न दैन्यं न पलायनम्

29.9.12

बच्चों की खिलती मुस्कान

›
भाग्य ने अपने सारे दाँव कॉन्क्रीट के जंगलों में लगा दिये हैं, बड़े नगरों में ही समृद्धि की नयी परिभाषायें गढ़ने में लगी हैं सभ्यतायें। आल...
51 comments:
26.9.12

बच्चों का जीवन

›
'ऐसी क्या चीज है, जो आपको तो नहीं मिलती है पर आपसे उसकी आशा सदैव की जाती है', आलोक ने बच्चों से पूछा। इज्जत या आदर, उत्तर मिलने मे...
49 comments:
22.9.12

एक आवश्यक निर्णय

›
बंगलोर की नगरीय व्यवस्थायें सुदृढ़ हैं, तन्त्र कार्यरत रहता है। पहले यही लगता था कि जहाँ पर इतने अधिक लोग रहते हों, वहाँ पर कोई अव्यवस्था ...
57 comments:
19.9.12

एप्पल का मूल्य

›
अभी तक की सर्वाधिक मूल्यवान कम्पनी का स्थान पाने के बाद अपेक्षाओं का जो अंबार एकत्र होता है, उसे समेट कर व्यवस्थित रख पाना उस कम्पनी की अग...
54 comments:
15.9.12

फ्रस्टियाओ नहीं मूरा

›
बड़ी दिलासा देते हैं ये शब्द, विशेषकर तब, जब पति जेल में हो, पति अपनी पत्नी को यह गाने को कहता हो और उसकी पत्नी सस्वर गा रही हो। बाहुबली प...
55 comments:
12.9.12

ध्यान से देखो, थोड़ा और ध्यान से

›
दर्पण देखता गया, पंथ खुलता गया। चेहरे पर दिखता, त्वचा का ढीला पड़ता कसाव, जो यह बताने लगा है कि समय भागा जा रहा है। शरीर की घड़ी गोल गोल ...
44 comments:
8.9.12

विस्तार जगत का पाना है

›
आयाम   विचारों   का   सीमित ,  रह   चार   दीवारों   के   भीतर , लगता   था   जान   गया   सब   कुछ ,  अपने   संसारों   में   जीकर, कुछ   ...
64 comments:
5.9.12

हे प्रसन्नमना, प्रसन्नता बाँटो न

›
अभी एक कार्यक्रम से लौटा हूँ, अन्य गणमान्य व्यक्तियों के साथ मंच पर एक स्वामीजी भी थे। चेहरे पर इतनी शान्ति और सरलता कि दृष्टि कहीं और टि...
49 comments:
1.9.12

बंगलोर का सौन्दर्य

›
जब कार्य के घंटे बहुत अधिक हो जाते हैं और आपके साथ लगे कर्मचारियों और सहयोगियों के चेहरे पर थकान झलकने लगती है, तो मुखिया के रूप में आपका ...
53 comments:
29.8.12

देख रहा था व्यग्र प्रवाह

›
पता नहीं था कि यह कितने दिन चलेगा? पूर्वोत्तर के लगभग दो लाख लोग बंगलोर में हैं, मुख्यतः विद्यार्थी है, सेक्योरिटी सेवाओं में है, होटलों ...
54 comments:
25.8.12

झण्डा ऊँचा रहे हमारा

›
स्वतन्त्रता दिवस था, सुबह सर ऊँचा कर भारत के झण्डे के सामने राष्ट्रगान का सस्वर पाठ किया था। जब भी राष्ट्रगान बजता है, दृष्टि स्वतः ही झ...
62 comments:
22.8.12

स्तब्धता

›
उनींदी   सी   शान्ति   जग   में ,   हवायें   बहकर   थकीं   हैं   । रात खेलीं चन्द्रमा संग, प्रात के द्वारे रुकी हैं ।।१।। फूल अकड़े ख...
63 comments:
‹
›
Home
View web version
Powered by Blogger.