16.10.13

शिक्षा के बिसराये सूत्र

टेड पर सर केन रॉबिन्सन के विचार सुन रहा था, शिक्षा पर। विचार सरल थे, सहज थे और सारगर्भित थे। अनुभव जैसे जैसे गाढ़ा होता जाता है, अभिव्यक्ति तरल होती जाती है, श्री रॉबिन्सन को सुनकर यह सिद्धान्त और भी दृढ़ हो चला। यही नहीं, जब कोई ज्ञान तत्व बिना किसी श्रांगारिक कोलाहल के सुनने को मिलता है, वह ग्रहणीयता के तार झंकृत कर देता है। एक स्थान पर खड़े हुये दिये गये २० मिनट के इस आख्यान में दशकों की अनुभव यात्रा का निचोड़ था।

शिक्षा पर विचारणीय दृष्टि
वार्ता का विषय था कि किस तरह शिक्षा की मृत्युघाटी से बाहर निकलें। वर्तमान शिक्षा पद्धति के लिये इतने कठोर शब्द का उपयोग ही उनके अवलोकनों और विश्लेषणों के निष्कर्ष को व्यक्त करता है। साथ ही साथ उस पीड़ा और छटपटाहट को भी दिखाता है जिससे होकर शिक्षा के प्रति संवेदनशील बौद्धिक समाज जी रहा है। उस मात्रा में भले ही न हो, पर शिक्षा पद्धति के विषय में हम सबके अन्दर भी उसी प्रकार की असंतुष्टि पनप रही है।

श्री रॉबिन्सन के अनुसार मानव की शिक्षा पद्धति मानव के मूलभूत गुणों के अनुरूप होनी चाहिये, पर वर्तमान शिक्षा पद्धति इनकी अनदेखी कर रही है। केवल अनदेखी ही नहीं कर रही है वरन उसके विपरीत जा रही है। यदि यही होता रहा तो मानव धीरे धीरे मशीन होता जायेगा, सभ्यता के विस्तृत प्राचीर में एक ईंट। यन्त्रवत से जीवन हो जायेंगे, तन्त्र मानवीय न रहेंगे।

मानव के तीन मूलभूत गुण हैं। पहला है उनकी भिन्नता और विविधता। दूसरा है उनमें निहित उत्सुकता। तीसरा है उनकी सृजनात्मकता। यही तीन गुण उसे मानसिक और बौद्धिक रूप से पूरी तरह से विकसित करते हैं। बिना इन तीन गुणों के मानव स्वयं को पूर्णता से व्यक्त नहीं कर सकता है। एक भी विमा यदि अनुपस्थिति रही तो विकास आंशिक होगा, सर्वपक्षीय नहीं होगा। आइये देखते हैं कि वर्तमान शिक्षा पद्धति किस प्रकार इन तीनों मूलभूत धारणाओं के विपरीत कार्य कर रही है।

कोई दो बच्चे एक जैसे नहीं होते हैं, जन्म से भी नहीं, परिवेश से भी नहीं, भले ही वे सगे भाई या सगी बहनें ही क्यों न हों? सबकी अपनी क्षमता होती है, सबकी अपनी विशिष्टता होती है। फिर भी हमारी शिक्षा पद्धति ऐसी है कि हम सबको एक जैसा ही बनाना चाहते हैं। प्रारम्भ से एक ही विषय पढ़ाते हैं, एक सा ही समझते हैं, फैक्टरी के उत्पाद जैसा। एक जैसी शिक्षा सबके काम नहीं आती है, कुछ को रुचिकर लगती है, कुछ सामाजिक कारणों से लग कर पढ़ते हैं, कुछ माता पिता को दिखाने के लिये पढ़ते हैं, कुछ का मन तनिक भी नहीं लगता है, कुछ पढ़ाई छोड़ ही देते हैं। हमें लगता रहता है कि बच्चों का मन पढ़ाई में क्यों नहीं लग रहा है? उपाय भी सरल ही है, देखिये कि पढ़ाई छोड़ने के बाद किन किन क्षेत्रों में बच्चों का मन लगता, वे सारे विषय पढ़ाये जाये। हर एक के लिये अपनी रुचि के अनुसार पढ़ने को मिले तो समय के पहले पढ़ाई छोड़ देने वालों की संख्या न्यूनतम हो जायेगी।

क्या शिक्षा में यह उत्सुकता पल्लवित होती है?
बच्चे प्राकृतिक रूप से उत्सुक होते है, जिज्ञासु होते हैं। उनकी उत्सुकता को व्यापक आधार या निष्कर्ष देने के स्थान पर हम उसमें ठंडा जल डाल देते हैं। यदि हम उनको यह बता दें कि क्या पढ़ना है तो वे हमसे अच्छा पढ़ सकते हैं। हमारी शिक्षा पद्धति उन्हें सब कुछ घोंट कर पिला देना चाहती है, वह सब कुछ जिसे जानकर हम स्वयं को विद्वान समझने का भ्रम पाले बैठे हैं। आप उन्हें बताये या न बतायें, उनकी उत्सुकता उन्हें वांछित ज्ञान तक ले आयेगी। कितनी ही ऐसी ज्ञान की बाते होती हैं जो बच्चे स्वयं ही सीख जाते हैं। कभी उनके प्रश्नों की दिशा और सृजनात्मकता पर ध्यान दिया है, आप आश्चर्य करने के अतिरिक्त कुछ और कर भी नहीं सकते हैं। उसकी उत्सुकता के लिये हमें उसे उकसाने की आवश्यकता है, उसे दिशा देने की आवश्यकता है, उसे प्रेरित करने की आवश्यकता है। हमें उसे पढ़ाना नहीं है, उसे सीखने के लिये उद्धत करना है, उत्सुकता का उपयोग करने के लिये तैयार करना है। इसके स्थान पर वर्तमान शिक्षा पद्धति ज्ञान ठूँसने में विश्वास रखती है और यह जानने के लिये परीक्षायें लेती रहती है कि ठूँसे हुये ज्ञान को समुचित उगलने का अभ्यास किया कि नहीं किया बच्चों ने?

सृजनात्मकता हमारा सर्वाधिक सशक्त गुण है। आप एक समस्या दस बच्चों को देकर देखिये, सब के सब अपने सृजनात्मक वैशिष्ट्य के अनुसार उसका समाधान ढूँढ़ लेगे। जीवन की समस्या है, ज्ञान की समस्या हो, विकास के सारे अध्याय इसी गुण ने लिखे हैं। इस गुण को उभारने के स्थान पर वर्तमान शिक्षापद्धति सबको समान रूप से उत्तर देने की अपेक्षा रखती है और जो सबसे भिन्न रहता है, वह दौड़ में पिछड़ जाता है। हम मानकीकरण को अपना मूलमन्त्र बनाये बैठे हैं, सबको एक ही तुला से तौलने चले हैं।

जब तक ये तीनों गुण पोषित रहते हैं, बच्चे को अपना महत्व पता चलता रहता है। उसे लगता है कि वह अपने प्रयास से सीख रहा है, न कि शिक्षा पद्धति से बौद्धिक अनुदान पा रहा है। उसे करने का भाव मिलता है, न कि कुछ पा जाने का। आन्तरिक क्रियाशीलता बच्चे को प्रेरित करती है, उकसाती है। यदि ऐसा नहीं हो पाता है तो वह अपना रुझान खो देता है, ठंडा पड़ जाता है। थोपे हुये तत्व व्यक्तित्व को ठेस पहुँचाते हैं, वह उन्हें स्वीकार नहीं कर पाता है। विविधता बनी रहती है तो कुछ भी थोपा हुआ सा नहीं लगता है, उत्सुकता बनी रहती है तो कुछ थोपा हुआ सा नहीं लगता है, सृजनात्मकता बनी रहती है तो कुछ थोपा हुआ सा नहीं लगता है।

वर्तमान शिक्षा पद्धति को इस दिशा में सोचना होगा। फैक्टरी के स्वरूप में शिक्षा को उत्पाद नहीं बनाया जा सकता। शिक्षक और शिष्य के बीच वैयक्तिक और दीर्घकालिक संबंध और क्रियाशीलता आवश्यक है। एक के बाद एक सारे महान जनों को देख लें, उनके ऊपर किसी शिक्षक की कृपादृष्टि रही है, जिसने ये तीन गुण न केवल समझे, वरन व्यक्तित्व में विकसित कराये। बच्चे को पढ़ाने भर से शिक्षकीय कर्मों की इतिश्री नहीं हो सकती है। एक बच्चे को पढ़ना और तदानुसार गढ़ना, यही एक शिक्षक का मूल कार्य है, यही शिक्षा पद्धति की सार्थकता है। 

12.10.13

कानपुर से बंगलोर

आनन्द के अतिरेक में थकान का पता नहीं चलता है। थकान तब आती है, जब आनन्द अवस्था से आप जीवन के सामान्य पर उतर आते हैं। दिनभर सहपाठियों के साथ भेंट में समय का पता ही नहीं चला। मन तो प्रसन्न ही बना रहा, पर शरीर अपनी सीमाओं से कितना परे जा चुका था, उसका प्रमाण मिलना शेष था। मन अपने सामने किसी की सुनता नहीं है, सबसे मनमाना कार्य लेता है। शेष सबको अपनी सीमाओं से आगे निकलने का पता तब चलता है जब मन तनिक शान्त होता है। मन मित्र बना रहे, सच्चा साथ देता रहे, भरमाये नहीं, उद्विग्न न करें, और भला क्या चाहिये इस चंचल जीव से।

स्टेशन जाते समय थोड़ी देर के लिये अपने मामाजी के यहाँ जाना हुआ। मन का उछाह और तन की थकान मेरे ममेरे भाई को स्पष्ट दिख गयी थी, उसने स्नान करने की भली सलाह दी। स्नान के पश्चात मन स्थिर हुआ, शरीर में शीतलता भी आयी, पर लगा कि थोड़ा विश्राम फिर भी आवश्यक है। अब थोड़ी ही देर में वापसी की यात्रा प्रारम्भ करनी है, सोचा तभी जीभर कर विश्राम हो जायेगा, अभी तन्त्रिका तन्तुओं को सचेत रखते हैं।

नाम में दम
वहाँ से स्टेशन जाते समय एक चाट वाला ठेला दिखायी पड़ा, लिखा था, हाहाकार बतासे, ललकार टिकिया। वाह, सच में महारोचक नाम है यह, बतासे ऐसे कि आप हाहाकार कर उठें और टिकिया आपको खाने के लिये ललकारे, विपणन की भला इससे अधिक प्रभावी तकनीक और क्या हो सकती है? कानपुर में ही एक और प्रसिद्ध दुकान है, ठग्गू के लड्डू और बदनाम क़ुल्फ़ी। आनन्द की बात यह है कि इतने दमदार और दामदार नाम होने के बाद भी यह नगर मँहगा नहीं है। बंगलोर जैसे मँहगे नगर में रहने के बाद कानपुर के बारे में एक बात तो सविश्वास कहीं जा सकती है, नामों में दम पर दामों में कम। पिछली पोस्ट में कानपुर की न सुधरने वाली टिप्पणी कहीं हमारे ससुराल, विद्यालय और आईआईटी का हृदय न तोड़ बैठे, इसलिये कानपुर के कुछ अच्छे पक्ष उजागर करने का नैतिक दायित्व भी हमारा ही बनता है।

इदमपि कानपुरम्
झाँसी इण्टरसिटी प्लेटफ़ार्म नम्बर एक से जानी थी। वहाँ पर पहुँच कर एक दूसरे प्रकार के आनन्द की अनुभूति हुयी। पिछले कई वर्षों से एक नम्बर प्लेटफ़ार्म को देखता आ रहा हूँ, सदा ही ऐसा लगा था कि वहाँ पर स्थान कम है और भीड़ अधिक। इस बार स्थान अधिक लगा और भीड़ कम। पिछले एक दो वर्षों से हुये बदलाव में ट्रेन से २० मीटर तक की दूरी से सारी दुकानें, बेंच और अन्य अवरोध हटा लिये गये हैं। इतना सपाट कि वहाँ पर चार सौ मीटर की दौड़ आयोजित की जा सके। ऐसा करने से यात्रियों के आवागमन में कोई कठिनाई नहीं आती है और सब कुछ बड़ा खुला खुला सा लगता है। यदि प्लेटफ़ार्म बनाये जायें तो ऐसे ही बनाये जायें, परिवर्धन भी इन्हीं सिद्धान्तों पर ही हो। दुकान, बेंच आदि बनाने से हम थोड़ी बहुत सुविधा तो देते हैं पर प्लेटफ़ार्म को उसके प्राथमिक कार्यों से वंचित कर देते हैं। प्लेटफ़ार्म का प्राथमिक कार्य अधिकतम भीड़ को निर्बाध रूप से सम्हालना है। भोजन, विश्राम आदि की व्यवस्था प्लेटफ़ार्म क्षेत्र के बाहर हो, प्लेटफ़ार्म पर केवल यात्री ही जाये, सामान ले जाने के लिये ट्रॉली हों, आने और जाने के लिये भिन्न भिन्न द्वार हों, तभी कहीं जाकर स्टेशनों पर स्वच्छता और व्यवस्था रह पायेगी। अभी तो प्लेटफ़ार्म पूरा मेलाक्षेत्र लगता है, १५-२० मीटर चौड़े और ६०० मीटर लम्बे प्लेटफ़ार्म सदा ही पूरी तरह खचाखच भरे दिखते हैं। ट्रेनों में यात्रियों की पूरी संख्या की दृष्टि से भी यह क्षेत्रफल ४ गुना है, फिर भी पैर रखने का स्थान नहीं मिलता है प्लेटफ़ार्मों पर। बताते चलें कि चीन में केवल यात्री ही प्लेटफ़ार्म पर जा सकते हैं और वह भी ट्रेन आने के मात्र ३० मिनट पहले ही। वहाँ के प्लेटफ़ार्म इतने स्वच्छ और खाली दिखते हैं कि वहाँ फ़ुटबॉल खेली जा सके।

इण्टरसिटी समय से आयी, इस बार पिछले दरवाज़े के पास की सीट मिली थी, सीट पर बैठने के बाद अत्यधिक सफल और सुचारु रूप से संचालित कार्यक्रम के लिये कई मित्रों को धन्यवाद प्रेषित किया और आँख बन्द कर कुछ सोचने लगे। थकान तो पहले से ही थी अतः बैठते ही निढाल हो सीट पर ही लुढ़क गये, कब नींद आ गयी पता ही नहीं चला। अधिक विश्राम हो नहीं पाया और शीघ्र ही नींद उचट गयी। वातानुकूलन होने के बाद भी गर्मी लग रही थी, अर्धचेतना में संशय हुआ कि या तो बुखार आ गया है या वातानुकूलन कार्य नहीं कर रहा है। पूर्णचेतना में आने पर कारण तीसरा ही निकला।

कोच के बाहर खड़ा एक व्यक्ति धीरे से दरवाज़ा धकिया कर वातानुकूलन की शीतल हवा बाहर लिये ले रहा था। उसके ऐसा करने से बार बार गर्म हवा का झोंका लग रहा था और विश्राम में विघ्न पड़ रहा था। उलझन तो हुयी पर मुझे उन महाशय की जुगाड़ प्रवृत्ति पर आश्चर्य भी हुआ और हर्ष भी। तभी विद्युत विभाग के अपने एक सहयोगी अधिकारी की बात याद आयी कि यदि दरवाज़ा खुला रह जाये तो वातानुकूलित संयन्त्र पर बहुत अधिक बोझ पड़ जाता है और संभावना रहती है कि वह शीघ्र ही ढेर न हो जाये। कहीं संयन्त्र बिगड़ न जाये, इस संभावना को न आने देने की कटिबद्धता में मैंने टीटी महोदय को बुला कर वातानुकूलन का यह पक्ष समझाया और उन व्यक्ति को ऐसा न करने की सलाह देने को कहा। मेरे याचना में संभवतः उतना बल न होता जितना टीटी महोदय के एक वाक्य में दिखा। उस व्यक्ति ने मेरी ओर ऐसे देखा, मानो मैंने लोकतन्त्र या धर्मनिरपेक्षता की नयी परिभाषा प्रस्तुत कर दी है। फिर बाहर जाकर टीटी महोदय ने उन महाशय को पता नहीं किन शब्दों में क्या समझाया कि वे नत होकर दृष्टि से ओझल हो लिये।

