30.11.16

लिली पाण्डेय

लिली रेलवे बोर्ड में वरिष्ठ अधिकारी हैं और कार्मिक विभाग का उत्तरदायित्व वहन कर रही हैं।बंगलुरु में उनके साथ कार्य करने का सौभाग्य मिला है। कला और साहित्य में रुचि है। रेलवे में कला के विषय परसफरनाम की पुस्तिका की सहलेखिका भी रही हैं। उसी के आगामी अंक के लिये लिली ने एक कविता लिखी थी। पढ़ने को दी, बहुत अच्छी लगी, गुनगुनायी और हिन्दी में अनुवाद कर दी। शाब्दिक के स्थान पर भावानुवाद किया है। आप भी पढ़ें।

Whirl of wheels
Setting in motion the celestial machinery
Turning to infinity, to eternity
An epic adventure beyond 
Beginnings & denouement 
Spinning a universe of words, forms and shapes
A cadence of dervishes
The dance of Shiva
Spasm of creation ..

~ Lily Pandeya

अथ कालचक्र निःश्वास नाद,
बढ़ता गतिमय वैश्विक प्रमाद,
शाश्वत, अनंत
निर्बन्ध छन्द,
आगत स्वागत, सब मार्ग सुप्त,
यात्रा अनादि, संहारमुक्त
शब्दों, आकृति आकारों में 
जग घूर्ण पूर्ण विस्तारों में
दरवेशी तालों पर विशेष
नर्तन नवनूतन शिवप्रवेश
घनघुमड़ उमड़ती सृष्टिशेष


भावानुवाद - प्रवीण पाण्डेय

लिली के साथ, बीजिंग में

27.11.16

चीन यात्रा - १८

अपनी संस्कृति पर गर्व करने वालों को लोग पुरातनपंथी समझते हैं। पुरातन से विद्वेष और नूतन से लगाव तथाकथित बुद्धिजीवियों का पहचान-तत्व बन गया है। समझना और समझाना तब और कठिन हो जाता है जब संस्कृति पर आस्था रखने वालों और न रखने वालों ने संस्कृति के मर्म को नहीं समझा होता है। तर्क तब परिधि पर ही रहते हैं, केन्द्र में सत्य संदोहित हुये बिना ही पड़ा रहता है। पक्ष में और विपक्ष में बोलने के लिये संस्कृति को समझना आवश्यक है। समझने के लिये पढ़ना और जीना आवश्यक है, नहीं तो तर्क शुष्क रह जाते हैं। संस्कृति के रूप में न जाने कितना ज्ञान, न जाने कितनी बुद्धिमत्ता हमें विरासत में सहज ही मिल जाती है। साथ ही साथ कुछ विकृतियाँ भी मिल जाती हैं जो संभव है कि किसी काल में संस्कृति के अनुकूल रही हों पर वर्तमान में विपरीत हों। संस्कृति का मर्म समझने के क्रम में ऐसी विकृतियाँ स्पष्ट दिखती हैं और दूर की जा सकती हैं। जो लोग मात्र कुछ विकृतियों के लिये अपनी पुरानी संस्कृति को छोड़ देते  हैं और नये को बिना सोचे समझे अपना लेते हैं, वे संस्कृति-संकर कहीं के नहीं रहते हैं। 

चीन में पुरानी संस्कृति का आज तक कहीं भी लोप नहीं हुआ है। वहाँ की सत्ता ने भले ही संस्कृति के स्वरूप को भले ही आघात पहुँचाया हो पर संस्कृति की आत्मा को नष्ट नहीं कर पायी है। कालान्तर में सत्ता ने संस्कृति के सुदृढ़ पक्षों का उपयोग आर्थिक और सशक्त राष्ट्र बनने में प्रयुक्त किया है। भारत इतिहास के आघातों से बिखरा और भ्रमित खड़ा है। संस्कृति में शक्ति के सूत्र छिपे हैं पर वह स्वयं पर विश्वास ही नहीं कर पा रहा है। बौद्धिक क्षमता है पर स्वयं को समझा नहीं पा रहा है। अन्तर्विरोधों से क्षीण और अपनी प्राथमिकतायें निर्धारित करने में असमर्थ देश को यदि कुछ चाहिये तो वह दिशा और संबल हैं। विश्व सौ पग आगे दिखता है और अपने पग पर समस्याओं के शत पाथर बँधे हैं, इसी पशोपेश के दिग्भ्रम मे आवाक सा बैठा हुआ है। 

सृजनशीलता है, सहनशीलता है, उपलब्धियों से भरा कालखण्ड है। स्वयं को सिद्ध नहीं कर पाये हैं तो पददलित भी नहीं हुये हैं। उठना होगा, बढ़ना होगा, उन्नति के शिखरों में चढ़ना होगा। पूर्वजों को संतुष्ट करने को लिये, आने वाली संततियों को गौरव करने के लिये कुछ शेष रहे, इसके लिये कुछ न कुछ करना ही होगा। छोटा नहीं, बड़ा करना होगा, बहुत बड़ा करना होगा।

चीन के रेलतन्त्र में देखा, रेल विश्वविद्यालय में देखा, नगरीय व्यवस्था में देखा, व्यापार में देखा, यातायात में देखा, कुछ भी छोटा नहीं पाया वहाँ पर। सिल्क रोड से लेकर आधुनिक सिल्क रोड तक, स्टील के उत्पादन से लेकर अंतरिक्ष कार्यक्रम तक, सब के सब असाधारण सोच के उदाहरण हैं। व्यवस्थाओं के स्वरूप जो सिद्ध हो चुके हैं, उन्हें यथास्वरूप अपनाने में क्या समस्या हो सकती है। 

भारत और चीन का संबंध बहुत पुराना है। हम चाहें, न चाहें हमें पड़ोसी के रूप में ही रहना है। भारत ने एक भी सैनिक भेजे बिना चीन को अपनी संस्कृति के बल पर सदियों तक अपने विचार के अधिकारक्षेत्र में रखा है। बौद्ध धर्म के माध्यम से अपना आध्यात्मिक वर्चस्व बनाकर रखा है। बौद्धिक प्रभुत्व के इस लम्बे कालखण्ड ने दोनों संस्कृतियों के बीच संबंध प्रगाढ़ किये हैं। वर्तमान राजनैतिक वर्चस्व की होड़ संभवतः उसी की प्रतिक्रिया है। शक्ति को शक्ति ही साधती है। अभी भी हम बौद्धिक रूप से चुके नहीं हैं। अपनी क्षमताओं का उपयोग कर हमें भी समकक्ष आना होगा और आँख से आँख मिलाकर बात करनी होगी, व्यापारिक क्षेत्र में भी, यदि आवश्यकता पड़ी तो सामरिक क्षेत्र में भी। संबंधों को राजनैतिक कटुता से हटाकर पुनः संस्कृति के आधार पर सिद्ध करना ही होगा।

व्यक्तिगत रूप से जितना सीखने को मिला, वह संभवतः पढ़कर सीख पाना संभव नहीं था। संस्कृतियाँ सोचने का ढंग बदल देती हैं। जब सब एक सा सोचते हैं तभी शक्ति का उद्भव होता है। भिन्न विचार श्रंखलायें या तो भ्रम फैलाती हैं या सीमित और दिशाहीन विकास करती हैं। यदि हमारे पास कोई एक ऐसा तत्व है जो सबको संगठित कर एक दिशा में प्रवृत्त कर सकता है तो वह है हमारी संस्कृति। बड़ी सोच के जो सूत्र हमारी संस्कृति में त्यक्त पड़े हैं, उनका आह्वान करना होगा। अपने पुरुषार्थ को पुनर्जाग्रत करना होगा। धन्यवाद उन्हें देना चाहिये जो हमें हमारी क्षमतायें सिद्ध करने के लिये उकसाते हैं। चीन का आभार, हम निश्चय ही स्वयं को सिद्ध करेंगे।


