17.11.10
मा पलायनम्
13.11.10
भाषायी उत्पात और अंग्रेजी बंदर
| श्री विश्वनाथजी |
भाषा है तो हम हैं।
10.11.10
शिवसमुद्रम्
6.11.10
प्रश्न और उत्तर
3.11.10
खेलशैली, कार्यशैली, जीवनशैली
कुछ खिलाड़ी परिश्रमशील होते हैं और सारे के सारे शॉट्स कोर्ट की पिछली रेखा पर खेलते हैं। यह बिना किसी विशेष कलात्मकता के खेल में बने रहने का गुण है, अपनी ओर से कोई भूल न करते हुये, सामने वाले को भूल करने के लिये विवश करने का। कुछ खिलाड़ी प्रारम्भ से ही ताबड़तोड़ तेज शॉट्स मारकर विरोधी को हतप्रभ करने में लग जाते हैं, पर उसमें स्वयं भूल की संभावनायें भी उतनी ही बढ़ जाती हैं। दोनों ही शैलियों में ही थकान बहुत होती है और ऊर्जा और कलात्मकता को अन्त तक बचा कर रखना कठिन हो जाता है। धीमे खेल में विशेष कलात्मकता आवश्यक होती है और थकान निसन्देह बहुत कम होती है। चतुर खिलाड़ी धीमे और तेज खेल या कहें तो कलात्मकता और गति का समुचित मिश्रण रखकर जीत पाते हैं। साथ ही साथ युगल खेल में जहाँ एक ओर आपकी सम्मिलित पहुँच पूरे कोर्ट में हो, वहीं दूसरी ओर समन्वय प्रतिपूरक हो।
30.10.10
नगर भ्रमण
बंगलोर जैसे बड़े नगर में एक छोर से दूसरे छोर पहुँचने में दो घंटे तक का समय लग जाता है। वैसे तो मुख्य सड़क से ही चलना श्रेयस्कर होता है, आप रास्ता नहीं भूल सकते हैं। जब मुख्य सड़कें रास्ता न भूलने वालों से भर जाती हैं और पूरा यातायात कछुये की गति पकड़ लेता है तब उन मुख्य सड़कों को जोड़ने वाली उपसड़कें बहुत काम आती हैं। सड़क-जाल के ज्ञाता ड्राइवर उस समय अपना प्रवाह उपसड़कों पर मोड़ लेते हैं और नगरीय चक्रव्यूह भेदते हुये गन्तव्य तक पहुँच जाते हैं। सभी मुख्य सड़कें एक-मार्गी हैं पर उपसड़कें द्विमार्गी हैं।
हमारे ड्राइवर महोदय जब वाहन चलाते हैं तो उनके मन में कितनी गणनायें चलती रहती हैं, इसका अनुमान नहीं होता है हमें। सामने का धीरे बढ़ता यातायात, अगला यातायात सिग्नल कहाँ आयेगा, पहली वह सड़क जहाँ से मुड़ा जा सकता है उपसड़कों पर, एक-मार्गी रास्तों का ज्ञान और मस्तिष्क में बसा पूरे बंगलोर का मानचित्र, इन सबके सुसंयोग ने कभी विलम्बित नहीं होने दिया हमें, अभी तक।
एक बार जब न रहा गया तो हम पूछ बैठे कि इतने रास्ते कैसे याद रह पाते हैं, इतने बड़े बंगलोर में। जो वाहन अधिक चलाते हैं, उनके उत्तर भिन्न हो सकते हैं पर यह उत्तर वैज्ञानिक लगा। मोड़ पर बने भवनों का एक चित्र सा बना रहता है मन में, उसी से दिशा मिलती रहती है। किन्ही और चिन्हों की आवश्यकता ही नहीं है। बहुत समय तक तो यह विधि सुचारु चली पर पिछले कुछ वर्षों से समस्या आ रही है। कारण उन कोनों के भवनों का पूर्ण कायाकल्प या उनके स्थान पर किसी और ऊँचे भवन का निर्माण हो जाना है। जिस गति से बंगलोर का विकास या निर्माण कार्य हो रहा है, यह भ्रम संभव है।