बाहर से गर्म हवा आनी भले ही बन्द हो गयी हो पर लोगों की बातचीत का उच्च स्वर सुनायी पड़ रहा था। कान लगा कर सुना तो विषय था कि अगला प्रधानमंत्री कौन? चर्चा भले ही चलती ट्रेन में हो रही थी, भले ही वातानुकूलन के बाहर हो रही थी, भले ही खड़े खड़े हो रही थी, पर चर्चा टीवी पर होनी वाली चर्चाओं से कहीं ऊँचे स्तर की और कहीं अधिक विश्लेषणात्मक थी। मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के राजनैतिक प्रभाव, दशकों से वोटर की बदलती मानसिकता, राजनैतिक पार्टियों की सूचना संग्रहण प्रक्रिया और निर्णयों को किस समय लेना है, इन जैसे कई विषयों पर जो सुनने को मिला, वैसा आज तक न किसी चैनल में सुना और न किसी समाचार विश्लेषण में पढ़ा। कानपुर के आस पास के जनों की इतनी उच्च राजनैतिक चेतना देख कर मन किया कि अपनी सीट उन्हें देकर उनका त्वरित सम्मान कर दें, पर अपनी थकान का स्वार्थ सर चढ़ कर बोलने लगा और यह सुविचार उतनी ही त्वरित गति से त्याग दिया गया। हाँ यदि टीवी चैनल वालों को अपनी टीआरपी स्तरीय विश्लेषणों से बढ़ाने की इच्छा हो तो उन्हें कानपुर-झाँसी के बीच चलने वाली ट्रेनों में अपना स्थायी प्रतिनिधि नियुक्त कर देना चाहिये।

झाँसी उतर कर ३ घंटे का विश्राम था, पर पूर्व परिचितों के आ जाने और उनके साथ बतियाने में वह समय भी निकल गया। नींद का ब्याज बढ़ता जा रहा था, पर राजधानी ट्रेन का आश्रय था कि उसमें सोकर सारी थकान उतारी जायेगी।

बंगलोर राजधानी झाँसी के प्लेटफ़ार्म नम्बर एक पर ही आयी। कोच पीछे था, वहाँ पहुँचने के क्रम में सारे प्लेटफ़ार्म पर एक विहंगम दृष्टि डाली। कानपुर की तुलना में झाँसी का प्लेटफ़ार्म पूरी तरह से भरा और अव्यवस्थित लग रहा था। अव्यवस्था से अधिक, झाँसी का प्लेटफ़ार्म वहाँ पर व्याप्त घोर निर्धनता को भी अभिव्यक्त कर रहा था। रात को कई ट्रेनें झाँसी से होकर निकलती हैं, कई ट्रेनें सुबह जाती है, लोग सायं से ही आकर स्टेशन पर डेरा डाल लेते हैं। प्लेटफ़ार्म पर ग्रेनाइट या अच्छा पत्थर लगने से लोगों को वहाँ पर सो लेने में कष्ट नहीं होता है। बहुतों के पास चद्दर नहीं थी, कई गत्ते बिछाकर सोये थे, कई नीचे अखबार बिछाये लेटे थे। छोटी छोटी गठरियाँ, मैले कुचैले कपड़े, सोये समाज में श्रमिक वर्ग प्रमुख था। पाँच छह के समूह में एक व्यक्ति आधी आँख खोले सामान की सुरक्षा कर रहा था। जो एकल थे, वे अपना सामान या तो हाथों में बाँधे थे या पैरों से दबाये सो रहे थे। बीस मीटर चौड़े प्लेटफ़ार्म पर दो फ़ुट चौड़ा रास्ता नहीं मिल रहा था चलने को। ऐसा नहीं है कि आवश्यकता पड़ने पर प्लेटफ़ार्म पर सोया नहीं जा सकता, पर यह दृश्य देख कर विवशता शब्द अधिक मुखरित होता है।

राजधानी के अन्दर पहुँच कर लगा कि सहसा विश्व परिवर्तन हो गया। रात्रि का डेढ़ बजा था, झाँसी के प्लेटफ़ार्म नम्बर एक का दृश्य मन को व्यथित अवश्य कर रहा था पर इस बार मन पर शरीर ने सहज अधिकार जमा लिया। थकान और शीतल वायु ने कुछ ही मिनटों में सोने को विवश कर दिया। स्वप्नहीन निशा थी, निश्चिन्त निशा थी, पिछले न जाने कितने दिनों की शारीरिक व मानसिक व्यस्तता के बाद घर वापसी की पूर्वनिशा थी। पता ही नहीं चला कि कब रात निकली, कब दिन चढ़ा, कब नागपुर आया और वर्धा पीछे छूट गया। जब नींद खुली तब अच्छा लग रहा था, थकान जा चुकी थी, परिचारक कई बार अल्पाहार व चाय के बारे में पूछ चुके थे। भोजन में क्या लेना है क्या नहीं, कब लेना है, आदि कई प्रश्नों से अपने ही देश में राजा होने का क्षणिक सुख अवश्य देती है राजधानी ट्रेन।

एक युगल था ऊपर की दो सीटों पर, नया विवाह था और प्रेम विवाह था, अनौपचारिकता और व्यवहारिकता अधिक थी, कोई झिझक व संकोच नहीं। हमारे घर में तो कई दिन इस बात पर चर्चा चली कि हमारी श्रीमतीजी हमें क्या संबोधन करें। हमारी माताजी और पिता जी एक दूसरे को पापा और मम्मी ही कहते हैं। कई लोग माँ और पिता के सम्बोधन को वैश्विक न बना कर बच्चों के नाम भी विशेषण के रूप में जोड़ देते हैं। अन्ततः बात पाण्डेजी पर आकर नियत हुयी, साथ में हमसे श्रद्धा कहने का अधिकार भी नहीं छीना गया, यह बात अलग है कि भरी भीड़ में हम भी सुनोजी जैसे सम्बोधनों पर उतर आते हैं। यह युगल था कि धाँय धाँय एक दूसरे का नाम लिये जा रहा था। कितने ही आधुनिकता में आ गये हों पर सार्वजनिक नाम लेना अब भी अटपटा लगता है। अच्छा ही है, माँ बाप ने इतने प्यार से नाम रखा है, लेने देने में क्या जाता है।

सायं से अगली सुबह तक ट्रेन तेलंगाना और सीमान्ध्र क्षेत्र में थी, पूरे आन्ध्र में आन्दोलन की स्थिति थी, भय इस बात का था कि कहीं रास्ते में रोक न लिया जाये। कहीं कुछ भी व्यवधान नहीं आया और हम ११० घंटे के पश्चात अपने परिवार के साथ सकुशल और प्रसन्न थे।

इति यात्रा।

9.10.13

वर्धा से कानपुर

स्टेशन पर ट्रेन आने के ३० मिनट पहले पहुँच गया था, ट्रेन अपने समय से ३० मिनट देर से आयी। मेरे पास एक घंटे का समय था, थोड़ी देर पहले जमकर वर्षा हुयी थी, बाहर का वातावरण सुहावना था, प्रतीक्षालय में न बैठकर मैंने प्लेटफ़ार्म की बेंच में बैठकर चारों ओर के दृश्य देखने और उन्हें लिखते रहने का निश्चय किया।

कितने विश्व यहाँ दिखते हैं
प्लेटफ़ार्म की बेंच पर बैठ कर चारों ओर देखते रहने से आस पास चल रहे ढेरों लघुविश्व दिखने लगते हैं। पहले तो लगता है कि रेलवे प्लेटफ़ार्म पर उपस्थित लोग या तो यात्री हैं या उनकी सुविधा के लिये वहाँ उपस्थित कर्मचारी या सहयोगी सेवा देने वाले। प्रथम दृष्ट्या लगता है कि यात्रियों के चारों ओर ही घूमता होगा प्लेटफ़ार्म का चक्र। यथार्थ पर इस धारणा से कहीं अलग होता है और कहीं अधिक रोचक भी।

जिस प्लेटफार्म पर मैं खड़ा प्रतीक्षा कर रहा था, उसके एक ओर से एक दिशा में और दूसरी ओर से दूसरी दिशा में ट्रेनें जा रही थी। एक के बाद एक ट्रेनें निकल रही थीं, हर दस मिनट में दो ट्रेनें, दोनों दिशाओं से एक एक। पास में ही एक कर्मचारी खड़ा था, उसका कार्य जाती हुयी ट्रेन को ढंग से देखना था और सबकुछ ठीक होने पर गार्ड महोदय को हरी झण्डी दिखाना था। यह बहुत ही अच्छा सुरक्षा उपाय होता है। ट्रेन में ड्राइवर और गार्ड दो सिरों पर तो रहते हैं, पर बीच अवस्थित ७०० मीटर लम्बी ट्रेन मे क्या घट रहा है, इस बारे में उन्हें जानकारी नहीं रहती है। हर स्टेशन और हर रेलवे फाटक पर यही कर्मचारी उनको सब कुछ ठीक होने की सूचना देते रहते हैं। बरबस ही ध्यान देश की गहराती और गाढ़ी हो चुकी समस्याओं पर चला गया कि काश इन तन्त्रों को भी हर थोड़ी दूरी पर कोई यह बताने के लिये खड़ा किया जाता कि सब कुछ ठीक चल रहा है। कोई भी तन्त्र बनाने के समय हम इतनी छोटी सी पर इतनी प्रभावी बात कैसे भुला देते हैं?

वह कर्मचारी अपने कार्य में मगन था। वह हर डब्बे को ध्यान से देखता था और अन्त में ट्रेन के गार्ड को बड़े ही उत्साह में हरी झण्डी हिलाता था। यह उत्साह और भी बढ़ जाता यदि गार्ड उनके परिचित निकल आते। मैंने इस बात का तनिक भी आभास नहीं दिया था कि मैं भी रेलवे से ही हूँ और यह तथ्य अवलोकन को और अधिक रुचिकर बना रहा था। उस कर्मचारी का उत्साह आनन्द की एक सुखद रेख बन मन में रच बस गया। दो ट्रेनों के बीच के समय के रिक्त को वह अपने साथ खड़े एक कर्मचारी को कोई पुरानी घटना सुना कर बिता रहा था। जिस लगन से उसने अपना दायित्व निभाया और जिस तरह मगन हो उसने अपने मित्र को अपनी घटना सुनायी, उसने मुझे अत्यधिक प्रभावित किया। यह देख कर मुझे लगा ही नहीं कि एक घंटे के प्रतीक्षा समय में मुझे किसी प्रकार की उलझन होनी चाहिये।

पास में ही एक सास, एक बहू और उसके चार बच्चे बैठे थे। देखने से लगा कि वे भी उसी ट्रेन की प्रतीक्षा में हैं और मुझसे पर्या्प्त पहले से वहाँ विद्यमान हैं। सास के चेहरे पर आधिपत्य झलक रहा था और वह कम बोल रही थी, बहू भी हल्का मुँह बनाये अपनी बात बोले ही जा रही थी। माँ और दादी के बीच चल रहे रासायनिक युद्ध का लाभ उठा बच्चे दोनों ओर पटरियोों में झाँक झाँक कर अपनी उत्सुकता को व्यक्त कर रहे थे। जब भी वे प्लेटफार्म के किनारे पर पहुँचते, दोनों सास बहू युद्धविराम कर बच्चों पर चिल्लाती, कहना न मानने पर झल्लाती और उन्हें उठाकर ले आतीं। युद्ध तो रह रह रुका जा रहा था, पर क्रोध कम नहीं था दोनों के मन में। बहू जब सास से अधिक नहीं जूझ पायी तो उसने अपने सबसे ऊधमी बच्चे के धमक कर अपने क्रोध का स्पष्ट संकेत दे दिया। यही नहीं, उस समय चारों ओर अपनी क्रोध भरी आँखे घुमाकर अश्वमेघ यज्ञ भी कर डाला। मैं अब तक उनके गृहनाट्य पटकथा का आनन्द उठा रहा था, बहू की उस दृष्टि ने मुझे अपना सारा ध्यान अपने आईफोन पर केन्द्रित करने पर विवश कर दिया।

जब से आईफ़ोन और आईपैड मिनी अद्यतन किया है तब से उसके विशिष्ट पक्ष अधिक नहीं देख पाया था। आईओएस७ से आईफोन पूरी तरह से नया लगने लगा है। वर्ष भर इस नयेपन को जीने के बाद ही नये आईफोन के बारे में सोचा जायेगा और तब तक इसके ही प्रयोग से ही तकनीक में बने रहा जायेगा। फ़ोन आदि करने के अतिरिक्त आईफ़ोन का सर्वाधिक उपयोग ईमेल, फेसबुक और टाइप करने में ही होता है। उसका हिन्दी कीबोर्ड और भी अच्छा हो गया है, अब अधिक समय तक टाइप करने में आनन्द आने लगा है। साथ ही साथ उसमें नोट का पार्श्व रंग पीले के स्थान पर श्वेत कर दिया गया है और लाइनें हटा दी गयी हैं। जिससे वह दिखने में और भी सुन्दर लगने लगा है।

ट्रेन आ गयी, सीट देखी तो किनारे की ऊपर वाली सीट थी। यात्रा के बीच के स्टेशन पर होने के कारण यह कोने की सीट भाग्य में अवतरित हुयी थी, नहीं तो बहुधा अन्दर की ही सीट मिलती रही है। लोगों को भले ही यह सीट थोड़ी अटपटी लगे पर मेरे कुछ मित्रों को यह सीट बड़ी भली लगती है। जब तक चाहिये चुपचाप लेटे रहिये, कोई व्यवधान नहीं, कोई पूछने वाला नहीं। मुझे बस तीन समस्यायें आयी। पहली, नीचे एक महिला के सोते रहने के कारण जब भी बैठने की इच्छा होती तो अन्दर वाली सीटों के मालिकों से पूछना पड़ता था। दूसरी, बार बार उतरने चढ़ने में कष्ट होने के कारण तब तक नीचे नहीं उतरता था जब तक उसके लिये पर्याप्त कार्य एकत्र न हो जाये। तीसरी, ऊपर की सीट में कोई चार्जिंग प्वाइंट नहीं होने से हर बार नीचे वाली सीट से बिजली उधार माँगनी पड़ती है। दो बार ही पूछा होगा, पर नीचे वाली महिला ने ऐसे देखा मानो ४०-५० लाख का होम लोन माँग लिया हो।

कष्टभरी है ऊपरी शैय्या
तीन समस्याओं को यथासंभव साधते हुये मैं स्वयं में व्यस्त हो गया। अन्दर की सीट में ऊपर की ओर एक वृद्ध बैठे थे, निश्चय ही ६० के ऊपर थे, उन्हें हर बार चढ़ने उतरने में कष्ट हो रहा था। चाह कर भी उनकी सहायता नहीं कर पा रहा था। यदि कोई इस तरह से नीचे की सीट माँगता है तो मैं बदलने को तुरन्त तैयार हो जाता हूँ, आज मैं भी किनारे की छत पर टँगा था। अन्दर की ओर दो अन्य युवा जीव नीचे बैठे थे पर उन्हें लगा कि वृद्ध को नीचे की सीट देने से उनके सम्मान को ठेस पहुँच जायेगी। वृद्ध भी सज्जन थे, उन्होंने अधिक ज़ोर नहीं डाला और चुपचाप ऊपर नीचे करने लगे। रात में एक बार उतरते हुये उनका हाथ सरक गया और वे गिर पड़े, बड़ी चोट लगी। फिर भी नीचे बैठे मूढ़ों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा और उन्होंने अपनी नीचे की सीट उन वृद्ध को नहीं दी। यूएन की एक आयी रिपोर्ट में ठीक ही कहा गया है कि वृद्ध लोगों की सुविधा की दृष्टि से भारत का स्थान विश्व में ७३वाँ है। ऐसे दृश्य देख कर यूएन की रिपोर्ट पर अविश्वास भी तो नहीं किया जा सकता है।

कई बार इस विषय पर चर्चा की है कि किस तरह से रेलवे में वयोवृद्ध यात्रियों को स्वतः ही नीचे की सीट दी जा सके। रेलवे में यह व्यवस्था वांछनीय तो है पर उसका क्रियान्वयन उतना ही कठिन है। चर्चा के निष्कर्ष इस प्रकार हैं। जैसे ही टिकट बिकने प्रारम्भ होते हैं, उपलब्धता के अनुसार सीटों का आवंटन प्रारम्भ हो जाता है। हर आरक्षित टिकट पर एक सीट नम्बर होता है और आवंटन एक ओर से प्रारम्भ होता है। उस समय इस बात का ध्यान अवश्य रखा जाता है कि एक टिकट पर सभी व्यक्तियों को एक साथ रखा जाये। जब अधिकतम सीटें भर जाती हैं तो फुटकर स्थान एक के बाद एक भरते जाते हैं और उसमें प्रारम्भिक चरणों की तुलना में सुविधाओं का ध्यान रखना संभव नहीं होता है। किसी के टिकट निरस्त कराने से छूटे स्थान भी इसी तरह अस्त व्यस्त बँटते हैं।

समाधान तब संभव है, जब प्रारम्भ में मात्र आरक्षण दिया जाये, सीट नम्बर न बताया जाये, जैसा कि प्रथम वातानुकूलित श्रेणी में होता है। ट्रेन चलने के नियत समय पहले सभी मानवीय सुविधाओं को ध्यान में रखकर सीटों का आवंटन किया जा सकता है। ठीक इसी तरह का सीट आवंटन हवाई यात्राओं में भी होता है। इसमें समस्या बस इतनी है कि अन्तिम समय में सबके लिये अपना सीट नम्बर पता करने में और उसके अनुसार अपनी नियत सीट में बैठने में अव्यवस्था फैलने का डर है। वर्तमान में पहले से सारी सीटें नियत रहने से अन्तिम समय में अव्यवस्था न्यूनतम रहती है और केवल प्रतीक्षारत यात्री अपने टिकट की स्थिति जानने को उत्सुक रहते हैं। व्यवस्था में परिवर्तन और आईटी और मोबाइल के समुचित उपयोग से शीघ्र ही ऐसी समस्याओं का समाधान होगा, ऐसी भविष्य से आशा है।