इति चीन यात्रा।

1.10.16

चीन यात्रा - १७

प्रकृति पुरुष का संग
व्यक्ति जब निश्चय कर लेता है कि उसे प्रकृति के साथ रहना है, समस्यायें स्वतः अपना समाधान ढूढ़ लाती हैं। प्रकृति की अवमानना या उस पर आधिपत्य के प्रयास अंततः विनाश के बीज बनते हैं। टाओ की प्रकृति से निकटस्थता का ऐसा ही एक सुन्दर उदाहरण है दूजिआनयान बाँध। चेन्दू सिचुआन राज्य में है और पर्वत की घाटी में होने के कारण यह क्षेत्र नदियों से प्लावित है। समस्या पहचानी सी है, वर्षा ऋतु में बाढ़ की। यदि बाढ़ से बचने के लिये नदियों से दूर रहा जाये तो अन्न उत्पादन और सूखे की समस्या। बाढ़ और सूखे की इस दुविधा से अपना देश भी दग्ध है। समाधान बाँध बनाना है, जब प्रवाह अधिक हो तो उसे रोक लिया जाये और सूखे के समय उस संचित जलराशि का उपयोग किया जाये। प्रकृति को चोट पहुँचाने के अतिरिक्त बाँध राजनैतिक चोट भी करते रहते हैं। कावेरी, सिन्धु और ब्रह्मपुत्र पर बने या बनाये जाने बाँध इसके जीवन्त उदाहरण हैं। समाधान समस्या से भी भयावह तब हो जाता है जब प्रकृति अनियन्त्रित हो जाती है। अत्यधिक वर्षा में जब ये बाँध अपनी क्षमता से अधिक पानी एकत्र कर लेते हैं तो उनका खोलना और टूटना सिचिंत क्षेत्रों में जल प्रलय बन कर आता है। बिहार हर वर्ष उसका भुक्तभोगी है। कुछ क्षेत्र बाँधों का पूरा लाभ तो स्वयं उठा लेते हैं पर दुष्परिणाम अन्य क्षेत्रों को बढ़ा देते हैं।

परिसर का मानचित्र

संचयन शब्द टाओ की शब्दावली में नहीं है, अपरिग्रह या आवश्यकता से अधिक न रखना। प्रकृति प्रवाहमान रहे, बाधायें न्यूनतम हों, यह धारणा टाओ में गहरे बसी है। इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है दूजिआनयान बाँध। इसे बाँध के स्थान पर सिचाई तन्त्र कहना अधिक उपयुक्त होगा। २२०० वर्ष पूर्व चेन्दू क्वेंगश्वेंग पर्वत से निकलने वाली मिंजियांग नदी के कारण हर वर्ष आने वाली भीषण बाढ़ से त्रस्त था। स्थानीय अधिकारी ली बिंग ने अपने पुत्र के साथ मिलकर इसका हल ढूढ़ा। लम्बे अवलोकन, सटीक योजना और अथक परिश्रम के बाद सिचाई तन्त्र तैयार हुआ। सम्पन्न कार्य की उत्कृष्टता इस बात से समझी जा सकती है कि पिछले २२०० वर्षों से यह तन्त्र सुचारु रूप से चल रहा है। बाढ़ की समस्या को चेन्दू में फिर कभी नहीं आयी और सिचुआन के सभी ५० नगरों में सिचाई व्यवस्था पर्याप्त है। सूखे के समय में मिंजियांग नदी का ६० प्रतिशत से भी अधिक जल सिचाई तन्त्र में आता है और वर्षा के समय यह घट कर ४० प्रतिशत से भी कम रह जाता है। कहने का आशय यह है कि अधिकता के समय यह तन्त्र अवांछित जल वापस नदी में भेज देता है। इस तन्त्र में कहीं भी जल के प्रवाह को बाधित नहीं किया गया है, बस उसे अद्भुत विधि से नियन्त्रित किया गया है। वर्ष २००० में इसे यूनेस्को ने बाढ़ नियन्त्रण, सिचाई तन्त्र, जल परिवहन और जल उपयोग के सतत लाभों के कारण अपनी सूची में स्थान दिया है।

सर्वप्रथम तो मुझे इस तन्त्र के पीछे का विज्ञान समझ नहीं आया क्योंकि इसके लिये हाइड्रोलॉजी का अध्ययन आवश्यक है। अपने साथ गये सिविल इन्जीनियरों से पूछने पर सन्तोषप्रद उत्तर नहीं मिले, संभवतः रेल की पटरियों के लौह ने जलविमर्श के विषयों को उनसे दूर कर दिया हो। वापस आने के बाद उसे कई दिनों तक समझा तब थोड़ा बहुत समझ में आया। जल के जटिल प्रवाह से शाश्वत लाभ ले पाना निश्चय ही एक प्रशंसनीय उपलब्धि है और उसके लिये प्राचीन चीन के नियन्ता साधुवाद के पात्र हैं।

समझने का लिये मॉडल
यह तन्त्र बनाने के लिये जिस स्थान को चुना गया है, वहाँ पर यह नदी दायीं ओर मुड़ती है। मुख्य प्रवाह के बायीं ओर एक उपधारा निकाली गयी है। उपधारा मुख्यधारा की तुलना में अधिक गहरी, पतली और लम्बी है। यह उपधारा आगे जाकर पुनः मुख्यधारा में मिल जाती है। बीच का भूमिखण्ड एक मछली का आकार बनाता है। इस मछली के तीन भाग हैं, मुँह, पिछले पंख का ऊपरी हिस्सा और पिछले पंख का निचला हिस्सा। मुँह के हिस्से को सप्रयास तिकोना और कठोर रखा जाता है। यह अत्यन्त महत्वपूर्ण भाग है क्योंकि यहीं से ही मुख्यधारा और उपधारा में जल का बँटवारा होता है। जब नदी में जल कम होता है तो उपधारा की गहराई अधिक होने के कारण उसमें अधिक जल जाता है। नदी की दिशा से उपधारा की दिशा तनिक बायें होने के कारण उसमें पत्थर और मिट्टी कम जाती है। जहाँ पर उपधारा मुख्यधारा से पुनः मिलती है, वहाँ पर धीरे धीरे नदी से उपधारा में बहकर आये पत्थर और मिट्टी जमा होता रहती है, इस कारण एक अस्थायी अवरोध बन जाता है। इस अवरोध के कारण मुख्यधारा में जाने वाले पानी की मात्रा कम हो जाती है। सारे पानी को उपधारा के बायीं ओर लम्बवत बनायी सिचाई नहर से प्रवाहित कर दिया जाता है। उपधारा के लम्बवत होने के कारण उस पर पत्थर और मिट्टी एकत्र नहीं होती है। इस व्यवस्था से गर्मी के समय लगभग ६० प्रतिशत जल सिचाई के लिये बनायी नहर में चला जाता है। 

मछली का मुख
जब वर्षा आती है तो मछली की पूँछ पर बने अस्थायी अवरोध बह जाते हैं। साथ ही सिंचाई नहर को जाने वाले मुँख की ऊँचाई भी बढ़ा दी जाती है। इसके लिये बड़े गोल पत्थरों को बाँस की रस्सी से लपेटकर लम्बी और बेलनाकार आकार बनाये जाते हैं और उन्हें रस्सियों के माध्यम से एक के ऊपर एक रखा जाता है। अपने आकार के कारण ये अस्थायी और पोरस दीवार की तरह कार्य करती है और तब सिचाई नहर में जाने वाले जल की मात्रा कम हो जाती है। मुख्यधारा और उपधारा दोनों ही शेष जल को बहा ले जाती हैं। इस व्यवस्था से वर्षा के समय ४० प्रतिशत से भी कम जल सिंचाई नहर में जाता है। साथ ही साथ पत्थर और मिट्टी भी सिचाई नहर में नहीं जा पाते हैं और सिंचित जलक्षेत्र बाढ़ के विभीषिका से मुक्त रहता है। इस व्यवस्था के साथ ही जल प्रवाह के प्रबंधन की अन्य कई उपव्यवस्थायें हैं और उसी के बल पर यह तन्त्र पिछले २२०० वर्षों से यथावत चल रहा है। इस पर कोई भी बड़ा निर्माण नहीं है और जिस प्राकृतिक विधि से जल और मिट्टी का पृथकीकरण किया गया है, आज के समय में वह स्वाभाविक व सरल लग सकती है पर उस समय के लिये यह निसंदेह एक अद्भुत उपलब्धि रही होगी।

मछली की पूँछ
जहाँ पर नदी, पर्वत, पेड़ और बादल एक साथ एकत्र हो जायें, प्रकृति अपने मद में रत हो जाती है। हम जब वहाँ पहुँचे, पानी बरस रहा था, हम लोग छाते निकाल कर चल रहे थे और प्रकृति के सुन्दर स्वरूप को निहारे जा रहे थे। यह दृश्य देखकर, दिन के प्रथम भाग में क्वेंगश्वेंग पर्वत के भ्रमण के पश्चात श्रान्त हुये तन में चेतना का पुनर्संचार हो गया। लगभग चार घंटे हम वहाँ घूमे, आनन्द आ गया। वहाँ के स्थानीय पर्यटकों के लिये यह अत्यन्त भ्रमणीय स्थल है, सब के सब अपने परिवारों के साथ यहाँ उपस्थित थे। निश्चिन्त समय बिताने के लिये यह उपयुक्त स्थान है, कहीं भी बैठ जायें और प्रकृति को निहारते रहें। युगल भी पर्याप्त संख्या में वहाँ थे, यहाँ से अधिक आकर्षक वातावरण उन्हें और कहाँ मिलेगा भला।

