्टों से लड़ के, बिन प्रयास बढ़ जाते थ...
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21.5.14

किसके लिये

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भूख   मिटाकर   दो   रोटी   में ,   जीने   की   क्षमता   रखता   हूँ, अपमानों का घोर हलाहल पीने की क्षमता रखता हूँ। मन को तुच्छ प्रलोभन ...
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17.5.14

अस्तित्व लगाने बैठा हूँ

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कर   लो   प्रारम्भ   महाभारत ,   निष्कर्ष   बताने   बैठा   हूँ , तुम रोज उजाड़ो घर मेरा, मैं रोज बनाने बैठा हूँ। आवारापन मेरे मन का,...
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14.5.14

समझौते

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खाई   बड़ी   थी   मतभेदों   की , भरने की करता अभिलाषा, कितने ही थे समझौते,  जो मैने अपने साथ किये । और अभी भी जीवन के जीवन ही इस...
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10.5.14

कहाँ अकेले रहते हैं हम

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कहाँ अकेले रहते हैं हम? अपने से ही सब दिखते हैं, जितने गतिमय हम, उतने ही, जितने जड़वत हम, उतने ही, भले न बोलें शब्द एक भी, पर ...
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7.5.14

झम झमाझम

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ढाढ़सी मौसम, बस रसद कम, जी ले लल्ला, बैठ निठल्ला, पानी बरसे, झम झमाझम। 
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3.5.14

तुम्हीं पर

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प्रश्न   कुछ   भी   पूछता   हूँ , उत्तरों की विविध नदियाँ, ज्ञान का विस्तार तज कर, मात्र तुझमें सिमटती हैं । नेत्र से कुछ ढूँढ़त...
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30.4.14

बचपन

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बचपन फिर से जाग उठा है, सुख-तरंग उत्पादित करने, ऊर्जा का उन्माद उठा है । वे क्षण भी कितने निश्छल थे, चंचलता का छोर नहीं था । ...
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26.4.14

कविता झरती

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आनन्द   रहित   मन   की   तृष्णा ,   जब   मधु   का   प्याला   कहती   है , जब यादों के मद ज्वारों की, सारी सीमायें ढहती हैं, जब मेरे सोय...
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23.4.14

मेरी कविता

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मेरी   कविता   है   आज   दुखी , शायद मेरी ही गलती है । कुछ है स्वभाव भी रूखा सा, कुछ रागें क्षुब्ध मचलती हैं ।। मैं कृतघ्न हूँ, ...
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19.4.14

जीवनी अलमस्त हो

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मगन   हो   अपने   विचारों   के   किनारों   में , जीवनी अलमस्त हो चुपचाप बहती जा रही थी । कहीं पर गाम्भीर्य की गहराइयों का, और उत्श्र...
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16.4.14

मध्यमार्गी पथ असाध्य है

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आदर्शों   के   मरुथल   में ,   जीवन   कष्टों   का   छोर   नहीं   है , भ्रष्टाचारी दलदल में आ बचा सके, कोई जोर नहीं है । इन दो विषम उपा...
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12.4.14

लोकपथ

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अनवरत   सुख   की   पिपासा , प्रकृति में उन्मुक्तता है । शान्ति को मन ढूढ़ता है, प्रेम को मन मचलता है ।। है विडम्बना मनुज की पर, ...
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9.4.14

आभार बंगलुरू

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पहली बार जब १९९३ में बंगलुरू आया था तो मन अभिभूत हो गया था, हर ओर हरा भरा, हर ओर पेड़ ही पेड़। सुदृढ़ नगरीय बससेवा होने पर भी मित्रों के स...
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5.4.14

गाय और आयुर्वेद

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एक बड़ी पुरानी कहावत है, हम गाय नहीं पालते, गाय हमें पालती है। हम भी गाय द्वारा ११ वर्ष पालित रहे हैं। गाय का घर में होना स्वास्थ्य के लिय...
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2.4.14

आयुर्वेद का आर्थिक पक्ष

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पिछले २०० वर्षों में भारत के स्वास्थ्य में हुये परिवर्तन को यदि एक पंक्ति में कहना हो तो इस प्रकार कहा जा सकता है। तब ५ में से ४ स्वस्थ रह...
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