रात में यात्रा का पहला भोजन था जो ट्रेन से मँगाया था, एक रोटी से अधिक नहीं खा सका, शेष छोड़ दिया। नागपुर से कुछ केले ले लिये थे जिनसे क्षुधा भी शान्त हुयी और ऊर्जा भी मिली। थोड़ा प्रयास करते तो यात्रा के बीच के स्टेशनों पर परिचितों के घर से भोजन आ सकता था, पर संकोचवश उनसे कह न सका। रात में शीघ्र ही सो जाने से झाँसी में प्रातः नींद खुल गयी, खिड़की से ही अपने पुराने स्टेशन को देखता रहा। तब जिन कार्यों का प्रस्ताव भेजा था, सब आधारभूत निर्माण पूरा हो चुका था। दो दिन पहले ही झाँसी कानपुर का विद्युतीकरण भी सम्पन्न हुआ था, अब झाँसी में इंजन बदलने में व्यर्थ हुआ समय कम हो जायेगा। बड़ा अच्छा लग रहा था, प्रभात का समय और सच हुये स्वप्न।

उन स्वप्नों को तब झटका लगा जब ट्रेन कानपुर पहुँच रही थी। कूड़े के वही ढेर और नगरीय अव्यवस्था। सब सुधर गये, तुम न सुधरे कानपुर।

5.10.13

बंगलोर से वर्धा

कभी कभी लगता है कि यात्रा के बारे में क्या लिखूँ? यात्रायें सामान्य क्रियाओं की श्रेणी में आ चुकी हैं। सबकी यात्रायें एक जैसी ही होती होंगी, यदि कुछ विशेष रहता होगा तो वह है यात्रा में मिले लोग। यदि आप बातें करने में उत्सुक हैं तो आपकी हर यात्रा रोचक होगी। यदि ऐसा नहीं है और आप पूर्णतया अन्तर्मुखी हैं तो आपकी यात्राओं में कुछ विशेष कहने को नहीं होगा।

पहचानों, हैं कौन मुखी हम
मुझे अब तक समझ नहीं आया है कि मैं बहिर्मुखी हूँ या अन्तर्मुखी। कभी कभी न चाहते हुये भी सामने वाले से इस लिये भी बतिया लेते हैं कि कहीं ऐसा न लगने लगे कि मानसिकता में भी प्रौढ़ता छाने लगी है। पता नहीं युवावस्था किस अवस्था तक मानी जाती है़, पर मन यह मानने को करता ही नहीं कि हम प्रौढ़ता के द्वार खटखटा रहे हैं। जब से लिखना अधिक हो गया, सोचना अधिक हो गया, अब अधिक बतियाने से समय व्यर्थ होने का बोध होता है, लगता है कि इससे अच्छा कुछ लिख लिया होता।

क्या हम यात्राओं में सामने वाले से बस क्या इसीलिये बतियाते हैं कि समय कट जाये, या संभव है कि कुछ नया और रोचक जानने को मिल जाये। २०-३० घंटे के यात्रा में उत्पन्न बौद्धिक व मानसिक संबंधों की इच्छा तब बहुत अधिक नहीं रहती जब आपके पास स्वयं ही करने के लिये पर्याप्त कार्य हों। अपने कार्यों के बन्धनों का बोझ जब अधिक कर लें तो सारी शक्ति उसी को साधने में निकल जाती है, पर सबको लगता है कि हम अन्तर्मुखी हो चले हैं। जब हम सभी बोझों से मुक्त रहते हैं और स्वयं को अनुभव से भरने को प्रस्तुत रहते हैं तब सबको लगता है कि हम बहुर्मुखी हो चले।

मैं भी अन्तर्मुखी और बहुर्मुखी की अवस्थाओं में बहुधा उतराता हूँ, इस यात्रा में पूरी तरह से निर्धारित कर के चला था कि ज्ञान के सागर भरूँगा, इसीलिये टेड की ढेरों वार्तायें अपने आईपैड में भरकर ले गया था। अनुभव भरने को प्रस्तुत था तो बहुर्मुखी होना था, पर अनुभव पूर्वनियोजित था और स्वयं में ही व्यस्त रहना था, अतः व्यवहार अन्तर्मुखी था।

पूर्वनियोजित अन्तर्मुखी बने रहने की सारी योजना तब धूल धूसरित हो गयी जब टेड की वार्ताओं ने बतियाना बन्द कर दिया। अब तो चाह कर भी व्यस्त नहीं लग सकते थे, अतः निश्चय किया कि कृत्रिम आवरण छोड़कर बहुर्मुखी हो जाया जाये।

सामने की सीट में एक वृद्ध महिला को बिठा कर उनके सहायक उतर गये थे। सामने की सीट रिक्त होने के कारण वह वहाँ बैठकर सुस्ता रही थीं। उन्हें यह तो ज्ञात था कि उनकी सीट पक्की है पर कौन सी वह सीट है, इसकी समुचित सूचना नहीं थी उन्हें। संभवतः ट्रेन चलने के तुरन्त पहले ही उनका आना हुआ था और सामने वाला कोच का दरवाज़ा खुला होने के कारण उसमें उन्हें चढ़ा दिया गया था। मुझे भी कुछ कार्य नहीं था अतः उनसे थोड़ी देर बैठ कर बात करता रहा। उनका व्यवहार मातृवत लगा और उनके हर वाक्य में एक बार बेटा अवश्य निकल रहा था। मुझे लगा कि मुझे उनकी सीट ढूँढ़ने में उनकी सहायता करनी चाहिये पर टीटी महोदय के आने तक कुछ कर भी नहीं सकता था।

टीटी महोदय आये और टिकट देख कर बोले कि माताजी आपका तो प्रथम वातानुकूलित कोच में है, आप द्वितीय वातानुकूलित कोच में क्यों बैठी हैं? माताजी के चेहरे पर रेलवे संबंधित इतनी जटिलता न जानने के मन्द भाव उभर आये। टीटी महोदय ने बताया कि उनका कोच दो कोच के बाद है। वे अकेली थीं और एक बड़ा बैग लिये थीं। हमने टीटी महोदय से कहा कि आप जाकर उन्हें बैठा दीजिये, हम पीछे उनका सामान भिजवा देते हैं। यह कह तो दिया था पर भूल गये थे कि हम पूरी तरह से व्यक्तिगत यात्रा पर थे और कोई भी सहायक हमारे साथ नहीं था। जब अगले स्टेशन पर एक और सहयात्री आ गये तो उन्हें अपना सामान देखने को कह कर हम स्वयं ही माताजी का सामान उठाकर उनके कोच में पहुँचा आये। माताजी गदगद हो गयीं, तनिक असहज भी कि क्या बोलें? उन्हें बस इतना ही कहा कि आपने इतनी बार बेटा बोला है तो बेटे को सामान उठाने का अधिकार है।

छोटा ही सही पर एक अच्छा कार्य करके मन प्रसन्न हो गया था। टेड की वार्तायें धुल जाने का दुख पूरी तरह से जा चुका था। अब सामने वाली सीटों पर एक वयोवृद्ध दम्पति थी, जैन मतावलम्बी थे, बंगलोर में किसी धार्मिक आयोजन में भाग लेकर वापस जा रहे थे। पत्नी किसी उपवास में थीं अतः विश्राम कर रही थीं, पतिदेव को दोपहर में नींद नहीं आ रही थी और वे ऊपर की सीट पर बैठकर पुरानी फ़िल्मों के गाने सुन रहे थे। मैनें भी कुछ विशेष न करने का निश्चित किया और आईपैड मिनी पर ही अपने कार्यों को व्यवस्थित करने में लग गया। कुछ पुरानी लेख छिटकनों का संपादन भी करना था, वह भी कार्य में जोड़ लिया। सच में आनन्द आ रहा था, बाहर के सुन्दर दृश्य, ट्रेन के सवेग भागने से उत्पन्न पवन का सुन्दर नाद, पार्श्व में पुराने गीतों का कर्णप्रिय संगीत और व्यस्तताओं के कारण छूटे रह गये कार्य का व्यवस्थित संपादन। सब कुछ लयबद्ध लग रहा था। अब तक टेड वार्तायें बह जाने का दुख पूर्ण रूप से जा चुका था और उसके स्थान पर बहिर्मुखी चेतना आनन्दमयी थी।

दृश्य मगन था
कार्य करने के बाद पुनः बाहर देखने लगा। हरीतिमा से पूरा यात्रा-क्षेत्र लहलहा रहा था। नदी नालों में पानी पूरे वेग में था। पानी का मटमैला रंग इस बात का प्रमाण था कि ग्रीष्म से प्यासी धरती की प्यास बुझाकर आया है वह वर्षा जल। ऊपर हल्के स्याह रंग के बादल से भरा आसमान और नीचे गहरे हरे रंग में लिपटा धरती का विस्तार, निश्चय ही वर्षा बड़ा हो मोहक दृश्य प्रस्तुत कर रही थी।

जैन दम्पति अपने खाने का पूरा सामान लेकर आये थे और घर में बनी चीज़ों को धीरे धीरे और रस लेकर खा रहे थे। सच में देखकर अच्छा लगा कि उनके पास दो बड़े बैगों में एक बैग केवल खाद्य सामग्री से ही भरा था। न बाहर का भोजन और न ही किसी से अधिक बातचीत। प्रारम्भिक परिचय के बाद वे आपस में ही अपने संबंधियों के बारे में कुछ बतियाने लगे। उनकी निजता को सम्मान देने के भाव से मैंने भी कुछ नहीं कहा, अपने लेखन में व्यस्त हो गया। बंगलोर और वर्धा के बीच की ट्रेन यात्रा में मैंने भी बाहर का कुछ नहीं खाया था। श्रीमतीजी ने पराँठे और सब्ज़ी बनाकर दे दी थी, साथ ही साथ १० केले ले लिये थे। उसी में सारा भोजनीय कार्य हो गया।

वर्धा पहुँचने के तीन घंटे पहले, पति ने पत्नी से रुई के बारे में पूछा, पति के नाख़ून में चोट लग गयी थी और हल्का ख़ून निकल रहा था। मेरे पास एक बैण्डेज था, निकालकर दे दिया, उन्हें अच्छा लगा। अगले तीन घंटे हम एक दूसरे को अपने बारे में बताते रहे, दूसरे के बारे में जानते रहे, स्नेहिल भाव से। वर्धा पहुँचने पर हमने उनसे विदा ली और उतर गये।

छोटे छोटे कार्यों की प्रसन्नता में हमारी यात्रा का प्रथम चरण बीत गया। भले ही पूर्वनियोजित यात्रा न हो पायी हो, भले ही अन्तर्मुखी यात्रा न हुयी हो, भले ही पूरी तरह बहिर्मुखी यात्रा भी न हुयी हो, पर यात्रा सरलमुखी थी, सहजमुखी थी।

चित्र साभार - हिन्दू

2.10.13

संग्रह भला किस काम का

कभी कभी लगता है, भगवान जो करता है, बहुत अच्छा करता है।

दो कार्यक्रमों में भाग लेना था, वर्धा में ब्लॉगरीय कार्यशाला और कानपुर में विद्यालय के सहपाठियों से २५ वर्षीय पुनर्मिलन। कानपुर का कार्यक्रम १० वर्ष पहले से नियत किये बैठे थे मित्रगण और वर्धा के लिये सिद्धार्थजी का आदेश दो माह पहले आया। अच्छी बात यह थी कि एक ही यात्रा में वर्धा और कानपुर, दोनों ही समेटे जा सकते थे, असहजता इस बात की थी कि दोनों ही स्थानों पर पूरे कार्यक्रम में भाग न लेकर आंशिक कटौती करनी पड़ रही थी।

कानपुर की ओर सपरिवार ही निकलना होता है, पर परिवार चाह कर भी साथ नहीं चल पा रहा था। बच्चों की परीक्षायें चल रही थी और अपने कार्य के लिये उनकी परीक्षायें को छुड़वाने की सोचना गृह-अपराधों की श्रेणी में आता। जब भी अकेले निकलना होता है, तब यात्रा पूरी तरह से अपने अनुसार ढाली जा सकती है, जहाँ भी समय बचाया जा सकता है, बचाया जाता है भले ही थोड़ी असुविधा ही क्यों न हो? रात और दिन का कोई भेद नहीं रहता है इन यात्राओं में क्योंकि अकेले होने पर कभी भी सोया जा सकता है और कभी भी जागा जा सकता है।

पहले एक यात्रा कार्यक्रम बना। उसमें ट्रेन के अन्दर तो कम समय लग रहा था पर ट्रेनों की प्रतीक्षा और सड़क यात्रा मिला कर कहीं अधिक समय लग रहा था। समय निचोड़ने की मानसिकता ने वैकल्पिक और समयोत्पादक कार्यक्रम बनाने के लिये उकसाया। अन्ततः ११० घंटे का कार्यक्रम बना, उसमें ४० घंटे स्थिर और शेष ७० घंटे ट्रेन में। कार्यक्रम और सिकोड़ा जा सकता था, पर हवाई जहाज़ वाले ही फैल गये, किराया बढ़ाते गये। ट्रेन में जाना अधिक सुविधाजनक लगता है, धरती से जुड़े मानुषों को। पूरे कार्यक्रम के लिये सप्ताहान्त के अतिरिक्त केवल २ दिन का अवकाश लेना पड़ रहा था। कार्यक्रम की लम्बाई चौड़ाई को देखते हुये २ दिन का अवकाश देने में प्रशासन को भी कोई कठिनाई नहीं हुयी।

वर्धा और कानपुर में मिला कर ४० घंटे पास में थे, उसमें तो पूरा समय ब्लॉगरों और मित्रों से मिलने में बीतने वाला था। ट्रेन के ७० घंटों में ४ रातें थी, उसमें ३० घंटे निकलने वाले थे। शेष बचे ४० घंटे विशुद्ध रूप से अपने थे। अब उन ४० घंटों में क्या किया जाये, इस पर पहले से विचार करना आवश्यक था। ट्रेन में संभावनायें तो बहुत होती हैं, इस पर एक पूरा लेख लिख चुका हूँ। सहयात्रियों के साथ परिचर्चायें रोचक हो सकती, पर उसके लिये सहयात्री भी रोचक होना आवश्यक हैं। कई बार भाग्य साथ नहीं देता है अतः समय बिताने के लिये अपनी व्यवस्थायें स्वयं करके चलनी होती हैं। न अब संभावनाओं की उम्र ही रह गयी है और न ही संभावनाओं के सहारे यात्रायें अनियोजित छोड़ी ही जा सकती हैं।

पुस्तकें ही सर्वोत्तम रहती हैं यात्रा में और हर बार पुस्तकों के सहारे ही यात्रायें कटती हैं। इस बार सोचा कि कुछ अलग किया जाये। कुछ फ़िल्में थी देखने के लिये, पर इस बार मैं अपना मैकबुक एयर घर छोड़कर जा रहा था। पहली बार प्रयोगिक तौर पर आईपैड मिनी लेकर जा रहा था। आईपैड मिनी में फ़िल्में तो देखी जा सकती हैं पर फ़िल्मों को आईपैड मिनी में स्थानान्तरित करना अपने आप में कठिन है। १५ जीबी के रिक्त स्थान पर अधिक फ़िल्में आ भी नहीं सकती थीं। फ़िल्में विशुद्ध मनोरंजन होती हैं और कुछ सोचने को प्रेरित नहीं करती हैं। यही कारण रहा कि फ़िल्मों का विचार त्याग दिया गया।

संगीत में बहुत समय बिताया जा सकता था पर परिवार साथ में नहीं होने के कारण मनोरंजन की अधिक इच्छा नहीं थी। इस बार कुछ सृजनात्मक करने की इच्छा थी, कुछ नया जानने की इच्छा थी, कुछ नया लिखने की इच्छा थी। अन्ततः इस पर निर्णय लिया कि टेड की शिक्षा और मन संबंधी वार्ताओं को सुना जाये। अभी तक जितनी भी टेड वार्तायें सुनी थीं, सब इंटरनेट पर थी। तभी टेड का एक एप्प मिला जिसमें आप ऑफ़ लाइन वार्तायें भी सुन सकते थे, उन्हें डाउनलोड करने के पश्चात।