२०० वर्ष पुराना बोन्साई
इस स्थान को एक सांस्कृतिक स्थान के रूप में भी विकसित किया गया है। यहाँ पर कई मंदिर देखे, उसमें गये भी, पर जल के प्रवाह का प्रश्न जो मन में कुलबुला रहा था उस कारण किसी और तथ्य पर ध्यान नहीं दे पाया। २२०० वर्षों के इतिहास को वहाँ पर सजा कर रखा गया है। विस्तृत क्षेत्र में फैले १५-२० ऐसे मंदिर भवन हैं जहाँ पर घूमने जाया जा सकता है। पहाड़ों के ऊपर नदियों पर दृष्टि करते हुये कई भवन बने हुये थे। हम लोगों की बहुत इच्छा थी कि वहाँ चला जाये पर पूरा घूमने के लिये २-३ दिन और चाहिये थे। वहाँ जाने के बाद ही हम नीचे बहती उन्मुक्त नदी के प्रवाह का आलौकिक रूप देख सकते हैं।  यहाँ पर सब प्रकृतिमय लगता है, ज्ञान, विज्ञान, समाज और परिवेश। व्यक्ति को यहाँ पहुँचकर अपने मूल का आभास हो आता है। प्रकृति-पुरुष का संतुलन और प्रकृति का निश्चिन्त प्रवाह, यहाँ के हर दृश्य में व्यक्त है।


अगले ब्लॉग में चीन के बारे में शेष बातें।

24.9.16

चीन यात्रा - १६

टेराकोटा सेना
दिन एक था और विकल्प ढेरों। बहस इस बात पर चली कि छुट्टी के दिन कहाँ चला जाये? बहुतों की इच्छा जियान स्थित टेराकोटा सेना देखने की थी। दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के एक राजा ने अपनी मृत्यु के बाद अपनी रक्षा के लिये मिट्टी की सेना बनवायी थी। ८००० सैनिक, १३० रथ, ५२० घोड़े और १५० घुड़सवारों से सज्ज यह स्थान पिछले वर्ष भारतीय प्रधानमंत्री की चीन यात्रा के समय चर्चा में आया था। चेन्दू और जियान के बीच कोई बुलेट ट्रेन नहीं चलती है। अन्य ट्रेन से जाने में समय सीमा का उल्लंघन हो रहा था और हवाई यात्रा में धन बहुत अधिक लग रहा था। अन्य व्यवस्थाओं को जोड़कर पूरी यात्रा में लगभग बीस हजार रुपये का व्यय आ रहा था। इसके अतिरिक्त वहाँ पर भी पूरा समय दौड़भाग में ही बीतना था। एक तिहाई समूह फिर भी उत्साहित था पर सबका साथ नहीं होने और अन्य विकल्प होने के कारण आग्रह छोड़ दिया गया।

लेशान के बुद्ध
दूसरा विकल्प लेशान के बुद्ध का था। तीन नदियों के संगम किनारे एक खड़ी चट्टान पर ७१ मीटर की बुद्ध प्रतिमा उनके मैत्रेय रूप को दर्शाती है। आना और जाना बुलेट ट्रेन से था। यात्रा पूरे एक दिन की थी। बताया गया कि मूर्ति के नीचे से ऊपर तक जाने में बहुत घूमकर जाना पड़ता है। मूर्ति अत्यन्त सुन्दर है, पर औद्योगिक प्रदूषण और सरकार की उपेक्षा के कारण अच्छी स्थिति में नहीं है। तीसरा विकल्प लांगकुआन झील का था। यह चेन्दू से ३८ किमी दूर है और बहुत बड़े क्षेत्र में फैली है। इसके बीच में कई टापू हैं और इसका प्राकृतिक सौन्दर्य मन मोह लेता है। यहाँ पर भी पूरा दिन लग जाता है। चौथा विकल्प दो स्थानों का था, दिन के प्रथम भाग में क्वेंगश्वेंग पर्वत और दूसरे भाग में दूजिआनयान बाँध को देखने का। दोनों ही चेन्दू के पास ही हैं और सुबह शीघ्र प्रारम्भ करके सायं तक देखे जा सकते थे। दो स्थानों का लोभ अन्य तीन विकल्पों से अधिक उपयोगी लगा, पर यदि समय मिलता तो मैं सारे स्थान देखता। इसके लिये आपके पास ४ अतिरिक्त दिन होने चाहिये।

लांगकुआन झील
हम लोग सुबह ही निकल गये। क्वेंगश्वेंग पर्वत चेन्दू से ६६ किमी है और दूजिआनयान बाँध वहाँ से १५ किमी है। हम बस से गये, हमारी गाइड का नाम जॉय हान था, उसने क्वेंगश्वेंग पर्वत पहुँचने तक के समय में चीन के कई महत्वपूर्ण तथ्य बतलाये। अंग्रेजी का उच्चारण कठिनता से होने के बाद भी संवाद स्पष्ट था। पानी बरस रहा था और वातावरण सुहावना था, हम लोग कब वहाँ पहुँच गये पता ही नहीं लगा। बीच में खेतों और मानव निर्मित जंगल की कतारें थीं, एक इंच भूमि भी रिक्त नहीं थी। हमारे देश में खेतों के बीच की मेड़ों में ही इतना स्थान छोड़ दिया जाता है कि जिसमें किसी छोटे देश के लिये अन्न की व्यवस्था हो जाये।

सहज प्राकृतिक सौन्दर्य
क्वेंगश्वेंग पर्वत टाओ का प्रमुख केन्द्र है, उसका उद्भव स्थान है। यहाँ पर कई बौद्ध स्थल भी हैं। पर्वत के दो भाग हैं, सामने का और पीछे का। सामने का भाग सांस्कृतिक और प्राकृतिक दृष्टि से घूमने योग्य है, हम लोग वहीं पर ही गये। पीछे का भाग पूर्णतया मनोरंजन और प्रकृतिप्रेमियों के लिये है, समयाभाव के कारण हम वहाँ नहीं जा पाये। चोटी तक पहुँचने के लिये हमने परिवहन के सारे संभावित साधनों का प्रयोग किया। बस से वहाँ पहुँचने के बाद हमें इलेक्ट्रिक कार से अन्दर तक ले जाया गया। वहाँ से हम सीढ़ियों से पहाड़ों पर चढ़े। वहाँ से एक नाव से आगे के स्थान पर पहुँचे और अन्त में रोपवे के माध्यम से ऊपर तक गये। पुनः पैदल चल कर टाओ के मंदिर पहुँच सके। इस प्रकार की व्यवस्था में पर्वत का मौलिक स्वरूप और वन को संरक्षित रखा गया है। बीच में शांगक्विंग महल है, ऊपर शैंक्विंग मंदिर है, मार्ग के चारो ओर घना जंगल और बीच बीच में विश्राम करने के सुविधाजनक स्थान। पहाड़ों पर चढ़ाई के समय दृश्यों के आनन्द ने हमारी थकान को दूर रखा।

झील के सम्मुख
पर्वत के नीचे समतल भाग में पुष्पों और पौधों को सौन्दर्यपूर्ण ढंग से व्यवस्थित किया गया है। प्रकृति स्वयं में ही बहुत सुन्दर होती है, उसे यदि उत्कृष्ट मानवीय संयोजन मिल जाये तो वह स्वयं प्रसन्न हो जाती है और अपने प्रभावक्षेत्र में आने वाले हर जीवजन्तु और मानव को अह्लाद से भर देती है। प्रकृति के बीच आकर लगता है कि अपने ही घर आ गये हैं। सदियों बाद जब मानव औद्योगिकीकरण का निष्पक्ष विश्लेषण करने बैठेगा तो प्रकृति की घनघोर उपेक्षा और कृत्रिमता का आलिंगन उसे अंदर तक कचोटेगा। अनियन्त्रित जंगल में भी एक लय है और तथाकथित नियन्त्रित कांक्रीट के आकार रुक्षता भरे दिखते हैं। प्रत्यक्ष को प्रमाण माना जाय तो इस यात्रा के अपने चित्रों को मैं स्वयं ही पहचान नहीं पाया। स्वयं का इतना प्रसन्न और आनन्दमय कहीं नहीं पाया था, तनावमुक्त और संतुष्ट।