बहुत दिनों के बाद वाहन-कला का एक और गुण समझ में आया कि उस रास्ते से तीव्रतम पहुँचा जा सकता है जिस पर कम से कम यातायात सिग्नल मिलें। कैसे यातायात सिग्नलों को छकाते हुये, उपसड़कों में घूमा जा सकता है, यह बड़ा रुचिकर प्रकल्प हो सकता है।
कभी कभी जब यातायात धीरे धीरे बढ़ता है और उपसड़कों की सम्भावना भी नहीं रहती है तो किस प्रकार से विभिन्न लेन बदलकर बहुमूल्य एक घंटा बचाया जा सकता है, यह कर दिखाना भी एक कला है। इस कलाकारी से कई बार समय बचा कर सार्थक कार्यों में लगाया गया है।
गाने चलते रहते हैं, कभी किशोर, कभी मुकेश, कभी रफी या कभी नये। अवलोकन के क्रम को थोड़ा विश्राम मिल जाता है संगीत से।
छोटे नगर के भ्रमण में भला कहाँ से मिल पायेगा इतना अनुभव। नगर भ्रमण जब एक पोस्ट में नहीं सिमट पाया तो अन्य अनुभव तो अध्यायवत हो जायेंगे बड़े नगरों में।
27.10.10
अब अपने कपड़े धोना है
छात्रावास में सारे कपड़ों को बाहर से धुलवाने की सुविधा थी पर धुलाई का पैसा बचाने के लिये, कम वस्त्रों से काम चलाने के लिये और शरीर का स्वास्थ्य बनाने के लिये कपड़ों से हमारा आत्मीय सम्बन्ध बना रहा। चद्दरें ही दी जाती थीं धुलने के लिये पर यदि रौ में आ जाते तो किसी रविवार को उनको भी धो डालने का उत्साह था हम लोगों में। हम मित्रों के लिये कपड़े धोते धोते लन्तरानी मारने का समय सबसे आनन्द देने वाला होता था, वहाँ अनुशासन की बयार नहीं पहुँच पाती थी। आई आई टी में भी हम अपनी मस्ती में अपने कपड़े धोते रहे, किसी उपसंस्कृति में बहे बिना।
बंगलोर में अब कपड़ों की धुलाई एक बहुत बड़ा व्यवसाय बन चुका है। स्वयं अपने हाथों से धोने की बात तो दूर, आई टी के महाशयों के पास इतना भी समय नहीं है कि वाशिंग मशीन में ही धोकर प्रेस कर लें। सुबह पति देव निकलते हैं, पत्नी, बच्चे, कपड़े और समान की सूची लेकर। सबको एक एक कर छोड़ते हुये और सायं पुनः सबको एक एक कर लेते हुये।
बंगलोर में कार्यरत विलेज लॉन्ड्री सर्विस के सर्वेसर्वा और भारतीय प्रबंधन संस्थान से निकले श्री अक्षय मेहरा से जब इस क्षेत्र की संभावनायें सुनी तो गांधी और विनोबा जैसे नेताओं को न पालन करने वाले महान जन समूह की शक्ति और उस पर आधारित अर्थतन्त्र का आभास हुआ। वर्धा के आश्रमों की अपना कार्य स्वयं करने की परम्परा बंगलोर में ढहती दिखी।
अभी कुछ दिन पहले रेलवे के कार्य से एक कपड़े धोने वाली कम्पनी में गया, अन्तर्राष्ट्रीय मानकों और गुणवत्ता को पछाड़ती उस कम्पनी में एक शर्ट की धुलाई 200 रु में होती है। मेरे बचपन का कार्य जब इतना मँहगा हो गया है तो सोचता हूँ कि अपने कपड़े अब ढंग से धोऊँ अन्तर्राष्ट्रीय मानकों से और अपने शारीरिक और आर्थिक स्वास्थ्य को एक और अवसर प्रदान करूँ।
23.10.10