जब निर्णय ले लिया तो एक सप्ताह पहले से ही उन वार्ताओं को चुन कर उन्हें आईपैड मिनी में डाउनलोड करने में लगा दिया। इण्टरनेट की गति अच्छी थी कि दो दिन में ही कुल ८ जीबी की ६० वार्तायें डाउनलोड हो गयीं। हम भी प्रसन्न थे, उन्हें ऑफ़ लाइन चला कर देख भी लिया, वे बिना किसी व्यवधान के सुव्यवस्थित चल रहीं थीं। एक बार निरीक्षण में जाते समय एक दो वार्तायें चलायीं, रोचक थीं। २० घंटे की और वार्तायें भी उसी स्तर की होंगी, यह सोचकर मन आनन्द से भर गया। ४० घंटों की रिक्त ट्रेन अवधि में २० घंटों के ज्ञानप्रवाह की अच्छी व्यवस्था, यात्रा सुखद होने के प्रति मुझे पूरी तरह से आश्वस्त कर गयी।

यात्रा प्रारम्भ करने के एक दिन पहले ही एप्पल ने अपना नया आईओएस ७ निकाल दिया। जिस दिन भी कुछ नया निकलता है, अद्यतन रहने की आतुरता मन में घिर आती है। बिना यह सोचे कि आईपैड मिनी को अद्यतन करने में किसी प्रोग्राम पर क्या प्रभाव पड़ेगा, हमने उसे प्रयोग करने हेतु डाउनलोड कर लिया। हर बार यही होता है कि ऐसा करने के पश्चात पुराने प्रोग्रामों को चलाने में कोई समस्या नहीं आती है। हम भी आश्वस्त रहे कि सब कुछ पहले जैसा ही रहेगा।

यात्रा प्रारम्भ हुयी। यात्रा से पूर्व व्यस्तता अधिक रहने के कारण थकान बहुत अधिक थी, ट्रेन में बैठते ही जाते निद्रा ने आ घेरा। दो तीन घंटे सोने के बाद जब शेष समय का सदुपयोग करने की याद आयी तो आईपैड मिनी खोलकर बैठ गये और टेड वार्ता का बटन दबा दिया। जैसे ही उसमें न चलने का संदेश आया, मन बैठ गया। दूसरी वार्ता चलायी, उसकी भी वही स्थिति। अब समझ में आ चुका था कि आईपैड मिनी को अद्यतन करने के क्रम में समन्वय का हृास हो चुका था, अब कोई भी वार्ता उसमें चलने से रही।

न केवल डाउनलोड में लगे प्रयास मिट्टी में मिल चुके थे, वरन इन वार्ताओं के लुप्त होने के साथ ही यात्रा को सार्थक और उपयोगी बनाने के स्वप्न भी धूल फाँक रहे थे। अब सामने पूरी यात्रा थी और पढ़ने के लिये अन्तिम समय में रख ली आधी पढ़ी एक छोटी पुस्तक और लिखने के लिये ढेरों पड़े आधे अधूरे अनुभव।

दुखी होकर खिड़की से बाहर देखने लगा। अपनी तकनीकी समझ पर झल्लाहट हो रही थी और लग रहा था कि इतनी छोटी सी बात पर ध्यान क्यों नहीं गया? संयोगवश खिड़की के बाहर वर्षा हो रही थी, पूरे परिवेश में हरीतिमा फैली थी और वातावरण हृदय की तरह रुक्ष नहीं था। खिड़की के बाहर का दृश्य तब तक देखता रहा, जब तक मन हल्का नहीं हो गया।

अब न कोई बाहरी ज्ञान आना है, अब न कोई नये विषयों के बारे में कुछ जानने को मिलेगा। यदि साथ रहेगा तो यात्रा का अपना अनुभव और उसे लिखने के लिये आईपैड मिनी। हो न हो यही ईश्वर की चाह थी कि इस यात्रा में कुछ मौलिक ही किया जाये।

28.9.13

अभिव्यक्ति का आकार - ब्लॉग, फेसबुक व ट्विटर

सूत्र - व्यसन या विवशता
अष्टाध्यायी के पृष्ठ पलट रहा था, आश्चर्य कर रहा था कि कैसे इतने छोटे छोटे सूत्रों में पाणिनी ने सारा व्याकरण संकलित कर दिया है। प्रत्येक सूत्र अपने आप में पूर्ण और पूर्णतया अपने स्थान पर। व्याकरण ही नहीं, ज्ञान के लगभग सभी अंग, उपांग सूत्रबद्ध हैं, योगसूत्र, ब्रह्मसूत्र, भक्तिसूत्र, कामसूत्र। श्लोक ले लें, सुभाषित ले लें, दोहे आदि, सब के सब अपने में सिद्ध और सक्षम, व्यक्त करने में समर्थ।

यद्यपि मैं ट्विटर में नहीं हूँ, पर यदि हमारे आदि सृजनकर्ता अपने समय में ट्विटर का उपयोग करते तो उनका प्रत्येक ट्वीट महत्वपूर्ण होता, किसी एक सिद्धान्त के सारे पक्ष व्यक्त करने में।

ज्ञान को संक्षिप्त में कह देना ज्ञानियों का व्यसन था या विवशता? व्यर्थता की परतें हटाने के बाद जो शेष रहता है, वह ज्ञान का मौलिक स्वरूप होता है। ज्ञान को उसके मौलिक स्वरूप में रखना ज्ञानियों का व्यसन था। उस समय लेखन सीमित था, लेखपत्र संरक्षित नहीं रखे जा सकते थे, सुनकर याद रख लेने की परंपरा थी। ज्ञान को इस परिवेश में संरक्षित रखने के लिये उन्हें संक्षिप्ततम रखना ज्ञानियों की विवशता थी।

आइये, तीनों माध्यमों का इस परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण करते हैं। विमा आकार की है, सृजन की है, अस्तित्व के काल की हैं।

ट्विटर अभिव्यक्ति का लघुत्तम माध्यम है, आकार में और अस्तित्व के काल में। फेसबुक अभिव्यक्ति का मध्यम माध्यम है, आकार में और अस्तित्व के काल में। ब्लॉग अभिव्यक्ति का वृहद पटल है, आकार में और अस्तित्व के काल में। आपने देखा कि मैंने सृजन की विमा के आधार पर वर्गीकरण नहीं किया है, उसका एक कारण है।

अभिव्यक्ति तथ्यात्मक हो सकती है, सृजनात्मक हो सकती है, विश्लेषणात्मक भी हो सकती है। तथ्यों का आकार बड़ा नहीं होता है, यदि उसमें विश्लेषण न जुड़ा हो। समाचारों को देखिये, यदि विश्लेषण या राय हटा दी जाये तो समाचार पत्र अपने से दसवीं आकार में आ जायेंगे। तथ्यों में सृजनात्मकता नहीं होती है, तथ्य सपाट होते हैं। विश्लेषण या सृजन तर्क श्रंखला या विचार तरंगों के संग चलता है और बहुधा आकार में फैलने लगता है। बहुत कुछ वैदिक संदर्भ ग्रन्थों जैसा।

सृजन पर सदा फैलता ही नहीं रहता है, उसके कुछ निष्कर्ष होते हैं, उसके कुछ सूत्र होते हैं। आदि ऋषियों ने जो सूत्र रूप में ज्ञान प्रस्तुत किया, वह सृजन की पराकाष्ठा थी, ज्ञान का पूर्ण संश्लेषण था। आकार ट्वीट का पर अस्तित्व का काल अनन्त। प्रक्रिया वृहद, आकार में भी, आधार में भी।

वर्तमान ट्वीट जगत अभिव्यक्ति का माध्यम तो है, पर उसमें अपनी कहनी अधिक होती है, सुननी कम। राजनेताओं, अभिनेताओं व अन्य प्रसिद्धात्माओं की गतिविधि को जानने का अच्छा माध्यम है ट्वीट। किसी घटना पर अपने त्वरित और क्षणिक विचार व्यक्त कर निकल लेने का माध्यम है ट्वीट। विचार एकत्र हो जाते है, कोई शोध करे तो उसमें तत्व भी निकाला जा सकता है, पर उसके लिये न किसी के अन्दर धैर्य ही होगा और न ही सामर्थ्य। आजकल किसी विषय पर कितने लोग अनुसरण कर रहे हैं, इसकी भी संख्या जानने का माध्यम है ट्विटर।

हम जिस ट्वीट्स को देख रहे हैं और जिसकी बात कर रहे हैं, वह तथ्य का स्वरूप है, प्राथमिक है, सृजन और विश्लेषण में न्यून है। हमारे पूर्वज ट्वीट के स्वरूप में जिस ज्ञान को हमें दे गये हैं, उसमें सृजन और विश्लेषण अधिकतम है।

मैं 'शून्य से शून्य तक' के सिद्धान्त का मानने वाला हूँ और वही सिद्धान्त यहाँ पर भी सटीक बैठता है। जन्म से मृत्यु तक का मार्ग शून्य से शून्य तक रहता है। सारी प्रकृति इस सिद्धान्त पर चलती है, उद्भव होता है, विकास होता है और अन्त हो जाता है। उद्भव से अन्त तक या कहें शून्य से शून्य तक की इस यात्रा में हर वस्तु अपना आकार गढ़ती है, अपना काल निर्धारित करती है। अभिव्यक्ति भी उनमें से एक है। एक विचार जन्म लेता है, आकार पाता है, विस्तार पाता है, संश्लेषित होता है, निष्कर्ष रूप धरता है और सिद्धान्त के रूप में अभिव्यक्ति क्षेत्र से विलीन हो जाता है। यदि इस सिद्धान्त के आधार पर चर्चा करें तो ट्वीट उतनी निष्प्रभ नहीं लगेंगी।

एक सूत्र जो रहा समाहित
समाचारों की मात्र तथ्यात्मक फुटकर निकाल दी जाये और साहित्य की दृष्टि से देखा जाये कि अभिव्यक्ति के माध्यमों का क्या मोल है? अभिव्यक्ति का प्रारम्भ तथ्यात्मक ट्वीट से हो सकता है, कई तथ्य मिलकर विचारों का झुरमुट बनता है जो फेसबुक की पोस्ट का आकार ले सकता है। ऐसे कई फेसबुकीय अभिव्यक्तियाँ विश्लेषणात्मक सृजनात्मकता के माध्यम से एक ब्लॉग के रूप में संघनित की जा सकती हैं, संप्रेषण को सुपाच्य रखने के लिये ब्लॉग के आकार में विस्तारित की जा सकती हैं। कोई संदर्भ ग्रन्थ लिखने की सामर्थ्य हो तो अभिव्यक्ति का आकार और भी बढ़ाया जा सकता है, संबद्ध विषयों को उससे जोड़ा जा सकता है।

अभिव्यक्ति का कार्य पर अपना विस्तार पाकर समाप्त नहीं हो जाता है। ज्ञान के निष्कर्षों को और मथना होता है, शाब्दिक कोलाहल के परे मर्म तक पहुँचना होता है। मर्म जब मथते मथते गाढ़ा हो जाये तो फेसबुकीय आकार में कहा जा सकता है। इस प्रक्रिया में बढ़ते बढ़ते जब मर्म में सत्य या सिद्धान्त दिखने लगे तो वह सूत्र रूप में संघनित हो जाता है। ज्ञान की पराकाष्ठा और आकार ट्वीट का। विचार से प्रारम्भ हुये एक ट्वीट से, सिद्धान्त तक विकसित हुये एक ट्वीट तक।

अभिव्यक्ति के रहस्य को माध्यमों में खोजना और उसे भिन्न कोष्ठकों में बाँट देना, अभिव्यक्ति की सततता और एकलयता के साथ अन्याय है। सृजनात्मकता अपना आकार भी ढूँढ लेती है, अपना आधार भी। तीनों माध्यम न भिन्न हैं, न एक दूसरे के प्रेरक हैं, न एक दूसरे के पूरक हैं। तीनों ही अभिव्यक्ति की तीन शारीरिक अवस्थायें हैं जो शून्य से शून्य तक पहुँच जाती है, जो प्रकृति की गति पर चली जाती है।

(हिन्दी अन्तरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा में 'ब्लॉग, फेसबुक व ट्विटर' के विषय पर व्यक्त मत)

25.9.13

मेरे लिये विद्यालय

मेरा विद्यालय
आज २५ वर्ष बाद उसी विशालकक्ष में खड़ा हूँ, जहाँ पर आचार्यों के उद्बोधनों ने सदा ही आगे बढ़ने को प्रेरित किया था। उसी विशालकक्ष में खड़ा हूँ, जहाँ पर अतुलित बलधामं, हेमशैलाभदेहं अंजनिपुत्र से नित कर्मरत रहने की शक्ति माँगता था। उसी विशालकक्ष में खड़ा हूँ, जहाँ अधंकार से प्रकाश की ओर बढ़ने के मन्त्रों का जाप हमारे गुणसूत्रों में पिरोया गया था। उसी विशालकक्ष में खड़ा हूँ, जिसमें आदरणीया बूजी के त्याग और स्नेह के स्पंद गूँजते थे और जिनकी स्नेहिल दृष्टि आज भी बच्चों को आशीर्वाद से पोषित करती है। उसी विशालकक्ष में खड़ा हूँ, जहाँ हम नित एकत्र होते थे, दिन के आकार को समेटने के लिये, भविष्य के विस्तार को समेटने के लिये, ज्ञान के आगार को समेटने के लिये।

२५ वर्ष बीत गये हैं यहाँ से गये हुये, पर स्मृतियों में आज भी एक एक दृश्य स्पष्ट दिखता है। २५ वर्ष के कालखण्ड में स्मृतियों बिसरा जाती हैं, उनका स्थान न जाने कितने नये घटनाक्रम ले लेते हैं, न जाने कितने नये व्यक्तित्व ले लेते हैं। पता नहीं क्या बात है यहाँ की स्मृतियों में कि वे हृदय से जाने का नाम ही नहीं लेती हैं। मेरे लिये स्मृतियों के रंग औरों की तुलना में कहीं गाढ़े हैं, मैंने सात वर्ष का समय यहाँ के छात्रावास में व्यतीत किया है। मेरी स्मृति में सुबह पाँच बजे उठने से लेकर रात दस बजे सोने तक के हज़ारों अनुभव एक स्थायी स्थान बना चुके हैं।

मेरा बेटा पृथु १३ वर्ष का है और बिटिया देवला १० वर्ष की। उनको सदा ही अपना काम करने के लिये उकसाता रहता हूँ। बहुधा वे कहना नहीं टालते हैं, विशेषकर इस तथ्य को जानने के बाद कि छात्रावास में मैं अपना सारा कार्य स्वयं ही करता था, कपड़े धोने से लेकर, कमरे में झाड़ू लगाने तक। स्वयं को ही नियत करना होता था कि कितना पढ़ना है, कब पढ़ना है और कैसे पढ़ना है? स्वयं को ही यह विचारना होता था कि व्यक्तित्वों से भरी भीड़ के इस विश्व में आपका नियत स्थान क्या है, और उस स्थान तक पहुँचने के लिये आपको क्या साधना आवश्यक है? स्वावलम्बन और अपने निर्णय स्वयं लेने के प्रथम बीज इसी विद्यालय के परिवेश की देन है।

अनुभव बहुत कुछ सिखाता है, कभी वह शिक्षा व्यवस्थित और मध्यम गति में होती है, कभी समय के थपेड़े आपको विचलित कर जाते हैं। हर अनुभव के बाद आप उसका विश्लेषण करते हैं, भले ही पेन पेपर लेकर न करते हों या कम्प्यूटर पर कोई एक्सेल शीट न तैयार करते हों, पर मन में विश्लेषण इस बात का अवश्य होता है कि उस अनुभव में हुयी आपकी क्षति, लाभ, आपकी स्थिरता और सीखने योग्य बातें क्या क्या रहीं? कौन सी वह दृढ़ता थी जिसने आपको सहारा दिया, कौन सी वे बातें थी जिन्होंने आपको निराशा के तम में जाने से बचाया, कौन सी वे बातें थीं जो सदा आपको उछाह देती रहीं? मुझे हर बार इस बात की संतुष्टि रहती है कि उन सभी विश्लेषणों के उजले पक्षों के स्रोत इसी विद्यालय से उद्गमित होते हैं। मेरी कृतज्ञता आनन्दित हो जाती है, मेरा यहाँ बिताया हुआ एक एक वर्ष अपनी सार्थकता के गीत गाने लगता है, मेरा विद्यालय मेरे जीवन का आधार स्तम्भ बन कर खड़ा हो जाता है़, मेरा विद्यालय मेरे जीवन के शेष मार्ग का प्रकाश स्तम्भ बन खड़ा हो जाता है।

आज उसी कृतज्ञता का उत्सव मनाने के लिये हम सभी मित्र एकत्रित हैं। हम सबके बच्चे अभी उसी आयु के होंगे जिस आयु में हम पहली बार इस विद्यालय में आये थे। उनकी गतिविधियों में हमें अपना विद्यालय याद आता है, उनकी गतिविधियों में हमें हमारा वह समय याद आता है जो हमने यहाँ पर आकर साथ साथ बिताया था। सब कहते हैं कि मैं ४१ वर्ष का हो गया हूँ, पर अभी भी १० वर्ष का एक छोटा बच्चा मन में बसा हुआ है। वह बच्चा जो उत्साह से भरा है, वह बच्चा जो स्वप्न देखना जानता है, वह बच्चा जिसे किसी बात का भय नहीं है, वह बच्चा जिसे प्रकृति के साथ रहना अच्छा लगता है, वह बच्चा जिसमें मन में कोई भेद नहीं, वह बच्चा जो निश्छल है, जो निर्मल है, जो प्रवाहयुक्त है, जो चिन्तामुक्त है। हम सभी मित्र अपने अन्दर रह रहे उसी बच्चे को उसके विद्यालय घुमाने लाये हैं, यह हम सबके लिये उसी कृतज्ञता का उत्सव है।