उत्साही समूह
पहाड़ पर चढ़ाई प्रारम्भ करने के पहले एक बड़ा ही उत्साही समूह मिला, पर्यटन में आकण्ठ आनन्दमग्न, संभवतः प्रकृति ने उनके परिवार में एक ऊर्जा भर दी हो। उनके उत्साह और ऊर्जा ने हमें भी प्रभावित किया। सीढ़ियों पर चढ़ते समय हम लोग हिन्दी साहित्य के कवियों की रचनाओं का सस्वर पाठ कर रहे थे, जिसको जो भी याद था। आस पास से निकलने वालों को आश्चर्य भी हो रहा था और अच्छा भी लग रहा था। आश्चर्य तो हम सबको भी हो रहा था क्योंकि इस प्रकार का प्रस्फुटन सामान्य परिस्थितियों में होना संभव नहीं है। पहली बार यह भी ज्ञात हुआ कि हम सबको अभी तक कितना कुछ याद है। कामायनी, उर्वशी, रश्मिरथी, शिवस्त्रोत, हिमाद्रि तुंग श्रृंग से और न जाने क्या क्या। प्रकृति यहाँ एकान्त बैठ निज रूप सँवारति, पल पल पलटति भेष, छनिक छवि छनि छनि धारति। निराला, दिनकर, प्रसाद अपनी अपनी छायाओं से बाहर आ गये थे। अपने मित्रों का साहित्यिक पक्ष जानकर सुखद आश्चर्य हुआ और सीढ़ियाँ कब पार हो गयीं, पता ही नहीं चला।

बीच रास्ते में एक मनोरंजक दृश्य दिखा। किसी बात को लेकर एक पत्नी अपने पति को जी भर के हड़का रही थी। कारण तो समझ में नहीं आया पर पति चुपचाप खड़ा सुन रहा था, एक हाथ में झोला पकड़े, दूसरे में बच्चे को। यह समझ नहीं आ रहा था कि किस बात पर डाँट पड़ रही है,  पर जिस तरह से पति खड़ा निर्विकार भाव से सब सह रहा था, उससे तो वह सिद्धपुरुष सा दिख रहा था। कृष्ण की अर्जुन को सहन करने की सलाह “तांस्तितिक्षस्व भारत” या टाओ का अकर्म “वू वाई”, इन दोनों में से किसी एक तत्व का ज्ञाता होगा वह पति, भारतीय पतियों की तरह ही।

यिन यांग
टाओ दर्शन सिद्धान्त की दृष्टि से अत्यन्त ही सहज है, इसकी व्यापकता व्यवहार में है। आपको हर क्षेत्र में टाओ को अपनाना होता है तब आप वह हो जाते हो। भारतीयों के लिये यह समझना कठिन नहीं है क्योंकि टाओ के हर सिद्धान्त या व्यवहार के लिये आप गीता, उपनिषद, रामचरितमानस आदि ग्रन्थों से पाँच उद्धरण सामने रख देंगे। कम शब्दों में कहें तो सरलता, सत्यता और प्रकृतिलयता से टाओ परिभाषित होता है। टाओ के प्रमुख तीन सिद्धान्त हैं। पहला सिद्धान्त है एकात्मता का, ब्रह्मन् जैसा, सब आपस में संबद्ध। दूसरा सिद्धान्त है यिन यांग का, विपरीतों में संतुलन, द्वन्द्व जैसा। तीसरा सिद्धान्त है वू वाई का, अकर्मता का, प्रकृति की लय को न छेड़ने का, पानी की तरह बह जाने का, व्यवहार का सहज मार्ग विकसित करने का। इन सिद्धान्तों को गहराई से समझें तो टाओ और बौद्ध में अन्तर करना कठिन हो जाता है। 

टाओ
वू वाई के सिद्धान्त पर जब एक साधक से पूछा कि आप फिर भी इतने कर्मशील क्यों हो, इतने श्रमशील क्यों हों, किसके लिये इतने उपक्रम विकसित कर रहे हो? उत्तर सुनकर हृदय अंदर तक तृप्त हो गया। साधक ने बताया कि मैं अपने कर्म को औरों की सेवा के रूप में देखता हूँ, जुड़ता भी हूँ, संतुलन भी रहता है और अकर्मता का भी बोध होता है, “कर्मण्येवाधिकारस्ते”। मन में विचार आया कि कहीं कृष्ण महाराज एक आधा अध्याय इनको भी तो नहीं सिखा गये, जाने के पहले। इस यात्रा के बाद तन श्रान्त था, मन शान्त था, आत्मा प्रफुल्लित थी, अस्तित्व संतुष्ट था।


अगले ब्ल़ॉग में दूजिआनयान बाँध के बारे में।

21.9.16

चीन यात्रा - १५

चाय हाउस
पीपुल्स पार्क नाम के अनुरूप सबके लिये बनाया गया है, यहाँ पर प्रत्येक के लिये कुछ न कुछ है। आप पैडल नौका में घंटों घूमिये, टी हाउस में चाय पीजिये, पेड़ की छाया में बैठिये, अखबार या पुस्तक पढ़िये, ओपेरा या नाटक देखिये, बैंड के सम्मुख संगीत सुनिये, उनके साथ गुनगुनाइये, धुनों पर थिरकिये, गाना चाहें तो गाना गाइये, वृद्धों के साथ धीमा और सामूहिक नृत्य कीजिये, उछलिये, कूदिये, चांग खेलिये, मित्रों के साथ ताश खेलिये, कहीं कोने में बैठकर शतरंज के मोहरों की चाल समझिये, मन करे तो बाँसुरी बजाइये, हरी घास और पौधों को निहारिये। बच्चों के लिये झूले, युवाओं के लिये प्रकृति और एकांत, साधकों के लिये एकाग्रता और वृद्धों के लिये अपने जैसों का संग, सबके लिये बना है पीपुल्स पार्क।

सामूहिक नृत्य
अच्छे सामाजिक जीवन के लिये यह आवश्यक है कि हम ऐसे स्थानों का निर्माण करें जहाँ लोग मिल जुल सकें, विचारों और भावों का आदान प्रदान कर सकें। यदि हम नहीं बनायेंगे तो मानव मन की उत्कट सामाजिकता कोई न कोई मार्ग ढूढ़ निकालती है, कभी सहज, कभी असहज। समुचित दिशा न दिखायी गयी तो सामाजिकता की यही प्यास घातक भी हो जाती है। भले ही चीन में स्वयं को व्यक्त करने की लोकतान्त्रिक स्वतन्त्रता न हो पर सामाजिक स्थानों को बहुत ही सुन्दर ढंग से विकसित कर जीवन का सामाजिक पक्ष सुदृढ़ रखा गया है। भारत में मंदिर ऐसे ही स्थान होते थे, गाँवों की पंचायत, त्योहार, मेले और अब मॉल। चीन में मंदिर नहीं हैं, मेले और त्योहार भी गिने चुने एक दो ही हैं, मॉल भी नगरों तक ही सीमित हैं अतः सामाजिकता का पूरा दायित्व पार्कों के ऊपर ही है। संस्कृति, मनोरंजन और वाणिज्य, ये तीनों पक्ष इन पार्कों में सम्मिलित रहते हैं।

ताइ ची अभ्यास
हम लोग बस से पीपुल्स पार्क पहुँचे और दक्षिण द्वार से अन्दर गये। सबसे पहले बच्चों के खेलने का स्थान था। एक चौतरफा घुमाने वाले झूले में कुछ बच्चे उत्साह से चीख रहे थे, कुछ भय से। नीचे खड़े अभिभावक हाथ भींचे मनोरंजन और कष्ट की सीमारेखा को लहराता हुये देख रहे थे। दृश्य बड़ा ही रोचक था, कभी हम अभिभावकों की बद्ध मनःस्थिति में रहते और कभी बच्चों की उन्मुक्त मनःस्थिति में। थोड़ा समय बिताकर हम आगे बढ़ गये। पार्क का अधिकांश भाग हरा भरा था, अन्दर एक झील थी, दो ऐतिहासिक स्मारक थे। एक स्मारक रेलवे को निजी कम्पनियों के हाथ में जाने से बचाने का था। १९११ में राजा द्वारा धन कमाने हेतु रेलवे को विदेशी कम्पनियों को बेच दिया गया था। उसके विरुद्ध उमड़े आन्दोलन के हुतात्माओं की याद में यह स्मारक खड़ा है। हम सायं के समय वहाँ पहुँचे थे, बहुत लोग टहल रहे थे, कई लोग पारम्परिक ध्यान मुद्राओं में एकाग्र थे, युवा अपनी आत्मीय बातचीत में तल्लीन थे। हम लोग चाह रहे थे कि उस दिन कोई और स्थान भी देख लिया जाये पर जब पाया कि यहीं पर ही देखने के लिये कितना कुछ था तो अपना मन बदल दिया और पीपुल्स पार्क में ही सारा समय बिताकर रात को ही वापस आये। आनन्द पूर्ण आया, हम लोगों की तरह ही स्थानीय निवासी अपने दैनिक कार्यक्रम से पर्याप्त समय निकाल कर यहाँ आते होंगे। यह स्थान छूकर आने वाले स्थानों में से नहीं है, यहाँ का आनन्द यहाँ बिताये समय पर निर्भर करता है।