वर्धित सर्वम् स वर्धा – 3
विनोबा का नाम हमारे मन में भूदान आन्दोलन की स्मृतियाँ उभार लाता हैं। जिस देश मे व्यक्तियों को अपनी भूमि से असीम लगाव हो, उस देश में भूदान-यज्ञ विनोबा के योगदान को वृहद-नाद सा उद्घोषित करता है। दस लाख एकड़ भूमि का दान भारत के इतिहास में अद्वितीय था, स्वतःस्फूर्त और मानव की सहृदयता से प्रेरित। यह एक महामानव के मन से प्रारम्भ हुआ और एक जन-आन्दोलन में बदल गया।
हम में से बहुतों को यह ज्ञात न हो कि भूदान आन्दोलन 13 वर्ष चला और इस काल में 70,000 किमी की पदयात्रा की, विनोबा ने। भारत के हर कोने में जन जन के मन में रच बस गया, वह खाँटी भारतीय स्वरूप। जन-सैलाब इस भूदान के महात्मा के दर्शन व अगवानी हेतु खड़ा रहता था और अपने क्षेत्र में अनवरत उनके संग रहता था। नये क्षेत्र में नये समूह, नयी आशा, नया उत्साह मिलता और पृथ्वी अपने महापुत्र को स्वदान का आशीर्वाद बरसाती रहती।
देश को देखने और समझने का इससे अच्छा माध्यम क्या हो सकता है भला? भारतीयता पर ज्ञान के अध्याय उघाड़ चुके विद्वानों का ज्ञान, विनोबा के सम्मुख सदा ही नगण्य रहेगा।
हमारा ज्ञान पुस्तकीय अधिक है, समस्याओं पर हमारी दृष्टि सीमित है और कल्पनाओं के खग अवसर पाते ही हमारे बौद्धिक परिवेश में उड़ने लगते हैं। प्रत्यक्ष जाकर देखने से पता लगता है कि हम कितना कम जानते हैं, वस्तुस्थिति के बारे में।
वर्धति भारत ज्ञानम्, वर्धति कर्म प्रमाणम्, स वर्धा।
20.10.10
वर्धति सर्वम् स वर्धा - 2
आश्रम सहसा ही आ गया, बिना किसी गुम्बदीय भौकाल के। जिस देश में जीवित आत्माओं के महिमा मण्डन में कुबेर के हाथों नहाने का प्रचलन हो, उस तुलना में अव्यक्त सा लगा आधुनिक भारतीय इतिहास के मर्म का निवासस्थल। मेरी व्यग्रता सहसा ढल गयी, स्थान का प्रभाव था संभवतः। राजनीति के कई शलाका पुरुषों को 1934 से 1948 के बीच ऐसी ही शान्ति मिल जाया करती होगी इस आश्रम में घुसते ही।
कुटिया में घुसते ही पर, बहुत ही करुण स्वर में गांधी जी ने मुझसे वह प्रश्न पूछ ही लिया। प्रश्न बहुत सरल था और मुझे पहले से ज्ञात भी। क्या मेरे देश के लोग सत्य और अहिंसा को अभी भी समझते हैं? राजनीति तो तब भी स्वार्थतिक्त थी और आज भी होगी, पर कहीं मेरे नाम का दुरुपयोग तो नहीं कर रहे हैं, आज के नेता?
सोचा, यदि सुबह ही यहाँ आ गया होता तो देश के सजग औऱ निर्भय ब्लॉगर बन्धुओं से इस प्रश्न का उत्तर पूछता। समय की कमी ने जीवन का क्रम तोड़ मरोड़ कर रख दिया है, जीने के समय मरने सी हड़बड़ी और मरने के समय शान्ति से जीने की उत्कट चाह।
64 वर्ष की आयु में गांधी जी वर्धा स्थित इस आश्रम में रहने आये थे। आज मेरे देश की स्वतन्त्रता को भी 64वाँ वर्ष लगा है, उसे भी वर्धा के आश्रम जैसे सरल, अनुशासित और कर्मशील जीवन जीने को कौन प्रेरित करेगा?