कुछ तो बात रही होगी हम सबके भाग्यों में कि हमें यह परिवेश मिला। हो सकता है कि यहाँ पर उतनी सुविधायें न मिली हों जो आज कल के नगरीय विद्यालयों में हमारे बच्चों को उपलब्ध रहती हैं, हो सकता है कि यहाँ पर अंग्रेजी बोलना और समझना न सीख पाने से विश्वपटल से जुड़ने में प्रारम्भिक कठिनाई आयी हो, हो सकता है कि कुछ विषय अस्पष्ट रह गये हों, हो सकता है कि प्रतियोगी परीक्षाओं का आधार यहाँ निर्मित न हो पाया हो। यह सब होने के बाद भी जो आत्मीयता, जो गुरुत्व, जो विश्वास, जो गाम्भीर्य हमें मिला है वह तब कहीं और संभव भी नहीं था, और न अब वर्तमान में कहीं दिखायी पड़ता है। मेरे लिये वही एक धरोहर है। जो व्यक्तित्व यहाँ से विकसित होकर निकलता है, वह एक ठोस ढाँचा होता है, वह अपने शेष सभी रिक्त भरने में सक्षम होता है।

जीवन विशिष्ट है, जीवन विविधता से भरा है, हम सभी मित्र विविध क्षेत्रों में अपना योगदान दे रहे हैं। प्रकृति ने सबको भिन्न कार्य दिया है, सबको भिन्न स्थान दिया है। वही हमारा मान है, वही हमारा प्राकृतिक साम्य है, वही हमारा वैशिष्टय है। किसी भी प्रकार की तुलना इस वैशिष्टय का अपमान है। हम जब इस शरीर में दो जीवन नहीं जी सकते हैं तो दूसरे से अन्यथा प्रभावित होकर अपने अन्दर रिक्तता का भाव क्यों लायें? अपने व्यक्तित्व, परिवार, परिवेश में जो भी सुन्दर परिवर्तन संभव हैं, उसका सुखद आधार बनें। यह विद्यालय भी विशिष्ट है, जैसा है, वैसा ही प्रिय है, इसके मूलभूत गुण ही इसकी आत्मा है, यदि कुछ बदलाव आवश्यक लगें तो वे केवल वाह्य ही होगें। वैशिष्टय बचा रहेगा, प्रकृति प्रसन्न बनी रहेगी।

जन्म के समय हम शून्य होते है, मृत्यु के समय हम पुनः शून्य हो जाते हैं। बीच का कालखण्ड जिसे हम जीवन कहते हैं, एक आरोह और अवरोह का संमिश्रण है। आरोह मर्यादापूर्ण और अवरोह गरिमा युक्त। एक पीढ़ी दूसरे का स्थान लेती है और उसे आने वाली पीढ़ियों को सौंप देती है। अग्रजों का स्थान लेने में मर्यादा बनी रहे और अनुजों को स्थान देने में गरिमा। अग्रजों के अनुभवों से हम सीखते हैं, अनुजों को स्वयं से सीखने देते हैं। यही क्रम चलता रहता है, प्रकृति बढ़ती रहती है। आज जो बच्चे इस विद्यालय मे पढ़ रहे हैं, वे भी २५ वर्ष बाद आयेंगे और इसी विशालकक्ष में अपने विद्यालय को और उससे ग्रहण किये गये तत्वों को याद करेंगे।

शून्य से शून्य की इस यात्रा में जुटाया हुआ हर तत्व किसी न किसी के उपयोग का होता है। यदि हम उसे सीने से चिपकाये बैठे रहे तो सब व्यर्थ हो जायेगा। हम सब संभवतः उस आयुक्षेत्र में प्रवेश कर चुके हैं कि हमें अपनी उपयोगितानुसार अपने परिवेश को अपने संग्रहणीय तत्व वापस करने हैं। वही हमारा योगदान है। जीवन को उसके निष्कर्ष में पहुँचाने के क्रम में जीवन भारहीन हो जाना चाहता है। अर्जित ज्ञान, अनुभव, विवेक, सामाजिकता, धन, श्रम, सब का सब समाज के ही कार्य आना होता है। यह वह समय है जब हमें विवेकशीलता से यह विचार करना प्रारम्भ कर देना चाहिये कि हमारे योगदान का स्वरूप क्या रहेगा। कोई अपने शब्दों से परिवेश में प्राण भरेगा, कोई अपने शौर्य से उसका नेतृत्व करेगा, कोई आधारभूत संरचनायें तैयार करने में अपना योगदान देगा, कोई अपने समाज में व्याप्त समस्याओं से दो दो हाथ करेगा। करना सभी को है। शून्य से शून्य तक की यात्रा आरोह के शिखर छुयेगी, आने वाली पीढ़ी को अपने कर्मों से अनुप्राणित करेगी और अन्ततः उन्हें अपना स्थान सौंप कर गरिमा के साथ अवरोह पर निकल पड़ेगी।

आचार्यों का आशीर्वाद रहा है हम पर, जो भी हम बन सके। आशीर्वाद की वह तेजस्वी ऊर्जा ही हमारा विश्वास है, हमारा अभिमान है। हमारे कर्म उन्हें भी ऐसे अभिमान से भर सकें, वही हमारी गुरुदक्षिणा है। ईश्वर हम सबको इतनी शक्ति दे और हमारी उपलब्धियाँ को उत्कृष्टता दे, जिससे हम अपने गुरुजनों का मस्तक ऊँचा और सीना चौड़ा रख सकें।

(पं. दीनदयाल विद्यालय में, २५ वर्षों बाद पुनर्मिलन समारोह में व्यक्त मन के उद्गार)

21.9.13

साइकिल, टेण्ट और सूखे मेवे

नीरज की वर्तमान में की गयी साइकिल यात्रा के दो अन्य साथी भी थे, उनका अपना टेण्ट और बैग में पड़े सूखे मेवे। इन दोनों के सहारे उन्होने तो बहुत साहसी यात्रा सम्पादित कर ली, पर कम जीवट लोगों में इनका क्या प्रभाव पड़ता है, यह एक मननीय प्रश्न है।

जब यातायात के साधन अधिक नहीं थे, यात्रायें पैदल होती थीं। यात्रायें सीमित थी, व्यापार आधारित थीं, धर्म आधारित थीं, ज्ञान आधारित थीं। लोग पढ़ने जाते थे, बनारस, तक्षशिला, नालन्दा। चार धाम की तीर्थ यात्रा पर जाते थे। यही नहीं, जितने भी इतिहास पुरुष हुये हैं, सबने ही यात्रायें की, बड़ी बड़ी। राम की पैदल यात्रा ४००० किमी से कम नहीं थी, कृष्ण भी १५०० किमी चले, शंकराचार्य तो ७००० किमी के ऊपर चले। मार्ग, साधन और भोजन आदि की व्यापक व्यवस्था थी, हर समय उपलब्धता थी। जब कभी भी नियत मार्ग से भिन्न गाँवों तक की यात्रा होती थी, अतिथि देवो भव का भाव प्रधान रहता होगा। लोग थोड़ा बहुत भोजन लेकर चलना अवश्य चलते थे पर शेष की अनिश्चितता तो फिर भी नहीं रहती थी।

कितना अच्छा वातावरण था तब पर्यटन या देश भ्रमण के लिये। लोग घूमते भी थे, कहीं भी पहुँचे तो रहने के लिये आश्रय और खाने के लिये भोजन। अतिथि को कभी ऐसा लगता ही नहीं था कि वह कहीं और आ गया है। तब घुमक्कड़ी का महत्व था, लोग मिलते रहते थे, ज्ञान फैलता रहता था। तीर्थ स्थान आधारित पर्यटन था, धर्मशाला, छायादार वृक्ष और आतिथ्य।

अब हमें न वैसा समय मिलेगा और न ही वैसा विश्वास। अब तो साथ में टेण्ट लेकर चलना पड़ेगा, यदि कहीं सोने की व्यवस्था न मिले। अब साथ में साइकिल भी रखनी पड़ेगी, यदि नगर के बाहर कहीं सुरक्षित स्थान पर रहना पड़े। अब साथ में थोड़ा बहुत खाना, सूखे मेवे, बिस्कुट आदि भी लेकर चलना होगा, यदि कहीं कोई आतिथ्य भी न मिले।

रेलवे के माध्यम से मुख्य दूरी तय करने के बाद स्थानीय दूरियाँ साइकिल से निपटायी जा सकती हैं। यदि पर्यटन स्थल के में ही साइकिल किराये पर मिल जाये तो १०० किमी की परिधि में सारे क्षेत्र घूमे जा सकते हैं, ५० किमी प्रतिदिन के औसत से। रेलवे के मानचित्र में रेलवे लाइन के दोनों ओर १०० किमी पट्टी में पर्यटन योग्य अधिकतम भूभाग मिल जायेगा, जो एक रात टेण्ट में और शेष ट्रेन में बिता कर पूरा घूमा जा सकता है।

कहीं भी मंगल हो जायेगा
अपने एक रेलवे के मित्र से बात कर रहा था, विषय था रेलवे की पटरियों के किनारों के क्षेत्रों में बिखरा प्राकृतिक सौन्दर्य। हम दोनों साथ में किसी कार्यवश बंगलोर से ७० किमी उत्तर में गये थे। एक ओर पहाड़ी, दूसरी ओर मैदान, मैदान में झील। अपना कार्य समाप्त करने के बाद हम दोनों अपनी शारीरिक क्षमता परखने के लिये पहाड़ी पर बहुत ऊपर चढ़ते चले गये। ऊपर से जो दृश्य दिखा, जो शीतल हवा का आनन्द मिला, वह अतुलनीय था। बहुत देर तक बस ऐसे ही बैठे रहे और प्रकृति के सौन्दर्य को आँकते और फाँकते रहे। बात चली कि हम कितने दूर तक घूमने जाते हैं, पैसा व्यय करते हैं, अच्छा लगता है, संतुष्टि भी मिलती है, पर रेलवे के पटरियों के किनारे सौन्दर्य के सागर बिखरे पड़े हैं, उन्हें कैसे उलीचा जाये। जिस खंड में भी आप निकल जायें, नगर की सीमायें समाप्त होते ही आनन्द की सीमायें प्रारम्भ हो जाती हैं।

तब क्यों न पटरियों के किनारे किनारे चल कर ही सारे देश को देखा जाये? हमारे मित्र उत्साह में बोल उठे। विचार अभिभूत कर देने वाला था, कोई कठिनता नहीं थी, दिन भर २५-३० किमी की पैदल यात्रा, सुन्दर और मनोहारी स्थानों का दर्शन, स्टेशन पहुँच कर भोजन आदि, पैसेन्जर ट्रेन द्वारा सुविधाजनक स्टेशन पर पहुँच कर रात्रि का विश्राम, अगले दिन पुनः वही क्रम। यदि टेण्ट और साइकिल आदि ले लिया तो और भी सुविधा। रेलवे स्टेशन के मार्ग में सहजता इसलिये भी लगी कि यह एक परिचित तन्त्र है और किसी भी पटरी से ७-८ किमी की परिधि में कोई पहचान का है।

क्या इस तरह ही पर्यटन गाँवों का पूरा संजाल हम नहीं बना सकते हैं, जिनका आधार बना कर सारे देश को इस तरह के पैदल और साइकिल के माध्यमों से जोड़ा जा सकता है। यदि बड़े नगर और उनके साधन हमारी आर्थिक पहुँच के बाहर हों तो उसकी परिधि में बसे गाँवों में पर्यटन गाँवों की संभावनायें खोजी जा सकती हैं। यदि स्थानीय यातायात के साधन मँहगे हों तो साइकिल जैसे सुलभ और स्वास्थ्यवर्धक साधनों से पर्यटन किया जा सकता है। तनिक कल्पना कीजिये कि कितना आनन्द आयेगा, जब पटरियों के किनारे, जंगलों के बीच, झरनों के नीचे, पहाड़ियों के बीच से, सागर के सामने होते हुये सारे देश का अनुभव करेंगे हमारे युवा। पर्यटन तब न केवल मनोरंजन के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य प्रदान करेगा वरन हमारे बौद्धिक और सांस्कृतिक एकता के आधार भी निर्माण करेगा।

पर्यटन के ऊपर मेरी सोच भले ही अभी व्यावहारिक न लगे पर इस प्रकार ही इसे विकसित करने से पर्यटन न केवल सर्वसुलभ हो जायेगा वरन अपने परिवेश में सारे देश को जोड़ लेगा। अभी पर्यटन में लगे व्यय को देखता हूँ तो लगता है कि पर्यटन भी सबकी पहुँच के बाहर होता जा रहा है, एक सुविधा होता जा रहा है। जिनके पास धन है, वे पर्यटन का आनन्द उठा पाते हैं, वे ही प्रारम्भ से अन्त तक सारे साधन व्यवस्थित रूप से साध पाते हैं। आज भले ही सुझाव व्यावहारिक न लगें, पर यदि पर्यटन को जनमानस के व्यवहार में उतारना है तो उसे सबकी पहुँच में लाना होगा।

ट्रेन की यात्रा, एक फोल्डेबल साइकिल, एक टेण्ट और सूखे मेवे। साथ में कुछ मित्र, थोड़ी जीवटता, माटी से जुड़ी मानसिकता, गले तक भरा उत्साह और पूरा देश नाप लेने का समय। बस इतना कुछ तो ही चाहिये हमें। यदि फिर भी स्वयं पर विश्वास न आये तो बार बार नीरज का ब्लॉग पढ़ते रहिये।

चित्र साभार - thereandbackagain-hendrikcyclessouth.blogspot.com

18.9.13

एप्पल - एक और दिशा निर्धारण

नया स्वरूप
जैसा कि पुरानी पोस्ट में संभावना व्यक्त की थी, एप्पल ने आईफ़ोन के दो मॉडल उतारे, पॉलीकार्बोनेट काया का आईफ़ोन 5सी व धातुकाया का आईफ़ोन 5एस। बहुत अच्छा किया कि इन दोनों में ही उसने अपने मुख्य मानक नहीं बदले, चार इंच की स्क्रीन रखी, ११२ ग्राम का भार और ३२६ पीपीआई की स्क्रीन स्पष्टता भी। बड़ी स्क्रीन व बढ़ी स्पष्टता के लिये बड़ा कोलाहल था, पर ये दोनों बैटरी निचोड़ने में अधिक और उपयोगिता में कम सिद्ध होने वाले थे, अतः इन्हें न बदल कर एप्पल ने अपना सशक्त पक्ष बनाये रखा है। जैसा सोचा था, बैटरी की क्षमता बिना भार बढ़ाये लगभग १० प्रतिशत बढ़ी है, पर उसकी तुलना में उससे बैटरी का समय नहीं बढ़ा है। यह अतिरिक्त बैटरी क्षमता, मोबाइल का समय न बढ़ा कर कहीं और सार्थक उपयोग में लायी गयी है, आइये उसके महत्व को समझते हैं।

एप्पल ने मुख्यतः तीन क्षेत्रों में बदलाव किये हैं। प्रोसेसर, कैमरा और सुरक्षा। अपनी छवि और नेतृत्व के अनुसार ये तीनों तकनीकी बदलाव मोबाइल क्षेत्र में सर्वप्रथम हैं, शेष अन्य मोबाइल बनाने वालों के लिये अनुकरणीय। अभी केवल आईफ़ोन से संबद्ध घोषणायें हुयी हैं पर इसके तन्तु आने वाले अन्य उत्पादों में भी झंकृत होते रहेंगे।

जो प्रोसेसर नये आईफोनों में आयेगा, वह ए७(A7) होगा। एक बात बताते चलें कि प्रोसेसर मोबाइल या कम्प्यूटर की आत्मा होता है और जो भी गणनायें या कार्य होते हैं, वह प्रोसेसर के माध्यम से ही होते हैं। यह जानना भी रोचक है कि जो भी प्रोसेसर होते हैं उन्हें एप्पल स्वयं ही डिजायन करता है और इस तरह से करता है कि हार्डवेयर और सॉफ़्टवेयर में समन्वय सम्पूर्ण रहे। इसकी विशेषता यह है कि यह ६४ बिट है। ६४ बिट तनिक तकनीकी शब्द है और जब मैंने अपना लैपटॉप को पुनः प्रतिष्ठित किया था, इस शब्द को समझाया था। आपको असुविधा न हो अतः पुनः इसे समझा देता हूँ।