जिनली का द्वार
वू हाउ मंदिर और जिनली रोड आसपास हैं। जिनली रोड एक बहुत पुराना व्यापारिक केन्द्र है। वू हाउ मंदिर के पूर्व में स्थित यह रोड २०० वर्ष ई पूर्व में भी इतनी ही व्यस्त रहती थी। वू हाउ मंदिर में उस कालखण्ड के स्मृतिचिन्ह रखे हुये हैं। उसी कालखण्ड में जिनली रोड कपड़े के व्यापार के लिये प्रसिद्ध रही है। बाहर एक बड़ा सा द्वार है और अन्दर सड़क के दोनों ओर पारम्परिक भवन, खानपान, कपड़े, हस्तकारी, चाय और मसालों आदि की दुकानें। पीपुल्स पार्क और चुन्क्सी रोड की तुलना में यहाँ पर चहल पहल कहीं अधिक थी। हम लोग कपड़ों की दुकान में गये, एक विशेष प्रकार के रेशम का मूल्य देखकर दंग रह गये। एक महिला अत्यन्त सुमधुर वाद्ययन्त्र बजा रही थी, हमने फोटो लेनी चाही तो उसने शालीनता से मना कर दिया। खानपान के स्टालों के पास भी हम खड़े नहीं हो पाये, पशु बसा में पकाये गये पकवानों की गन्ध वितृष्णा उत्पन्न कर रही थी। 

भित्ति कमल
दीवारों और द्वारों पर बने भित्तिचित्र और आकार बड़े ही रुचिकर थे। एक दुकान में विशेष प्रकार का धनुषबाण देखा। उसका छोटा प्रतिरूप लेकर आने की इच्छा थी, पर भार अधिक होने के कारण और कस्टम द्वारा पारित न करने की संभावना के कारण उसका विचार त्याग दिया गया।  यहाँ की हस्तकारी अन्य स्थानों की तुलना में अच्छी और विविधता भरी थी, पर मोल भाव तनिक भी न था। हमारे समूह का एक भाग दुकानों की विविधता में ही व्यस्त हो गया, हम उसे छोड़कर जिनली रोड के अन्य पक्ष देखने आगे बढ़ गये। हमें एक तिब्बती दुकान भी मिली, वहाँ पर बड़ा अपनत्व लगा। उस युवा ने न केवल बड़े उराव से वस्तुओं को दिखाया वरन उनके मूल्य भी कम कर दिये। उसी परिसर में स्थित वू हाउ मंदिर झूग लियांग को समर्पित है, जिन्हें बुद्धिमत्ता और अच्छी राजनीति का प्रतीक माना जाता है। मंदिर सुन्दर है पर रात में बन्द हो जाने के कारण हम उसे देख नहीं पाये। जिनली रोड से बाहर आने के पहले वहाँ की छतों में रंगबिरंगी लालटेनों से सारा परिवेश जगमगा उठा था। इसी जगमग को निहारने में हमें बाहर निकलने में देर भी हो गयी।

लटकी लालटेनें
जो आनन्द और संतोष अन्य जनस्थानों पर मिला, वह बात यहाँ नहीं मिल पायी। संभवतः अधिक भीड़ और कम क्षेत्रफल के कारण यह क्षेत्र वह प्रभाव उत्पन्न नहीं कर पाया। वातावरण आधुनिक मॉलों जैसा था। जो शान्ति और शालीनता एक मंदिर परिसर में होनी चाहिये उसका सर्वथा आभाव इस स्थान पर मिला। यहाँ सौम्यता की तुलना में व्यवसायिकता कहीं अधिक थी, पर हमारे आनन्द में कोई कमी नहीं रही। जिनली रोड के बाहर भी मुख्य सड़क के दोनों ओर कई दुकानें थी जिनमें पर्यटक व्यस्त दिखे। हम लोग वापस आने के दो दिन पहले ही वहाँ गये थे अतः सब लोगों में घर के लिये कुछ न कुछ खरीद लेने की व्यग्रता थी। खरीददारी के लिये जिनली रोड और उसके आसपास का क्षेत्र बड़ा उपयोगी सिद्ध हुआ।


अगले ब्लॉग में क्वेंगश्वेंग पर्वत और दूजिआनयान बाँध।

14.9.16

चीन यात्रा - १४

यदि चेन्दू को अंतरिक्ष से देखा जाये तो एक ओर पर्वतमालायें, समतल पर नदियों का नीला जाल और हरे रंग से आच्छादित शेष धरती। पश्चिमी चीन का महत्वपूर्ण नगर चेन्दू सदा से ही प्रचुरता का स्थान माना गया है, व्यापारिक गतिविधियों का स्वाभाविक केन्द्र। कहते हैं कि कागज के नोटों का प्रचलन यहीं से प्रारम्भ हुआ था। चाय, मसाले और खाद्यान्न की प्रचुर उपलब्धता और सम वातावरण के कारण यहाँ पर लोग बसते रहे। संस्कृति, विज्ञान और इतिहास के कई अध्यायों से पटे इस नगर में पर्यटकों को देखने के लिये बहुत कुछ है। 

विज्ञान संग्रहालय के सम्मुख देवी प्रतिमा
जूते पहने श्वान
टियान्फू चौक और चुन्क्सी रोड, दोनों ही आसपास हैं और एक साथ ही देखे जा सकते हैं। टियान्फू चौक आधुनिक नगर का केन्द्र है और चुन्क्सी रोड पुरातन काल से ही चेन्दू का वाणिज्यिक केन्द्र रहा है, सदियों से सारा व्यापार यहीं से ही संचालित होता रहा है। यद्यपि पुराने हाटों का स्थान नये और आधुनिक निर्माणों ने ले लिया है पर कुछ गलियों को उनके मौलिक स्वरूप में संरक्षित करके रखा गया है। आप देखकर कल्पना कर सकते हैं कि किस प्रकार क्रय विक्रय योग्य वस्तुओं का यहाँ जमावड़ा लगता होगा, भीड़ और उत्सुकता भरी चहल पहल बनी रहती होगी। वर्तमान में भी कुछ नहीं बदला है। सायं होते होते लगता है कि सारा चेन्दू यहीं पर ही आ गया हो। हम लोग बस से वहाँ के लिये चले थे पर त्रुटिवश लगभग एक किमी पहले ही उतर गये। जहाँ पर उतरे थे वहाँ से पैदल चलने में स्टेडियम और विज्ञान संग्रहालय देखने को मिले। सर्वाधिक रोचक दृश्य चार जूते पहने एक छोटे कुत्ते का था। देखकर लग रहा था कि वह कष्ट में है, पर पता नहीं हम लोग जानवरों को मनुष्य की तरह ढालने में क्यों लगे रहते हैं।   

टियान्फू चौक
लिपटे ड्रैगन
कहते हैं कि जिस स्थान पर अभी टियान्फू चौक है वहाँ पर कभी राजमहल होता था। सांस्कृतिक विद्रोह के समय उसे ढहा दिया गया। राजशाही के सारे संकेत मिटाकर संस्कृति और आधुनिकता को एक साथ पिरोकर इस स्थान की परिकल्पना की गयी है। टियान्फू चौक नगर के मध्य में एक बहुत बड़ा समतल स्थान है और इसका क्षेत्रफल लगभग अठ्ठासी हजार वर्गमीटर है। इस परिसर में कोई ऊँचा निर्माण नहीं, बस कांक्रीट का सपाट समलत। इसके एक ओर विज्ञान संग्रहालय है जिसके सम्मुख विशाल झण्डे के साथ माओ की बड़ी प्रतिमा लगी है। अन्य दिशाओं में ऊँची अट्टालिकाओं में स्थित व्यापारिक प्रतिष्ठान हैं। वर्गाकार चौक के अन्दर एक वृत्ताकार आकृति है। यह टाओ का प्रतीक चिन्ह है, दो भागों में बराबर बटा, यिन और यांग, पुरुष और प्रकृति के प्रतिरूप, नर और नारी के प्रतीक। बस थोड़ा सा अन्तर केन्द्र का लघु वृत्त है जिसमें चीन के पुरातन संस्कृति के प्रतीक सुनहरे सूर्य पक्षी का प्रतिरूप लगाया गया है। यिन और यांग आकृतियों के केन्द्र में लिपटे ड्रैगन के आकार के दो फव्वारे लगे हैं। पूर्वी भाग एक तल नीचे है और इस खुले हुये भाग के चारों ओर दुकाने हैं। संस्कृति और आधुनिकता के सम्मिलित रूप का बड़े ही सुन्दर ढंग से समन्वय किया गया है। विशेषकर रात्रि में इस परिसर की शोभा और भी बढ़ जाती है, हर ओर जगमगाहट, खुला स्थान और मानवीय चहल पहल।