वर्धति गांधी कर्मम्, वर्धति गांधी मर्मम्, स वर्धा।
16.10.10
वर्धति सर्वम् स वर्धा - 1
अनीता कुमार
|
देवीरूपा, संयत, गरिमा,
ब्लॉग जगत की एक मधुरिमा
|
अजित गुप्ता
|
अब तक तो गाम्भीर्य दिखा है,
एक प्रफुल्लित हृदय छिपा है
|
कविता वाचक्नवी
|
हिन्दी-महक, बयार लिये,
परदेशी बन प्यार लिये
|
रचना त्रिपाठी
|
आवृत गांधी खादी,
एकल ही संवादी
|
गायत्री शर्मा
|
मेधा-अर्जित आस,
रूपमयी-विश्वास
|
अनूप शुक्ल
|
मौज लेने में अपरिमित आस्था,
उसी रौ में सुना डाली दास्ता
|
विवेक सिंह
|
हाथ कैमरा, झोंके फ्लैश,
विद्वानों से क्योंकर क्लैश
|
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
|
दिवस दो काँधों सकल ब्लॉगिंग टिकी,
जी गये पल, पर जरा भी उफ नहीं की
|
डॉ महेश सिन्हा
|
देखकर स्मित सी मुस्कान,
उड़न छू परिचय का व्यवधान
|
हर्षवर्धन त्रिपाठी
|
उद्यमिता की बात कही,
सब सुधरेंगे, देर सही
|
संजीत त्रिपाठी
|
एक कुँवारा इस शहर में,
मिला उसे दोपहर में
|
यशवन्त सिंह
|
जो विचार मन में आयेगा,
यहीं अभी वाणी पायेगा
|
अविनाश वाचस्पति
|
कलमाडी की कृति अद्भुत,
पर ब्लॉगिंग में मजा बहुत
|
जय कुमार झा
|
स्वच्छ व्यवस्था करे विधाता,
हम घूमेंगे लिये पताका
|
रवीन्द्र प्रभात
|
मन बसी परिकल्पना,
शब्द दिखते अल्पना
|
संजय बेगाणी
|
छोटा तन, गुजरात बसा,
हिन्दी का विश्वास बसा
|
सुरेश चिपलूनकर
|
तिक्त शब्द, भीषण संहार,
हृदय किन्तु विस्तृत आकार
|
विनोद शुक्ल
|
निज आह्लादित, शान्त, सुहृद-नर,
है अनामिका विजयित पथ पर
|
जाकिर अली रजनीश
|
जहाँ ब्लॉग और हिन्दी वर्धित,
दिख जाते रजनीश समर्पित
|
अशोक कुमार मिश्र
|
हम पहले थे मिले नहीं,
भाव किये संवाद कहीं
|
प्रियन्कर पालीवाल
|
परिचय में संवाद सिमटकर,
थे वर्धा में एक प्रियन्कर
|
शैलेष भारतवासी
|
परिचय दृष्टि रहा बनकर,
है भविष्य-आशा तनकर
|
वन बिहारी बाबू
|
हम सम्मेलन में उन्मत थे,
आप व्यवस्था में उद्धृत थे
|
आलोक धन्वा
|
हुआ हमारा मेल नहीं,
सुना आप संग रेल रही
|
विभूति नारायन राय
|
गूँज रहा बस एक संदेशा,
ब्लॉगिंग में ही लक्ष्मण-रेखा
|
रवि रतलामी
|
गोली मारो, जियो कलन्दर,
मायावी हो घूम घूम कर
|
पवन दुग्गल
|
बच के रहना बाबा जी,
उत्श्रंखल मन बाधा जी
|
श्रद्धा पाण्डेय
|
लख ब्लॉगिंग की मदमत धार,
संग रहीं बनकर पतवार
|
प्रवीण पाण्डेय
|
जिन्दगी अलमस्त हो,
चुपचाप बहना चाहती है
|
13.10.10
वक्तव्यों के देवता
समाचार पत्रों की विवशता है या पाठकों की रसिकता, कोई भी समाचार बिना वक्तव्य पूरा ही नहीं लगता है। हर सामाचार के अन्त में एक पुछल्ला लगा रहता है वक्तव्यों का, अन्तिम अर्ध्य के रूप में, वक्तव्यों के देवताओं के द्वारा। बिना 'बाइट' किसी टेलीविज़नीय समाचार को सत्यता का प्रमाण पत्र नहीं मिलता। जब तक प्रसिद्धिप्राप्त देवगण अपना सौन्दर्यमुखीय व्यक्तित्व कैमरा के सामने प्रदर्शित नहीं कर लेते हैं, समाचार को नैसर्गिक निष्पत्ति नहीं मिल पाती है। तब जो भी शब्द उनके आभामण्डल से टपक जाये, सत्य की संज्ञा से पूर्ण हो जाता है।
भारत वैसे ही देवताओं की विविधता व अधिकता से ग्रस्त और त्रस्त है, उस पर नये दैवीय प्रतीकों का उदय। इस युग में हमारी बुद्धि को विकसित करने का और कोई उपाय मिले न मिले, पर इन वक्तव्यों को समझ सकने का प्रयास बुद्धि के विकास के लिये नितान्त प्रभावी हो सकता है। वक्तव्यों के प्रवाह से जल निकाल कर चर्चा में उड़ेलना और समय पड़ने पर प्रतिद्वन्दी के वक्तव्यों से उसी को भिगो देना बौद्धिक श्रेष्ठता के पर्याय हो गये हैं। देवता समुद्रमंथन में अमरत्व को प्राप्त हो चुके हैं पर ये आधुनिक कुलीन अपने विषवमन करने के गुण से सहस्त्र सर्पों को निष्प्रभ करने की क्षमता रखते हैं।
वक्तव्यों की अधिकता से उनका मूल्य कम होने लगा है। कोई अब उन पर विश्वास ही नहीं करता। चन्द्रकान्ता सन्तति के पात्रों से भी अधिक काल्पनिक हो गयी है उनकी छवि। क्या करें? किसको अवकाश पर भेजा जाये? वक्तव्यों को या उनके देवताओं को?