हर प्रोसेसर में एक मेमोरी होती है जो सामान्य मेमोरी से भिन्न होती है। इस मेमोरी को रैम(RAM) कहते हैं। इसका प्रयोग भिन्न प्रोग्रामों को चलाने के लिये एक अस्थायी क्षेत्र की तरह से किया जाता है। जब कोई प्रोग्राम चलता है तो अपने को सुचारु रूप से चलाने के लिये वह रैम से ही मेमोरी छेंक लेता है। जब एक साथ कई प्रोग्राम चलते हैं तो सबके हिस्से की सम्मिलित मेमोरी कुल रैम से अधिक नहीं होनी चाहिये। यदि ऐसा होता है तो प्रोग्रामों के बीच होड़ मचेगी। तब या तो कुछ प्रोग्राम नहीं चलेगें, या चलेंगे तो धीरे चलेंगे। सरल प्रोग्राम कम रैम लेते हैं, वीडियो गेम जैसे प्रोग्राम या गणना प्रधान प्रोग्राम कहीं अधिक मेमोरी लेते हैं।

कितना कुछ है मुझमें
३२ बिट के प्रोसेसरों की रैम २ की ३२ घातों तक होती है और ४जीबी के पार नहीं जा पाती है। ६४ बिट के प्रोसेसरों में रैम १६ ईबी तक बढ़ाई जा सकती है। कहने का आशय यह कि प्रोग्रामों के लिये कई गुना अधिक मेमोरी उपस्थित रहेगी। इस बढ़ी हुयी मेमोरी का लाभ और अधिक उन्नत प्रोग्राम बनाने के लिये किया जा सकता है और वही एप्पल का उद्देश्य भी है। ६४ बिट के प्रोसेसर मुख्यतः लैपटॉप में लगाये जाते हैं, मोबाइलों में इसका प्रयोग प्रारम्भ कर एप्पल मोबाइल, टैबलेट और लैपटॉप के बीच के अन्तर की मिटाने पर उद्धत है। अपनी स्क्रीन के आकार के कारण मोबाइल भले ही लैपटॉप का स्थान न ले पाये, पर टैबलेट निश्चय ही लैपटॉप की समाप्ति के अन्तिम गीत गाने लगेंगे।

मोबाइल और टैबलेट में ६४ बिट का प्रोसेसर लाकर एप्पल ने पहल कर अपना आशय स्पष्ट कर दिया है, प्रतियोगियों के पास अब और कोई विकल्प नहीं है, सिवाय इसके कि वे भी अनुसरण करें। चित्रों और ग्रॉफिक्स के लिये भी एप्पल उच्चतम वर्तमान मानक लेकर आया है। यही नहीं ए७ के साथ में एक और उपप्रोसेसर एम७ भी होगा, जो मोबाइल से मापी जा सकने वाली शरीर की गतियों की गणना करेगा और वह भी मुख्य प्रोसेसर की ऊर्जा व्यर्थ किये बिना। यह उपप्रोसेसर स्वास्थ्य, चिकित्सा मनोरंजन आदि के क्षेत्रों में बनाये जाने वाले प्रोग्रामों के लिये आधारभूत संरचना तैयार करेगा। निश्चय ही यह मानवता के लिये अत्यन्त लाभदायक रहेग और इस क्षेत्र में सृजनात्मकता के वृहद विस्तार खोलेगा।

६४ बिट ए७ प्रोसेसर का एक व्यवसायिक कारण भी है। अभी तक एप्पल अपने मैक कम्प्यूटरों पर इन्टेल प्रोसेसर उपयोग में ला रहा है। इस विकास के बाद आने वाले मैकबुक एयर में यदि ए७ प्रोसेसर आ जाये तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। जहाँ एक ओर इन्टेल प्रोसेसर अधिक बैटरी खाता है, वरन आकार में बड़ा भी है। साथ ही साथ बाह्य निर्भरता के कारण मैकबुक के हार्डवेयर और सॉफ़्टवेयर पक्ष में अधिक समन्वय की संभावना नहीं मिल पायी है। भविष्य के संकेत माने तो आने वाले समय में मैकबुक का आकार घटेगा, मूल्य कम होगा, भार कम होगा, सॉफ़्टवेयर अधिक उत्पादक होंगे और सबसे महत्वपूर्ण यह होगा कि बैटरी का समय २४ घंटे तक हो सकता है। इसे लेकर न केवल एप्पल उत्साहित है वरन तकनीकविदों में भी सुखद भविष्य की आशा का संचार है।

एप्पल ने आईओएस६ (iOS6) से ही लैपटॉप व मोबाइल के ओएस की दूरियाँ कम करना प्रारम्भ कर दिया था। आईओएस७ से यह कार्य और आगे बढ़ने वाला है जिससे लैपटॉप व मोबाइल में किये गये कार्य में कोई भिन्नता न हो और उपयोगकर्ता का अनुभव एक सा ही रहे।

यद्यपि कैमरे का मेगापिक्सल ८ ही रखा गया गया है, पर चित्रों की गुणवत्ता के क्षेत्र में तीन प्रमुख उन्नत विकास किये गये हैं। पहला लेन्स का आकार बढ़ाया गया है जिससे दृश्यों से सेन्सरों पर अधिक प्रकाश पहुँचे और चित्रों की गुणवत्ता बढ़े। दूसरा सेन्सरों का आकार लगभग २० प्रतिशत बढ़ा दिया है जिससे वे अधिक फोटॉन्स ग्रहण कर सके और स्पष्ट चित्र बन सकें। तीसरा फ़्लैश के प्रकाश का रंग वातावरण के रंग जैसा हो जाये जिससे दृश्यों की यथार्थता चित्रों में आये, न कि कोई तीसरा और भिन्न रंग। इसके अतिरिक्त सामर्थ्यशाली प्रोसेसर का लाभ उठाते हुये, एक साथ कई चित्र, उनका त्वरित संपादन और उन्नत निष्कर्ष, जिससे आप एक सिद्धहस्त फ़ोटोग्राफ़र की तरह चित्र खींच सकें।

सुरक्षा के क्षेत्र में फ़िंगरप्रिंट को मोबाइल खोलने व धनविनिमय का माध्यम बना देने से मोबाइल पहले से कहीं सुरक्षित हो चले हैं। अब कोई आपका मोबाइल नहीं चुरा पायेगा क्योंकि किसी चोर के लिये वह मोबाइल कभी खुलेगा ही नहीं। फ़िंगरप्रिंट से संबंधित तथ्य कहीं और न संरक्षित रह कर प्रोसेसर के अन्दर संरक्षित रहेंगे। इससे मोबाइल सुरक्षा की दीवार और भी ऊँची हो जायेगी और मोबाइल चोरी होना एक पुरानी कहानी सा हो जायेगा।

अपनी छवि के अनुसार एप्पल ने तकनीक के तीन अध्याय खोल दिये हैं। इस बार भी उपयोगकर्ताओं के सतही माँगों के बाजार को नकारते हुये, तकनीक पर स्वयं को केन्द्रित रखा है। १० सितम्बर को हुयी घोषणायें आने वाले कई वर्षों की दिशा निर्धारण की क्षमता रखती हैं, पूरे मोबाइल, टैबलेट और लैपटॉप के क्षेत्र के लिये।

14.9.13

पर्यटन - स्थानीय पक्ष

एक बार आपकी यात्रा पूरी होती है तो अगली चिन्ता होती है, रुकने की। किसी स्थान में ठहरने का उद्देश्य तीन बातों के लिये होता है, पहला स्नानादि के लिये, दूसरा विश्रामादि के लिये और तीसरा अपना सामान रखने के लिये। नीरज बहुधा अपनी यात्राओं में ये पहले दो कार्य टाल जाते हैं और यदि सामान अधिक हो तो तीसरे के लिये क्लॉक रूम का सहारा लेते हैं। सही भी है, जब दिन भर पर्यटन में ही व्यतीत करना हो तो होटल आदि में व्यय क्यों? जब दो घंटे से अधिक भी उस स्थान पर नहीं बिताना है, तो दिन भर के लिये उसे क्यों आरक्षित करना और दिन भर का किराया क्यों देना? एक दिन में घूमे जा सकने वाले स्थानों में सुबह की ट्रेन से आकर सायं की ट्रेन से जाया जा सकता है। अब प्रश्न दो हैं, कहाँ तैयार हों और थोड़ा थक जाने की स्थिति में कहाँ िवश्राम करें?

अपने १७ वर्षों के रेलवे कार्यकाल में मैंने कई जीवटों को देखा है। सुबह नित्यक्रिया ट्रेन में ही, गंतव्य में उतर कर ट्रेन में पानी भरने वाले पाइपों में स्नान, रेलवे प्लेटफार्मों में विश्राम, क्लॉक रूम में सामान, लीजिये बच गया होटल का अपव्यय। तनिक और सकुचाये लोग प्रतीक्षालयों में स्नानादि करते हैं और वहीं पर विश्राम भी। झाँसी या राउरकेला के स्टेशनों पर सुबह के तीन बजे आप चले जाइये, आपको स्टेशनों में पाँव धरने का स्थान नहीं मिलेगा, सुबह की ट्रेनों से कहीं जाने वाला सारा जनमानस रेलवे के प्लेटफ़ार्मों पर ही रात से आकर सो जाता है। इसमें बहुधा लोग अपनी जीविका के लिये जाने वाले निर्धनजन होते हैं, पर बहुत से घुमक्कड़ों के लिये इस प्रकार की घुमक्कड़ी कोई आश्चर्य की बात नहीं है?

आप में बहुतों को ज्ञात होगा कि रेलवे में वातानुकूलित प्रथम श्रेणी के कोच के चार बॉथरूमों में एक में स्नान की व्यवस्था भी रहती है। मैंने कई बार उसका उपयोग किया भी है, अत्यधिक सुविधाजनक है वह। हाँ, उतने आनन्द से तो नहीं नहा सकते हैं जितने घर में या नदी में नहाते हैं पर शुचिता की दृष्टि से बहुत उपयोगी सुविधा है। यदि पूरी तरह से तैयार होकर ही निकला जाये तो गंतव्य में न जाने कितना समय बचाया जा सकता है। कई बार ऐसे ही समय बचाया है। अभी कुछ दिन पहले एक सलाह मिली थी कि यदि रेलवे अन्य कोचों में इसी तरह स्नान की व्यवस्था कर दे तो न जाने कितना समय बचाया जा सकता है, चाहे तो इसके लिये पैसा भी लिया जा सकता है। यदि यह व्यवस्था की जा सके तो प्रातः शीघ्र ट्रेन पहुँचाने की आवश्यकता कम हो जायेगी, किसी स्थान पर पहुँचने वाली ट्रेनों के लिये सुबह ५ बजे से ११ बजे तक का सुविधाजनक कालखण्ड मिल जायेगा। यदि यह भी संभव न हो सके तो स्टेशन में ही बस तैयार होने के लिये सुविधा की व्यवस्था कर दी जाये, बस १ घंटे के लिये, शुल्क सहित। वह एक होटल के व्यय से बहुत कम पड़ेगा। घुमक्कड़ों और घुमक्कड़ी के लिये इससे अधिक बचत का कोई साधन तब हो ही नहीं सकता।

इस तरह का मितव्ययी साधन होने के बाद भी बहुतों को भागादौड़ी में आनन्द नहीं आता है। किसी स्थान पर पहुँचने के बाद थोड़ा सुस्ताना अनिवार्य हो जाता है। उन पर्यटकों के लिये भी रेलवे स्टेशन से कहीं दूर पर होटल में जाकर ठहरना तनिक कष्टकर हो जाता है। कई लोगों को यदि रेलवे स्टेशनों के रिटायरिंग रूम में रहने को मिल जाये, तो वे दूर जाकर रहना नहीं चाहते। स्टेशन पर स्थानीय यातायात के सारे साधन रहते हैं, भोजन की व्यवस्था रहती है, इस दृष्टि से देखा जाये तो किसी भी होटल की तुलना में रेलवे के रिटायरिंग रूम अधिक सुविधाजनक हैं। लोगों ने दो और सुविधायें मुझे बतायीं, जिन पर सामान्यतः रेलवे में कार्य करने वालों का ध्यान नहीं जाता है। पहली यह कि रात में कभी भी ट्रेन पहुँच जाये, उतर कर सीधे विश्राम किया जा सकता है, रात में नींद में अधिक व्यवधान नहीं पड़ता है। दूसरा यह कि किसी ट्रेन को पकड़ने के लिये प्लेटफार्म पर बहुत पहले से नहीं आना पड़ता है, समय की बचत होती है और किसी भी समय ट्रेन हो, पर्यटन की सततता बनी रहती है।

होटल में जाने से यात्रा के स्तरों की संख्या बढ़ जाती है। किन्हीं भी दो स्तरों के बीच में समय व्यर्थ होता है, धन व्यय होता है और अनिश्चितता भी बनी रहती है। बैंगलोर का ही उदाहरण लें। रात्रि में ८ बजे के बाद ऑटो का किराया दुगना हो जाता है, इस कारण से रात्रि में जाने वाली ट्रेनों के यात्री सायं से ही स्टेशन पर आकर जम जाते हैं, इसमें बहुत समय व्यर्थ हो जाता है। वैसे मैनें कई युवाओं को अपना लैपटॉप खोल कर कार्य करते हुये देखा है, पर जिस निश्चिन्तता से वह रिटायरिंग रूम में कार्य कर सकते हैं, भरी भीड़ में कर पाना संभव नहीं है। यद्यपि रेलवे में इस प्रकार के यात्रियों के लिये एयरपोर्ट जैसे आधुनिक सुविधाओं से युक्त प्रतीक्षालय बहुत उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं, पर फिर भी रिटायरिंग रूम से अधिक सुविधाजनक कुछ और नहीं पाया है। जहाँ कहीं भी सरकारी विश्रामगृह की सुविधा नहीं रहती है, मैं भी रिटायरिंग रूम में ही रुकता हूँ।

जब भी हम यात्रा की योजना बनाते हैं, सदा ही ऐसी ट्रेनें ढूँढते हैं जो सायं ६ से ९ के बीच चले और सुबह ५ से ८ बजे के बीच पहुँच जाये। उस समय हम उन ट्रेनों को छोड़ देते हैं जो या तो रात में चलती हैं या रात में पहुँचती हैं। कारण बस यही रहता है कि इतनी रात में स्टेशन से उतर कर कहाँ जायेंगे? यदि थोड़ा ध्यान दिया जाये और स्टेशन पर अल्पकालिक या दिन भर रहने की व्यवस्था मिल रही हो तो उन ट्रेनों में भी यात्रा असुविधाजनक नहीं रहेगी। तब सुविधाजनक दिखने वाली ट्रेनों की भीड़ ऐसी ट्रेनों में भी आरक्षण ढूँढने का प्रयास करेगी। स्टेशनों पर गतिविधि का कालखण्ड बढ़ेगा, व्यस्त समय की भीड़ नियन्त्रित होगी, उतने ही रेलवे संसाधनों में अधिक लोग यात्रा कर सकेंगे।

जो यात्रियों की सुविधाजनक मानसिकता होती है, उसी के अनुसार रेलवे अपनी समय सारिणी भी बनाती है। प्रथम दृष्ट्या, उन ट्रेनों के प्रस्ताव पर विचार तक नहीं होता है जो देर रात को चलें या देर रात को पहुँचें। ऐसा होने से सारा का सारा दबाव सुबह और सायं की ट्रेनों में पड़ने लगता है और बहुधा ही संसाधनों के अभाव में नयी ट्रेन का प्रारम्भ हो ही नहीं पाता है। यदि स्टेशन स्थिति रिटायरिंग रूमों को यात्रा का एक अभिन्न अंग मान कर योजना बनायी जायेगी तो रात्रि में न केवल ट्रेनों का संचालन किया जा सकेगा वरन व्यस्त समय के अतिरिक्त और लोगों को ट्रेन सुविधा का लाभ दिया जा सकेगा। ट्रेनें वैसे तो २४ घंटों दौड़ती हैं पर वाह्य परिवेश से असमयीय संपर्क के कारण रात के समय का उपयोग बड़े स्टेशनों पर नहीं कर पाती हैं। रिटायरिंग रूम की व्यवस्थायें व्यर्थ जा रहे समय के संसाधन का सदुपयोग कर सकती है और न केवल पर्यटकों को सुविधा वरन रेलवे की आय में भी वृद्धि कर सकती है।

कुछ छोटी सुविधायें स्टेशनों की व्यस्तता को विस्तारित कर अधिक ट्रेनों और यात्रियों को रेलवे तन्त्र में समाहित करती है और ही साथ यात्रियों और पर्यटकों को कहीं अधिक सुविधाजनक अनुभव भी प्रदान करती हैं। बंगलोर का अनुभव पुनः लेता हूँ, यहाँ पर रात्रि के ५ घंटे पूरा सन्नाटा रहता है,वहीं दूसरी ओर सुबह और सायं के समय ट्रेनों और यात्रियों के लिये प्लेटफार्मों का अभाव हो जाता है। जिस प्रकार से बंगलोर के लिये ट्रेनें चलाने के लिये माँग है, उसकी दृष्टि से देर सबेर रेलवे इन छोटी छोटी सुविधाओं को बड़े स्तर पर जुटाने का प्रयत्न करने वाला है, अधिक को समाहित करने हेतु, अधिक सुविधा हेतु और अधिक आय हेतु। इस प्रक्रिया में पर्यटन भी लाभान्वित पक्षों में उभरेगा।