इस चौक के भूमिगत एक पूरा का पूरा बाजार बसा है, दो भूमिगत मेट्रो लाइनें यहीं पर आकर मिलती हैं। नगरीय सेवाओं की बसें परिसर के चारों ओर से मिल जाती हैं। किसी भरे पूरे पुराने बसे नगर के केन्द्र में, जहाँ भूमि की भाव सातवें आसमान पर होते हैं, इतना सपाट मैदान निकाल पाना अपने आप में उपलब्धि है। यहाँ से दो किमी की परिधि में चुन्क्सी रोड, पीपुल्स पार्क, विज्ञान, कला और ऐतिहासिक संग्रहालय, स्टेडियम, सिचुआन पुस्तकालय सहित कई परिसर स्थित हैं। सभी के सभी भवन भव्य हैं और स्थापत्य वैशिष्ट्य परिलक्षित करते हैं। यही कारण है कि यहाँ पर आने के बाद सब कुछ देखने में पूरा दिन निकाला जा सकता है। हम लोगों के पास समयाभाव था अतः हम लोग यहाँ से पैदल टहलते हुये चुन्क्सी रोड पहुँच गये।

चुन्कसी रोड
मन में तो कल्पना थी कि यह पुरानी दिल्ली की व्यस्त और भीड़ भरी गलियों के जैसी ही होगी। भूमिगत बाजार के मार्ग से होते हुये जैसे ही हम खुले भाग में पहुँचे, हमारी बद्ध कल्पना हमें छोड़कर जा चुकी थी और जो सामने था वह हमें आश्चर्यचकित करने के लिये पर्याप्त था। चुन्क्सी रोड एक चौड़ी सी सड़क है। इसका निर्माण चेन्दू के दो व्यापारिक केन्द्रों को जोड़ने के लिये १९२४ कराया गया था। इसका क्षेत्रफल लगभग दो लाख वर्गमीटर है। अपने चारों ओर यह अन्य वाणिज्यिक रोडों से जुड़ी हुयी है। इसके दोनों ओर दुकाने हैं जिसमें पारम्परिक वस्तुओं से लेकर अत्याधुनिक समान तक मिलता है, मोलभाव भी बहुत होता है। साथ ही चीन भर के खाने पीने की विविधता यहाँ देखने को मिल जाती है, हर तरह का खाद्य, ठेले से लेकर पाँच सितारा तक। चौड़ी सड़क होने के कारण यहाँ पर खरीददारी के अतिरिक्त और सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियाँ चलती रहती हैं, बिना किसी व्यवधान के । लोग अपने परिवार के साथ बैठे बतियाते मिलेंगे, युवावर्ग अपने आधुनिकतम और न्यूनतम फैशन के परिधानों से आपको हतप्रभ कर देंगे। कुछ नहीं तो लोग सेल्फी खींचने में व्यस्त दिख जायेंगे। यहाँ पर आने का कोई न कोई कारण निकाला जा सकता है क्योंकि यहाँ पर कुछ न कुछ होता रहता है। आसपास भी घूमने के कई स्थान हैं और सायं होते होते सब लोग यहीं सिमट आते हैं। करने को कुछ नहीं भी हो तो बस समय बिताने भी यहाँ आया जा सकता है। पूरा परिदृश्य एक चलचित्र की तरह सामने घूमता सा दिखता है। 

ऐश्वर्यकृत बाथरूम
मित्रों ने बताया कि यहाँ पर हर बड़ी और मँहगी ब्राण्ड की वस्तुयें मिल जाती हैं। बड़े बड़े मॉल देखकर लगा कि विश्व का ऐश्वर्य इन्हीं दुकानों में आकर सिमट गया हो। ऐसे ही एक मँहगे मॉल (IFS) में एलेवेटर सीधे दूसरे खण्ड में ले गया। चमचमाती दुकानों के बीच में बना एक बाथरूम भी स्वर्ग से ही अवतरित लग रहा था। कुछ मित्रों को वह इतना अच्छा लगा कि उन्होंने वहाँ अपने चित्र भी खिंचवाये। वहाँ से जब बाहर निकले तब कहीं जाकर अपने विश्व में होने का बोध हुआ। अपने संबंधियों और मित्रों के लिये भेंट करने की कई वस्तुयें सबने बाहर आकर ही लीं। बाहर विज्ञापनों की बड़ी स्क्रीनें ही इतना प्रकाश उत्पन्न कर रही थीं कि चुन्क्सी रोड में दिन सा वातावरण लग रहा था।

चुन्क्सी रोड से अन्य वाणिज्यिक रोडों को जोड़ने वाली गलियों को पारम्परिक स्वरूप दिया गया है। पुरानी गलियों को संरक्षित कर शताब्दियों पहले क्या वातावरण रहता होगा, उसे दर्शाने की चेष्टा की है। यहाँ से दस मिनट की दूरी पर डाची का बौद्धमठ है। १६०० वर्ष पहले स्थापित यह मठ चीन का प्राचीनतम और विशालतम मठ है। यह बौद्ध संस्कृति का बड़ा संग्रहालय है। सायं को यह मठ बंद हो जाने के कारण हम लोग यहाँ जा नहीं पाये।


जिनली रोड और पीपुल्स पार्क अगले ब्लॉग में।

10.9.16

चीन यात्रा - १३

चेन्दू का इतिहास ३००० वर्ष से भी अधिक पुराना है। नगर में और उसके आसपास इतिहास के साक्ष्य बिखरे पड़े हैं। देखने को बहुत कुछ था पर समय की बाध्यता थी। दिन भर सेमिनार में निकल जाता था, सायं का समय मिलता था चेन्दू को टटोलने के लिये। बीच में एक सप्ताहान्त था पर शनिवार का अवकाश न होने के कारण केवल रविवार का दिन ही घूमने के लिये मिल पाया। उसी को देखते हुये पर्यटन की योजना बनायी गयी और जैसा अपेक्षित था, निकट के ही स्थान दर्शनार्थ नियत किये गये।

डू फू की कुटिया, वाइड एण्ड नैरो एले, पाण्डा संरक्षण केन्द्र, टियान्फू चौक, चुन्क्सी रोड, जिनली रोड, वू हाउ मंदिर, पीपुल पार्क, क्वेंगश्वेंग पर्वत, दूजिआनयान बाँध, ये दस स्थान थे जहाँ पर हम घूमने जा सके। बाँध और पर्वत नगर में नहीं थे, उन्हें छुट्टी के दिन देखा गया। शेष नगर में ही थे, एक दूसरे के आसपास ही, इस कारण एक दिन में दो स्थान भी देखे जा सके। इसके अतिरिक्त कई ऐसे स्थान थे जहाँ पर जाने की तीव्र इच्छा के बाद भी समयाभाव के कारण नहीं देखे जा सके। इनमें लेशान के बुद्ध, लांगकुआन झील और टेराकोटा सेना प्रमुख हैं, इन तीनों को देखने के लिये आपके पास ३ दिन का अतिरिक्त समय होना चाहिये। इन स्थानों के अतिरिक्त मेरी रुचि वहाँ के स्थानीय जनजीवन में भी थी। रेल विश्वविद्यालय के पास की गलियों में, स्थानीय बाजारों में, फल फूल बिक्री के स्थानों पर और ऐसे ही कितनी निष्प्रयोजनीय भ्रमणिकायें करने हम शेष दिनों में निकले।
डू फू
डू फू परिसर
डू फू चीन के महानतम कवियों में से एक हैं। ८वीं शताब्दी में लिखी उनकी लगभग पन्द्रह सौ कवितायें आज भी पढ़ी जाती हैं। सन्त कवि के नाम से विख्यात डू फू एक प्रशासनिक अधिकारी थे। अपनी स्पष्टवादिता के कारण उन्होंने कई स्थान बदले, लम्बी यात्रायें की और पर्याप्त कष्ट सहे। तत्कालीन चीनी समाज को विनाश पर लाकर खड़ा करने वाले लुसान विद्रोह को उन्होंने निकट से देखा। जो देखा, जो अनुभव किया, जो निकट रहे, जो सुना, प्रकृति, भाव, ध्यान, मित्रता, तटस्थता आदि सब कुछ उन्होंने अपनी कविता के माध्यम से व्यक्त किया। यद्यपि चेन्दू में वह पाँच वर्ष ही रहे पर यह समय उनकी कृतित्व का प्रवाहमान काल था। कविता से अपनत्व होने के कारण उनकी कुछ कविताओं को मैंने पढ़ा भी। अंग्रेजी के अनुवाद संस्कृति के सूक्ष्म और तरल पक्ष बताने में बहुधा असमर्थ रहते हैं, फिर भी कविताओं ने मुझे अत्यन्त प्रभावित किया। डू फू के रहने के स्थान को एक स्मारक का रूप दिया गया है, जहाँ पर डू फू के अतिरिक्त अन्य कवियों के भी संग्रहालय कक्ष हैं। पूरे परिसर की हरीतिमा और प्रकृति-संरचना मन मोह लेती है। घूमते समय यही आशा करता रहा कि काश संवेदना के कुछ कंपन मेरे हृदय में भी अनुनादित हो जाते।