शब्दों को जीकर दिखलाने वालों के बारे में कब जानेगे हम?
"दुनिया को शास्त्र की भूख नहीं, आस्थापूर्वक की हुई कृति की आवश्यकता है।" - महात्मा गांधी
9.10.10
बात तो बस शुरुआत करने की है
अभी करने से समय की हानि नहीं होगी पर क्रियान्वयन के समय ऐसी समस्यायें आ सकती हैं जिन पर आपने पहले भलीभाँति विचार ही नहीं किया हो। ऐसा भी हो सकता है कि समस्यायें इतनी गहरी हों कि आपकी योजना धरी की धरी रह जाये।
6.10.10
आवारा हूँ
2.10.10
तुलसी वाला राम, सूरदास का श्याम
जितनी बार भी राम का चरित्र पढ़ा है जीवन में, आँखें नम हुयी हैं। कल मेरे राम को घर दे दिया मेरे देशवासियों ने, कृतज्ञतावश पुनः अश्रु बह चले। धार्मिक उन्माद के इस कालखण्ड में भी सदैव ही मेरे राम मुझे दिखते रहे हैं, त्याग में, मर्यादा में, शालीनता में, चारित्रिक मूल्यों में। पृथु(पुत्र जी) के बाल्यकाल में मुझे तुलसी वाले राम और सूरदास के श्याम अभिभूत कर गये थे और लेखनी मुखरित हो चली थी।
मन्त्र-मुग्ध मन, कंपित यौवन, सुख, कौतूहल मिश्रित जीवन ।
ठुमक ठुमक जब पृथु तुम भागे, पीछे लख फिर ज्यों मुस्काते ।
हृद धड़के, ज्यों ज्यों बढ़ते पग, बाँह विहग-पख, उड़ जाते नभ ।
विस्मृत जगत, हृदय अह्लादित, छन्द उमड़ते, रस आच्छादित ।।
तेरे मृदुल कलापों से मैं, यदि कविता का हार बनाऊँ ।
मन भाये पर, तुलसी वाला राम कहाँ से लाऊँ ।।१।।
सुन्दर गीतों में बसता जो, बाजत पैजनियों वाला वो ।
छन्दों का सौन्दर्य स्रोत बन, तुलसी का जीवन-आश्वासन ।
अति अनन्द वह दशरथ-नन्दन, ब्रम्हविदों का मन जिसमें रम ।
कोमल सा मुखारविन्दु जो, कौशल्या-सुत आकर्षक वो ।
कविता का श्रृंगार-पूर्ण-अभिराम कहाँ से लाऊँ ।
मन भाये पर, तुलसी वाला राम कहाँ से लाऊँ ।।२।।
चुपके चुपके मिट्टी खाना, पकड़ गये तो आँख चुराना ।
हर भोजन में अर्ध्य तुम्हारा, चोट लगी तो धा कर मारा ।
भो भो पीछे दौड़ लगाते, आँख झपा तुम आँख बताते ।
कुछ भी यदि मन को भा जाये, दे दो कह उत्पात मचाये ।।
तेरे प्यारे प्यारे सारे कृत्यों से यदि छन्द बनाऊँ ।
मन भाये पर, सूरदास का श्याम कहाँ से लाऊँ ।।३।।
घुटनहिं फिरे सकल घर आँगन, ब्रजनन्दन को डोरी बाँधन ।
दौड़ यशोदा पीछे पीछे, कान्हा सूरदास मन रीझे ।
दधि, माखन और दूध चुराये, खात स्वयं, संग गोप खिलाये ।
फोड़ गगारी, दौड़त कानन, चढ़त कदम्ब, मचे धम-ऊधम ।।
ब्रज के ग्वाल-ग्वालिनों का सुखधाम कहाँ से लाऊँ ।
मन भाये पर, सूरदास का श्याम कहाँ से लाऊँ ।।४।।