आइये अब स्थानीय साधनों के बारे में चर्चा करते हैं। एक उदाहरण मैं अपने मित्रों को बहुधा देता हूँ। किसी साधारण श्रेणी से दिल्ली जाने वाले कि लिये, जिसके पास थोड़ा सामान भी है, पूरी यात्रा में उसका धन किस तरह से व्यय होता है? लगभग १० किमी की दूरी से ऑटो से आने में २०० रुपये, क़ुली को २०० रुपये और दिल्ली तक का टिकट भी २०० रुपये। एक आश्चर्य का भाव आता है सुनने वालों में, पर यह शब्दों सत्य है। हमारे पर्यटनीय बजट का बड़ा भाग स्थानीय साधनों पर न्योछावर हो जाता है। नीरज जैसी घुमक्कड़ी के लिये इतना धन स्थानीय साधनों में व्यर्थ कर पाना सबके लिये संभव नहीं। कोई न कोई साधन तो ढूँढना ही पड़ेगा जिससे देश के विस्तार का पूरक भाग मापा जा सके। मेरी दृष्टि में वह साइकिल है।

पिछली पोस्टों में मैंने अपने एक वरिष्ठ अधिकारी के बारे में बताया था जो ट्रेन में भी अपनी मोटरसाइकिल लेकर चलते थे। मैं उन वरिष्ठ अधिकारी की तरह मोटर साइकिल से तो नहीं चल पाऊँगा, किन्तु साइकिल साथ में ले जाने का विचार सदा ही मन में रहा है। साइकिल भी बहुत बड़ी नहीं। यदि साइकिलों के बारे में तनिक शोध करें इण्टरनेट पर तो १२ किलो तक की साइकिलें आती हैं जो अपनी सीट के नीचे मोड़ कर रखी जा सकती है। किसी भी स्थान पर पहुँच कर उसे सरलता से खोला जा सकता है और स्थानीय स्थल ही नहीं वरन ६०-७० किमी के पर्यटन बिन्दु नापे जा सकते हैं।

मुझे यूरोप के वे नगर बहुत अच्छे लगते हैं, जहाँ पर साइकिल का उपयोग प्रमुखता से किया जाता है और उसे समुचित प्रोत्साहन भी मिलता है। गूगल बाबा आपको ऐसे नगरों की सूची पकड़ा देंगे। जिस प्रकार से प्रदूषण और यातायात से कण्ठ और पंथ अवरूद्ध होता है, भविष्य साइकिलों का आने वाला है। जितना संसाधन और प्रदूषण इस क़दम से बढ़ सकता है, उसे देखते हुये वहाँ के प्रशासन ने निशुल्क साइकिलों की व्यवस्था कर रखी है। भारतीय नगरों में तो निशुल्क साइकिलें बहुत दूर की सोच हैं, पर घुमक्कड़ी के लिये हल्की व उन्नत साइकिलें वरदान हैं।

जब हम रेलवे स्टेशनों से निकल कर पर्यटकीय अन्तस्थल में बढ़ चुके हैं, साइकिल, टेण्ट और आतिथ्य की विमायें प्रमुख हो जाती हैं। अगली पोस्ट पर इन तीनों पर चर्चा।

11.9.13

पर्यटन - रेल अपेक्षायें

रेलवे और पर्यटन पर कहीं भी विचार विमर्श होता है तो कई बाते हैं जो सदा ही सुनने को मिलती हैं। बहुधा बहुत अधिक सुनना पड़ता है, कभी सुझाव के रूप में, कभी उलाहना के रूप में, कभी शिकायत के रूप में, कभी उग्र तर्क के रूप में। सुनना कभी भी हानि नहीं करता है, यदि आप उसे हृदय तक न ले जायें। सुनना आपको भले ही व्यक्तिगत रूप से कचोटे पर एक संस्था को सुनने से लाभ ही होता है। जब भी मैं सुनता हूँ, एक संस्था के सदस्य के रूप में सुनता हूँ, ग्रहणीय सुझाव मस्तिष्क में वहन करता हूँ, क्रोध मन से सहन करता हूँ।

उन बातों में जो सार निकलता है, वह इस प्रकार का ही रहता है। सबसे पहली समस्या तो आरक्षण की, उसके बाद टिकट मिलने में व्यर्थ हुआ समय, सुविधाओं का अभाव, व्यवस्थाओं की कमी और संवेदनाओं का अभाव। अपेक्षाओं और प्रयासों में दूरी है, किसी तरह आवश्यकताओं तक ही प्रयास पहुँच पा रहे हैं, वह भी न्यूनतम आवश्यकताओं तक। प्रस्तुत पोस्ट में अन्य विषयों पर विस्तृत चर्चा न कर पर्यटन से संबंधित पक्ष ही उठाऊँगा। जितना संभव हो सके, चर्चा को आदर्शवादी स्थितियों से न जोड़कर व्यवहारिक ही रखूँगा।

इस बार की मुक्तकण्ठ से और त्वरित प्रशंसा होती है कि रेलवे में यात्रा करने से कभी भी जेब पर अधिक भार नहीं पड़ता है औऱ कम पैसों में एक जनसुलभ साधन दे पा रही है, भारतीय रेल। पर आरक्षित सीटों की उपलब्धता की कमी ही एकमात्र ऐसा कारक है जो बहुधा कृत्रिम माँग बढ़ाकर दलालों को अधिक धन उगाहने का अवसर दे देता है। बात सच है और अनुभव पक्ष कठिनाइयों से भरा रहता है।

वर्ष में तीन या चार ऐसे अवसर आते हैं, जब यात्रा सर्वाधिक होती है। उस समय सबको अवकाश मिलता है, बच्चों के विद्यालयों में भी तभी छुट्टी मिलती है, उसी समय सबको घर जाने की और घूमने जाने की सूझती है। यद्यपि उस समय रेलवे के सारे कोच सेवा में लगे होते हैं, फिर भी माँग बनी रहती है, बढ़ी रहती है। स्वाभाविक भी है, जब सारा देश घूमने पर उतर आयेगा तो संसाधन भी कम पड़ जायेंगे। किसी भी तन्त्र की योजना उसके अधिकतम भार के लिये नहीं बनाई जा सकती, यदि ऐसा होगा तो शेष समय संसाधन व्यर्थ पड़े रहेंगे।

इन तीन या चार अवसरों को छोड़ दिया जाये तो अधिकांश मार्गों में आरक्षण की उपलब्धता कोई समस्या नहीं है। यदि पर्यटन को वर्ष में अन्य समय के लिये भी किया जाये तो न केवल पर्यटकों को सुविधा रहेगी वरन रेलवे वर्ष में अधिक लोगों को सेवा दे पायेगी, अपनी व्यर्थ जा रही क्षमता का समुचित उपयोग कर पायेगी। जो सिद्धान्त रेलवे के लिये सच है, वही पर्यटन के अन्य अंगो के लिये भी सटीक बैठेगा। होटल हो, स्थानीय साधन हो, मनोरंजन के अंग हों, सबको ही पर्यटन का काल खंड बढ़ने से लाभ होगा।

यद्यपि जब किसी पर्यटन स्थल पर भीड़ होती है तो मन को वहाँ आने की और अपने निर्णय को सही ठहराने की संतुष्टि होती है, पर अधिक भीड़ में पर्यटन स्थल अपना आनन्द छिपा लेता है, पूर्ण प्रकट नहीं कर पाता है। यदि समुद्र तट में अधिक लोग हैं तो जहाँ प्रारम्भ में अच्छा लगेगा, वहीं बाद में एकान्त में समुद्र की लहरों को न देख पाने का दुख भी रह जायेगा। कई व्यवसायी परिवारों को जानता हूँ, जो अपने पर्यटन की योजना ऐसे समय में ही बनाते हैं जब भीड़ न हो। रेलवे में आरक्षण मिलता है, होटल सस्ते में मिल जाते हैं, खेल खिलाने वाले राह तकते रहते हैं और पूरे परिवार को पर्यटन का पूर्ण आनन्द भी आता है। नीरज भी ऐसे ही समय में पर्यटन पर निकलते है, अभी वह अकेले हैं, पर मुझे पूरा विश्वास है कि परिवार के साथ होने पर भी वह इस सिद्धान्त को नहीं छोड़ेंगे।

अधिक नहीं, बस विद्यालय और कार्यालयों की ओर से पर्यटन के महत्व और इस सिद्धान्त को समझा जाये। ५ दिन की छुट्टी और दो सप्ताहान्त मिला कर ९ दिन का पर्यटन अवकाश का अवसर मिलना चाहिये, जिससे लोग सपरिवार पर्यटन पर जा सकें, बिना किसी समस्या के, वर्ष में किसी भी समय। विद्यालयों की ओर से सामूहिक यात्रा भी वर्ष के कम व्यस्त माहों में करनी चाहिये, हो सके तो हर कक्षा के लिये अलग माह में। देश जानने के लिये और ज्ञान बढ़ाने की दृष्टि से हर विद्यालय के लिये ९ दिवसीय पर्यटन अनिवार्य हो, और न केवल अनिवार्य हो, वरन उसका शैक्षणिक विभाग व मन्त्रालय उसमें अपना अनुदान दें, कम से कम ८० प्रतिशत। इससे विद्यार्थियों को एक वर्ष में पर्यटन के दो अवसर मिलेंगे, एक बार मित्रों के साथ, एक बार परिवार के साथ। उस पर्यटनीय अनुभव में उन्हें आनन्द भी आयेगा और साथ ही साथ रेलवे की आय में वृद्धि भी होगी।

तनिक सोचिये, यदि हम व्यस्त समय की विवशताओं को मात देकर किसी अन्य समय में घूमने की योजना बना सकें तो रेलवे के पास एक सीट क्या, पूरे के पूरे कोच की उपलब्धता रहेगी। तनिक सोचिये, तब कितना आनन्द आयेगा, जब सारे मित्र एक पूरे कोच में आनन्द मनाते, गीत गाते, साथ में खेल खेलते पर्यटन का प्रारम्भ और अन्त करेंगे। यह अनुभव पर्यटन को एक अविस्मरणीय स्थिति पर ले जायेगा। व्यस्त समय की समस्यायें, अन्य समय का आनन्द भी बन सकती हैं।

रेलवे यात्रा के समय अच्छा व स्वास्थ्यकारी भोजन एक बड़ा प्रश्न रहता है और बहुधा रुष्ट चर्चाओं का केन्द्र भी। लम्बी यात्राओं में यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि चार या पाँच बार भोजन आदि करना होता है। कुछ के लिये भोजन अधिक चटपटा, कुछ के लिये अधिक फीका, कुछ के लिये स्वाद रहित, कुछ के लिये अपौष्टिक, कुछ के लिये शुचिता और स्वच्छता से न बना। मुझे कम मसाले का सादा भोजन अच्छा लगता है, मिर्च तो जैसे भय उत्पन्न कर देती हो। लगभग हर बार ही भोजन की पूरी थाली में चावल और दही में संतोष करना पड़ जाता है क्योंकि पैन्ट्रीकारों के रसोइयों को बिना चटपटा खाना बनाये अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने का मार्ग नहीं मिलता है। अपने सहयात्रियों को भी देखता हूँ, यद्यपि छुट्टी के भाव में सभी रहते हैं पर उल्टा सीधा खाकर कोई भी अपना स्वास्थ्य बिगाड़ना नहीं चाहता है। यात्रा में एक ही स्थान पर तैयार हुआ खाना सबको अच्छा लगेगा, इस बात की प्रायिकता बहुत ही कम है। स्वाद और स्वास्थ्य के मानक में हर एक की भोजनीय अभिरुचि भिन्न है।

जिस भोजन में आप स्वाद या स्वास्थ्य ढूंढ़ते हैं, उसी भोजन में व्यवसायी अपना आर्थिक लाभ भी ढूँढता है। यद्यपि भोजन की मात्रा आदि सब निर्धारित होता है, पर अधिक आर्थिक लाभ निचोड़ लेने की मानसिकता गुणवत्ता से समझौता करवा देती है। वहाँ भोजन बाँटने का अधिकार एक ठेकेदार के ही पास है, विवशता का यथा संभव आर्थिक लाभ लेने की प्रवृत्ति इतनी सरलता से जाने वाली नहीं। शिकायतों के निस्तारण में भोजन के स्वाद, स्वास्थ्य और गुणवत्ता संबंधी मानक असिद्ध ही रह जाते हैं।

अधिकांश यात्री कम से कम एक समय का भोजन और एक समय का नाश्ता अपने साथ लेकर चलते हैं। घर का खाना ट्रेन यात्रा में अच्छा लगता है। मैँ भी यही करता हूँ। रेलयात्रा में ही क्यों वरन हवाईयात्रा में लोग अपने घर से लाये पराँठे और अचार खाते हैं। देश के हर क्षेत्र में यात्रा करने वालों के पास अपने अपने व्यंजन हैं जो दो तीन दिन से अधिक संरक्षित किये जा सकते हैं। बिहार में लिट्टी चोखा, उत्तर भारत में सत्तू, राजस्थान और गुजरात में तो दसियों ऐसे व्यंजन हैं, जो स्वादिष्ट हैं, पौष्टिक हैं और संरक्षित भी किये जा सकते हैं। उन्हें यात्रा में ले जाने से बाहर के खाने पर निर्भरता बहुत कम रहेगी। इसके अतिरिक्त रेलवे को भी यह चाहिये कि ट्रेनों में प्रस्तावित भोजन की सूची में उन ही व्यंजनों को ही रखा जाये, जो न केवल बनाने में सरल हों वरन स्वाद और स्वास्थ्य की दृष्टि से उत्तम हों। यही नहीं, मोबाइल या इण्टरनेट आधारित साधन भी विकसित किये जा सकते हैं, जिससे बाहर के भी भोजन बनाने वालों को किसी ट्रेन में भोजन आपूर्ति की सुविधा मिल सके। इन उपायों से पर्यटन का अनुभव पक्ष और भी सुखद व रुचिकर होगा।

नीरज अपने साथ कुछ बिस्कुट आदि सदा लेकर चलते हैं, यदि कहीं भोजन न मिले तो उस पर आश्रित रह लिया जाये। व्यवसायियों के लिये भी पर्यटन-व्यंजन एक संभावनाओं का क्षेत्र है। एक पूरी की पूरी फ़ूड चेन बनायी जा सकती है, इसके ऊपर। आप चिन्तन में जुटिये, अगली पोस्ट में स्टेशनों पर उन सुविधाओं की चर्चा जो पर्यटन के स्थानीय पक्षों को सुदृढ़ करने में सक्षम हैं।

7.9.13

अगला एप्पल कैसा हो

जब कभी भी एप्पल का नया उत्पाद आने वाला होता है, अपेक्षाओं की एक लम्बी सूची बन जाती है। हो भी क्यों न, किसी भी क्षेत्र में नायकों से यह आशा अवश्य रहती है कि तकनीक के अग्रतम शोधों के निष्कर्ष हमारे हाथों में होंगे। हर बार बात घूम फिर के तीन चार मानकों पर ठहर जाती है। उन्हीं के आधार पर बहसें होती हैं, बहसें क्या विधिवत युद्ध होते हैं, दो तीन मुख्य पाले रहते हैं। अब १० सितम्बर को निष्कर्ष चाहे जो निकले, पर उत्पाद आने के एक माह पहले से ज्ञानचक्षु इतने खुलने लगते हैं कि मन करता है कि एक शोधपत्र ही लिख डालें। शोधपत्र तो नहीं पर उन मानकों की चर्चा अवश्य होनी चाहिये, जो हम सबको समझ में आते हैं और हमारे उपयोग को प्रभावित भी करते हैं।

डेक्सटॉप, लैपटॉप, टैबलेट और मोबाइल, यही चार प्रमुख श्रेणियाँ हैं। डेक्सटॉप अब बीते समय की चीज़ होने वाली है और उसका उपयोग सीमित और विशिष्ट रह गया है। उसमें तकनीकी विकास तो हो रहा है पर वह चर्चा का विशेष बिन्दु नहीं। लैपटॉप में मैकबुक एयर ने पहले ही हल्केपन और बैटरी समय के सशक्त मानक स्थापित कर दिये है और शेष लैपटॉप निर्माता उसी का अनुसरण कर रहे हैं। दो साल पहले एक किलो का मैकबुक एयर लिया था, अभी तक उस मूल्य में उतना हल्का और उतनी अधिक बैटरी समय का कोई और लैपटॉप नहीं दिखा है।

संघर्ष केवल दो श्रेणियों में रह जाता है, टैबलेट और मोबाइल। अपेक्षाओं के बादल इन्हीं दो के ऊपर सर्वाधिक मँडराते हैं। आईपैड मिनी आने के बाद आईपैड पर उत्सुकता कम हो चली है। बहस आईपैड मिनी और आईफ़ोन के नये मॉडलों पर केन्द्रित हो चुकी है। तकनीक की श्रेष्ठता वैसे भी छोटे आकार में अधिक क्षमता भरने की होती है। इस पोस्ट में उन क्षमताओं और उनके तकनीकी पक्ष पर ही चर्चा सीमित रहेगी।