वाइड एण्ड नैरो एले
वाइड एण्ड नैरो एले का शाब्दिक अनुवाद चौड़ी और पतली गलियाँ है। नगर के ऐतिहासिक परिवेश को इन गलियों में संरक्षित करके रखा गया है। नगरीकरण के कोलाहल को पीछे छोड़कर इन गलियों में आते ही ऐसा लगता है कि पारम्परिक चीन वहाँ पर जीवन्त हो स्वच्छन्द विचरण कर रहा है। विकास को इन गलियों से दूर रखा गया है। चीन की संस्कृति, खानपान, संगीत, जीवनशैली, भवनशैली, स्थापत्य, हस्तशिल्प आदि की विस्तृत उपस्थिति इन गलियों में दिखती है। पर्यटन की दृष्टि से इस प्रकार के स्थानों को संरक्षित करने का प्रयास चीन की सरकार ने किया है। अपने अतीत से जुड़ने के क्रम में संस्कृति और धर्म, दोनों से जुड़ना होता है। पर्यटन में जहाँ पर भी संस्कृति के हस्ताक्षर दिखे, धर्म को बड़े स्पष्ट रूप से विलग रखा है। साम्यवादी सरकारों का अविश्वास धर्म और संस्कृति पर बराबर रूप से होता है। जिस प्रकार संस्कृति के चिन्हों में धर्म अनुपस्थित मिला, यह लगा कि संस्कृति को अपनाने और धर्म को हटाने के लिये निश्चय रूप बड़ी बहस और बड़ा प्रयास करना पड़ा होगा। जो भी निष्कर्ष निकले हों, चीनी संस्कृति की पूर्ण उपस्थिति उन गलियों में दिखायी पड़ी। एक उत्सव सा वातावरण था वहाँ पर, मेले का उत्साह, कलाकारों की तन्मयता, व्यंजनों की मधुरिम सुगन्ध, बाँस और लकड़ी के बने पुराने घरों में चलह कदमी करते पर्यटक, घर के अन्दर बने उद्यानों में उड़ती चाय की महक, इतिहास के बिन्दु पर वह स्थान कालबद्ध हो गया था। वहाँ पर जाने के बाद बाहर आने का मन नहीं करेगा आपका। 
संगीतमय गलियाँ
बाँस खाता पाण्डा
पाण्डा बड़ा ही प्यारा दिखता है, श्वेत-श्याम में ढका भोला और भारी प्राणी। पाण्डा चीन की राष्ट्रीय धरोहर है। ये केवल चीन में ही पाये जाते हैं, इनकी कुल संख्या दो हजार के आसपास है, उसमें भी सत्तर प्रतिशत सिचुआन राज्य में हैं। चेन्दू सिचुआन राज्य की राजधानी है, यहाँ पर उनके संरक्षण का प्रयास स्वाभाविक ही है। चेन्दू से १० किमी दूर, पाण्डा संरक्षण केन्द्र में पाण्डा को उनके अनुकूल वातावरण दिया जाता है जिससे वे सुरक्षित रह सके और अपनी जनसंख्या बढ़ा सकें। कालान्तर में यह केन्द्र पर्यटन का प्रमुख बिन्दु बन चुका है। पाण्डा देखने के लिये बच्चे जितने उत्साहित दिखे, उससे कहीं अधिक उत्साह बड़ों में था। ९२ एकड़ में फैले इस परिसर का परिवेश पूर्णतया प्राकृतिक है और पर्यटकों को पर्याप्त दूरी से ही देखने की अनुमति है। बताया गया कि कुछ समय पहले तक पर्यटकों को उनके निकट तक जाने और उनको दुलराने की अनुमति थी। यहाँ पर नवजात पण्डा को भी अत्याधुनिक चिकित्सीय सुविधाओं में रखा जाता है और मनुष्य के बच्चे से अधिक सावधानी से रखा जाता है। अधिक बड़े हो जाने पर इन्हें जंगल में छोड़ दिया जाता है। 

बड़ा पाण्डा
यहाँ पर हर पाण्डा का नामकरण होता है। व्यक्ति या संस्थायें उसके पालन में आर्थिक सहायता कर सकती हैं, उन्हें ही नामकरण का अधिकार भी होता है। यहाँ बच्चों के भोजन का कक्ष है, सोने का कक्ष है, चिकित्सा का कक्ष है, खेलने का कक्ष है। बाँस की पत्ती पाण्डा का प्रिय भोजन है, यहीं कारण है कि इस परिसर में बाँस बहुतायत में बोया गया है। यहाँ पर पाण्डा के संरक्षण में समर्पण का भाव देखकर श्रीमती इंदिरा गाँधी ने लिखा था कि जहाँ पर पशुओं की इतनी देखभाल की जाती है वहाँ पर मनुष्यों का कितना ध्यान रखा जाता होगा। पता नहीं इंदिरा गांधी उनकी बढ़ाई कर रही थीं या कटाक्ष। पाण्डा के चित्र देखकर तो सबसे अधिक मेरे बच्चे उत्साहित थे। जब से कुंगफू पाण्डा नाम की फिल्म देखी है, पाण्डा ने उनके मनस में एक नायक का स्थान ले लिया है। उनका लगाव देखकर उनके लिये यादगार स्वरूप पाण्डा के छोटे खिलौने ले लिये।

परिसर की हरीतिमा
जब हम लोग वहाँ पहुँचे, वर्षा हो चुकी थी और वातावरण अत्यन्त सुखकर था। मित्रों के साथ भ्रमण करने में बड़ा ही आनन्द आया। जिस मनोयोग से पूरे स्थान को विकसित किया गया है और उसका रखरखाव किया जा रहा है, उसके लिये वहाँ के संचालक साधुवाद के पात्र हैं। बीच में एक झील है, हंस, मछलियाँ, बतख झील का जीवन्त स्वरूप बनाये रखते हैं। पास खेलते हुये बच्चे मगन थे, झील के किनारे खाने के स्टॉल थे, कुल मिलाकर वहाँ भी उत्सव सा लग रहा था। प्रकृति, मानव, पशु, पक्षी, सब मिल उत्सव मना रहे थे। यदि आपको चेन्दू जाने को मिले और पास में ३-४ घंटे ही हों तो पाण्डा संरक्षण केन्द्र अवश्य जायें। (यह प्रसन्नता की बात है और इनके परिश्रम और लगन का ही प्रतिफल है कि पाण्डा कल ही लुप्तप्राय प्राणियों की श्रेणी से बाहर आ गया है)


शेष स्थानों के बारे में अगले ब्लॉग में। 

7.9.16

चीन यात्रा - १२

माननीय राजदूत के साथ हम सब
बीजिंग से वापस चेन्दू लौटने के पहले हम सब भारतीय राजदूत श्री गोखले से शिष्टाचार भेंट करने गये। उनके सम्बोधन में रेल विश्वविद्यालय, बुलेट ट्रेन, विकास के विविध मॉडल और नौकरशाही की उभरती सोच, ये चार विषय प्रमुखता से थे। बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारतीय पक्ष दृढ़ता और स्पष्टता से रखने वाले भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी आजकल निश्चय ही असाधारण रूप से व्यस्त हैं। इस व्यस्तता में समय निकालने और हमें सम्बोधित करने के लिये हमने उनका आभार व्यक्त किया। 