एप्पल के उत्पाद गुणवत्ता के साथ ही साथ अपने अधिक मूल्य के लिये भी जाने जाते हैं, लोग चाहकर भी उन्हें नहीं ख़रीद पाते हैं, यही उसकी आलोचना और प्रतियोगी उत्पादों की ओर मुड़ जाने का प्राथमिक आधार है। खोजीं पत्रकार बताते हैं कि एप्पल इस बार आईफ़ोन ५सी के नाम से नया मॉडल लाने वाला है जिसकी काया प्लास्टिक की होगी। एप्पल अपनी गुणवत्ता की छवि को कितना खोयेगा, क़ीमत कितनी कम करेगा और किन किन मानकों पर समझौता करेगा, इस बारे में ढेरों संभावनायें व्यक्त की जा रही हैं। आईफ़ोन इस क़दम से कितनी पहुँच बढ़ा पायेगा, यह १० सितम्बर को ही पता चलेगा, पर श्रेष्ठता के अन्य मानकों पर एप्पल अपने आप को कितना सिद्ध करता है यह उसकी विशिष्ट तकनीकी क्षमताओं को प्रदर्शित करेगा। पहले आईफ़ोन और फिर आईपैड मिनी का विश्लेषण करते हैं।

४ इंच की स्क्रीन, ११२ ग्राम भार, ३२६ पीपीआई की स्क्रीन स्पष्टता और लगभग ८ घंटे की बैटरी पर पहुँचने के बाद आईफ़ोन ५ के मॉडल में कुछ अधिक जोड़ पाने की संभावना नहीं दिखती है। प्रतियोगिता में सैमसंग का गैलैक्सी एस४ (५ इंच की स्क्रीन, १३० ग्राम भार, ४४१ पीपीआई और १६ घंटे की बैटरी) है और एचटीसी वन(४.७ इंच की स्क्रीन, १४३ ग्राम भार, ४६९ पीपीआई और १२ घंटे की बैटरी) है। जहाँ दोनो प्रतियोगी स्क्रीन की आकार, स्पष्टता और बैटरी में श्रेष्ठ हैं, वहीं उनका आकार और भार भी बढ़ा हुआ है। प्रश्न यह है कि एप्पल को अपने प्रतियोगियों की नक़ल करनी चाहिये या अपने मानक स्वयं नियत करने चाहिये, विशेषकर उन क्षेत्रों में जिसमें वह सशक्त है।

यदि स्क्रीन का आकार बड़ा होगा तो अधिक बैटरी खायेगी, यदि स्पष्टता अधिक होगी तब भी अधिक बैटरी का उपयोग होगा। अधिक बैटरी के लिये न केवल भार बढ़ेगा वरन आकार भी बढ़ेगा। यदि स्क्रीन का आकार और पीपीआई आवश्यकतानुसार निर्धारित कर दें तो मोबाइल का भार न्यूनतम किया जा सकता है। तीनों फ़ोन उठाकर देखे हैं, उपयोग की सहजता में आईफ़ोन५ का कोई प्रतियोगी नहीं। उसे एक हाथ से न केवल पकड़ सकते हैं वरन अँगूठे से टाइप भी कर सकते हैं। साथ ही वह पतला इतना है कि कहीं पर भी सरलता से समा जाता है।

मुझे नहीं लगता है कि एप्पल अपने प्रतियोगियों की नक़ल करने में अपने इस सशक्त पक्ष को खोना चाहेगी। स्क्रीन के आकार में ४ इंच के ऊपर जाने में कोई विशेष लाभ नहीं दिखता है, बड़े आकार के फ़ोन न केवल भद्दे लगते हैं वरन अनुभव में भी कुछ लाभ नहीं देते हैं। फ़ोन के प्राथमिक कार्यों के अतिरिक्त वेब के पेज बड़े देखने में, गेम खेलने में और वीडियो देखने में ही बड़ी स्क्रीन का उपयोग है। शेष सारे कार्य ४ इंच की स्क्रीन से भलीभाँति सम्पादित होते हैं। २८७ पीपीआई की स्पष्टता जिसे रेटिना डिस्प्ले भी कहते हैं, उसके ऊपर की स्पष्टता को आँख अन्तर नहीं कर पाती है। मुझे नहीं लगता है कि आईफ़ोन को वर्तमान ३२६ पीपीआई से ऊपर ले जाने का कोई भी प्रयास होगा।

अब शेष रहे भार और बैटरी, एप्पल अपनी तकनीकी शोधों और श्रेष्ठता का उपयोग या तो आईफ़ोन का भार कम करने में या बैटरी बढ़ाने में करेगा। वह जो भी करेगा और जितना करेगा, अपने प्रतियोगियों से उतनी बढ़त बना लेगा।

चार क्षेत्र हैं, जिनमें किये गये तकनीकी शोध एप्पल को लाभ पहुँचा सकते हैं। पहला है स्क्रीन की मोटाई और कम करना, दूसरा है नये तरह की बैटरी की तकनीक लेकर आना, तीसरा है प्रोसेसर और रेडियो एन्टेना की ऊर्जा की खपत कम करना और चौथा है सॉफ़्टवेयर को सरलीकृत कर व्यर्थ होने वाला समय और ऊर्जा बचाना। चारों का उपयोग कर भार कम किया जा सकता है और बैटरी का समय बढ़ाया जा सकता है। इन शोधों से न केवल आईफ़ोन लाभान्वित होगा वरन आईपैड मिनी भी अपने प्रतियोगियों से आगे निकलेगा।

आईपैड मिनी का प्रमुख प्रतियोगी नेक्सस७ है। ७.९ इंच की स्क्रीन, ३०८ ग्राम भार, १६५ पीपीआई और १२ घंटे की बैटरी पर आईपैड मिनी के पास अपनी स्क्रीन की स्पष्टता बढ़ाने का अवसर भी है। मुझे डर है कि कहीं पीपीआई बढ़ाने के व्यग्रता में एप्पल अपने तकनीकी लाभ न गँवा बैठे। बड़े आकार की स्क्रीनों में स्पष्टता अधिक महत्व नहीं रखती है और एप्पल को सारा तकनीकी लाभ इसी पर न्योछावर नहीं कर देना चाहिये। मैं पिछले आठ माह से आईपैडमिनी उपयोग में ला रहा हूँ, सारा कार्य इसी में करता हूँ, पर कभी ऐसा लगा नहीं कि इसमें स्पष्टता बढ़ाने की कोई आवश्यकता है। यहाँ पर भी एप्पल का प्रयास भार कम करने का और बैटरी समय बढ़ाने का होना चाहिये।

१० सितम्बर पर न केवल मेरी वरन एप्पल के प्रतियोगियों की पूर्ण दृष्टि रहेगी। जो भी निष्कर्ष हों, लाभ उपभोक्ता का होगा। मानकों की एक स्वस्थ प्रतियोगिता में, तकनीक का विकास ही होता है, नहीं तो किसने सोचा था कि अपने प्रथम कम्प्यूटर पूर्वज से लाख गुना छोटा और लाख गुना अधिक शक्तिशाली मोबाइल हमारी पीढ़ी को देखने को मिलेगा। आइये १० सितम्बर की प्रतीक्षा करते है।

4.9.13

पर्यटन - आनन्द का कार्य

हमारी श्रीमतीजी को पर्यटन संबंधी पुस्तकें और आलेख पढ़ने में रुचि है। बड़े ही संक्षिप्त अन्तरालों में उनकी रुचि, रह रहकर अनुभव में बदल जाना चाहती है। न जाने कितने स्थानों के बारे में हम से कह चुकी हैं और हम हैं कि एक को भी मना नहीं किया है। वर्तमान में देखा जाये तो हमारे अगले दो वर्षों के सप्ताहान्त, छुट्टियाँ आदि सब आरक्षित हैं। यदि इतनी छुट्टी मिल सकती और व्यवस्था बन सकती तो, उनकी सारी आशायें पूरी कर देता। फिर भी हार नहीं मानता हूँ, सरकारी नौकरी में पूरा देश घूम चुका हूँ, ईश्वर की ऐसी ही कृपा रही तो श्रीमतीजी की घूमने जाने वाले स्थानों पर भी देश की सेवा का अवसर मिलेगा। नौकरी और पर्यटन साथ साथ चलते रहेंगे, न श्रीमती जी रूठेंगी, न हम व्यथित होंगे, पता नहीं कौन सा वादा कब पूरा हो जाये।

आप ऐसी दार्शनिकता झाड़ कर कुछ सप्ताहान्त तो टाल सकते हैं, सारे सप्ताहान्त उदरस्थ नहीं कर सकते, सो घूमने जाना पड़ जाता है। पहले तो वरिष्ठों से छुट्टी माँगने के लिये कुछ विशेष कार्य करना पड़ जाता है, योग्यता सिद्ध करनी पड़ जाती है। कई बार तो अन्य अवसरों पर इसीलिये शब्द नहीं फूटते हैं कि कहीं छुट्टी के लिये मना न हो जाये। जिस दिन छुट्टी स्वीकृत हो जाती है, उस दिन मन मुदित हो नाचने का करता है, जैसे अपनी श्रीमतीजी के लिये कोई हीरे का हार ले आये हों। उसके बाद की तैयारी और भी श्रमसाध्य रहती है। बच्चों को समझाना पड़ता है कि कैसे किसी विशेष स्थान पर जाना वीडियो गेम खेलने से कहीं अच्छा है। पिछली यात्रा में की गयी भूलों को न दुहराने का वचन देना पड़ता है। साथ ही साथ रेलवे की सीटों पर उन्हें नीचे सोने देने का आश्वासन भी देना पड़ता है।

यदि पर्यटन स्थान पर रेलवे की व्यवस्था है तो ठहरना रेलवे के ठिकानों पर ही होता है। अपने विभाग की कृपा से आने जाने का आरक्षण मिल ही जाता है। वहाँ पर स्थानीय साधनों की व्यवस्था और अन्य स्थानों पर ठहरने की व्यवस्था में संपर्क सूत्र खड़खड़ाने पड़ते हैं। ७ राज्यों पर रह चुकने के कारण यह प्रसाद बहुधा मिल जाता है। कई बार व्यवस्थायें बहुत अच्छी मिलती हैं, तो कई बार काम चल जाता है। उसके बाद गूगल महाराज की कृपा से मानचित्र आदि समझे जाते हैं, स्थानीय भ्रमण की योजना का सूत्र रखा जाता है, मित्रों से बातचीत होती है, यात्रा संबंधी ब्लॉग पढ़े जाते हैं, तब कहीं जाकर पर्यटन की अस्पष्ट ही सही, एक छवि बन जाती है।

एक बात बीच में स्पष्ट कर दूँ कि इस श्रंखला में नीरज का परिप्रेक्ष्य अविवाहित घुमक्कड़ी का है, मेरे पीछे एक पूरी श्रीमतीजी और दो प्यारे पर जिज्ञासु बच्चे हैं। मेरा परिप्रेक्ष्य निश्चय ही भिन्न होगा, क्योंकि मेरे लिये व्यवस्थाओं का न हो पाना विवशताओं को जन्म देने जैसा हो सकता है। मेरा अनुभव पर्यटन के पक्ष को उतना न कह पायेगा जितना मेरा पर्यटन अनुभव पक्ष को कह जायेगा। सच कहूँ तो इच्छा मेरी भी करती है कि मैं भी अपने पर्यटन के वृत्तान्त लिखूँ और आप सबको बताऊँ, पर उनका स्वरूप उतना गहरापन लिये हुये नहीं होगा जितना नीरज का होता है। मेरे यात्रावृत्तान्तों की कहानी बहुत कुछ सब चैनल के धारावाहिक जैसी ही हो जायेगी, चलना कम होगा, हँसी अधिक आयेगी।

रेलवे स्टेशन के निकट घर होने के कारण, पर्यटन यात्रायें रेलवे स्टेशन से ही प्रारम्भ होती हैं। मेरे साथ बच्चों को भी रेलवे बहुत भाता है। पृथु को ट्रेन में पुस्तक पढ़ना और वीडियो गेम खेलना अच्छा लगता है तो देवला को बतियाना और पहेली आदि से खेल खेलना। श्रीमतीजी को बच्चों से जूझने से बचने और आगामी यात्रा के लिये ऊर्जा संचयन की दृष्टि से सोना अच्छा लगता है और मुझे सबकी बातें मानना। रात आने पर समान के निकट रहने के कारण मुझे नीचे की सीट मिल जाती है पर इस विशेष लाभ के लिये मुझे सबके बिस्तर भी लगाने पड़ते हैं। जो भी गणित लगता हो, जो भी सन्धि प्रस्ताव पारित होते हों, पर शेष तीन सीटों के लिये कभी किसी को विशेष श्रम नहीं करना पड़ता है।

रेलवे में समान्यतः नींद अच्छी आती है, साथ ही साथ भूख भी खुलकर लगती है। हो भी क्यों न, कोई इतनी देर डुलायेगा तो लोरी जैसा लगेगा, नींद आ जायेगी। साथ ही लगातार हिलते डुलते रहने से खाना भी पच जाता है, इसीलिये भूख भी खुलकर लगती है। बच्चों को भी अपनी पसन्द का चटपटा खाने का अवसर मिल जाता है। पर्यटन में बहुधा खानपान में नियन्त्रण नहीं रह पाता है, पर मैं नियमतः कम ही खाता हूँ, अधिक खाने से पर्यटन का उत्साह कम पड़ने लगता है और सोने की इच्छा प्रबल हो जाती है। हाँ, यदि गोवा जैसे किसी स्थान में शारीरिक और मानसिक विश्राम के लिये जाते हैं तो दोपहर में पर्याप्त भोजन कर सोने में बहुत आनन्द आता है।

श्रीमतीजी को पर्यटन में प्राकृतिक दृश्य भाते हैं, मुझे ऐतिहासिक पक्ष और अनुभव और बच्चों को वहाँ की कहानियाँ। इन तीनों में संतुलन बिठाने के लिये पहले तो श्रीमतीजी के साथ प्राकृतिक दृश्यों की फोटो उतारना पड़ती है फिर वहाँ के बारे में पहले से पढ़कर कहानी सुनाना पड़ती है। इन दोनों में मुझे ऐतिहासिक पक्ष का और सौन्दर्यपक्ष का समुचित अनुभव हो जाता है। बस यही ध्यान देना पड़ता है कि एक को साधने के कार्य में दूसरा क्रोधित न हो जाये। ऐसा नहीं कि मैं सदा उन तीनों पर व्यस्त रहता हूँ, जब कभी वे आपस में व्यस्त होते हैं मैं शान्ति से पर्यटन का आनन्द ले लेता हूँ।

कपड़े थोड़े अधिक लेकर चलते हैं कि बीच यात्रा में धोने नहीं पड़ें। यही कारण रहता है कि सामान अधिक हो जाता है। बच्चे समझदार हो गये हैं, सामान उठाने और ले जाने में हाथ बँटाते हैं और यदि ट्रेन देर रात में हो, तो जगकर चल भी लेते हैं। उनके बचपन में यह सारा कार्य मुझे ही करना पड़ता था। हाँ, मेरी तरह उन्हें भी प्रतीक्षा करना बहुत अखरता है।

परिवार के साथ बहुत अधिक दिन बाहर रहना संभव नहीं होता है। स्थान परिवर्तन का अनुभव पूर्ण होते ही मानसिक थकान घिरने लगती है और अपना घर याद आने लगता है। अधिक दिनों के पर्यटनीय अनुभव के लिये, रोचकता के विशिष्ट प्रयास करने पड़ते हैं। विकल्प उपस्थित होने की स्थिति में कई बार परिवार से पूछ पूछ ही आगे बढ़ना अच्छा होता है। तब लगता है कि पर्यटन यात्रा की बागडोर उन्हें सौंप दी गयी है और पर्यटन में रुचि बनाये रखना उनका उत्तरदायित्व है।

हमारे लिये पर्यटन एक विशुद्ध पर्यटनीय अनुभव न होकर प्रबन्धन का व्यक्तिगत अनुभव जैसा हो जाता है। नीरज के ब्लॉग पढ़ने के बाद लगता है कि हम तो कुछ घूम ही नहीं पाये, केवल परिवार को घुमाने में लगे रहे। अकेले होने पर कितना घूम पाता, कहना बहुत कठिन है। विवाह के पहले भी अकेले घूमना कभी हुआ ही नहीं, मित्रगण न केवल कार्यक्रम बनाते रहे वरन उसे साधते भी रहे। तब भी मिलजुल कर घूमे, आज भी मिलजुल कर ही घूम रहे हैं, तब निश्चिन्त होकर, अब परिवार को निश्चिन्त कर के।

जो भी हो, घर वापस आने में एक उपलब्धि की अनुभूति होती है, आनन्द के कार्य की।