बीजिंग में गैंजेस नाम के होटल में दोपहर का भोजन किया। बहुत दिनों बाद भारतीय भोजन मिला था अतः संतृप्त होकर आकंठ खाया। वहाँ से सीधे ही एयरपोर्ट के लिये निकले। सुरक्षा की दृष्टि से होने वाली तलाशी में संभावित देरी के कारण हम हर एयरपोर्ट पर २ घंटे का समय हाथ में लेकर चलते थे। बीजिंग एयरपोर्ट में लम्बी पंक्ति में प्रतीक्षा करते हुये किसी पुस्तक के दो तीन अध्याय पढ़े जा सकते हैं। खड़े खड़े और पूरे एयरपोर्ट में पैदल चलने से पूर्ण व्यायाम भी हो जाता है। स्थानीय निवासियों के लिये यह नियमित क्रम था, बहुतों को फोन पर लगे देखा, बातें कम कर रहे थे, चैट अधिक कर रहे थे। हवाई जहाज में एक सहयात्री चीनी भाषा में लिखी एक मोटी सी पुस्तक पढ़ रहा था। ध्यान जाने का प्रमुख कारण उस पर बने मशीनगन आदि शस्त्रों के चित्र थे। ऐसा तो नहीं लगता था कि वह किसी पाठ्यक्रम में पढ़ायी जाने वाली पुस्तक थी, पर इस बात की संभावना अवश्य थी कि चीनी उद्योगी एके ४७ का भी डुप्लीकेट तैयार करने के प्रयास में लगे हों।

हॉटपॉट, सड़क किनारे
हवाई जहाज में भोजन के नाम पर फल का रस और ब्रेड ही लिया जा सकता था। भोजन के मुख्य भाग में कौन सा जानवर पड़ा हो, इस बात की अनभिज्ञता से तो हमारे माँसाहारी मित्र भी भयभीत रहते थे। हम शाकाहारियों के लिये भोजन यात्रा का सर्वाधिक दुखद पक्ष था, हवाई जहाज में भी, होटल में भी और नगर में भी। चेन्दू को चीन में खानपान की राजधानी कहा जाता है, वहाँ की गलियों सा भोजन बड़ा स्वादिष्ट माना जाता है, विशेषकर हॉटपॉट। मसालों का पानी मेज के बीच में रखा रहता है, नीचे से आग सुलगती रहती है। उबलते उस बर्तन में माँसादि के टुकड़ो को चॉपस्टिक से उठा उठा कर मेज के चारों ओर बैठे लोग खाते हैं। उसी को हॉटपॉट कहा जाता है। सड़क के किनारे खुले भोजनालयों में सायं से ही ये दृश्य दिखायी पड़ जाते हैं। चीन में सायं बाहर भोजन करने प्रचलन अधिक है। लोग कहते हैं कि वर्तमान यह तनिक कम हुआ है, एक पीढ़ी पहले तक यह बहुत ही अधिक हुआ करता था।

चीन में भोजन सायं को ही हो जाता है। चेन्दू में हम लोग को भोजन सायं ६ बजे ही परस दिया जाता था, वहाँ पर सूरज डूबने के २ घंटे पहले ही। हम भारतीय ही अंग्रेजों के प्रभाव में आकर डिनर आदि करने लगे हैं, नहीं तो जैनियों की तरह सूर्यास्त के पहले भोजन कर लेना आयुर्वेद की दृष्टि से सर्वोत्तम माना गया है। भारत से ढाई घंटे का समयान्तर होने के कारण, भारतीय समय के अनुसार हमारा भोजन सायं ४-५ बजे के ही बीच हो जाता था। रात में सोने के पहले पेट से एक बार पुनः पुकार उठती थी, तब माँ के द्वारा बाँधे हुये भोजन के थैले खोले जाते थे, कभी किसी के कमरे में, कभी किसी के सूटकेस से। वहाँ अधिक समय रहना होता तो संभवतः पेट को समझाया जा सकता था पर १५ दिन के अन्तराल में पेट से उलझना हमें ठीक न लगा।

कभी खुशी
कभी गम
रोटी के अभाव और चिपके चावल पर निर्वाह ने पेट में इतना हल्कापन भर दिया कि पेट में सदा ही एक रिक्त सा लगता था। फल, सलाद और रस बहुतायत से शरीर के पोषण में रत रहे। मसालों की अनुपस्थिति ने हमारी स्वाद ग्रन्थियों को आंशिक रूप से निष्क्रिय कर दिया था। उबली सब्जी और चिपके चावल, यही जीवन में रस रंग के पर्याय बन चुके थे। मेरे दोनों बच्चों को चाइनीज खाना रुचिकर लगता है, उन्हें लग रहा था कि उनके पिताजी आनन्द की सातवीं सीढ़ी में होंगे। पर सत्य यही है कि हम भारतीय जिन मसालों में डुबोकर चाइनीज भोजन तैयार करते हैं उसकी तुलना में चीन का भोजन निस्वाद ही लगेगा, नमक भी न्यूनतम। बिटिया को विश्वास दिलाने के लिये नियमित रूप से मुझे अल्पाहार और भोजन के चित्र व्हाट्सएप्प में भेजने पड़ते थे, धीरे धीरे उसे विश्वास हो गया कि पिताजी किस तपस्या में जीवन जी रहे हैं।

पता नहीं क्या था यह
मांसाहारी मित्रों के लिये भी यह यात्रा बहुत उत्साहजनक नहीं थी। सप्ताह में एक बार खाने और विशेषकर मंगलवार में निषेध रखने वाले कई मित्रों का प्रारम्भिक उत्साह बहुत ही शीघ्र उड़ गया था।  नित्यप्रति और प्रतिदिन तीन बार मांसाहार तो किसी की भी भोजनचर्या में नहीं था। साथ ही साथ आशंका यह भी थी कि पता नहीं मुर्गे और मछली के नाम पर किस जीव जन्तु को सामने परोस दे। स्वाद से पता लगाना कठिन था और संभावनाओं के आधार पर शेष धर्म भी भ्रष्ट न हो जाये, इसकी चिन्ता तो उत्कट माँसाहारियों को भी थी। एक मित्र ने बताया कि उसमें पड़ा एक विशेष प्रकार का मसाला मसूड़ों में सनसनाहट उत्पन्न करता है। वे भी शीघ्र ही ऊब गये। उनके लिये भी सड़क के किनारे का भोजन तो और भी भय उत्पन्न करने वाला था। एक बार स्थानीय बाजार में टहलते हुये साँप आदि हर प्रकार के जीव को दुकानों पर पकते और लटकते देखा था, माँसाहार के प्रति हमारे मित्र का मोहभंग उसी दिन हो गया था। विनोद की दृष्टि से ही सही पर हम भारतीय अपने चीनी बान्धवों को माँसाहार के पैमाने पर कभी नहीं पछाड़ सकते क्योंकि वे सब कुछ खा सकते हैं। जब माँसाहारी मित्र बाहर खाने में हिचकते रहे तो हम शाकाहारियों की क्या सामर्थ्य। पूरी यात्रा में बस एक बार दूध की कुल्फी खाने का साहस कर सका।

जिस होटल में हम ठहरे थे उन्हें तो बता दिया गया था कि शाकाहारी और माँसाहारी भोजन अलग अलग लगाये जायें। एक तो भाषा के आधार पर एक दूसरे को न समझ पाने की दूरी और दूसरी कि किसको शाकाहार कहें किसे नहीं, यह उन्हें न समझा पाने का कष्ट। वहाँ पर शाकाहार को सूदा बोलते थे। भले ही उन्होने कोई व्यंजन सूदा या शाकाहार में रखा हो पर व्यंजन का नया रंग रूप और आकार देखकर हमारा संशय जाग जाता था। अपने माँसाहारी मित्रों को चखाने और पूर्णतया पुष्टि करने के बाद ही हम उसे खा पाते। इस पुनीत कार्य के लिये उनका हृदय से आभार।

सर्वाधिक कष्ट हमें तब हुआ जब यात्रा के बीच में किसी होटल में खाने गये। हर स्थान पर भोजन की बफे पद्धति ही थी। हर स्थान पर पर्याप्त भीड़ थी, ऐसा लगा कि पर्यटकों के अतिरिक्त आस पास कार्य करने वाले भी वहाँ नियमित आते होंगे। मूल्य भी बहुत अधिक नहीं, ६०-७० युआन अर्थात अधिकतम ७०० रु, व्यंजन १०० से भी अधिक, हर प्रकार के। वहाँ पर खाने योग्य व्यंजन ढूढ़ पाना एक महत कार्य था। फल, रस और दही तो निश्चिन्तता से ग्रहण किये जा सकते थे पर सलाद, आइसक्रीम,  सूप आदि में और क्या मिला हो उस पर संशय रहता था। मूल व्यंजनों में कुछ भी कहना कठिन था, उन्हें न लेना ही श्रेयस्कर था। उबली सब्जियाँ और चावल ही शेष रह जाते थे, उनका आभार कि हमारे अन्दर भी प्राण शेष रह पाये। अच्छा हो भविष्य में अधिक भारतीय वहाँ जाये और चीनियों को भी अपने पर्यटकीय आतिथ्य सत्कार में भारतीय खानपान को सम्मिलित करने में सहायता मिल सके।


चेन्दू और उसके दर्शनीय स्थान अगले ब्लॉग में।